ब्रेस्ट कैंसर का खतरा हर औरत को होता है. और कैंसर कभी तूफ़ान सा नहीं आता, धीरेधीरे आपके शरीर में घर करता है. इसलिए हर साल अपना टेस्ट करवाएं. खासकर वो औरतें जोमां बन चुकी हैं. क्योंकि स्तन आपके अस्तित्व का हिस्सा हैं. अक्टूबर ब्रेस्टकैंसर अवेयरनेस मंथ है. यानी ब्रेस्ट कैंसर के बारे में बात करने वाला महीना. इसलिएहम आज ब्रेस्ट कैंसर पर बात करेंगे, विभा रानी की कलम के जरिए.विभा रानी एक कवि और थिएटर आर्टिस्ट हैं. और हां, अब एक कैंसर सर्वाइवर भी. 2013में इनका ब्रेस्ट कैंसर डायग्नोज़ हुआ था. जिसके बाद इनके कीमोथेरेपी के सेशन हुए.आज विभा स्वस्थ हैं. आपको बता रही हैं कि कैंसर के मरीजों को क्या-कुछ सहना पड़ताहै. और कैसे अपनी हिम्मत और इच्छाशक्ति से हर मुसीबत को हराया जा सकता है.--------------------------------------------------------------------------------‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’ ‘मुझे नहीं लगता.‘ ‘फिर क्यों आई मेरेपास?’ ‘भेजा गया है.‘ ‘किसने भेजा?’ ‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने.‘ और छ्ह साल पुरानीकेस-हिस्ट्री- ‘बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ. अबभीगे छोले के आकार की. ....कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो. मुंबई-चेन्नै मेंदिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी. लेडी डॉक्टर्स से भी. हंसी आती है, साइज की इस घरेलूतुलना से. हंसी आती है अपनी बेवकूफी पर भी कि ब्रेस्ट-यूट्रस की बात आने पर सबसेपहले हम गायनोकॉलॉजिस्ट के पास ही दौड़ती हैं.'यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट मेंअटके-भटके. छह साल मैं भी इस-उसको दिखाती रही. सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्टभी बोलीं- ‘उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं. डोंट वरी.‘ और मैंनिश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर, घर-परिवार में लगी रही.धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स! डॉक्टर से मिलने की वजह जानकरबोली- ‘मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए. ये भी आपको वहीं भेजेंगी. आपका समयबचेगा’ दिल धड़का- "ओंकोलॉजी!" फिर खुद ही हंसी में उड़ा दिया- "विभा डार्लिंग! आज तककभी तुझे कुछ हुआ है जो अब होगा."डॉक्टर मुझसे भी महान! बोला- ‘मुझे फायब्रोइड लगता है. डजंट मैटर. आप जिंदगी भरइसके साथ रह सकती हैं." मेरा खुला या भौंचक चेहरा देखकर टालू अंदाज में कहा- "फिरभी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट.‘ मेरे लिए हरक्षेत्र अनुभव का नया जखीरा. इसके लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल मेंएक महीने, यानि दीवाली तक मेरे पास समय नहीं. आज संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सलनहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब’. मैमोग्राफी विभाग ने कहा, ‘बिनाअपॉइंटमेंटन वाले पेशेंट को वेट करना होता है. मैं तैयार, पर अकेली, अजीब घबराहट औरबेफिक्री का भाव लिए. अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति केसमय की बरबादी लगती. अस्पताल जाना भी उनमें से एक था. अजय (पति) को फोन कर दिया किकुछ टेस्ट के लिए रुक गई हूँ. करवाकर आऊँगी. मैंने ही इसे गंभीरता से नहीं लिया थातो वे क्या लेते!मजाक में कहती रहती थी- "मेरा ब्रेस्ट! रोलर प्रेस्ड!!" इस रोलर प्रेस्ड ब्रेस्ट नेमैमोग्राफी की तकलीफ को चौगुना कर दिया. टेक्नीशियनों की भी उलझन चुनौती की तरहमुंह बाए थी-" करो इस सपाट छाती की मैमोग्राफी.“ चुनौती स्वीकारी गयी और मेरी तकलीफकई गुना बढ़ा गई. मैंने लिखा- यह स्तन है या नींबू या नारंगी! यह मशीन है या किसीआतताई के हाथ, जिसकी नजर में स्तन हैं मांस का लोथड़ा भर! चक्की के ये दो पाट! आओ,और भर दो इन दो पाटों के बीच अपने जीते-जागते बदन को-खुद ही! भरो चीख भरीसिसकारियाँ, कोई नहीं आएगा इन बड़े बड़े डैनेवाले गिद्धों से तुम्हें बचाने!स्त्रियों का यह अंग किस-किस रूप में छलता है खुद को!बायप्सी की तकलीफ का भी अंदाजा था नहीं. डॉक्टर ने कहा था- "एक इंजेक्शन देकरफ्लूइड का सैम्पल लेंगे. बस!” लेकिन जब सुई चारों कोनों से कट कट मांस काटती गई तबबायोप्सी के दर्द का पता चला. ट्रे में खून से लिथड़ी रुई ने नर्वसनेस को और बढ़ादिया. तन-मन से कमजोर अब मैं घर जाने के लिए अस्पताल से बाहर आई. गाड़ी लेकर गई नहींथी. ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे. एक रुका, पर जाने से मना कर दिया. मैंने कहा, ‘भैया,अस्पताल से आई हूँ. चक्कर आ रहा है, ले चलो.‘ उसने फटाक से कहा- “तो अस्पताल सेलेना था न!” मैं बोली- “वहाँ कोई ऑटो रुक नहीं रहा था, इसलिए रोड तक आई हूँ. देखनहीं रहे, गाड़ी का सहारा लिए खड़ी हूँ.“ उसने फिर से एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घरछोड़ा. लेकिन, जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा. छोटे-छोटे मानवीय संवेदनाके पल मन को छूते हैं. चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से. ऑफिस औरमेरी व्यस्तता का चोली दामन का साथ है. उसमें भी तब, जब आपके कार्यालय का निरीक्षणहो और सारी जिम्मेदारी आप पर हो. लिहाजा, व्यस्तता में भूल गई सब. चार दिन बादअचानक याद आने पर अजय को फोन किया. वे बोले- ‘रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिरदेखते हैं.' यह 18 अक्तूबर, 2013 की रात थी. ऑफिस के काम से चूर इस रिपोर्ट से दिलएकबारगी फिर ज़ोर से धड़का. रात थी. पार्टी चल रही थी. मैं भी पार्टी में शामिल हुई.मन न होते हुए भी खा रही थी, हंस-बोल रही थी. दिन रात कुछ न कुछ तकलीफ़ों के बावजूदआज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं. मन हंसा- ‘कुछ तो निकला.‘ दूसरा मन कहरहा था, गलत होगी रिपोर्ट! फिर भी अजय से कहा, "मेरे पहुँचने तक फैमिली डॉक्टर सेदिखा लो." दूसरे दिन फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया. मतलब, "वेलकम टु दवर्ल्ड ऑफ कैंसर!"डॉक्टर भी रिपोर्ट देख चकरा गया- ‘कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है.' डॉक्टरने बड़े साफ और संक्षिप्त शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच-प्रक्रिया बता दी. कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्यशीघ्रम! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जानाथा- ऑफिस के एक टेस्ट में भाग लेने. लौटकर विभागीय मीटिंग करनी थी, क्योंकि छुट्टीलंबी लेनी थी. डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी. ना! इस दिन कैसे करा सकती हूँ!चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी. इसबार तोरह लूँ. तो 1 नवंबर, 2013 तय हुआ- ऑपरेशन के लिए.अभी तक केवल ऑफिस वालों को बताया था. रिशतेदारों की घबराहट का अंदाजा हमें था.वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ीजिठानी को कैंसर से खो चुकी थी. घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से. इसलिए दोनों हीओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना...बड़ी कठिन स्थिति थी. हमनेनिर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही घरवालों या हित-मित्रों कोबताया जाए.आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रहीथीं. मैंने ही कहा- ‘मुझे हिम्मत देने के बजाय आपलोग ही हिम्मत हार बैठेंगी तो मेराक्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारणनही रोऊंगी. जब भी हालात से विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं.मन को ताकत मिलती. यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज केरोगी हैं. वे भी तो जीते हैं. उनका भी तो इलाज होता है. पहली बार मैंने अपने बाबतसोचा- मुझे मजबूत बने रहना है. अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए. शहर में जबचर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे. हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते-कतराते हैं. इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती. मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारीपर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी सेलड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें. याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटालेंगे, लेकिन मन की ताकत सिर्फ आप अपने से ही जुटा सकते हैं. आपके हालात परजेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको ही उन्हें बताना है कि ऐसे समय मेंआपको उनके आँसू नहीं, उनके मजबूत मन चाहिए. निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है. यह इंसानको तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है. लेकिन इसके साथही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही होते. जबतकबात अपने पर नहीं आती, तबतक अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं. इससेभ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं. कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं. इसलिएइसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं. हम भी नर्वस थे. मेरा एकमन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब रोएँ. लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरीदोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी – अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे.मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था. ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझेकेमो पोर्ट नहीं लगाया- ‘आपका केस बहुत फेयर है. सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकताहै, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े. केवल रेडिएशन देकर छुट्टी.‘ किसी भी मरीज के लिएइससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है!ऑपरेशन के बाद अलग अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती एक्यूट यूरिनइन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी. मेरे मित्र रवि शेखर एकम्यूजिक बॉक्स छोड़ गए. सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता.नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए. दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर. अजय औरबच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए. मुझे सख्त ताकीद, कोई काम नकरने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की. पूरे जीवन जितनानहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी. शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादतीप्रकृति भी नहीं सहती. उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है. तो क्या मेरा कैंसरप्रकृति का दिया इलाज है? या जीवन और नौकरी में आए वे पल और झंझावात, जिन्हेंसमझनेवाला कोई नहीं और जो गहरे जाकर गाँठ बना गया? या मैंने ही किसी के साथ नहींबांटा- "रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय. सुनि इठलैन्हि लोग सब, बाँटि नलैंहे कोय." सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड III! डॉक्टर ने समझाया- "चोरीहोने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़. ग्रेड 3 यही आतंकवादीहैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं. इसलिए केमो अनिवार्य!" केमोस्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- ‘सर्जरी के तीन सेचार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए. चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथशरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना,कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि.‘ तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ मेंमुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे. केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करालिए थे-पिक्सी कट. लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना. फिर भीबालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भीमैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी. अजय और कोशी भागे-भागे आए. कारणजानकर दिलासे देने लगे. कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया.लेकिन, आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई. झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया. रात में तोषीके आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है. उसने मुझे अपने गले सेलगाते हुए कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो.‘एक-दो दिन बाद स्थिर होकर खुद को देखा- नाटक ‘मि. जिन्ना’ करते समय अक्सर गांधी कीभूमिका की सोचती. तब हिम्मत नहीं थी. लेकिन अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार होगया. उसे ढंकती नहीं, न घर में न बाहर में. यह अपना आत्म-विश्वास है. मुझेदेखनेवाले कहते हैं- ‘यह ‘कट’ आप पर बहुत सूट कर रहा है.‘ किसी ने मौंक कहा, किसीने कहा, "आप बिलकुल वाटरवाली शबाना आज़मी लग रही हैं." शबाना से मेरी तुलना शुरू सेकी जाती रही है. लेकिन अब मैंने कहना शुरू कर दिया था, "मैं नहीं, वो मुझसे मिलतीहैं." (आखिरकार अब मेरी भी एक हैसियत है-लेखक, कवि, ट्रेनर, थिएटर एक्टर.)केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया. लेकिन तीसरे केमो तक आते-आतेसारी नसें फायर कर गईं. नसें काली पड़ गईँ और काफी दर्द रहने लगा. डॉक्टर बोले-‘आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं. आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़महीने में ही हो गया. अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा. इसके लिए औरमार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन!मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम होजाते हैं. मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिएभेजा गया, ताकि कैंसर –सेल्स की स्थिति का पता चल सके. रिपोर्ट आ गई. डॉक्टर नेबताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं. लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम- शिड्यूलके मुताबिक! पहले 4 केमो के एक सेट के बाद दूसरे सेट में 12 केमो- साप्ताहिक. केमोसे भूख बहुत लगती और अस्पताल का खाना! केमो में दिन भर लगता. चुराकर घर से खाना लेजाती. हर केमो की अपनी दुश्वारियां. कभी सबकुछ सामान्य रहता. कभी एकदम कंप्लीकेटेड.एक साइकिल में ज़बान ऐंठ गई तो एक में शरीर में जर्क आने लगा.इसी बीच इंफेक्शन हो गया और फिर 10 दिन अस्पताल में. जांच पर जांच और बिल पर बिल.मैं सोचती रहती, “क्या ये सभी जांच जरूरी भी थे?” फिर से वही बात आने लगी दिमागमें, “शिक्षा और चिकित्सा- ये दो क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आप कुछ नहीं कर सकते.“इंफेक्शन और इसके इलाज के कारण मेरा केमो 15 दिन आगे टल गया. मेरे साथ की दूसरीमहिलाओं का आखिरी केमो आता. केमो से निकलने की ख़ुशी चहरे पर साफ़ नज़र आती. वेबाकियों को दिलासे देतीं. मुझे भी मिले और मैंने भी दिए. 16 केमो के बाद रेडिएशन.फिर से उसका पूरा प्रोटोकॉल. 35 सिटिंग. सोमवार से शुक्रवार. प्रतिदिन. उसके लिएअलग से काउन्सिलिंग. अलग से बचाव के उपाय! प्रभावित जगह पर पानी, साबुन, क्रीम काप्रयोग वर्जित. ब्रेस्ट के कारण गले पर भी असर पड़ा. आवाज़ फट सी गई. धीरे धीरेरेडियेशन से जगह झुलसकर काली पड़ने लगी. साइकिल पूरा होने पर एक महीने का पूर्णआराम.ये सब तो शिड्यूल में था. जो नहीं था और जिसे मैंने अपने लिए तय किया था, वह था खुदको बिजी रखना. केमो के दो सप्ताह तक मैं उठने की हालत में नहीं रहती. उसके बाद एकसप्ताह “बेहतर” रहती. साप्ताहिक केमो मे तो और भी मुश्किल थी. जबतक तबीयत थोड़ीसंभलती, फिर से नए केमो का दिन आ जाता. लेकिन अपने इन तथाकथित ‘बेहतर’ दिनों कोमैंने तीन भागों में बाँट दिया- लिखना, पढ़ना और वीडियो बनाना. खूब किताबें पढ़ीं-हिन्दी, अँग्रेजी, मैथिली की. लिखा भी- कई कहानियाँ, कविताएँ और नाटक "मटन मसालाचिकन चिली." उसे प्रोड्यूस किया. CAN शीर्षक से इस मौके पर लिखी कविताओं का संग्रहतैयार है-अँग्रेजी और हिन्दी में- द्विभाषी. “सेलेब्रेटिंग कैंसर” नाम से हीआत्मकथात्मक किताब लिख रही हूँ. यह एक प्रयास है रचनात्मक तरीके से लोगों को कैंसरके बारे में बताने का, कैंसर से न डरने का, इससे लड़ने का साहस और इसके प्रतिसकारात्मकता तैयार करने का. इंस्टाग्राम पर 15 सेकेण्ड के वीडियो बनाने की सुविधाहै. चुनौतियों में जीना स्वभाव में है. भोजपुरी गीतों और बच्चों की बातों को लेकरवीडियो बनाने और यूट्यूब पर पोस्ट करने लगी. फिर उन्हें एडिट करके कई फ़िल्में बनाकरपोस्ट कीं. हर रोज खूब फल खाना पड़ता. ‘सत्यमेव जयते’ प्रोग्राम में घर में खादबनाने की विधि बताई गई. मैंने फलों के छिलके से खाद बनाना शुरू कर दिया. थोड़ी बहुतबागवानी भी कर लेती. पोए साग की पहली फसल मेरी खुशी कई गुना बढ़ा गई.इसी समय शुरू किया- “अवितोको क्रिएटिव इवानिंग” कार्यक्रम! “रूम थिएटर” की अवधारणापर आधारित! चूंकि इन्फेक्शन के डर से घर से निकलने की इजाज़त नहीं थी, इसलिए इसे घरपर ही शुरू किया. शनिवार को केमो लेती. केमो के बाद रात भर नींद नहीं आती. पर,इतवार को ‘रूम थिएटर’ के लिए तैयार हो जाती. अमूमन 36 घंटे के बाद मैं सो पाती. सभीने मेरा बहुत साथ दिया और घर पर ही हमने ‘एक्सपेरिमेंटिंग थिएटर’ से लेकर ‘मंटो’ परनाटक की कई प्रस्तुतियाँ कीं. 25-30 लोगों के बैठने की क्षमतावाले घर में 60-70 लोगआए. अप्रैल, 2013 के गीताश्री के संपादकत्व में निकलनेवाली हिन्दी पत्रिका‘बिंदिया’ में मेरा एक लेख छपा. दरअसल, उन्होने ही मुझे इस पर लिखने के लिए प्रेरितकिया, जबकि मैं उसके छपने के बाद के परिणाम को लेकर थोड़ी परेशान थी. अंतत: वही हुआ.उसके छपते और उसे फेसबुक पर पोस्ट करते ही जैसे भूचाल आ गया. फोन, मेल, फेसबुकमेसेज! सभी मुझे इस तरह दिलासे देने और रोने लगे, जैसे मैं सचमुच मर गई होऊँ! उनकेफोन दिलासे के बदले हतोत्साहित करते. अजय ने कड़े शब्दों में मुझे किसी का फोन लेनेया किसी से बात करने से मना कर दिया. कुछ मेरे पास आना चाहते थे. मुझे पता था, वेमुझसे मिलने के बहाने मेरी और भी कुरूप पड़ गई सूरत को देखना चाहते हैं. उन सबनेकैंसर के बारे में सुन भर रखा था, उसे नजदीक से देखा नहीं था और मैं उनके लिए एकरेडीमेड उपकरण बनकर आ गई थी. वे सब आए. मैं उनसे मिली- अपनी गंजी खोपड़ी, सूनी पलकोंऔर भौंहों, लेकिन जीवंत मुस्कान और जीवन की एक नई आस के साथ- उन्हें ही दिलासे देतीऔर खूब मुसकुराती हुई.आज इन सबसे निकल आई हूँ. केमो, रेडिएशन का प्रोटोकॉल पूरा करने और एक महीना आरामकरने के बाद ऑफिस आना शुरू किया. मेरे साथ मेरा काम मेरा इंतज़ार करते रहते हैं यामैं काम के बगैर जी नहीं सकती, पता नहीं. दफ्तर के दौरे के साथ-साथ साहित्यिक औरनाट्य दौरे शुरू हो चुके हैं. सितंबर, 2014 में एसआरएम, चेन्नै का पहला दौरा-विशिष्ट अतिथि के रूप में! दिसंबर, 2014 में आजमगढ़ में नाटक ‘भिखारिन’ का पहला शो.रायपुर साहित्य महोत्सव का संयोजन और इन सबसे ऊपर ऑफिस की तमाम जिम्मेदारियाँ. जीवनकी दूसरी पारी का व्यस्ततम दौर शुरू हो चुका है. दवा और फॉलो- अप चल रहा है.खान-पान और आराम अभी भी बहुत ज़रूरी है. कमजोरी अभी भी है. लेकिन, खुद को व्यस्तरखना बहुत सी परेशानियों से निजात दिलाता है. अजय, तोषी, कोशी सभी मुझे समझाते रहतेहैं. मैं थोड़ा उनको और थोड़ा खुद को समझाती-समझती रहती हूँ.कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में. लेकिन, अपना मानसिकसंबल और घरवालों का संग-साथ कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनीहै. यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकीसहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा). यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं. यह सोचेंकि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है. इसे जिएँ- भरपूरऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है.सो, कम एंड लेट्स सेलेब्रेट कैंसर! क्या फर्क पड़ता है कि सीना सपाट है या उभराचेहरा सुंदर है या बिगड़ा सर पर बाल हैं या है यह टकला जीवन इससे बढ़कर है यौवनमय,स्फूर्त और ताज़ा, आइये, मनाएँ इसे भरपूर, जिएं इसे भरपूर !--------------------------------------------------------------------------------यह लेख पहले स्त्रीकाल में छपा था. हम इसे लेखिका की इजाज़त से आपको द लल्लनटॉप परपढ़वा रहे हैं.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें:ब्रेस्ट कैंसर: जिसका खतरा औरतों और मर्दों दोनों को हैजिन्ना की मजार को औरतों के लिए गुलाबी क्यों कर दिया?