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कदांबी शेषाटार वेंकटाचार : कर्नाटक का रहने वाला ये आदमी राजस्थान का मुख्यमंत्री कैसे बना?

मुख्यमंत्री बना तो IAS था, पद से हटा तो फिर IAS बन गया.

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3 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 2 दिसंबर 2018, 05:20 AM IST)
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वेंकटाचार मूल रूप से कर्नाटक के रहने वाले थे और 1945 में राजस्थान आए थे.
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चुनावी मौसम में दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री. इस कड़ी में बात राजस्थान के दूसरे मुख्यमंत्री कदांबी शेषाटार वेंकटाचार की, जो थे तो सिविल सर्वेंट, लेकिन एक संवैधानिक संकट के चलते उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया. ये देश में आईएएस के पद पर रहते हुए वर्किंग सीएम बनने का इकलौता मौका था.

कदांबी शेषाटार वेंकटाचार: IAS होते हुए राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने वाले नेता की कहानी

अंक 1: नेहरू ने इलाहाबाद से जोधपुर में एंट्री करवाई

साल था 1945. भारत छोड़ों आंदोलन में गिरफ्तार हुए पंडित नेहरू को तीन साल बाद अहमदनगर फोर्ट जेल से रिहा कर दिया गया था. नेहरू आगे की रणनीति बनाने इलाहाबाद के आनंद भवन में बैठे हुए थे. तभी एक चिट्ठी आई जोधपुर से. जयनारायण व्यास ने चिट्ठी में लिखा कि यहां का अंग्रेज प्रधानमंत्री डोनाल्ड फील्ड जनरल डायर की तरह काम कर रहा है. कभी भी किसी को पकड़कर जेल में डलवा देता है तो कभी भी गोलियां चलवा देता है. राज्य की स्थिति दिनोंदिन खराब हो रही है. फील्ड की वजह से जनता और राजदरबार के बीच का फासला बढ़ गया है. ऐसे में आपको यहां आकर परिस्थियों में दखल देना होगा.

जोधपुर एक बड़ा स्टेट था. ऐसे में नेहरू ने वहां जाना जरूरी समझा और अपने साथ शेख अब्दुल्ला और इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू को भी लेकर गए. अक्टूबर, 1945 के इस दौरे में जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह खुद नेहरू से मिलने पहुंचे. बात शुरू हुई तो नेहरू ने महाराजा को सलाह दी कि डोनाल्ड फील्ड को पीएम की पोस्ट से हटा देना चाहिए. यहां कि जनता का यही मत है. नहीं तो राजमहल और जनता के बीच संवाद नहीं हो सकेगा. उम्मेद सिंह ने नेहरू से सहमति तो दर्ज करवाई लेकिन पूछा कि डोनाल्ड फील्ड की जगह कौन ले सकता है. इतने बड़े स्टेट को संभालना हर किसी के बस की बात नहीं है. ऐसे में पंडित नेहरू ने नाम लिया इलाहाबाद के कमिश्नर सी एस वेंकटाचार का.


नेहरू, शेख अब्दुल्ला और इंदिरा जोधपुर आए थे जिसके बाद यहां कि परिस्थितियों में सुधार आया.
नेहरू, शेख अब्दुल्ला और इंदिरा जोधपुर आए थे जिसके बाद यहां कि परिस्थितियों में सुधार आया.

नेहरू की सिफारिश को उम्मेद सिंह टाल नहीं सके. और डोनाल्ड फील्ड की जगह पर प्रधानमंत्री बनाया गया सी एस वेंकटाचार को. यहां से उनके जीवन का राजस्थान काल शुरू हुआ.

अंक 2: जोधपुर को पाकिस्तान में जाने से रोकने में वेंकटाचार का बड़ा रोल

1946 में भारत में अंतरिम सरकार बनी. नेहरू पीएम बने. देश आजादी के बाद कैसा होगा, इस पर चर्चा शुरू ह गई थी. उधर रियासतें भी इन सब बदलावों को गौर से देख रह थीं. जोधपुर में 1947 की शुरुआत महाराजा उम्मेद सिंह के निधन से होती है. गद्दी पर बैठते हैं उनके बेटे - हनवंत सिंह. हनवंत सिंह को हणूत सिंह बोला जाता था. हणूत हठधर्मी स्वभाव के थे. उनके राजा बनने के बाद जनता और राजाशही के बीच फिर से खाई पैदा हो गई. इसे चौड़ा किया डाबड़ा गोलीकांड ने.

इस गांव में किसान सभा मीटिंग कर रही थी. जागीरदार ने अपने कारिदों से सभा पर गोली चलवा दी. कई नेता और किसान मारे गए. राजा ने जागीरदार का पक्ष लिया. मगर जल्द ही उनको एक और पक्ष चुनना था. ये मामला उसके सामने गौड़ हो गया.

3 जून, 1947. इस दिन भारत विभाजन की बात तय होती है. दो देश बनेंगे. भारत और पाकिस्तान. अंग्रेजों के शासन वाली जगहें इनके बीच बंटेंगी. और रियासतें. उन्हें अपनी मर्जी से दोनों में से किसी एक संग मिल सकती हैं. इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी तय हुई सीमा से लगी रियासतों पर डोरे डालने शुरू कर दिए. जोधपुर, उदयपुर और जैसलमेर, इन तीनों रियासतों से जिन्ना ने बातचीत शुरू की. जोधपुर के राजा हणूत सिंह ने दोनों तरफ बातचीत चालू रखी. दिसंबर 1947 में वह भारत की संविधान सभा का हिस्सा बन गए. दो बार भारत में शामिल होने का ऐलान भी कर दिया. मगर कागज पर दस्तखत नहीं किए.


जिन्ना ने खाली कागज़ साइन कर हनवंत सिंह को दे दिया था.
जिन्ना ने खाली कागज़ साइन कर हनवंत सिंह को दे दिया था.

फिर जिन्ना ने उन्हें मुलाकात का बुलावा भेजा. 5 अगस्त, 1947 को जिन्ना से मुलाकात हुई. साथ में जैसलमेर के राजा भी थे. कहते हैं कि मीटिटंग में जिन्ना ने हणूत सिंह को खाली कागज दस्तखत कर दे दिया. कहा- पाकिस्तान में मिल जाइए. जो भी शर्तें हो, लिख दीजिए. सब मान लूंगा.

राजा ने जवाब दिया- कुछ समय दीजिए विचार के लिए. फिर वह एडीसी केसरी सिंह के साथ चर्चा करने लगे. केसरी बोले- फैसला लेने से पहले एक बार घरवालों से बात करनी चाहिए. हणूत सिंह ने हामी भरी और जिन्ना से थोड़ा और वक्त मांगा.

दोनों कराची से वापस आ गए. केसरी सिंह ने सब बात वेंकटाचार को बताई. वेंकटा ने तुरंत सरदार पटेल को पत्र लिख सब बताया. पटेल ने हणूत को दिल्ली बुलाया. यहां फिर वृतांत में एक कही सुनी दाखिल होती है. पटेल के यहां हुई मीटिंग में गर्मागर्मी हुई. कहते हैं कि किसी बात पर राजा उत्तेजित हुए. उन्होंने पटेल के सचिव वीपी मेनन पर बंदूक तान ली. बात रफा दफा हुई. पटेल और माउंटबेटन ने हणूत सिंह को समझाया और जोधपुर भारत मे शामिल हो गया.


महाराजा हनवंत सिंह ने वेंकटाचार को पद से हटा दिया था.
महाराजा हनवंत सिंह ने वेंकटाचार को पद से हटा दिया था.

अंक 3: गढ़ आया मगर दफ्तरी गया

हणूत सिंह को वेंकटाचार के खत के बारे में पता चल गया था. उन्हें अब ये अफसर खटकने लगा. कहने को लोकतंत्र आने को था, मगर हणूत शासन पर पकड़ ढीली करने को तैयार न थे. उन्होंने वेंकटाचार को हटाकर अपने भाई अजीत सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया. एक राजा इस बदलाव को गौर से देख रहा था. बीकानेर के महाराजा सादुल सिंह. उन्होंने सी एस वेंकटाचार को बीकानेर में प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. फिर 1949 में राजस्थान बना तो उन्हें जयपुर से बुलावा आ गया. राजप्रमुख की तरफ से. ये राज्यपाल के समकक्ष एक पद था. राजा मान सिह राज प्रमुख थे. वेंकटाचार उनके प्रशासनिक अधिकारी हो गए.

अंक 4:  फिर सीएम कैसे हो गए?

दिसंबर, 1950 तक हीरालाल शास्त्री के पद से हटने की रूपरेखा तैयार हो चुकी थी. अगले मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे आगे नाम था जयनारायण व्यास का. लेकिन पंडित नेहरू के खास रफी अहमद किदवई ने उनके नाम पर वीटो कर दिया. किदवई का कहना था कि व्यासजी तो अच्छे आदमी हैं लेकिन उनका ग्रुप ठीक नहीं है. अगर उनको सीएम बनाएंगे तो वो अपने लोगों को मंत्री बनाएंगे. ये लोग मंत्री बनकर करप्शन करेंगे. जो बिल्कुल ठीक नहीं है. किदवई की आपत्ति को नेहरू दरकिनार नहीं कर सके. फिर एक नए नाम की तलाश की गई.

किसी नए नाम पर एक राय बनने तक एक अंतरिम व्यवस्था के लिए नाम सुझाया गया वेंकटाचार का. और फिर सिविल सर्विस ऑफिसर सी एस वेंकटाचार को 6 जनवरी, 1951 को सीएम पद की शपथ दिलाई गई. उनके मंत्रीमंडल में केवल एक ही मंत्री था. वो भी एक सिविल सर्वेंट. नाम था भोलानाथ झा.

अंक 5: कोलार से कनाडा तक...

व्यास-वर्मा गुट चुप नहीं बैठा था. किदवई के तर्कों की काट खोजी गई और नेहरू को मनाया गया. इसमें लग गए तीन महीने. और फिर जयनारायण व्यास बन गए सीएम. वेंकटाचार को दिल्ली रवाना कर दिया गया. वह पहले केंद्रीय मंत्रालय में सचिव बने और फिर राजेंद्र बाबू के मुख्य सचिव. 1958 मे कार्यकाल पूरा हुआ तो सरकार ने उन्हें कनाडा का हाई कमिश्नर बना दिया.


सीएस वेंकटाचार कनाडा के राजदूत बनकर रिटायर हुए.
सीएस वेंकटाचार कनाडा के राजदूत बनकर रिटायर हुए.

यहां पर वेंकचाटार की कहानी खत्म होती है. जो शुरू हुई थी. मैसूर स्टेट के कोलार से. उनका जन्मस्थान. पापा-चाचा अंग्रेज सरकार में अफसर. वेंकटाचारी भी उसी राह बढ़े. 1921 में आईसीएस की परीक्षा पास कर बड़े साहब बन गए. पोस्टिंग मिली यूपी में. यहां उन्होंने 1931 की जनगणना में अहम काम किया. ये आखिरी जनगणना थी, जिसमें जाति गिनी गई. रिजर्वेशन के मुद्दे पर आज तक इसी जनगणना के आंकड़ों का हवाला दिया जाता है. मंडल कमीशन की रपट भी इसी के आधार पर बनी थी. बहरहाल. अच्छे काम का इनाम मिला. वेंकटाचारी को इंडियन पॉलिटिकल सर्विसेज में भेज दिया गया. इसमें रक्षा, मेडिकल, सिविल और पीडब्ल्यूडी जैसी कई सारी दूसरी सेवाएं शामिल थीं. वेंकटाचार से पहले इस सर्विस में बस ब्रिटिश मिलिट्री के लोग ही जा सकते थे. 1942 में उन्हें इलाहाबाद का कमिश्नर नियुक्त किया गया. यहीं पर वह नेहरू की नजर में आए. और फिर नियति जोधपुर ले गई.

वेंकटाचार. पॉलिटिक्स की किताब में हाशिए की एंट्री. मगर कई बार सबसे जरूरी बात वहीं दर्ज होती है.

मुख्यमंत्री के अगले ऐपिसोड में बात करेंगे जयनारायण व्यास की. एक नेता जो मुख्यमंत्री रहते दो सीटों से चुनाव लड़ा. दोनों पर हारा. मगर फिर भी सत्ता से पकड़ नहीं छूटी.



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