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कैसे एक तांत्रिक ने दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों को झांसे में डाला!

कहानी चंद्रास्वामी की, जिनका नाम ब्रिटेन की प्रधानमंत्री से लेकर दाऊद इब्राहिम से जुड़ा.

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नरसिम्हा राव जब आंध्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे तो उन्होंने युवा चंद्रास्वामी को हैदराबाद युवा कांग्रेस का महासचिव बना द‍िया. इसके बाद वह राजनीति‍ में अपनी पैठ बढ़ाने लगे. (तस्वीर: Getty)
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2 मई 2022 (Updated: 30 अप्रैल 2022, 16:25 IST)
Updated: 30 अप्रैल 2022 16:25 IST
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तांत्रिक शब्द सुनते ही दिमाग में छवि बनती है भूत प्रेतों, जादू टोना ऐसी सभी चीजों की. लेकिन आज जिस तांत्रिक की कहानी हम आपको सुनाने जा रहे हैं. उसका भूत प्रेतों से नहीं राजनेताओं से रिश्ता था. वो भी छोटे-मोटे राजनेता नहीं बल्कि भारत के प्रधानमंत्री और देश विदेश के राष्ट्राध्यक्षों से. इस शक्श का नाम राजीव गांधी की हत्या से भी जुड़ा और दाऊद इब्राहिम से भी. आज 2 मई है और आज की तारीख का संबंध है एक तांत्रिक से. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश अपनी किताब ‘To The Brink & Back’ में एक किस्से का जिक्र करते हैं.

नरसिम्हा राव के गुरु

1991 का साल. देश में आर्थिक संकट के बादल थे. नरसिम्हा सरकार ने आर्थिक सुधारों की घोषणा की. लेकिन फॉरेन रिजर्व खाली होने की कगार पर था. ऐसे में एक दिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव अपने गुरु चंद्रास्वामी से मिलने गए. चंद्रास्वामी ने नरसिम्हा राव की लकीरों को देखते हुए कहा,

‘दोस्त, चिंता मत करो. मैंने अपने मित्र ब्रुनेई के शाह से बात की है. उन्होंने कहा है कि जितना पैसा चाहिए, उधार देंगे. बिना सवाल पूछे.’

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पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव (तस्वीर: Getty)

राव ने इस बात को एकदम सीरियसली ले लिया. तुरंत एक प्लेन तैयार किया गया. ब्रुनेई से माल मंगवाने के लिए. जब बाकी नेताओं और अफसरों को पता चला तो भागे-भागे आए. राव को समझाया, ‘सर, ऐसे थोड़ी ना होता है! देश-विदेश का मामला है. नाक कट जाएगी. शाह अपना मामा थोड़े है जो जेबें और बगली भर के गिन्नियां दे देगा.’

चंद्रास्वामी की कहानी शुरू होती है 1948 से. उनके शुरुआती जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है. लेकिन उनके अपने अनुसार बचपन से ही उनका दिल तंत्र साधना में था. इसलिए छोटी उम्र में उन्होंने घर छोड़ कर जंगल की शरण ले ली थी. कई साल जंगल में साधना करने के बाद 23 की उम्र में वो बनारस पहुंचे. यहां धीरे-धीरे उन्होंने ज्योतिष के रूप में अपना नाम चमकाया. और इसी दौर में कई नेता उनके शिष्य बन गए.

इनमें से एक नाम था पीवी नरसिम्हा राव का. राव 1971 से 1973 के बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उसी दौरान राव की मुलाकात चंद्रास्वामी से हुई थी और वो राव के साथ नजर आने लगे थे. धीरे-धीरे चंद्रास्वामी का रिश्ता और नेताओं से भी जुड़ता गया. इंदिरा गांधी ने उन्हें दिल्ली में आश्रम बनाने के लिए जमीन मुहैया कराई थी. विदेशी नेताओं पर चंद्रास्वामी कैसे अपनी धाक जमाते थे, इसको लेकर पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह अपनी किताब “‘वॉकिंग विद लॉयन्स- टेल्स फ्रॉम अ डिप्लोमेटिक पास्ट’ में एक किस्सा बताते हैं.

मारग्रेट थैचर से मुलाकात

1975 का साल था. नटवर सिंह ब्रिटेन में भारतीय उप-उच्चायुक्त के पद पर काम करते थे. इंदिरा के करीबी और पूर्व राज्य सभा सांसद यशपाल कपूर ने चंद्रास्वामी से कहा था, लन्दन जाओ तो नटवर से मिलकर आना. चंद्रास्वामी इंडिया हाउस में नटवर सिंह से मिलने पहुंचे. और बातों ही बातों में उन्होंने मारग्रेट थैचर से मिलने की इच्छा जताई.

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ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर (तस्वीर: Getty)

थैचर तब कंजेर्वेटिव पार्टी की पहली महिला अध्यक्ष बनी थीं. चंद्रास्वामी की ये बात सुनकर नटवर सिंह को कुछ आश्चर्य हुआ. फिर भी उन्होंने थैचर तक ये बात पहुंचाई. थैचर को भी ये बात अटपटी लगी. लेकिन थैचर इंदिरा गांधी से बहुत प्रभावित थी. इसलिए जब उन्हें पता चला कि चंद्रास्वामी इंदिरा के करीबी हैं तो उन्होंने 10 मिनट की मीटिंग का टाइम दे दिया. चंद्रास्वामी जब थैचर से मिलने पहुंचे, तो उनके सिर पर बड़ा तिलक, गले में रुद्राक्ष की ढेर सारी मालाएं और हाथ में लाठी थी. कमाल की बात ये थी कि चंद्रास्वामी को अंग्रेज़ी बोलनी तक नहीं आती थी. इसलिए नटवर सिंह उस रोज़ ट्रांसलेटर की भूमिका में थे.

बात शुरू होते ही चंद्रास्वामी ने दो कागज मंगाए. एक पर उन्होंने ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं तक लाइनें खींच दीं. और दूसरे कागज़ के पांच छोटे-छोटे टुकड़े कर थैचर को थमा दिए. इसके बाद चंद्रास्वामी ने थैचर से कहा कि वो अपने भविष्य को लेकर जो सवाल पूछना चाहती हैं, उन्हें कागज़ के टुकड़ों पर लिखकर दूसरे कागज़ में बने खांचों पर रख दें. थैचर ने ऐसा ही किया. इस कवायद के बाद चंद्रास्वामी ध्यान की मुद्रा में बैठ गए और थैचर से कागज पर लिखा कोई एक सवाल मन में पढ़ने को कहा.

जैसे ही थैचर ने मन में सवाल पढ़ा, चंद्रास्वामी ने वही सवाल ज्यों का त्यों दोहरा दिया. थैचर को थोड़ा अचरज हुआ. इसके बाद थैचर ने एक के बाद एक पांचों सवाल मन में पढ़े और चंद्रास्वामी ने वही सवाल उनके सामने दोहरा दिए. अभी तक अनमने ढंग से इस कार्यकलाप को देख रही थैचर अचानक से चंद्रास्वामी में दिलचस्पी लेने लगीं.

भविष्यवाणी सच साबित हुई

चंद्रास्वामी ने थैचर के पांचों सवालों को बिना पढ़े बता दिया था. माहौल बनता देख चंद्रास्वामी सोफे पर पद्मासन लगाकर बैठ गए. नटवर ये सारी गतिविधियां देखकर घबरा रहे थे, लेकिन थैचर हर चीज को मूक सहमति देती जा रही थीं. थैचर सवाल पूछ रही थीं और चंद्रास्वामी जवाब दे रहे थे. अचानक चंद्रास्वामी ने घोषणा कर दी कि अब सूर्यास्त हो गया और अब वह सवालों के और जवाब नहीं दे सकते. इसके बाद वह थैचर ही थीं, जिन्होंने अपनी तरफ से पूछा कि वह चंद्रास्वामी से अगली बार कब मिल सकती हैं.

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पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह (तस्वीर: Getty)

इस पर चंद्रास्वामी ने शांत स्वर में नटवर सिंह से कहा, ‘बोल दो, मंगलवार की दोपहर ढाई बजे नटवर सिंह के घर पर.’

इतना सुनना था कि नटवर सिंह बौखला उठे, उन्होंने थैचर को इसकी अंग्रेज़ी बताने के बजाय उल्टा चंद्रास्वामी से कहा, ‘यह भारत नहीं है. किसी देश के विपक्षी नेता की सुविधा जाने बिना उससे ऐसी बात नहीं कही जा सकती.’

चंद्रास्वामी ने शांत स्वर में नटवर सिंह से कहा, ‘आप बस अनुवाद कर दीजिए. फिर देखिए.’ अब चौंकने की बारी नटवर सिंह की थी. जैसे ही नटवर ने अंग्रेज़ी में ये बात थैचर को बताई, थैचर झट से तैयार हो गई. उन्होंने नटवर से उनके घर का पता भी ले लिया. इसके बाद चंद्रास्वामी ने थैचर को एक ताबीज दिया.

नटवर सिंह लिखते हैं कि तय दिन और तय वक्त पर मार्गरेट थैचर नटवर के घर पहुंची. और भी हैरानी की बार ये थी कि उन्होंने वही ताबीज़ पहना था जो चंद्रास्वामी ने थैचर को दिया था.

उस रोज़ थैचर ने अपने मन की इच्छा चंद्रास्वामी के सामने दोहराई और पूछा, मैं प्रधानमंत्री कब बनूंगी. चंद्रास्वामी ने जवाब दिया, ‘अगले तीन या चार साल में.’
इसके बाद चन्द्रस्वामी ने एक और भविष्यवाणी की. उन्होंने कहा कि थैचर 9, 11 या 13 साल के लिए पीएम बनेंगी. आश्चर्यजनक रूप से ये बात सच भी साबित हुई. 1979 में मार्गरेट थैचर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनी और 1990 तक 11 साल के लिए प्रधानमंत्री रहीं.

कुछ ऐसा ही जादू चंद्रास्वामी ने ब्रूनेई के सुल्तान, बहरीन के शासक, और ज़ायर के राष्ट्राध्यक्ष पर भी चलाया था. सत्ता और विपक्ष दोनों जगह उनकी पैठ थी. इसलिए 1993 में उन्होंने राम मंदिर मामले में मध्यस्त की भूमिका भी निभाई थी.

दाऊद इब्राहिम के साथ नाम जुड़ा

साल 1995 में बबलू श्रीवास्तव नाम के हिस्ट्री शीटर की गिरफ्तारी हुई. बबलू श्रीवास्तव कभी दाऊद इब्राहिम का साथी हुआ करता था. और 1993 बम धमाकों के बाद उसने खुद को डी कंपनी से अलग कर लिया था. पुलिस से पूछताछ के दौरान बबलू ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया, उसने बताया कि 1989 में दाऊद ने चंद्रास्वामी को तीन भागों में एक बड़ी रकम दी थी, जिसे हवाला के रास्ते स्वामी ने खपाया था.

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बबलू श्रीवास्तव (फ़ाइल फोटो)

इसी दौरान स्वामी पर दाऊद और अदनान खशोगी के बीच हथियारों की डील में बिचौलिए का रोल निभाने का आरोप भी लगाया. बबलू ने आरोप लगाया कि गृह मंत्रालय में अपनी पहुंच के चलते चंद्रास्वामी से खुद पर लगे संभी मामलों को दबा दिया था.

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट जिसे वोहरा कमिटी के सामने पेश किया गया था, उसमें भी चंद्रास्वामी के दाऊद के साथ रिश्तों की बात कही गई थी. इन सबके बावजूद अपने राजनैतिक रसूख के चलते चंद्रास्वामी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. बबलू ने साथ ही साथ चंद्रास्वामी पर कुछ और आरोप भी लगाए. उसके अनुसार चंद्रास्वामी के कहने पर उसने ‘जनाधार’ पत्रिका के प्रकाशक राजेन्द्र जैन की कार में बम लगाया और दो साधुओं, नारायण और नित्यानंद मुनि, का अपहरण किया था.

स्वामी की पहुंच स्वयं प्रधानमंत्री तक थी. इसलिए शुरुआत में तो उन पर किसी ने हाथ डालने की कोशिश नहीं की. लेकिन जब 1995 में कांग्रेस में सत्ता को लेकर नई उठापटक का दौर शुरू हुआ तो चंद्रास्वामी के राजनैतिक विरोधी गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट ने सीबीआई को चंद्रास्वामी की गिरफ़्तारी के आदेश दे दिए.

तिहाड़ पहुंचे

1995 में ब्रिटेन के एक गुजराती व्यापारी लखुभाई पाठक ने चंद्रास्वामी पर 1 लाख पाउंड की ठगी का आरोप लगाया था. और इसी मामले में आज यानी 2 मई 1996 ही वो तारीख थी जिस दिन से राजनेताओं को अपनी जेब में रखने वाले इस तांत्रिक की उलटी गिनती शुरू हो गई थी.

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चंद्रास्वामी और सुब्रमण्यम स्वामी (तस्वीर: Getty)

उस रोज़ कई पत्रकारों को एक साथ टिप मिली कि चिन्नई के सिंदूरी होटल में CBI पहुंची है और एक हाई प्रोफ़ाइल गिरफ्तारी होने वाली है. CBI के जॉइंट डायरेक्टर डी मुखर्जी टीम को लीड कर रहे थे. उनको निर्देश मिले थे कि किसी भी तरह से चंद्रास्वामी को गिरफ्तार कर उसी शाम दिल्ली लाया जाए.

कुछ देर में डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी जो चंद्रास्वामी के काफी नजदीक थे. वो भी होटल पहुंच गए. लेकिन CBI ने उन्हें चंद्रास्वामी से मिलने नहीं दिया. रात के करीब 1 बजे थे. चंद्रास्वामी सीबीआई के साथ चलने को तैयार नहीं थे. किसी तरह उन्हें मनाकर नीचे लॉबी में लाया गया. और पुलिस सीधे उन्हें दिल्ली ले गई.

इसके बाद उन पर एक के बाद एक ED ने चंद्रास्वामी पर कई मुक़दमे दर्ज किए और चंद्रास्वामी तिहाड़ पहुंच गए. 1996 में नरसिम्हा राव सरकार की रुखसती के बाद चंद्रास्वामी सत्ता के केंद्र से बाहर हो गए थे, लेकिन उनके दोस्त हर जगह मौजूद थे. तमाम मुकदमों के बावजूद उन्हें आसानी से जमानत मिल गई और वे दिल्ली के एक आलीशान इलाके में बने फ़ॉर्म हाउस में जमे रहे.

साल 1997 में जैन कमीशन के सामने कांग्रेस ने उन पर आरोप लगाया कि राजीव गांधी की हत्या की फंडिंग में वो शामिल थे. जैन कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में राजीव गांधी की हत्या में स्वामी के रोल का जिक्र किया. जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने स्वामी के विदेश ट्रेवल पर रोक लगा दी थी. साल 2011 में उनके ED ने उनके ऊपर 9 करोड़ का जुर्माना भी लगाया. साल 2017, 23 मई को भारतीय राजनीतिक के सबसे विवादास्पद किरदारों में से एक तांत्रिक चंद्रास्वामी की मौत हो गई.

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