यूक्रेन के राष्ट्र्पति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की ने एक ट्वीट किया “ये यूक्रेन और EU के संबंधों में आया ऐतिहासिक क्षण है. यूक्रेन का भविष्य EU केसाथ नत्थी है.”ट्वीट देखा. अब एक बयान देखिए. ये बयान है, यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट चार्ल्समिशेल का.“आज का दिन आपके लिए ऐतिहासिक है. आप EU के सदस्य बनने की राह पर आगे बढ़ चुकेहैं.”इन बयानों में बार-बार EU का ज़िक्र आ रहा है. ये क्या है? ये यूरोपियन यूनियन काशॉर्ट फ़ॉर्म है. यूरोपियन यूनियन क्या है? ये यूरोप के 27 देशों का आर्थिक औरराजनीतिक संगठन है. उन्होंने व्यापार, कृषि, फ़िशरीज़ और रीजनल डेवलपमेंट जैसेमुद्दों पर एक जैसे कानून लागू किए हैं. सदस्य देशों के नागरिकों के लिए एक सेदूसरे देश में जाने की आज़ादी है. इसके अलावा भी बहुत सारे आर्थिक और राजनैतिक हितजुड़े हुए हैं. EU के देशों में साझा सुरक्षा को लेकर भी समझौता है. एक समय तक EUमें 28 देश हुआ करते थे. जनवरी 2020 में ब्रिटेन ने नाता तोड़ लिया था. उसके जानेके बाद संगठन में 27 देश ही बचे. वैसे, एक फ़ैक्ट ये भी है कि शुरुआती दौर में इसगुट में 06 देश ही थे. बेल्जियम, फ़्रांस, इटली, लग्ज़मबर्ग, नीदरलैंड्स और वेस्टजर्मनी.EU की ख़ासियत समझने के लिए एक ब्रीफ़ इंट्रो ज़रूरी है. इस संगठन का इतना हौव्वाक्यों है?- सदस्य - 27 देश.बड़े देश - फ़्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन, पुर्तगाल, स्वीडन आदि. इनमें सेफ़्रांस यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का परमानेंट सदस्य है. यानी, उसके पासवीटो का अधिकार है.- EU की कुल आबादी - लगभग 45 करोड़. ये पूरी दुनिया का लगभग 6 प्रतिशत है. दुनियाके 100 लोगों में से 06 EU के सदस्य देशों के नागरिक हैं.- कुल जीडीपी - 2021 की गणना के मुताबिक, 17 ट्रिलियन डॉलर. ये दुनिया की कुलजीडीपी का लगभग 18 प्रतिशत है. ये कितना पैसा होगा? बहुत है. आसान भाषा में समझनाहो तो 2020 में भारत की कुल जीडीपी 2.66 ट्रिलियन डॉलर थी. EU की जीडीपी लगभग सातगुणा ज़्यादा है.- EU के सदस्य देशों का ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (HDI) काफ़ी बढ़िया है. HDI कानिर्धारण मुख्यतौर पर तीन फ़ैक्टर्स के आधार पर किया जाता है. लाइफ़ एक्सपेकटेंसी,एजुकेशन और प्रति व्यक्ति आय. ये बताता है कि EU के देश अपने नागरिकों कोस्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं अच्छे से उपलब्ध कराते हैं.- 2012 में EU को नोबेल पीस प्राइज़ से सम्मानित किया जा चुका है.- इसके अलावा, EU का दखल यूनाइटेड नेशंस, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन, जी-7 औरजी-20 जैसे ताक़तवर अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी है.आपने EU के बारे में समझा. अब ये समझते हैं कि आज हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं?अब शुरुआत के दो बयान याद करिए. ज़ेलेन्स्की और मिशेल के. उनके बयानों का मजमून येथा कि यूक्रेन EU का सदस्य बनने के लिए पहली सीढ़ी पर कदम रख चुका है. ये कैसे हुआ?दरअसल, 23 जून को यूरोपियन काउंसिल ने यूक्रेन और मोल्दोवा, दोनों को कैंडिडेट कास्टेटस दे दिया है. चिट्ठी तो जॉर्जिया ने भी भेजी थी. लेकिन फिलहाल के लिए उसकेआवेदन को किनारे रख दिया गया है.अब सवाल आता है, ये कैंडिडेट स्टेटस क्या है?ये समझने के लिए थोड़ा बैकग्राउंड जानना होगा.यूक्रेन, मोल्दोवा और जॉर्जिया, तीनों एक समय तक सोवियत संघ का हिस्सा थे. सोवियतसंघ के विघटन के बाद ये तीनों अलग और आज़ाद हो गए. लेकिन उनके यहां एक धड़ा ऐसा था,जो इस आज़ादी से खुश नहीं हुआ. उसे रूसी पहचान से लगाव बरकरार रहा. इस धड़े ने अलगहोने की कोशिश की. इसके चलते उनका अपनी ही सरकार से संघर्ष हुआ. इस संघर्ष का फायदाउठाया रूस ने. उसने इन जगहों पर या तो अपनी पीसकीपिंग सेना भेज दी. या अलगाववादियोंको सपोर्ट करने लगा.अतीत से एक उदाहरण जॉर्जिया का मिलता है. यहां रूस ने अगस्त 2008 में अपनी सेनाभेजी थी. 11 दिनों तक युद्ध भी चला था. तब से जॉर्जिया के दो इलाके रूस-समर्थितअलगाववादियों के नियंत्रण में है. उनकी अपनी सेना और करेंसी है. जबकि मोल्दोवा में1992 से रूस की पीसकीपिंग आर्मी मौजूद है.जहां तक यूक्रेन की बात है, उसका हाल तो जगजाहिर है. 2014 में क्रीमिया पर क़ब्ज़ा.दोनेश्क और लुहान्स्क में अलगाववादियों को पैसा और हथियार. फिर 24 फ़रवरी 2022 कोस्पेशल मिलिटरी ऑपरेशन के नाम पर सेना भेज दी. ये लड़ाई पिछले चार महीने से जारीहै. नतीजे का तो पता नहीं, लेकिन यूक्रेन तबाही की कगार पर पहुंच चुका है.यूक्रेन के साथ एक और समस्या है. वो है, उसकी लोकेशन. यूक्रेन यूरोपियन यूनियन औररूस के बीच की कड़ी है. रूस की पूर्वी सीमा यूक्रेन से लगती है. उसका कहना है किअगर नेटो या यूरोपियन यूनियन उसकी पूर्वी सीमा के पास आया तो बवाल होगा. यूक्रेन इनदोनों में शामिल होने की लंबे समय से कोशिश कर रहा था. रूस के हमले के पीछे की एकवजह ये भी थी.रूस के हमले के बावजूद यूक्रेन ने मेंबरशिप की कोशिश नहीं छोड़ी. 28 फ़रवरी को उसनेऔपचारिक तौर पर EU की सदस्यता के लिए ऐप्लिकेशन फ़ॉर्म भर दिया. 03 मार्च कोजॉर्जिया और मोल्दोवा ने भी फ़ॉर्म भरकर भेज दिया. उन्हें डर ये था कि यूक्रेन केबाद अगला नंबर उनका हो सकता है. चूंकि आज हमारा फ़ोकस यूक्रेन पर रहने वाला है.इसलिए, हम मोल्दोवा और जॉर्जिया के डिटेल्स में जाने से बचेंगे.हमने दुनियादारी में पहले भी EU की मेंबरशिप के ऐप्लिकेशन की न्यूनतम योग्यताएंबताईं है. एक क्विक रिकैप कर लेते हैं. योग्यता तय करने के लिए 1993 में डेनमार्ककी राजधानी कोपेनेहेगन में यूरोपियन काउंसिल की बैठक हुई. इसलिए, इन शर्तों को‘कोपेनहेगन क्राइटेरिया’ के नाम से जाना जाता है.कौन सा देश EU की सदस्यता के काबिल होगा?- जिसकी बसाहट यूरोप में हो.- जहां लोकतंत्र हो. कानून का शासन हो. मानवाधिकारों का सम्मान और अल्पसंख्यकों केअधिकारों की रक्षा होती हो.- जहां अर्थव्यवस्था ठीक स्थिति में और EU के देशों के साथ काम करने लायक हो.- इन सबके अलावा, संबंधित देशों मेंबरशिप के नियमों और शर्तों का पालन करने कीक्षमता हो.यूक्रेन इन योग्यताओं पर खरा उतरा. उसका ऐप्लिकेशन स्वीकार कर लिया गया. फिर इसेसमीक्षा के लिए यूरोपियन कमिशन के पास भेजा गया. कमिशन में हर सदस्य से एकप्रतिनिधि होते हैं. ये EU की एक इंडिपेंडेंट एग्जीक्यूटिव इकाई है. इसका काम नएकानूनों का खाका तैयार करना, यूरोपियन पार्लियामेंट और यूरोपियन काउंसिल के फ़ैसलोंको लागू कराना है. 17 जून को यूरोपियन कमिशन ने यूक्रेन और मोल्दोवा को कैंडिडेटस्टेटस देने की सिफ़ारिश की. सिफ़ारिश के बाद ऐप्लिकेशन लेटर पहुंचा यूरोपियनकाउंसिल के पास. ये EU की सबसे ताक़तवर इकाई है. यूरोपियन काउंसिल में सदस्य देशोंके राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के मुखिया शामिल होते हैं. काउंसिल उन मुद्दों परफ़ैसले लेती है, जिन्हें नीचे के लेवर पर सुलझाना मुश्किल होता है. कैंडिडेट स्टेटसदेने में भी इसी काउंसिल का फ़ैसला अंतिम होता है.यूरोपियन काउंसिल की बैठक हर तीन महीने पर एक बार होती है. आपात स्थिति में बैठककभी भी बुलाई जा सकती है. 23 जून को ब्रुसेल्स में आयोजित बैठक रूटीन वाली थी.इसमें यूक्रेन और मोल्दोवा के भविष्य पर फ़ैसला होना था. बैठक के बाद पता चला किकाउंसिल ने यूक्रेन को कैंडिडेट का दर्ज़ा देने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास करदिया है.कैंडिडेट स्टेटस मिलना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. ये ऐसा है, जैसे आपने किसीएग्ज़ाम का फ़ॉर्म भरा और उसका एडमिट कार्ड आ गया. आपका फ़ॉर्म रिजेक्ट नहीं हुआ.अंतिम परिणाम परीक्षा में आपकी मेहनत पर तय होता है. यूक्रेन के कैंडिडेट स्टेटस केसाथ भी वही पेच है. दर्ज़ा मिल जाने भर से यूक्रेन EU का मेंबर नहीं बन जाएगा. अभीउसे और भी बहुत कुछ करना होगा. क्या? उसे EU की शर्तों के हिसाब से अपने कानून मेंबदलाव करने होंगे. EU के रूल्स और रेगुलेशंस की संख्या बहुत ज़्यादा है. इन सब परसहमति बनाने में समय लगता है. अंदाज़न कितना समय लग सकता है? फिनलैंड और स्वीडन तीनसाल के अंदर सदस्य बन गए थे. वहीं EU के सबसे नए सदस्य क्रोएशिया को प्रोसेस पूराकरने में 10 साल लग गए थे.क्रोएशिया का प्रोसेस तो पूरा भी हो गया. कई देश हैं, जो सालों से कैंडिडेट स्टेटसपर अटके हुए हैं. जैसे, अल्बानिया को 2014 में कैंडिडेट स्टेटस मिला था. बात वहींअटकी हुई है. नॉर्थ मेसेडोनिया को दिसंबर 2005 में कैंडिडेट का दर्ज़ा मिला था. 17सालों के बाद भी वो EU का मेंबर नहीं बन पाया है. इसी तरह, मॉन्टेनीग्रो को 2010,सर्बिया को 2012 और तुर्की को 1999 में कैंडिडेट घोषित किया जा चुका है. लेकिन येदेश अभी तक सदस्य नहीं बन पाए हैं.ये तो हुई समय की बात. यूक्रेन के सामने और क्या बाधाएं हैं?पहली बाधा है, आम सहमति.EU में किसी नए देश को दाखिल करने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति ज़रूरी है.यूक्रेन के मामले में आम सहमति बन पाना काफ़ी मुश्किल है. उदाहरण के लिए, हंगरी कीसरकार पश्चिमी देशों की बजाय रूस की करीबी है. वे यूक्रेन के लिए पुतिन को नाराज़करने का ज़ोखिम नहीं उठा सकते हैं.दूसरी बाधा ये है कि कई EU के कई देश नए सदस्यों को शामिल करने को लेकर हिचकते हैं.उन्हें ये आशंका रहती है कि नए सदस्य EU के पूरे कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं.वे EU के फ़ैसले लेने की क्षमता पर भी असर डाल सकते हैं. उनका कहना है कि नए दाखिलेसे पहले संगठन को चुस्त-दुरुस्त कर लिया जाए.तीसरी बाधा युद्ध की है. EU ने कभी किसी देश को उस वक़्त में सदस्यता नहीं दी है,जब वो देश युद्ध से जूझ रहा हो. मेंबरशिप प्रोसेस पर आगे बढ़ने के लिए युद्ध कारुकना बेहद ज़रूरी है. फिलहाल इसकी कोई संभावना नज़र नहीं आती. रूस ने यूक्रेन कोकैंडिडेट स्टेटस मिलने पर कहा कि ये उनका अंदरुनी मसला है. लेकिन रूस इस फ़ैसले केबाद चुप बैठेंगे, ऐसा दावे से नहीं कहा जा सकता है. जानकारों की मानें तो यूक्रेनकी राह में रूस अभी और कांटे बिछाने वाला है.अब सवाल ये आता है कि यूक्रेन EU का मेंबर बनने के लिए कितना तैयार है?यूक्रेन पिछले आठ बरस से EU के नियम-कानूनों को आत्मसात करने के लिए काम कर रहा है.EU के मुताबिक, यूक्रेन ने लगभग 70 प्रतिशत अहर्ता पूरी भी कर ली है. अभी पहलीसमस्या युद्ध की है. जब तक युद्ध नहीं रुकता, तब तक बाकी का प्रोसेस लेट होताजाएगा. इसका सीधा असर उसकी EU मेंबरशिप पर पड़ेगा. यानी, यूक्रेन को अभी जो मिलाहै, वो बस एक दिवास्वप्न है. ये स्वप्न हक़ीक़त में कामयाब होता है या नहीं, येकाफ़ी हद तक रूस के कंधों पर टिका है.अब सुर्खियों की बारी.पहली सुर्खी अफ़ग़ानिस्तान से है. 22 जून 2022 का दिन अफगानिस्तान के लिए नासूरसाबित हुआ. इस भूकंप से अब तक हज़ार से भी ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. हताहतोंका आंकड़ा बढ़ने की पूरी आशंका है. भूकंप का सबसे ज़्यादा प्रभाव पकतिका प्रांत मेंदिखा. जब भी ऐसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो फौरी तौर पर तबाही तो होती ही है,लेकिन इनमें लोगों का भविष्य भी अंधकार में चला जाता है.अफगानिस्तान में आए इस भूकंप ने ऐसी ही कई कहानियां दी हैं. ऐसी ही एक कहानी हैकौसर की, कौसर अफगानिस्तान के पकतिका प्रांत में रहते हैं. उन्होंने DW को बताया,‘जब भूकंप आया, उस वक़्त मैं सो रहा था. लेकिन भूकंप के झटके इतने तेज़ थे की मेरीनींद फ़ौरन खुल गई. नींद खुलते ही मैं अपने कमरे से निकलकर बाहर की तरफ भागा तो देखाधूल का गुबार, हर तरफ सिर्फ एक ही चीज़ थी, धूल! मेरा घर भी ढह गया था, और उसी धूलकी आगोश में समा गया था, हमने जैसे तैसे मेरी मां, छोटे भाइयों और बहनों को वहां सेनिकाला, लेकिन मैं अपने पिता को नहीं बचा पाया. मेरे चाचा के परिवार का हाल और भीबुरा है, चाचा के परिवार के 12 सदस्य मारे गए. मैं भी भूकंप के समय उनकी मदद नहींकर पाया.’अफ़ग़ानिस्तान के हालात इतने ख़राब हैं कि मरनेवालों को सामूहिक क़ब्रों में दफ़नायाजा रहा है. लोगों के पास जो कुछ भी खाने का सामान था अब वो मलबे में दब गया है.उनके इलाके की हालत बहुत गंभीर है.एक कहानी अहमद नूर की भी है. अहमद नूर की कहानी बीबीसी में छपी है. नूर ने बताया,“रात के करीब 01:30 बजे भूकंप आया. सब सो रहे थे, भूकंप की आवाज़ से मैं डर गया. जबसब शांत हुआ मैंने अपने दोस्तों को ढूंढने की कोशिश की, जब मैं घर से बाहर निकला तोहर जगह सिर्फ एम्बुलेंस के सायरन सुनाई दे रहे थे. हर तरफ़ मनहूसी भरा आलम था, सबमायूस ही नज़र आ रहे थे. हर गली में मातम के निशान पसरे हैं.’ये तो भूकंप के नुकसान का एक पहलू है, लेकिन एक सवाल जो काफी मौजू है, वो ये किक्या भूकंप के बाद अफगानिस्तान में पर्याप्त राहत पहुंच रही है? तालिबान केअफगानिस्तान में सत्ता संभालने से क्या अंतरराष्ट्रीय मदद में फ़र्क पड़ा है? तालिबानके एक वरिष्ठ अधिकारी अनस हक्कानी ने ट्विटर पर कहा कि सरकार अपनी क्षमताओं के भीतरकाम कर रही है. उनके इस ट्वीट से लोग ये आकलन कर रहे हैं कि इस आपदा के समयअफ़ग़ानिस्तान अकेला पड़ता जा रहा है.अफगानिस्तान की आपात सेवा के अधिकारी सराफुद्दीन मुस्लिम ने कहा ,‘किसी देश में जब इस तरह की कोई बड़ी आपदा आती है तब अन्य देशों की मदद की जरूरतपड़ती है.’इस बीच, संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुतेरेस ने कहा कि अफगानिस्तान में आए इसभूकंप में अंतरराष्ट्रीय संगठन, ज़रूरी टीमों की तैनाती में लगा हुआ है.अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी नज़र रखने और मदद पहुंचाने की बात कही है. लेकिनअफगानिस्तान की पिछली सरकार में काम करने वालों की अपनी अलग राय है. पिछली सरकार केआपदा प्रबंधन मंत्रालय के प्रवक्ता अहमद तमीम अज़ीमी का कहना है कि तालिबान के लिएआपदा प्रबंधन प्राथमिकता नहीं है. यदि आप धार्मिक मौलवियों को तकनीकी विभागों काप्रभारी बनाते हैं, तो आप संकट से निपटने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यह केवलअफगानिस्तान को अराजकता की ओर धकेलेगा.तालिबान शुरुआत से ही अपनी सरकार की वैधता की मांग अंतरराष्ट्रीय समुदाय से करताआया है. लेकिन उसे अभी तक किसी भी बड़े देश या संगठन ने आधिकारिक मान्यता नहीं दीहै. इस वजह से अफ़दग़ानिस्तान के साथ डिप्लोमैटिक संबंध स्थापित नहीं हो सके हैं.आज की दूसरी और अंतिम सुर्खी कोरोना महामारी से जुड़ी है. हम पोस्ट-कोविड वर्ल्डमें जीने की शुरुआत कर चुके हैं. आपदा से निपटने में जिस एक चीज़ ने सबसे अहमभूमिका निभाई, वो कोरोना की वैक्सीन थी. ये सवाल अक्सर पूछा जाता है कि अगरवैक्सीन नहीं होती तो क्या होता? अब उसका वैज्ञानिक प्रमाण मिल गया है. लेंसेट मेंछपी एक स्टडी के मुताबिक, कोरोना के टीकों ने एक साल में करीब 2 करोड़ लोगों की जानबचाई है. ये अध्ययन लंदन के इम्पीरियल कॉलेज ऑफ़ में हुआ है. इसमें 185 देशों काडेटा इकठ्ठा किया गया. रिसर्च से निकले आकलन बताते हैं कि टीकों ने भारत में 42लाख, अमेरिका में 19 लाख, ब्राजील में 10 लाख फ्रांस में 6 लाख 30 हज़ार यूनाइटेडकिंगडम में करीब 5 लाख लोगों की जान बचाई. स्टडी में एक और बात निकलकर आई कि अगर WHO ने 2021 के अंत तक 40% टीकाकरण का लक्ष्यपूरा कर लिया होता, तो 6 लाख और मौतों को रोका जा सकता था. रिसर्चर्स ने कहा कि हमसंभावित मौतों की संख्या पर सहमत-असहमत हो सकते हैं. लेकिन हमें ये बात ज़रूर माननीपड़ेगी कि कोरोना के टीकों ने लाखों लोगों की जान बचाई है और इस दुनिया को महामारीके चंगुल से बाहर निकलने में मदद की है.