रवीन्द्र नाथ टैगोर ने देशभक्ति पर अगर आज ये कहा होता तो लोग उनका जीना मुहाल कर देते
आज रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिन है.
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फोटो - thelallantop
यह बयान देना अपने आप में विवादित हो सकता है. किसी पार्टी का कोई नेता ऐसा बयान दे, तो इन दिनों उसे पाकिस्तान भेजने तक की नसीहत दी जा सकती है. लेकिन यह बयान करीब 100 साल पहले दिया गया. और ऐसा कहने वाले थे देश का राष्ट्रगान लिखने वाले, नोबेल पुरस्कार विजेता कवि गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर.
भारत के साथ ही बांग्लादेश का राष्ट्रगान लिखने वाले और गीतांजलि जैसे महाकाव्य पर नोबेल हासिल करने वाले टैगोर मानवता को राष्ट्रीयता से ऊपर रखते थे. नोबेल विजेता अमर्त्य सेन ने किताब 'Argumentative Indian' में 'टैगोर और उनका भारत' में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें बताईं हैं. ये बातें उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से लिखी हैं.
एंड्रूज महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे. लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एकदूसरे से अलग थे. टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चारदीवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है. दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है. वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे.
रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन की स्थापना की थी. यह तस्वीर 1929 की है.
भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा,
भारत के साथ ही बांग्लादेश का राष्ट्रगान लिखने वाले और गीतांजलि जैसे महाकाव्य पर नोबेल हासिल करने वाले टैगोर मानवता को राष्ट्रीयता से ऊपर रखते थे. नोबेल विजेता अमर्त्य सेन ने किताब 'Argumentative Indian' में 'टैगोर और उनका भारत' में टैगोर के राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़ी बातें बताईं हैं. ये बातें उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता और पादरी सी एफ एंड्रूज के हवाले से लिखी हैं.
एंड्रूज महात्मा गांधी और टैगोर के करीबी मित्रों में से एक थे. लेकिन गांधी और टैगोर के विचार एकदूसरे से अलग थे. टैगोर मानते थे कि देशभक्ति चारदीवारी से बाहर विचारों से जुड़ने की आजादी से हमें रोकती है. दूसरे देशों की जनता के दुख दर्द को समझने की स्वतंत्रता भी सीमित कर देती है. वह अपने लेखन में राष्ट्रवाद को लेकर आलोचनात्मक नजरिया रखते थे.
1908 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस की पत्नी अबला बोस की आलोचना का जवाब देते हुए टैगोर ने कहा था कि देशभक्ति हमारा आखिरी आध्यात्मिक सहारा नहीं बन सकता, मेरा आश्रय मानवता है.
टैगोर ने 1916-17 के दौरान जापान और अमेरिका की यात्रा के दौरान राष्ट्रवाद पर कई वक्तव्य दिए थे. ये एक पुस्तक राष्ट्रवाद की शक्ल में 2003 में सामने आए. इसमें 1917 में दिए गए भाषण में टैगोर ने कहा था,रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शांति निकेतन की स्थापना की थी. यह तस्वीर 1929 की है.
भारत के संदर्भ में टैगोर ने लिखा,
भारत के संदर्भ में टैगोर ने सुझाव दिया था कि भारत भले ही पिछड़ा हो, मानवीय मूल्यों में पिछड़ापन उसमें नहीं होना चाहिए. निर्धन भारत भी विश्व का मार्गदर्शन कर मानवीय एकता में आदर्श को प्राप्त कर सकता है. भारत का अतीत यह साबित कर सकता है कि भौतिक संपन्नता की चिंता न कर भारत ने अध्यात्मिक चेतना का सफलतापूर्वक प्रचार किया है.

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