The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • was martyr thakur roshan singh not culprit of kakori robbery

वो ठाकुर, जो फांसी पर चढ़ने के लिए कॉम्पटीशन करता था

ठाकुर रोशन सिंह का जन्मदिन है आज

Advertisement
pic
22 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 22 जनवरी 2021, 11:20 AM IST)
Img The Lallantop
ठाकुर रोशन सिंह की याद में लगा शिलालेख.
Quick AI Highlights
Click here to view more

'ज़िंदगी ज़िदा-दिली को जान ऐ रोशन वरना कितने ही यहां रोज फ़ना होते हैं.'

-ठाकुर रोशन सिंह

काकोरी ट्रेन डकैती के लिए अंग्रेजों ने अशफ़ाक़, 'बिस्मिल', राजेंद्र लाहिड़ी के साथ रोशन सिंह को जिम्मेदार माना था. ब्रिटिश अदालत ने चारों को 5-5 साल की बामशक़्क़त क़ैद और फांसी की सजा सुनाई. पर मौत का फ़रमान सुनकर ये वीर नौजवान खिलखिलाकर हंस पड़े. फांसी, ताउम्र क़ैद में भी तब्दील हो सकती थी, लेकिन जेल में किसको बैठना था. ये मतवाले तो चाहते थे कि उन्हें फांसी ही हो, और ये बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. आज़ादी की लड़ाई और धारदार हो जाए. लोगों के दिल में गुस्से का ज्वालामुखी फट पड़े.
img1121218055_1_2

ठाकुर रोशन सिंह 22 जनवरी 1892 को पैदा हुए थे. रोशन सिंह और रामप्रसाद 'बिस्मिल' में बहुत ही गाढ़ी दोस्ती थी. दोनों में हमेशा इस बात का कॉम्पटीशन रहता था कि ठाकुर रोशन सिंह देश के काम पहले आएगा या रामप्रसाद 'बिस्मिल'. रोशन के साथी उनको ठाकुर बोल-बोलकर तंग किया करते थे.
19 दिसंबर 1927 का वो दिन आया, जब बिस्मिल और रोशन सिंह साथ में फांसी के तख़्ते पर चढ़ने जा रहे थे. रोशन सिंह ने अपनी रौबीली मूंछ पर ताव देते हुए 'बिस्मिल' से कहा, 'देख, ये ठाकुर भी जान की बाजी लगाने में पीछे नहीं रहा.' काकोरी कांड में रोशन नहीं थे शामिल? अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह
शहीद ठाकुर रोशन सिंह

इतिहास के कुछ जानकारों का कहना है कि 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के करीब काकोरी स्टेशन के पास जो सरकारी खजाना लूटा गया था, उस घटना में ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे. इसके बावजूद उन्हें 19 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद के नैनी जेल में फांसी पर लटका दिया गया.
36 साल के ठाकुर रोशन सिंह की उमर के ही केशव चक्रवर्ती काकोरी डकैती में शामिल थे. उनकी शक्ल रोशन सिंह से मिलती थी. अंग्रेजी हुकूमत ने माना कि रोशन ही डकैती में शामिल थे. केशव बंगाल की अनुशीलन समिति के सदस्य थे, फिर भी पकडे़ रोशन सिंह गए. लेकिन अंग्रेजों को सबूत नहीं मिल पा रहे थे ताकि उनकी धरपकड़ कर सकें.
25 दिसंबर 1924 की बमरौली डकैती हुई. इस डकैती में रोशन सिंह भी शामिल थे. इस बार अंग्रेजों को सबूत हाथ लग गए थे. अब तो अंग्रेज पुलिस ने सारा जोर ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा दिलवाने में लगा डाला. इस डकैती के सबूतों को अंग्रेजों ने काकोरी के लिए इस्तेमाल किया. केशव चक्रवर्ती को उसके बाद ढूंढा तक नहीं गया, और रोशन सिंह को ही काकोरी कांड का आरोपी बना डाला. दिलेर रोशन सिंह की जबर दिलदारी ठाकुर रोशन सिंह  ने 6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद में नैनी की मलाका की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र लिखा था,
'इस सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी. आप मेरे लिये रंज हरगिज न करें. मेरी मौत खुशी का सबब होगी. यह मौत किसी प्रकार के अफसोस के लायक नहीं है. दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूं'
बताते हैं कि रोशन सिंह फांसी के पहले ज़रा भी उदास न थे. वो अपने साथियों से कहते रहते थे कि उन्हें फांसी दे दी जाए, कोई बात नहीं. उन्होंने तो जिंदगी का सारा सुख उठा लिया, लेकिन बिस्मिल, अशफाक और लाहिड़ी जिन्होंने जीवन का एक भी ऐशो-आराम नहीं देखा, उन्हें इस बेरहम बरतानिया सरकार ने फांसी पर चढ़ाने का फैसला क्यों लिया?

Advertisement

Advertisement

()