शहीद औरंगजेब का बदला सेना अब उस ऑपरेशन से ले सकती है, जिससे आतंकी थर-थर कांपते हैं
भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर में एकतरफा संघर्षविराम पर बड़ा फैसला लिया है.
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कश्मीर घाटी में अब सेना की कार्रवाई दोबारा ज़ोर-शोर से शुरू हो जाएगी.
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रमज़ान का महीना शुरू हुआ तो भारत सरकार ने एकतरफा संघर्षविराम का ऐलान किया था. माने सेना अपनी तरफ से उग्रवादियों पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी. लेकिन इसके बावजूद उग्रवादियों की तरफ से लगातार हमले होते रहे. आजिज़ आकर भारत सरकार ने संघर्षविराम पर दोबारा विचार करने के लिए एक बैठक बुला ली थी. और बैठक का निचोड़ ग्रहमंत्री राजनाथ सिंह ने एक ट्वीट करके बता दिया. राजनाथ के ट्वीट के साथ ही जम्मू कश्मीर में उग्रवाद के इतिहास में 17 साल में पहली बार हुआ संघर्षविराम खत्म हो गया.
जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी साथ-साथ सरकार चला रहे हैं. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की मांग थी कि रमज़ान के महीने में सरकार घाटी में चल रहे अभियान रोक दे ताकि माहौल को सुधरने का एक मौका मिले. जम्मू कश्मीर में सरकार के खास प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा ने भी इस बात का समर्थन किया था. उनका मानना था कि लगातार उग्रवादियों के मारे जाने से घाटी की स्थिति काबू में नहीं आ रही है. एक के बाद उग्रवादियों के जनाज़े में भीड़ उमड़ रही थी और इससे उग्रवादियों को नए युवा भर्ती करने में आसानी हो रही थी.
इसी के मद्देनज़र 16 जून को एक ट्वीट करके राजनाथ सिंह ने एकतरफा सीज़फायर का ऐलान किया था. इसका मतलब ये था कि सेना और दूसरी सुरक्षा एजेंसियां घाटी में कोई नया ऑपरेशन नहीं चलाएंगे. 'ऑपरेशन ऑल आउट' बंद रहेगा. चाहे उग्रवादी संघर्षविराम में सहयोग करें न करें. सुरक्षा बल सिर्फ आत्मरक्षा गोली चलाएंगे या तब, जब उन्हें किसी आम नागरिक की जान बचाने के लिए गोली चलाना ज़रूरी लगे. इसे 'सीज़ ऑफ ऑपरेशन्स' कहा गया.

उग्रवादियों के जनाज़ों में कश्मीर में गन सैल्यूट तक हो जाता है. जनाज़ों से भावनाएं उमड़ती हैं और उग्रवादियों के भर्ती आसान होती है.
सरकार द्वारा जारी किए आंकड़ों के अनुसार संघर्षविराम के बावजूद घाटी में 65 पत्थरबाज़ी की घटनाएं हुई हैं. उग्रवादियों की तरफ से लगातार हमले हुए हैं. खासकर रमज़ान के आखिरी दिनों में. राइज़िंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या हुई. सैनिक औरंगज़ेब को अगवा करके मारा गया. दूसरी तरफ सेना और पुलिस की गोलियों से भी लोगों की मौतें हुईं. इसीलिए सरकार में संघर्षविराम को लेकर राय दोफाड़ हो गई थीं. एक धड़ा संघर्षविराम जारी रखना चाहता था तो दूसरे का मानना था कि संघर्षविराम घाटी में सुरक्षा के लिहाज़ से ठीक नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक संघर्षविराम जारी न रखने के फैसले के पीछे शुजात बुखारी और औरंगज़ेब की हत्या बड़े कारण हैं.
अब आगे क्या होगा?
सुरक्षा बलों को अपनी कार्रवाई जारी रखने को कहा गया है. इसका सबसे बड़ा नतीजा होगा ऑपरेशन ऑल आउट का दोबारा शुरू होना. इसके तहत सेना तब तक उग्रवादियों के खिलाफ अपने अभियान नहीं रोकेगी, जब तक आखिरी उग्रवादी मारा नहीं जाता या सरेंडर नहीं कर देता. माने इस ऑपरेशन की ज़द में वो भी आएंगे जिन्होंने औरंगज़ेब को अगवा करके उनकी हत्या की थी. 18 जून को दिनेश्वर शर्मा श्रीनगर जाएंगे और स्थिति का जायज़ लेंगे.
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The Government of India decides not to extend the suspension of operations in J&K announced in the beginning of Ramazan.
— HMO India (@HMOIndia) June 17, 2018
जम्मू कश्मीर में भाजपा-पीडीपी साथ-साथ सरकार चला रहे हैं. मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की मांग थी कि रमज़ान के महीने में सरकार घाटी में चल रहे अभियान रोक दे ताकि माहौल को सुधरने का एक मौका मिले. जम्मू कश्मीर में सरकार के खास प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा ने भी इस बात का समर्थन किया था. उनका मानना था कि लगातार उग्रवादियों के मारे जाने से घाटी की स्थिति काबू में नहीं आ रही है. एक के बाद उग्रवादियों के जनाज़े में भीड़ उमड़ रही थी और इससे उग्रवादियों को नए युवा भर्ती करने में आसानी हो रही थी.
इसी के मद्देनज़र 16 जून को एक ट्वीट करके राजनाथ सिंह ने एकतरफा सीज़फायर का ऐलान किया था. इसका मतलब ये था कि सेना और दूसरी सुरक्षा एजेंसियां घाटी में कोई नया ऑपरेशन नहीं चलाएंगे. 'ऑपरेशन ऑल आउट' बंद रहेगा. चाहे उग्रवादी संघर्षविराम में सहयोग करें न करें. सुरक्षा बल सिर्फ आत्मरक्षा गोली चलाएंगे या तब, जब उन्हें किसी आम नागरिक की जान बचाने के लिए गोली चलाना ज़रूरी लगे. इसे 'सीज़ ऑफ ऑपरेशन्स' कहा गया.

उग्रवादियों के जनाज़ों में कश्मीर में गन सैल्यूट तक हो जाता है. जनाज़ों से भावनाएं उमड़ती हैं और उग्रवादियों के भर्ती आसान होती है.
सरकार द्वारा जारी किए आंकड़ों के अनुसार संघर्षविराम के बावजूद घाटी में 65 पत्थरबाज़ी की घटनाएं हुई हैं. उग्रवादियों की तरफ से लगातार हमले हुए हैं. खासकर रमज़ान के आखिरी दिनों में. राइज़िंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या हुई. सैनिक औरंगज़ेब को अगवा करके मारा गया. दूसरी तरफ सेना और पुलिस की गोलियों से भी लोगों की मौतें हुईं. इसीलिए सरकार में संघर्षविराम को लेकर राय दोफाड़ हो गई थीं. एक धड़ा संघर्षविराम जारी रखना चाहता था तो दूसरे का मानना था कि संघर्षविराम घाटी में सुरक्षा के लिहाज़ से ठीक नहीं है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक संघर्षविराम जारी न रखने के फैसले के पीछे शुजात बुखारी और औरंगज़ेब की हत्या बड़े कारण हैं.
अब आगे क्या होगा?
सुरक्षा बलों को अपनी कार्रवाई जारी रखने को कहा गया है. इसका सबसे बड़ा नतीजा होगा ऑपरेशन ऑल आउट का दोबारा शुरू होना. इसके तहत सेना तब तक उग्रवादियों के खिलाफ अपने अभियान नहीं रोकेगी, जब तक आखिरी उग्रवादी मारा नहीं जाता या सरेंडर नहीं कर देता. माने इस ऑपरेशन की ज़द में वो भी आएंगे जिन्होंने औरंगज़ेब को अगवा करके उनकी हत्या की थी. 18 जून को दिनेश्वर शर्मा श्रीनगर जाएंगे और स्थिति का जायज़ लेंगे.
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