'आई एम ए स्टुपिड कॉमन मैन'. याद आया न एक दमदार किरदार. जो थरमस से चायनिकालते-निकालते मुंबई पुलिस की बैंड बजा देता है. नसीरुद्दीन के चहेते 'अवेडनेसडे' को कभी नहीं भूल सकते. मंडी, मक़बूल, निशांत, इक़बाल और ऐसी ही तमामबेहतरीन फ़िल्मों में अपने ज़ोरदार किरदार को जीने वाले नसीर का आज बर्थडे है. हमआपके लिए उनकी 6 ऐसी फ़िल्में चुनकर लाए हैं जो न सिर्फ नसीर की उम्दा अदायगी कीनज़ीर बनीं बल्कि हिन्दी सिनेजगत के लिए भी बेशकीमती पूंजी हैं.#1. स्पर्श (1980)आंखों से देख न सकने वाले बच्चों का स्कूल चलाने वाले एक प्रिंसिपल अनिरुद्ध यानीनसीर. उनकी आंखों की रोशनी भी नहीं है. इन्हें प्यार हो जाता है ख़ूबसूरत आवाज़वाली कविता यानी शबाना आज़मी से. मगर अंधेरी आंखें उन्हें देखने नहीं देती कविता काप्यार. देख न पाने वालों की ज़िन्दगी को बखूबी जिया है नसीर ने इस फ़िल्म में.छोटी-छोटी बारीकियां और ये कि कितना आम है उनका जीवन भी हमारी ही तरह. सई परांजपेकी लिखी और उन्हीं के निर्देशन में बनी ये फ़िल्म सर्वकालिक महान फिल्मों में जरूरशामिल होती है. मस्ट वॉच!फिल्म-स्पर्श Photo: Youtube#2. जूनून (1978)रस्किन बॉन्ड के नॉवेल 'ए फ्लाइट ऑफ पिजन्स' पर बनी श्याम बेनेगल की फिल्म 'जुनून'का प्लॉट 1857 की गदर क्रांति था. इस फिल्म में प्रेम, सनक और मौत को बेहद करीब सेदिखाने वाली कहानी थी. हालांकि फ़िल्म में शशि कपूर अहम किरदार में थे लेकिन एकगुस्सैल लड़ाके के तौर पर नसीर ख़ूब जंचे. सिर पर साफ़ा, हाथ में तलवार और ख़ुदघोड़े पर सवार वे जंग की तासीर को पूरा करते हैं. 'जुनून' नसीर की शुरुआती फ़िल्मोंमें से है लेकिन उनकी अदायगी में ज़ोर तब भी नज़र आता है. 1980 में श्याम बेनेगल कोइसी फ़िल्म के लिए फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का ख़िताब मिला.फ़िल्म-जुनून Photo: Indian express#3. अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (1980)अपनी दुनिया में ख़ुश एक नौजवान. गाड़ियों की स्टेयरिंग के साथ झूमता. अपनीगर्लफ्रेंड को दूसरों की 'आंखों' से बचाता. हड़ताल को बेमतलब की चीज़ बताने वाला.नाम है, अल्बर्ट पिंटो. उसे गुस्सा क्यों आता है? इसी की कहानी है ये फ़िल्म. सईदअख्त़र मिर्ज़ा के निर्देशन में बनी ये फ़िल्म उस दौर के हालात बयां करती है जबमजदूरों की सुनने वाला कोई नहीं था. उनकी हड़ताल पर कोई एक्शन नहीं लिए जा रहे थे.हमेशा पॉजिटिव सोच रखने वाला युवक कैसे इतना परेशान हो जाता है कि लोगों से भरे हॉलमें चिल्ला पड़ता है. बहुत अच्छी और सच्ची फिल्म.फिल्म-अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है. Photo: Youtube#4. कथा (1980)शरीफ़, कमाऊ, बाल में तेल लगाकर कायदे से कंघी करने वाला मुलगा यानी लड़का. मन हीमन अपनी चाल (मुंबई में बने घर जिसमें कई परिवार रहते हैं) में रहने वाली एक लड़कीपर मरता है. अपनी शराफ़त की वजह से कुछ कह नहीं पाता. दोस्त के हाथ ठगा जाता है.प्यार को भी खो ही देता है. लेकिन आखिर में जीतती है शराफ़त. उन्हें मिल जाती हैअपनी महबूबा. यही कहानी है कथा की. वो लड़का है नसीर. लड़की हैं दीप्ति नवल. फारुखशेख ने ठग के रोल में भी जान डाली है. सई परांजपे ने ही इस फ़िल्म का निर्देशन भीकिया है.फ़िल्म-कथा Photo: Youtube#5. मानसून वेडिंग (2001)निर्देशक मीरा नायर. बहुत कुछ यहीं समझ आ जाता है. लेकिन उनकी कहानी को परदे परजिंदा करने वाले एक्टर्स भी फिल्म में एक से बढ़कर एक हैं. सबसे पहले नसीर.उन्होंने फिल्म में ललित वर्मा का किरदार निभाया है जिसकी बेटी की शादी हो रही हैऔर सारे रिश्तेदार आ रहे हैं. लेकिन कुछ ऐसा हुआ था जिस वजह से उसे न्याय या अपनेदेवता समान बड़े भाई में से किसी एक को चुनना होगा. फ़िल्म के आखिर तक ये किरदारदर्शकों का दिल जीत लेता है. बेहद जोरदार फिल्म.फ़िल्म-मानसून वेडिंग Photo: Youtube#6. फ़िराक़ (2008)2002 में गुजरात के दंगों से कई ज़िंदगियां बदलीं. किसी का परिवार छूटा तो किसी कीऔलाद. लाशों को दफनाने के लिए जगह कम पड़ने लगी. हर तरफ चीख-पुकार थी. लेकिन उसकेबाद क्या हुआ? जो दंगे में मरे नहीं उन्हें क्या-कुछ झेलना पड़ा? इसी पर नंदिता दासने बनाई फ़िल्म 'फ़िराक़'. एक वृद्ध मुस्लिम संगीतकार का किरदार निभाने वालेनसीरुद्दीन शाह इस फ़िल्म में 'इनसान' की मौत से आहत दिखाई देते हैं. कई सवाल छोड़जाने वाली ये फ़िल्म देखने के बाद नसीर का किरदार आपके दिमाग से नहीं उतर पाएगा.--------------------------------------------------------------------------------विडियो: पहली बार Naseeruddin Shah से कहां मिले Sanjay Mishra?