The Lallantop
Advertisement

साक्षी धोनी को बंदूक का लाइसेंस अप्लाई करने की जगह कट्टा रखना चाहिए

कट्टा एक सुख है, एहसास है, जज्बात है, रसूख है, वजूद है, रोमांच है. कट्टा किसी भी गारंटी-वारंटी से ऊपर है.

Advertisement
pic
21 जून 2018 (अपडेटेड: 21 जून 2018, 06:37 AM IST)
Img The Lallantop
साक्षी धोनी ने बंदूक के लाइसेंस के लिए अप्लाई किया.
Quick AI Highlights
Click here to view more
पियूष पांडे
पियूष पांडे

पीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम’. पीयूष ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए लिखते रहे हैं. हमारे लिए उन्होंने एक ‘लौंझड़’ नाम की सीरीज भी लिखी है. यहां पढ़िए उनका लिखा एक और व्यंग्य-


 
महेन्द्र सिंह धोनी की पत्नी साक्षी धोनी को बंदूक का लाइसेंस चाहिए. उनका कहना है कि वो घर में अकेली रहती हैं, तो डर लगता है और डर के आगे जीत का पता नहीं अलबत्ता लाइसेंस जरुर है. तो उन्हें लाइसेंस दिया जाए. साक्षी के तर्क के हिसाब से हिन्दुस्तान में रहने वाली करीब 33 करोड़ महिलाओं को लाइसेंस मिलना चाहिए. वो भी घर में अकेली रहती हैं. उन्हें भी डर लगता है. साक्षी के घर के बाहर करीब आधा दर्जन सुरक्षा गार्ड रहते हैं, लेकिन बाकी महिलाओं को गार्ड के रुप में सिर्फ पति की सेवाएं मिल पाती हैं.
launjhad banner

साक्षी को लाइसेंस देना या न देना सरकार का काम है. साक्षी कानूनी तरीके से बंदूक अपने पास रखना चाहती हैं तो लाइसेंस जरुरी है. वरना,  बिना लाइसेंस के तो देश में करोड़ों लोग बंदूक रखे हैं. रईस लोग इटालियन रिवॉल्वर रखते हैं, और गरीब आदमी कट्टा रखता है. कट्टा गरीब गुंडों, रंगबाजों, आशिकों और बदमाशी की दुनिया में ट्रेनी बच्चों की शान है. कट्टा एक सुख है. कट्टा एक अहसास है. कट्टा एक जज्बात है. कट्टा एक रसूख है. कट्टा एक वजूद है. बाहर निकली शर्ट के भीतर से बाहर झांकने को बेताब कमर पर कट्टा लगे होने का मतलब क्या होता है-ये दुनिया में सिर्फ वो ही शख्स समझ सकता है, जिसने कट्टा लगाया हो या कहें कट्टे को जिया हो.
महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी.
महेंद्र सिंह धोनी और उनकी पत्नी साक्षी.

देसी कट्टा सिर्फ बहादुर किस्म के नौजवान रख सकते हैं. ऐसे बहादुर, जिन्हें जान हथेली पर लेकर चलने की आदत हो. ऐसे वीर, जिन्हें जान की रत्ती भर परवाह न हो. जी नहीं, कट्टा रखने से किसी भी पल सामने वाले को मार देने की बहादुरी नहीं आती. दरअसल, कट्टा कब, कैसे, किन मौकों पर चल जाए इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता. न कट्टा बनाने वाला, न बेचने वाला, न रखने वाला. कट्टा कभी भी फायर हो सकता है. इस मामले में कट्टे की सिर्फ प्रेमिका से तुलना की जा सकती है. कट्टा और प्रेमिका कभी भी फायर हो सकते हैं. बिन कारण, बिन मौसम.
देसी कट्टा और रिवॉल्वर.
देसी कट्टा और रिवॉल्वर.

कट्टे से खेलने में एक अलग रोमांच है. कट्टे को लेकर कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. बहुत मुमकिन है कि कट्टा उस वक्त न चले, जब आपको सबसे ज्यादा जरुरत हो. कट्टा 'मिस' बहुत होता है. कट्टा कई बार चलाने वाले पर ही चल जाता है. कट्टे की नली सामने ही होती है, लेकिन दागते ही कट्टे से गोली पीछे की तरफ निकलती है. कट्टा चलाने वाले इसे 'थ्रिल' कहते हैं, जो रेस-3 वगैरह जैसी फिल्में देखकर खुद को 'थ्रिलर' के प्रशंसक कहने वाले वाले कभी नहीं जी सकते.
कट्टा जिस तरह प्रेमिकी की तरह कभी भी फायर हो सकता है, वैसे ही प्रेमिका की तरह कभी भी आपसे ब्रेक-अप कर सकता है. इसे लेकर अपने पास एक धांसू किस्सा है.
गैंग्स ऑफ वासेपुर में तो कट्टा हाथ में फटकर फ्लॉवर हो जाता है.
गैंग्स ऑफ वासेपुर में तो कट्टा हाथ में फटकर फ्लॉवर हो जाता है.

दरअसल, मोहल्ले का हमारा एक दोस्त चांदी सिंह घोषित रुप से बेहद डरपोक था. वो घर में चूहे, कॉकरोच, बिल्ली से लेकर हर उस चीज़ से डर सकता था, जिसमें थोड़ा भी मूवमेंट हो. दुनिया का दस्तूर है कि जो डरता है, वो मरता है. सो, दोस्त लोग चांदी को डराने का ही खेल अक्सर खेला करते थे. एक दिन हमारे एक दोस्त ने अपने कट्टे का सार्वजनिक प्रदर्शन किया. इस दौरान एक दूसरे दोस्त ने वो कट्टा देखने के लिए मांग लिया और पास ही एक दुकान पर बैठे चांदी सिंह के माथे पर टिका दिया.
बोल-चांदी सिंह...मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए.
डायलॉग बाजी हो रही थी. जिस दोस्त का कट्टा था, वो लघुशंका के लिए सीन से नदारद था.
कंपकंपाया चांदी को कुछ दोस्त देख भी रहे थे,लेकिन शायद किसी को अंदाज नहीं था कि अब क्या होगा.
अचानक..दोस्त ने ट्रिगर दबा दिया......ट्रिगर दबते ही चांदी गिर पड़ा. सब हंस पड़े. खिलखिलाकर. गोली चली नहीं, चांदी डर के मारे गिर पड़ा था.
लेकिन इस तमाशे की भनक कट्टे के मालिक यानी हमारे दोस्त को लगी, वो दौड़कर घटनास्थल पर पहुंचा. उसने कट्टा चालक को करीब चार किलो मां-बहन की गालियां दी और कट्टा खोल कर दिखाया. कट्टा लोड़ था.....बस मिस हो गया.
कट्टे का अपना अलग ही भौकाल है.
कट्टे का अपना अलग ही भौकाल है.

कट्टे का यही रोमांच है. कट्टा किसी भी गारंटी-वारंटी से ऊपर है. कट्टे की कार्य प्रणाली ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करती है. ईश्वर की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता तो कट्टा चलाने वाली की क्या औकात. वैसे, कट्टा चले ना चले, कमर में कट्टा खोंचकर कट्टा चालक की चाल में रौब जरुर आ जाता है. कट्टे से चाल में एक अलग लहक आती है, जो कट्टा लगाए शख्स को देखने पर समझी जा सकती है. कट्टे से गोलीबाजी बदमाशी की यूनिवर्सिटी में बीए (पास) की डिग्री है. कट्टा चलाने वाला ही भविष्य में बम चालक बन सकता है. वैसे, कट्टा चालकों की एक राह नेतागीरी में भी खुलती है. कई पूर्व कट्टाचालक अब नीति निर्माता बन चुके हैं.


ये भी पढ़ें-
‘डाची की कल्पना भी पाप है’

‘मैंने सोचा कि इसकी दाढ़ी के पीछे कितना कपट छुपा हुआ है’

‘सात दिन हो गए और शादी में गया जगपति नहीं लौटा’

‘सोफ़िया की छाया इस घर से बाहर रखना उतना ही कठिन था, जितना कि मेरा वकील बनना’

वीडियो-अटल बिहारी बाजपेयी और नरसिंह राव के बीच ये बात न हुई होती, तो इंडिया न्यूक्लियर स्टेट न बन पाता

 

Advertisement

Advertisement

()