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सिद्धू पर छित्तर फेंकने वाली महिला ने बताया कि इसके पीछे कौन सी 'प्रेरणा' रही थी

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भारत में चुनाव होते हैं. होते ही रहते हैं. चुनाव हैं तो जनता है, जनता है तो नेता हैं, नेता हैं तो भाषण हैं, भाषण हैं तो कालीन है, कालीन है तो पैर हैं, पैर हैं तो…

थोड़ा लॉजिक आप लगा लो. यूं जूते-चप्पल आजकल हो गए हैं मल्टी-टास्किंग. पांव में होने के अलावा अब जूते-चप्पल और कई जगह पाए जाते हैं. पैरों में पाया जाना उनका साइड बिज़नेस हो गया है. वो इवॉल्व हुए हैं. डार्विन मुस्कुरा रहे हैं, नेता घबरा रहे हैं…

# अब कहां चल गया?

हरियाणा में रोहतक है. वहां भी चुनाव है. और सबसे ऊपर वाले पैरा का सारा प्रोसेस वहां भी होता है. मतलब भाषण वगैरह. तो रोहतक से चुनाव लड़ रहे हैं कांग्रेस के दीपेंद्र सिंह हुड्डा. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा के बेटे हैं. उन्हीं के लिए प्रचार करने गए थे नवजोत सिंह सिद्धू. अपना भाषण दे ही रहे थे कि ANI के अनुसार वहां खड़ी एक महिला ने उनपर चप्पल चला दी. महिला को पुलिस पकड़कर थाने ले गई.

लोग भी अजीब हैं, बात का जवाब बात से ही दिया जाता है न. जूता वूता काहे भाई?
लोग भी अजीब हैं, बात का जवाब बात से ही दिया जाता है न. जूता वूता काहे भाई?

# आखिर ऐसा किया ही क्यों?

छित्तर चलाने वाली महिला के अपने ही लॉजिक हैं. लोग बता रहे हैं कि महिला सिद्धू से नाराज़ थी. क्यों थी? क्योंकि उसके हिसाब से सिद्धू जब बीजेपी में थे तो कांग्रेस को गरियाते थे, और अब कांग्रेस में हैं तो बीजेपी की ऐसी-तैसी करते हैं.

उधर सोशल मीडिया पर इस घटना की अलग ही मौज ली जा रही है. लोग कह रहे हैं ‘निशाना चूक गई इसलिए जेल हुई’

कसम से लोग बहुत ज़्यादा खलिहर बैठे हैं अपने यहां इंडिया में
कसम से लोग बहुत ज़्यादा खलिहर बैठे हैं अपने यहां इंडिया में

ख़ैर कहने वालों को रोक ही कौन सकता है. जिसके मन में जो आया बोल दिया. बाकी बचा काम सोशल मीडिया करता ही है. लेकिन सिद्धू पर ही क्यों. किसी पर भी कहीं भी जूता चप्पल क्यों चले भाई ? आप पूछ सकते हैं तो अच्छा सवाल पूछिए. दरवाज़े पर प्रोडक्ट बेचने आए सेल्समैन को चप्पल मार देते हैं क्या? नहीं न. तो सवाल पूछिए सवाल. उसी से बात बनेगी. अच्छा और काम का प्रोडक्ट तभी मिलेगा.

# चुनाव में चलते जूते-चप्पल

मज़ेदार टाइटल है न? फ़र्ज़ कीजिए कल को कोई ब्रांड आ जाए. रिलेक्सो की जगह इलेक्सो. टैगलाइन क्या होगी? ‘एक शॉट, मामला हॉट’ टाइप की. जिस तरह से इस ख़ास काम के लिए जूते-चप्पल का अब इस्तेमाल होने लगा है. उससे एक चीज़ तो साफ़ है कि बस किसी कारोबारी की समझ में आ जाए.

लेकिन फिर भी हमें लगता है कि विरोध का ये तरीका हिंसक, गैर कानूनी, गैर नैतिक है. और चूंकि कानून को आप अपनी तरफ आकृष्ट कर रहे हैं तो गौर-क़ानूनी भी कहा जा सकता है. इसलिए एडवाइज़ तो यही रहेगी कि चप्पल को चप्पल रहने दो, उससे कोई (और) काम न लो.


वीडियो देखें: प्रयागराज में लोग बोले- गंगा सफाई पर दर्शन कम प्रदर्शन ज्यादा, कोई बोला कभी नहीं साफ़ होंगी गंगा

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