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ये बिल्डिंग खरीदी गई, बेची गई, खरीदी गई, बेची गई... मकान मालिक को पता ही नहीं चला!

पुलिस को अब तक नहीं पता चला है कि इस पूरे खेल के पीछे कौन लोग हैं.

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Building sold 20 times in pune
सांकेतिक तस्वीर. (इंडिया टुडे)
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दुष्यंत कुमार
14 सितंबर 2022 (Updated: 14 सितंबर 2022, 11:22 AM IST)
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महाराष्ट्र के पुणे में एक चार मंजिला इमारत बार-बार खरीदी, बेची या गिरवी रखी गई. हैरानी की बात ये कि इमारत के मालिकों को इसकी भनक तक नहीं लगी. खबर के मुताबिक पिछले एक साल में बिल्डिंग को करीब 20 बार खरीदा, बेचा या गिरवी रखा गया. इस दौरान मालिकों को पता ही नहीं चला कि कोई धोखेबाजी से उनके नाम का इस्तेमाल कर लेनदेन कर रहा है.

पुणे में Building Sold or Bought 20 times

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये बिल्डिंग पुणे के कोंधवा इलाके में है. चार महिलाएं इसकी मालिक हैं. किरण चड्ढा, सुमन खंडागले, निरू गुप्ता और अंजलि गुप्ता ने 1994 में मिलकर ये इमारत खरीदी थी. 2005 में उन्होंने इसे रेजिडेंशियल बिल्डिंग के रूप में फिर बनाया.

रिपोर्ट के मुताबिक चारों महिलाओं ने प्रॉपर्टी बेचने का इरादा कर लिया था. ये पता चलने के बाद मई 2021 में कुछ रियल एस्टेट एजेंट इन महिलाएं के पास पहुंचे. यहीं से धोखेबाजी की कहानी शुरू हुई. एक के बाद एक फर्जी खरीदार और बेचने वाले नकली आधार कार्ड के साथ सामने आने लगे. पुलिस में दर्ज शिकायत के मुताबिक महिलाओं ने बताया है कि करीब सौ लोगों ने उनसे संपर्क कर बिल्डिंग के सौदे की बात की थी. किसी ने खुद को खरीदार बताया तो कोई रियल एस्टेट एजेंट या बैंक अधिकारी बनकर बात कर रहा था.

जल्दी ही महिलाओं के नाम पर बिल्डिंग की सेल को लेकर फर्जी डील्स होने लगीं. पुलिस का कहना है कि इस धोखाधड़ी में कुछ अज्ञात महिलाएं शामिल हैं, जो खुद को प्रॉपर्टी की मालिक बताती थीं. उन्होंने जो आधार कार्ड दिए, उन पर नाम तो असली मालिकों के थे, लेकिन तस्वीरें किसी और की.

रिपोर्ट के मुताबिक इस फर्जीवाड़े के तहत एक करोड़ रुपये के रूप में पहला ट्रांजैक्शन एक जुलाई, 2021 को हुआ. ये पैसा ‘माधवी और संतोष’ नाम के एक दंपती ने ट्रांसफर किया था. उन्होंने बिल्डिंग की पहली मंजिल खरीदने का दावा किया. लेकिन पुलिस और सरकार के अधिकारियों को आज तक नहीं पता चला है कि ये संतोष और माधवी कौन हैं. अब शक है कि ये फर्जी नाम हो सकते हैं. ये भी साफ नहीं है कि पैसे का लेनदेन वाकई में असली सेलर और खरीदार के बीच हुआ था, या केवल कागजों पर ही पहली मंजिल बेच दी गई.

रिपोर्ट के मुताबिक बिल्डिंग कम से कम तीन बार अलग-अलग बैंकों में गिरवी रखी गई. बदले में करीब 2.35 करोड़ रुपये का लोन उठा लिया गया. ये बैंक थे कॉजमोस बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र जिन्होंने अब विजिलेंस इंक्वायरी का आदेश दिया है.

अखबार ने बताया कि बिल्डिंग को दो बार ‘विशाल गोरडे’ के नाम पर गिरवी रखा गया, जिन्होंने कथित रूप से इमारत के दो फ्लोर अलग-अलग ट्रांजैक्शन के तहत खरीदे थे. बाद में उन्होंने एक-एक फ्लोर बैंक ऑफ महाराष्ट्र और कॉजमोस बैंक के यहां गिरवी रखवा दिए. मामले से जुड़े डॉक्युमेंट्स के मुताबिक विशाल गोरडे ने 24 फरवरी, 2021 को 96 लाख रुपये देकर एक फ्लोर खरीदा था. बाद में उन्होंने लगभग 70 लाख रुपये में प्रॉपर्टी कॉजमोस बैंक के यहां गिरवी रख दी. एक और फ्लोर उन्होंने 1.2 करोड़ रुपये में खरीदा था, जिसे बाद में 96 लाख रुपये के बदले में बैंक ऑफ महाराष्ट्र के यहां गिरवी रख दिया.

वहीं बिल्डिंग गिरवी रखने का तीसरा काम किसी ‘अनिल अग्रवाल’ और ‘सुनिता अनिल अग्रवाल’ ने किया. रजिस्ट्रेशन पेपर्स के मुताबिक इस कथित दंपती ने 96 लाख रुपये में बिल्डिंग की एक मंजिल खरीदी थी, जिसे बाद में उन्होंने 70 लाख रुपये के लोन के बदले कॉजमोस बैंक के यहां गिरवी रखवा दिया. पुलिस को अब तक नहीं पता चला है कि ये 'विशाल गोरडे' और 'अग्रवाल दंपती' कौन हैं. 

कॉजमोस बैंक के चेयरमैन मिलिंद काले ने अखबार से बातचीत में कहा है,

"हमारे साथ धोखा हुआ है. हमारी विजिलेंस टीम ने इसका पता लगाया और हमने अधिकारियों को इसकी रिपोर्ट दी है. ऐसा लगता है कि ठगों के गिरोह ने नकली मालिक और फर्जी खरीदार बनकर प्रॉपर्टी बैंक को गिरवी में दी थी. अब वे पकड़ में नहीं आ रहे हैं."

ये तो केवल गिरवी रखने के मामले हैं. इसके अलावा बिल्डिंग को खरीदने और बेचने से जुड़े कई दस्तावेज मिले हैं. इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि जुलाई 2021 से लेकर जुलाई 2022 के बीच 22 वित्तीय लेनदेनों के जरिये इमारत के रजिस्ट्रेशन डॉक्युमेंट्स तैयार करवाए गए. पुणे के अलग-अलग रजिस्ट्रेशन ऑफिस में ये पंजीकरण कराए गए थे. पूरे फर्जीवाड़े का पता तब चला जब एक प्रॉपर्टी लॉयर ने इस बारे में सब-रजिस्ट्रार दत्तात्रेय सतभाई को अलर्ट किया.

दत्तात्रेय ने बताया कि जब उन्होंने धोखेबाजी के तहत किए गए वित्तीय लेनदेन की जांच की तो पता चला कि नकली दस्तावेजों के जरिये ये काम किया गया है. दत्तात्रेय ने ये भी बताया कि जब तक उन्होंने इसकी शिकायत पुलिस में दी, इसकी जानकारी देने वाला वकील उनके ऑफिस से चला गया था. वहीं मामले की जांच कर रहे सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर अनागा देशपांडे ने कहा कि इस काम में नकली आधार कार्ड्स का इस्तेमाल किया गया है, जिन पर नाम तो असली मालिकों के हैं, लेकिन तस्वीरें किसी और की. देशपांडे ने बताया कि आरोपियों और उनके सहयोगियों की तलाश की जा रही है.

उधर, बिल्डिंग की असली मालिकों का कहना है कि पुलिस के बताने तक उन्हें इस सबके बारे में पता ही नहीं चला. दिलचस्प ये कि इस धोखाधड़ी के चलते उनके नाम एफआईआर में दर्ज हो गए हैं. इस पर सब-रजिस्ट्रार का कहना है कि उन्होंने एफआईआर में ये नाम इसलिए लिए, क्योंकि दस्तावेजों पर यही लिखे थे. इस सबके बीच नवंबर 2021 में बिल्डिंग के असली मालिकों को एक खरीदार मिल गया, जिसने 3.4 करोड़ रुपये में पूरी बिल्डिंग का सौदा कर लिया. हालांकि साढ़े 37 लाख रुपये बतौर टोकन मनी देने के बाद उसने बाकी की पेमेंट अब तक नहीं की है.

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