के आसिफ़ की बेटी जो हिरोइन बनी और फिर माफ़िया इक़बाल मिर्ची की पत्नी बन गई
सत्य व्यास की कलम से एक भुलाई जा चुकी ऐक्ट्रेस की कहानी.
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फोटो - thelallantop

फ़िल्मी हलक़ों का अपना ही शब्दकोश होता है और उन शब्दों का अपना ही आरोपित अर्थ भी. ‘टाइपकास्ट’ एक शब्द है. अदाकारों के लिए यह एक भयावह शब्द है. जिसका फ़िल्मी अर्थ होता है - एक ही प्रारूप में ढल जाना. सीधे अर्थों में एक ही तरह के रोल निभाते रहना. ‘हिना क़ौसर’ इसका जीवंत उदाहरण हैं. हिना, मशहूर निर्देशक के आसिफ़ (मुग़ल- ए- आज़म ) और 50 के दशक की अभिनेत्री निग़ार सुलताना की बेटी थी. इस लिहाज़ से भी अदाकारी का हुनर उनमें पैदाइशी था. मगर सन 70 का वक्त आज का वक्त नहीं था. के. आसिफ़ ने हिना के फिल्मी करियर में कोई मदद की हो ऐसा नहीं दिखता. वैसे भी, 1971 में के. आसिफ़ की मृत्यु हो गयी. हिना ने सन 1970 में हरसुख भट्ट की फ़िल्म ‘होली आई रे’ से फ़िल्मों में पदार्पण किया. इसमें वह नायिका ‘कुमुद चुगानी’ की दोस्त मीना की भूमिका में नज़र आयीं. हॉस्टल के कमरे में नायिका को नायक के नाम से छेड़ते उस एक सीन के शॉट में हिना ने यह दिखाया कि उनमें अदाकारी नैसर्गिक है. मगर इसके बाद उन्हें इस तरह की भूमिकाएं ही प्रस्तावित होने लगीं और वह नायिकाओं की सहेलियों, नायक के बहन या दूसरी औरत की भूमिकाओं में ढलती नजर आयीं. 'पाकीज़ा', 'दोस्त', 'नागिन', 'परवरिश', 'अदालत', 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' जैसी फ़िल्मों में वह इन्हीं भूमिकाओं में नजर आयीं. सन 70 के दशक तक उर्दू का प्रभार संवादों में बाकी था. इस जुबान पर हिना की पकड़ ने भी हिना को फ़िल्मों में मशरूफ़ रखा. इसी दशक में मुस्लिम धार्मिक पृष्ठभूमि पर बनने वाली फिल्मों के एक लहर सी आई. इन फिल्मों में हिना अपने संवाद पर पकड़ के कारण ही अहम हिस्सा बनी रहीं. 'दयार-ए-मदीना', ‘सात सवाल’ जैसी फिल्मों में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई. हिन्दी फ़िल्मों में तो उन्हें नायिकाओं की भूमिका नहीं मिली परंतु इसी वक्त में वह भोजपुरी फ़िल्मों में एक प्रमुख नाम बनकर उभरीं और अभिनेता कुणाल के साथ 'एक चुटकी सेनूर', तथा 'जागल भाग हमार' जैसी फिल्मों में नजर आयीं. सन 80 का दशक अपने साथ कई परिवर्तन लेकर आया. संवादों में अब उर्दू का असर जाता रहा. नयी उम्र की अभिनेत्रियां आती रहीं तो उन्हीं की हमउम्र चरित्र अभिनेत्रियों की भी जरूरत समझी गयी. हिना वक्त की जरूरत समझ गयी. वह एक बार फिर टाइपकास्ट हुईं. अबकी दफ़ा उन्होने नृत्य का दामन थामा. 80 के दशक के पूर्वार्ध तक फिल्मों में मुज़रा गीत अवश्य होते थे.हिना को मुज़रा गीत के प्रस्ताव आने लगे. उन्होंने उसे भी ना नहीं कहा और इस दशक में उन्होंने कई गीत किए. फ़िल्म ‘कालिया’ और ‘अय्याश’ के गीत प्रमुख हैं. यह भी संयोग है कि पिता के. आसिफ़ ने फ़िल्म इतिहास की सबसे खूबसूरत मुजरे में से एक ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ दी और हिना क़ौसर ने भी इस विधा पर खूब अदाकारी की. सन अस्सी के उतरार्द्ध तक उनकी छिटपुट फिल्में आती रहीं. फिल्मों में 15-16 वर्ष के संघर्ष के बाद अब स्थायित्व की जरूरत थी. इन्हीं वर्षों में उनकी मुलाकात इक़बाल मोहम्मद मेमन से हुई, जिसे मुंबई अंडरवर्ल्ड में ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची के नाम से जानते हैं. जाहिराना तौर पर प्रेम हुआ और हिना, इक़बाल मिर्ची की हो गईं. 1993 के बम विस्फोट में इक़बाल मिर्ची को भी साजिशकर्ता पाया गया; मगर तब तक इक़बाल देश से फरार हो चुका था और हिना कौसर भी देश छोड़ चुकी थीं. इक़बाल अब लंदन के निवासी थे और चावल के व्यापारी भी. हिना कुछ पुरानी फिल्में 90 के दशक में भी आती रहीं. हिना अंतिम दफ़ा खबरों में सन 2012 में आयीं जब उन्होंने मुंबई नारकोटिक्स विभाग द्वारा इक़बाल के मुंबई के दो फ्लैट को सील किए जाने के विरोध में अदालत में अपील की थी. अपील हालांकि नामंज़ूर हो गयी. इसके अगले ही वर्ष अगस्त 2013 में इक़बाल मिर्ची की हृदय विकार से मौत हो गयी. इसके बाद से हिना की खोज-खबर लेने की कोई कोशिश नहीं हुई. हालांकि पनामा पेपर लीक मामले में इक़बाल के बेटों और उनकी पहली पत्नी का नाम आया था. मगर हिना का नाम उसमें नहीं था. जो भी हो, 15 वर्षों में लगभग 75 फ़िल्में करने के बाद भी हिना का नाम उन अभिनेत्रियों की सूची में दिखता है जिनके संबंध माफियाओं से रहे हैं, इस बात को दरकिनार करते हुए की वह वह खुद भी एक कुशल अभिनेत्री थीं.
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