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CBI डायरेक्टर के पद से हटाए जाने के बाद आलोक वर्मा ने क्या कहा

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आलोक वर्मा ने इस्तीफ़ा दे दिया है. उन्होंने लिखा है कि CBI डायरेक्टर के पद से उन्हें हटाने का फैसला जिस सिलेक्शन कमिटी ने लिया, उसने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया. वर्मा का ये भी कहना है कि उनकी रिटायरमेंट तो जुलाई 2017 में ही थी. लेकिन फिर उन्हें CBI निदेशक बना दिया गया. इस पद का कार्यकाल दो साल का होता है. 31 जनवरी, 2019 को वो इससे रिटायर होने वाले थे. अब जबकि वो इस पद पर नहीं हैं और जहां नियुक्ति की गई है उसकी रिटायर होने की उम्र भी पार कर चुके हैं, सो वो खुद रिटायरमेंट ले रहे हैं. इससे पहले खबर आई थी कि उन्होंने अपनी नई पोस्टिंग पर जॉइन करने से इनकार कर दिया था.

कौन सी कमिटी ने वर्मा को हटाया?
10 जनवरी को आलोक वर्मा CBI निदेशक के पद से हटा दिए गए थे. उन्हें हटाने का फैसला जिस उच्च-स्तरीय सिलेक्शन कमिटी ने लिया, उसमें थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. जस्टिस सीकरी और नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे. जस्टिस सीकरी को इस कमिटी में नॉमिनेट किया था चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने. वर्मा को हटाने का फैसला 2-1 से लिया गया. PM मोदी और जस्टिस सीकरी फैसले के पक्ष में थे, खड़गे खिलाफ थे. आलोक वर्मा को CBI से हटाकर फायर सर्विसेज़ का डायरेक्टर जनरल नियुक्त कर दिया गया. इस पद के लिए रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके हैं आलोक वर्मा. यानी तकनीकी तौर पर वो इस पोस्ट पर जा ही नहीं सकते थे. सवाल ये भी है कि जब उन्हें इस पोस्ट पर भेजने का फैसला लिया गया, तो क्या ये अधिकतम उम्र वाली बात ध्यान नहीं रखी गई? या फिर ये जान-बूझकर किया गया, ताकि आलोक वर्मा जॉइन ही न कर पाएं?

CBI डायरेक्टर की पोस्ट से हटाए जाने पर क्या कहा आलोक वर्मा ने?
खुद को CBI निदेशक के पद से हटाए जाने पर आलोक वर्मा ने एक बयान भी जारी किया. अंग्रेजी में जारी किए गए इस स्टेटमेंट का हिंदी तर्जुमा पढ़िए-

CBI देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी है. ये ऊंचे सरकारी पदों, कार्यालयों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करती है. ये ऐसा संस्थान है, जिसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रहनी चाहिए. इसकी आज़ादी बरकरार रखी जानी चाहिए. इसे किसी भी तरह से बाहरी प्रभाव और दबाव से मुक्त रहकर काम करना चाहिए. मैंने इस संस्थान की प्रतिष्ठा, इसके सम्मान को बनाए रखने की कोशिश की, जबकि इसे बर्बाद किए जाने की कोशिशें हो रही थीं. 23 अक्टूबर, 2018 को केंद्र सरकार और CVC ने जो आदेश जारी किया, उससे ये बात समझी जा सकती है. इन्होंने जो आदेश दिया, वो इनके अधिकारक्षेत्र के बाहर था. सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को खारिज कर दिया.

बहुत तकलीफ की बात है कि एक आदमी के लगाए गए फर्जी, निराधार और ओछे आरोपों के आधार पर मेरा तबादला कर दिया गया. जिसने मुझपर इल्ज़ाम लगाए, वो मेरा विरोधी था. जिस कमिटी ने किसी और डिपार्टमेंट में मेरा तबादला करने का फैसला सुनाया है, उसे बतौर CBI डायरेक्टर मेरा भविष्य तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. मैंने CBI के सम्मान को बनाए रखने, उसे बचाकर रखने की कोशिश की. अगर मुझसे कहा जाता है, तो मैं फिर से ऐसा ही करूंगा. ताकि कानून का पालन किया जा सका. कानून का राज बनाए रखा जा सके.

M. Nageshwar Rao, Additional Director, CBI has assumed the charge of the office of Director, CBI after Alok Verma was transferred yesterday as DG Fire Services, Home Guards and Civil Defence. pic.twitter.com/byJxaH5Ywj

— ANI (@ANI) January 11, 2019

राकेश अस्थाना की गिरफ़्तारी रोकने से हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया
अक्टूबर में CVC ने आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया था. इस फैसले के खिलाफ वर्मा सुप्रीम कोर्ट गए. 8 जनवरी को अदालत ने वर्मा को छुट्टी पर भेजने वाला फैसला खारिज कर दिया. 9 को वर्मा CBI डायरेक्टर के दफ़्तर में वापस लौटे. 10 की रात खबर आई कि वो फिर से हटा दिए गए हैं. उधर दिल्ली हाई कोर्ट ने राकेश अस्थाना की याचिका खारिज़ कर दी है. अस्थाना अपनी गिरफ़्तारी पर रोक के लिए अदालत गए थे. मगर कोर्ट ने ये रोक हटाने से इनकार कर दिया. राकेश अस्थाना पर केस आलोक वर्मा ने ही दर्ज़ करवाया था. CBI डायरेक्टर के पद पर रहते हुए. आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना, दोनों एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं.


सीबीआई विवाद: जस्टिस सीकरी ने मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह नरेंद्र मोदी का साथ क्यों दिया?

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