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युवाओं के हक पर डाका डालने वाली फ़िल्म 'संजू' का बहिष्कार कीजिए

पढ़िए पीयूष पांडे का नया व्यंग्य.

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26 जून 2018 (अपडेटेड: 29 जून 2018, 11:03 AM IST)
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महात्मा गांधी आज जीवित होते तो क्या संजू देखने की योजना बना रहे होते?
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पियूष पांडेपीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम’. पीयूष 'दी लल्लनटॉप' के लिए लिखते रहे हैं. हमारे लिए उन्होंने एक ‘लौंझड़’ नाम की सीरीज भी लिखी है. यहां पढ़िए उनका लिखा एक और व्यंग्य-  


 

महात्मा गांधी आज जीवित होते तो क्या संजू देखने की योजना बना रहे होते? ये सवाल इसलिए क्योंकि बापू ने अपने जीवनकाल में सौ फीसदी बायोपिक फिल्में देखीं. यह अलग बात है कि उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ एक ही फिल्म देखी. रामराज्य. भगवान राम की बायोपिक. बापू को फिल्म इतनी पसंद आई कि दस मिनट देखने पहुंचे बापू पूरी फिल्म देखकर उठे. संजू कैसी है-कहना मुश्किल है. लेकिन मैं देश के लाखों युवाओं की आवाज़ बनकर संजू पर पाबंदी की मांग करना चाहता हूं. ना ना.. फिल्म में न तो ब्राह्मणों का अपमान है, न किसी और जाति का. फिल्म में युवाओं का अपमान है.

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संजू के ट्रेलर में हीरो बड़े गर्व से एलान करता है कि उसका कम से कम 350 लड़कियों से अफेयर रहा. ये इकलौता बयान ही फिल्म पर पाबंदी के लिए काफी है. ये डायलॉग उस सर्वहारा 97 फीसदी हिन्दुस्तानी युवा समाज का अपमान है, जो एक अदद गर्लफ्रेंड के लिए मारा-मारा फिर रहा है. एक फीसदी में वो युवा आते हैं,जिनके पास मर्सिडीज या बीएमडब्लू जैसी लंबी गाड़ियां हैं. या जो लव जेहाद कर रहे हैं. या जिनके पास अपनी कथित गर्लफ्रेंड की सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा दस्ता है और लड़की, लड़के से कम इस सुरक्षा दस्ते से अधिक प्रेम करती है. बाकी दो फीसदी युवा वे हैं, जो इस भ्रम में हैं कि उनके पास गर्लफ्रेंड है अलबत्ता लड़की कभी उन्हें अपना नौकर, चपरासी, एटीएम वगैरह कुछ-कुछ समझती है.

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इस देश में युवाओं के सामने रोजगार के संकट से बड़ा संकट गर्लफ्रेंड का संकट है. आप शहरी युवाओं को ही युवा मत समझिए. देश के हजारों कस्बों और लाखों गांवों में युवा पहचान के संकट से कम-गर्लफ्रेंड के संकट से ज्यादा जूझ रहे हैं. कुछ युवा भाग्यशाली होते हैं, जो एक-दो मर्डर करके पहचान का संकट दूर कर लेते हैं,लेकिन गर्लफ्रेंड का संकट उन्हें भी सालता है. उन्हें समझ नहीं आता कि ईश्वर ने जब उन्हें सामने वाले की खोपड़ी धम्म से उड़ाने लायक हिम्मत दी है, तो यह हिम्मत लड़की को आईलवयू बोलते वक्त कहां काफूर हो जाती है? कन्या के सामने उनके पैर क्यों कांपने लगते हैं और अचानक उन्हें ऐसा क्यों लगने लगता है मानो प्रेम कहानियों का सारा संसार फिल्मों में ही बसा होता है.

देश में स्त्री-पुरुष अनुपात पहले ही गड़बड़ है, और ऐसे में संजय दत्त जैसे लोगों ने युवाओं की किस्मत में कील ठोंकने का काम किया है. बताइए, 1,2,3,4,5,6,7,8,8,10 नहीं पूरे 350 चक्कर. ये कोई बात हुई भला. इश्क के कॉलेज में कोई आरक्षण नहीं तो इसका मतलब यह नहीं है कि सारे युवाओं की सीटों पर एक ही बंदा कब्जा कर ले. बताइए, बंदे ने एक अफेयर तीन महीने भी मेंटेन नहीं किया. यह अनुपात प्रति व्यक्ति एक गर्लफ्रेंड के समानता के उस अधिकार का उल्लंघन है, जो भारतीय संविधान हमें देता है. काए बात की समानता और काए बात का संविधान, अगर कुछ युवा अपनी मोटी जेब, नशीली आंखें और फिल्मी चकाचौंध के आसरे आम युवाओं का हक छीन लें.

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मैं देश के युवाओं से अपील करता हूं कि फिल्म का बहिष्कार करें. जो नायक सरेआम फिल्म से पहले प्रोमो में देश के युवाओं की बेइज्जती करने का दुस्साहस करे-उसकी फिल्म का बहिष्कार करके मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए. मैं राहुल बाबा से अपील करता हूं कि अगर वो खुद को युवा नेता कहते हैं तो पहले युवाओं के पक्ष में ट्वीट करें. वे तो खुद भुक्तभोगी दिख रहे हैं. 48 बसंत सूने निकल गए और अभी तक खोज जारी है. और ये सिर्फ इसलिए है क्योंकि संजू बाबा जैसे किसी बाबा ने उनकी रईस सोसाइटी में गर्लफ्रेंड का अनुपात बिगाड़ रखा होगा.

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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे तमाम विद्यार्थी संगठनों से अपील है कि वो युवाओं के पक्ष में लामबंद हों. वे न केवल फिल्म का विरोध करें बल्कि सरकार से मांग करें कि प्रति युवा एक गर्लफ्रेंड के संविधान सम्मत अधिकार को दिलाना सुनिश्चित करें. बाकी मुद्दे टाले जा सकते हैं. रोजगार वगैरह का क्या है- युवा पकौड़ा का ठेला लगाकर काम चला लेगा. मुद्रा योजना में पकौड़े का ठेला लगाने लायक कर्ज मिल ही रहा है. गर्लफ्रेंड दिलाने के लिए कोई लोन दुनिया की किसी बैंक में नहीं मिलता. गर्लफ्रेंड व्यक्ति को अपने साहस, अपने विवेक, अपनी सहनशीलता, अपनी जुगाड़ से हासिल करनी होती है.

यूं मैं शादीशुदा हूं लेकिन जानता हूं कि अपने जमाने में गर्लफ्रेंड बनाने में कितने पापड़ बेलने पड़े थे. वो तो अच्छा है कि मैंने विवेकानंद को पढ़ा था. और विवेकानंदजी ने कहा है- उठो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य तक न पहुंच जाओ. मैं भी नहीं रुका.

खैर, संजू के ट्रेलर ने जख्मों को हरा किया है. और इसीलिए मैं युवाओं के पक्ष मे खड़ा हूं. आप भी खड़े होइए और युवाओं के हक पर डाका डालने वाले 'संजूनुमा' लोगों का विरोध कीजिए. इसकी शुरुआत संजू के बहिष्कार से कीजिए.


'संजू' का ट्रेलर-


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