भूमिका जोशी भूमिका जोशी लखनऊ की रहने वाली हैं और अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजीमें पीएचडी कर रही हैं. भूमिरिकाकी नई किस्त में वो बता रही हैं कि अमेरिका की तबीयत क्यों नासाज़ है. --------------------------------------------------------------------------------चुनावी राजनीति वह बला है जो नवरस की तरह लगभग सारी भावनाओं और मुद्राओं के सहयोगसे अवतरित हो पाती है. चुनाव से पहले के माहौल की गहमा-गहमी की ऊर्जा ही कुछ ऐसीहोती है कि हर घर-चौबारे चौपाल बन जाए. टी.वी और इंटरनेट के युग में हर टीवी औरलैपटॉप स्क्रीन ही अदालत हो गई है - विचारों की, मतभेदों की, सवालों की. कुछ ऐसीभावनाओं का एहसास हो जाता है जिनका कोई ज्ञान न हो और जिन्हें नाम देना भी मुश्किलहो जाए - झुंझलाहट से आगे वाली थकावट, क्रोध से दांत भींचते-भींचते जबड़े का दर्द याफिर निराशा वाली मुस्कान से भरी चुटकुलाहट - दिल और दिमाग की ऐसी एक्सरसाइज किपसीना और ठंड साथ-साथ आ पड़े.अमरीकी आबो -हवा में यही नवरस घुल-घुल कर बह रहा है. टीवी सीरियल नुमा न्यूज़ औरफिल्मनुमा प्रेसिडेंशियल डिबेट के आगे-पीछे कोई और बात करने की जैसे गुंजाइश हीनहीं रही. लांछन और काउंटर-लांछन के चक्रव्यूह में सच का वज़न अब खतरनाक के पैमानेसे तय होने लगा है. जिस चिल्लमचिल्ली के बीच कोई भी बात सुनाई पड़ पा रही है, उस सेयही तय हो पा रहा है कि चुनाव दो उम्मीदवारों और उनके दावों पर नहीं, इस बल पर तयहोगा कि कौन कितना खतरनाक है. जो जितना कम खतरनाक, उतना ही वोट के लायक. हिलेरीक्लिंटन और डॉनल्ड ट्रम्प के बीच का मुक़ाबला उनके लायक-नालायक होने के बल पर नहीं,कौन कितना कम डरावना है, इस बात पर तय होगा.प्रेसिडेंशियल डिबेट के दौरान हिलेरीयही बात है जो चुनाव के एक महीने पहले तक यह नहीं तय कर पा रही है कि डर भांपे तोकैसे ? ये तो साफ़ है कि पहली और दूसरी प्रेसिडेंशियल डिबेट के बीच ट्रम्प के बारेमें टेप पर खुलासे हुए कि कैसे विगत वर्षों में ट्रम्प ने औरतों को मॉलेस्ट कियाहै? उसने कई के डर को एक नाम दे दिया - ट्रम्प का नाम, उसकी बेशर्मी का नाम और उसकीहीनता का नाम. टेप के द्वारा खुलासे के बाद तो खुलासों की कतार सी लग गई. जब ट्रम्पने दूसरी डिबेट के दौरान इन दावों को नकार डाला तो एक दिन के अंदर ही अंदर आठमहिलाओं ने ट्रम्प द्वारा उनके साथ की गयी हिंसा का ब्यौरा टीवी पर दे डाला -ट्रम्प को झूठा साबित करने के लिए. भले ही ट्रम्प समर्थकों ने टी वी पर आकर औरट्रम्प ने ट्वीट कर करके इन दावों को झूठा, मनगढ़ंत और राजनैतिक साज़िश का हिस्साकरार करने का भरसक प्रयास किया हो, इतना तो तय हो गया है कि बेशर्मी और खतरनाक होनेके बीच अगर कोई लकीर है, तो ट्रम्प ने वो मिटा डाली है.प्रेसिडेंशियल डिबेट में बोलते डोनल्ड ट्रंपपर शायद यही वो लकीर है जो कई वोटरों ने खुद भी मिटा डाली है. चुनावी राजनीतिज़्यादातर गुटों के बल पर संचालित होती है, और हिलेरी और ट्रम्प के अपने अपने गुटबहुत पहले से ही तय हो चुकें हैं. जो तय नहीं कर पाएं हैं, उन्हीं के लिए इस डर कीधार को दूसरी तरफ से तेज़ किया जा रहा है. ट्रम्प ने भले ही हिलेरी का काम आसान करदिया हो, उसे अभी भी खारिज नहीं किया जा सकता. अगर ट्रम्प का बेशर्म स्वरूप इसचुनावी मौसम में कई बार उभर-उभर कर सामने आया हो, इसी ट्रम्प ने अमरीकी चुनाव केइतिहास के एक और डर को फिर से पनपाने की कवायद शुरू कर दी है.2000 के अमरीकी प्रेसिडेंशियल चुनाव के दौरान जॉर्ज बुश और एल गोर की टक्कर कीयादें बहुत पुरानी नहीं हैं. फ्लोरिडा में वोटों की गिनती फिर शुरू करा कर परंतुपूरी होने से पहले रोक कर, अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने बुश को राष्ट्रपति घोषित करदिया था. आज भी अमरीका में अटकलें लगती हैं कि अगर गिनती पूरी होने देते तो क्यापता - शायद डेमोक्रेट उम्मीदवार एल गोर ही राष्ट्रपति बन जाते. जो हुआ सो हुआ परट्रम्प ने हार के डर से ये डर फैलाना शुरू कर दिया है कि चुनावी मशीन जबरन हीहिलेरी को जिता सकती है, कि ट्रम्प समर्थकों को मतदान के दिन सतर्क रहना चाहिए -ऐसे मतदाताओं के प्रति जो मतदान के दौरान बेईमानी कर और करवा सकतें हैं. चुनावीविशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कथन द्वारा ट्रम्प शायद ऐसा डर फैलाना चाहते हैं जिसकारण कुछ मतदाता वोट करने ही न निकलें - इस डर से कि कहीं ट्रम्प समर्थक चुनाव केदिन और दौरान किसी प्रकार की हिंसा न उत्तेजित कर दें.चुनावी कैम्पैन के दौरान ट्रम्प की रैलियों में कई दफा हिंसात्मक घटनाएं हो चुकीहैं , ये डर बेवजह नहीं है. और भले ही अमरीकी चुनाव कर्ता ये सफाई दे डालें किअमरीका में चुनाव 'रिग' यानी भ्रष्ट नहीं होते, कोई भी इस डर को पूरी तरह से भगा भीनहीं पा रहा है. और अगर ट्रम्प ने इस डर को हवा दे देकर इसे और बड़ा बना डाला तोआश्चर्य नहीं होगा कि ट्रम्प का डरावनापन इस डर के पीछे कहीं छुप जाए. आखिरीप्रेसिडेंशियल डिबेट में ट्रम्प ने यह कह ही डाला कि वो चुनावी नतीजों के बारे मेंअपनी प्रतिक्रिया 'सस्पेंस' ही रखेंगे.हिलेरी को सुनने उनकी बेटी चेल्सिया और पति बिल क्लिंटन भी पहुंचे, फोटो - रायटर्सट्रम्प के डरावनेपन के साथ साथ उसके समर्थकों के डरावनेपन ने भी कुछ ऐसा रूप लेलिया है कि लगभग हर न्यूज़ चैनेल ने कभी न कभी अमरीका के पिछड़े और पिछड़ते हुए शहरोंमें बसे 'व्हाइट वर्किंग क्लास' को उसका नमूना बना डाला है. उनकी धारणा में यही वहतबका है जो ट्रम्प के डरावनेपन की ओट में अपने बेबुनियाद डर को हवा दे रहा है. कुछऐसी ही धारणा कई समय से ब्रिटेन में भी पनप रही है, किस प्रकार से समाज का वो तबका- जो 'व्हाइट' है पर आर्थिक सफलता से कोसों दूर है, जो सरकारी सब्सिडी के भरोसेरहता है - जिसे गरियाते हुए 'चैव' कहा जाता है - वही सारी समस्याओं के लिएज़िम्मेदार है - भले ही वह इस्लामोफोबिया हो या फिर रेसिस्म.इस अजब कॉकटेल में निवेशक और व्यवसायी के रूप में भी ट्रम्प को इसी 'व्हाइट वर्किंगक्लास' का मसीहा भी मान लिया जाता है, कुछ वैसे ही जैसे ब्रिटेन में लेबर पार्टी कीअसफलताओं के चलते दक्षिणपंथी टोरी पार्टी अनायास ही तथाकथित 'चैव्स' की प्रतिनिधिबनती नज़र आ रही थी. इस खिचड़ी में मध्यम वर्ग की दानवता का कोई खाता ही नहीं है, भलेही कई मायनों में पब्लिक यह भी जानती है कि ज़्यादातर ट्रम्प समर्थक इसी तबके से आतेहैं.जो अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों को कई सालों से देख परख रहें हैं, वो यह जानते हैं किडॉनल्ड ट्रम्प अपना कैम्पैन अमरीका के भूतपूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सनके एजेंडे की परछाई में रच रहें हैं. रिचर्ड निक्सन ने 1960 के दशक में चुनाव डर कीराजनीति बुन के जीता, ये बात अब कोई भी नहीं नकारता है. निक्सन ने चुनाव एक ऐसेमाहौल में जीता था जब राजनैतिक एवं अधिकारों का दायरा अमरीका में हाशिए पर बसी हुईआबादी तक पहुंचने लगा था, जब लिबरल राजनीति परचम पर चढ़ने लगी थी और लोगों कोविश्वास होने लगा था कि सामाजिक संगठन और आंदोलन की शक्ति से कुछ बदलाव हो सकता है.उस समय भी वर्किंग क्लास वाले तबके को दोषी ठहरा मध्यम वर्गीय अमरीकियों नें निक्सनकी डर की राजनीति को खूब हवा दी थी. आज भी जब 'ब्लैक लाइव्स मैटर' जैसे सशक्तआंदोलन अमरीका के शहरों में गूंजने लगे है, जब बरनी सैंडर्स के छोटे पर हावीकैम्पैन ने छात्र राजनीति को एक नया रुख दिया है, जब इमीग्रेशन से जुड़े मुद्दों परसफाई से बात करना ज़रूरी हो गया है - ट्रम्प की डर की राजनीति तो निक्सन जैसे थोड़ीबहुत ढंकी-संभली भी नहीं है. डर के आगे जीत हो न हो, इस डर के पीछे इतनी साज़िशेंहैं कि डर खुद ही मामूली दिखने लगा है. देखना यह है कि दूध का दूध और पानी का पानीहोगा या नहीं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें -हमारे वैशाली से गणतंत्र 'चुराकर' ले गया था अमेरिका, अब देखोट्रंप का औरतों के बारे में सबसे बेहूदा बयानअमेरिकी प्रेसिडेंट रहे बिल क्लिंटन की जमकर धुनाई करती थीं हिलेरीकौन रोकेगा शाहरुख़ के कपड़े उतरने से, हिलेरी या ट्रम्प?डोनल्ड ट्रंप की बीवी के साथ इस अखबार ने की शर्मनाक हरकतडॉनल्ड ट्रंप की जीत बस एक शीशी दारू की मोहताज है, लौलेस बताइन