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वैवाहिक रिश्ते में 'बलात्कार' अपराध नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

अगर पत्नी की उम्र 18 साल से ज़्यादा है, तो IPC के तहत जबरन सेक्स को बलात्कार नहीं माना जा सकता – ये कहते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को बरी कर दिया.

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9 दिसंबर 2023 (पब्लिश्ड: 05:00 PM IST)
Allahabad High Court Image
मैरिटल रेप पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी. (फोटो/ इंडिया टुडे)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘मैरिटल रेप’ (Marital Rape) के एक केस में सुनवाई करते हुए टीप्पणी की है, कि अगर पत्नी की उम्र 18 साल से ज़्यादा है, तो ये भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता. 

ये कहते हुए अदालत ने एक व्यक्ति को बरी कर दिया, जिस पर अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक सेक्स करने के आरोप थे.

'वैवाहिक रिश्ते में बलात्कार अपराध नहीं'

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त 2013 में पीड़िता ने अपने पति के खिलाफ IPC की धारा 498-ए (क्रूरता), 323 (जानबूझकर चोट पहुंचाना), 504 (जानबूझकर अपमान करना), 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) और दहेज निषेध अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की थी. 

शिकायत के मुताबिक, उनकी शादी जुलाई 2012 में हुई थी. उसके बाद से ही पति उनका उत्पीड़न कर रहा है. पति ने उनसे फॉर्च्यूनर गाड़ी और 40 लाख नकद रुपये मांगे थे और इसके लिए उन पर अपने माता-पिता पर दबाव डालने के लिए कहता था. उनके साथ गाली-गलौज करता था, पीटता था और ज़ोर-जबरदस्ती करता था. अप्राकृतिक सेक्स भी करता था. फिर वो दोनों अलग रहने लगे.

9 अगस्त 2013 को आरोपी पीड़िता के मायके में घुस आया. उन्हें एक कमरे में घसीटा, उन्हें गालियां दी और जबरन उनके साथ अप्राकृतिक सेक्स किया. उसी दिन पीड़िता ने तत्काल FIR दर्ज कराई.

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आरोपी पति ने आरोपों को निराधार बताया. किसी भी तरह के शारीरिक संबंध बनाने से साफ इनकार कर दिया. अदालत को बताया कि ये महिला की दूसरी शादी थी और वो शादी के बाद कुछ समय तक उसके साथ रही. शादी के केवल डेढ़ महीने बाद ही रिश्ता खत्म कर दिया.

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को उक्त धाराओं के तहत दोषी ठहराया. इस निष्कर्ष के साथ कि अप्राकृतिक यौन कृत्य - जैसे एनल सेक्स और ओरल सेक्स - वैवाहिक दुर्व्यवहार है, क्रूरता है. IPC की धारा 323, 498-ए और 377 के तहत सज़ा सुनाई गई.

आरोपी ने सजा को चुनौती दी. तत्काल पुनरीक्षण याचिका के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया. हाई कोर्ट ने माना कि IPC की धारा 323 और 498-ए के तहत जो आरोप निचली अदालत ने पाए हैं, वो सही हैं. उनमें कोई तथ्यात्मक या कानूनी त्रुटि नहीं है. लेकिन IPC की धारा 377 लगाना सही नहीं, क्योंकि इस देश में अभी तक मैरिटल रेप को अपराध नहीं माना गया है.

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दरअसल, IPC की धारा-375 बलात्कार को अपराध मानती है, लेकिन उसमें एक अपवाद है. एक पुरुष और उसकी पत्नी के बीच यौन संबंध बिना मर्ज़ी के भी हों, तो बलात्कार नहीं माने जाते. मैरिटल रेप को घरेलू हिंसा का मुद्दा माना जाता है. घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 में इससे जुड़े प्रावधान हैं. और, मैरिटल रेप को रेप बनाने वाली कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में अभी लंबित हैं.

जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने मौजूदा कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को IPC की धारा 377 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता. हालांकि, अदालतों ने धारा 498-ए और 323 के तहत आरोपी की दोषसिद्धि और सज़ा को बरकरार रखा है.  

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