जब मुन्ना समोसेवाले के 10 समोसों के चक्कर में हो गया कांड
गोरखपुर में हो, तो 'बवाल' कहते हैं. लखनऊ में हो, तो 'मैटर' कहा जाता है. ये कानपुर में हुआ, इसलिए 'कांड' था.

अंकित त्रिपाठी
लल्लनटॉप को एक और फायरब्रांड लौंडा मिला है. बकैती के तीर्थस्थल कानपुर से. कहिता है कि RSS के स्कूल से पढ़ा है, जिसके हिसाब से उम्र 24 है, लेकिन असल में 25 है. IIT से बीटेक किया है. मार्क्स धर्म को अफीम कह गए थे, अंकितवा गांजा कहता है. जब मूड भन्नाता है तो वेबसाइटों के पेज पर जाकर कमेंट दाग देता है.
रेज्यूम जीवन में सिर्फ एक बार बनाया, क्योंकि ये बनावटी काम लगता है. वनलाइनर ऐसे मारता है कि बड़के मठाधीश भी जल-भुन जाएं. आपके लिए बड़ी मोहब्बत से समोसा कांड लिखकर लाया है. बांचिए. इससे आपको भी वो किस्से याद आएंगे, जब आप समोसे और चाट की दुकानों पर कांड किया करते थे.
आज के किस्से का मुख्य किरदार है समोसा. समोसा ऐसा व्यंजन है, जो सबने खाया होगा. चटनी में लपेटकर. कभी लाल, कभी हरी, कभी दोनों मिक्स करके. पिचके हुए समोसे में पड़ीं हरी और लाल चटनी ऐसी लगतीं हैं, जैसे पहाड़ के ऊबड़-खाबड़ रस्ते से दो नदियां बह रहीं हों. चटनी बिना समोसा वैसा ही है, जैसे मोदी बिना बीजेपी. बिल्कुल बेदम. बिना चटनी के सूखा समोसा धंसाने के लिए जिगरा चाहिए. दुनियाभर में जित्ते भी जीव-जंतु हैं, सभी की टांगें ईवन नंबर में हैं. अरे जीव-जंतु छोड़ो, कुर्सी-मेज-स्टूल की भी टांगें ईवन नंबर में ही होतीं हैं. लेकिन, समोसा शायद इकलौती ऐसी फेमस चीज है, जिसकी तीन टांगें होतीं हैं. यानी ऑड नंबर में. टांगें जरूर बेटा इसकी ऑड रहतीं हैं, लेकिन खाने में बिल्कुल ईवन होता है.
इसे ईवन टांगें लेकर जीवन में स्थायित्व नहीं चाहिए. टिकने थोड़ी न आता है ये. ये तो पैदा ही होता है किसी के पेट में जाने के लिए. बहुत छोटा लाइफ-स्पैन रहता है इसका. गरम रहता है तो दुकनदार की बड़ी सी थरिया में इसका चार-पांच मिनट भी टिकना बड़ी बात समझो. हां. कभी-कभार जब ठंडा हो जाता है, तो जरूर दुत्कारा जाता है, लेकिन इसका भी इलाज है. अगली फेरी में फिर से कढ़ाई में डालकर चमका दिया जाता है. इसकी तीन टांगें देखकर बचपन में गणित की क्लास में पढ़ाया गया समबाहु त्रिभुज याद आ सकता है. समोसे को चाहे दुकान पर ही खड़े होकर खाओ या फिर घर के लिए पैक करवा लेओ. एक्स्ट्रा चटनी की पुड़िया मांगने पर दुकनदार का गंदा लुक फिरी.
चलो समोसे के गुणधर्म बहुत गिना दिए. अब आते हैं स्टोरी पर. तो बात कुछ अइसी है कि हम चार-पांच दोस्त लोग साइकिल से बालाजी चौराहे वाली रोड से होते हुए कोचिंग जाते और लौटते थे. जवाहर नगर से होते हुए नेहरू नगर निकलते थे. बालाजी चौराहे के थोड़ी सा ही आगे बाएं हाथ पर मुन्ना समोसे वाले की दुकान पड़ती थी. आज भी पड़ती है. जब भी वहां से गुजरते थे, तो पेट में कुलबुली मच जाती थी. पेट दिमाग से अपना रोना रो देता था और दिमाग के जरिए पैरों को आदेश मिल जाता था धीरे पैडल मारने का.
मन के और जमीन के घर्षण से साइकिलें बिल्कुल दुकान के सामने ही आकर रुक जातीं थीं. फिर सबकी जेबें झरियाई जातीं थीं और अगर सबके लिए एक-एक समोसे का भी जुगाड़ हो जाता था, तो वहीं अगली फेरी के समोसे सिंकते हुए देखने के लिए खड़े हो जाते थे. अब यार गरम का ही जमाना है. ठंडा समोसा कौन खाता है बे? हमाये लिए तो भईया समोसा जीभजलाऊ गरम होना चाहिए. फूंकते-फूंकते खाओ, तभी तो मजा आता है.
मैदे के लिफाफे में आलू का भरता भरकर बनाए गए सफेद समोसे कढ़ाई के गर्म तेल में लुढ़का दिए जाते थे. फिर उनका रंग सुनहरा हो जाने तक उन्हें तेल में ही तैरते देखते रहो. ऊपर निकलती भाप देखकर हम भौतिक विज्ञान के अपवर्तन यानी रिफ्रैक्शन का लाइव डेमो लिया करते थे. फिर जैसे ही बड़ी आली कल्छुली से समोसों की खेप निकाली जाती थी, जनता टूट पड़ती थी. दुकान काफी फेमस थी और आस-पास के लोग हमाये जैसे चटोरे, जीभ के लिए घर की देहरी खोदकर बेच दें. पिल पड़ते थे सब. हमाये पांच पैक करो, हमाये दस. भसड़ मच जाती थी. और उसी भसड़ में हम या हमारा कोई दोस्त भी पिला रहिता था. जब दस-बीस समोसों वाले बड़े-बड़े आर्डर निपटा लिए जाते थे, तो हमाये जैसे गरीबों का नंबर आता था.
ऐसी समोसा-खिलाई अक्सर ही होती रहती थी. हम सब लोग दो-दो, तीन-तीन रुपया जोड़कर समोसा खा लेते थे. एक दिन हमाये दोस्त अमित ने कहा कि चलो आज के समोसे हमाई तरफ से. हम लोगों को उत्ती ही खुशी हुई, जित्ती कि दूरदर्शन के किसी धार्मिक नाटक में राक्षस को कई वर्षों की तपस्या के बाद वरदान देने के लिए प्रकट हुए ब्रह्मा जी दिखने पर होती होगी. आज जेब में पइसे ज्यादा थे तो एक-एक समोसे से तो काम चलना नहीं था.
शान से आर्डर दिया: 'पांच जगह डबल समोसे, चटनी डालकर' 'फोड़ के कि बिना फोड़े?' 'फोड़कर ही खाते हैं हम लोग तो. रोज खाते हैं. पहिली बार थोड़े न खा रहे हैं. याद रखा करो डेली कस्टमरों को.' दुकनदार कम-कम चटनी डाल रहा था. 'अउर डालो चटनी. खट्टी-मीठी दोनों. इत्ता इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं और तुम चटनी कम डाल रहे हैं. ऊपर से जलजीरा वाला नमक भी उर्रा देना. बिल्कुल चाट जैसा लगना चाहिए खाने में.', हमने कहा.
मस्त समोसा खाकर आत्मा तृप्त हुई. बगल वाली थाल में रखीं गुझियां भी बुला रहीं थीं. गुझिया भी सही चीज़ होती है और समोसे के बाद गुझिया के कॉम्बिनेशन को वैसे भी यूनेस्को बेस्ट कॉम्बिनेशन के अवार्ड से नवाज चुकी थी. लेकिन, फिर सोचा अमित अपने मन से खिला रहा है, ज्यादा लूटना सही नहीं रहेगा. डिप्लोमेसी दिखाते हुए समोसे खाने के बाद ही भोज का समापन कर दिया गया. बाकी दोस्त पानी-वानी पीकर साइकिल की ओर बढ़ चुके थे. हम समोसा खाने के बाद पानी नहीं पीते हैं. क्या है न कि समोसा खाकर तुरंत पानी पी लेओ, तो समोसे-चटनी का पूरा स्वाद मर जाता है. पेट भरने के लिए थोड़े न कोई समोसा खाता है. जीभ के लिए खाते हैं, तो स्वाद भी तो रहिना चाहिए थोड़ी देर कि नहीं.
'पइसे निकालो यार. जल्दी देओ इनको और फिर निकला जाय.', हमने अमित से कहा. थोड़ी देर जेब टटोलने के बाद वो गंदे एक्सप्रेशन देने लगा, 'अबे कल मौसी आईं थीं. बीस रुपए दे गईं थीं. खरा-खरा नोट डालकर लाए थे सुबह.' 'हां तो निकालो खरा-खरा.' 'कहां से निकालें? मिली नहीं रहा है.' 'अबे लफद्दरांय न करो. अगर मजाक कर रहे हो तो दौंचे जाओगे.' 'कसम से भाईजी, नहीं मिल रहा है नोट. कहीं चू गया है शायद.' 'जेब तो नहीं फटी है?' 'लेओ, देख ल्यो.' अमित ने जेब पूरी पलटकर निकाल ली और दिखाने लगा.
जेब सही-सलामत थी. पलटी हुई जेब में मूंगफली के छिलकों की झाड़न जरूर चिपकी हुई थी, लेकिन बीस का नोट नदारद. हम भी उस दिन बिल्कुल झड़े हुए थे. कुछ भी नहीं था हमाये पास भी. बाकी दोस्त शायद समझ गए कि कुछ गड़बड़ हो गई है, इसीलिए चुपचाप सरक लिए साइकिल लेकर. हम और अमित ही बचे खाली.
हम दोनों इसी बहस में फंसें थे कि पइसा कइसे चुकाया जाय? किसका सामान गिरवी धरा जाय? तब तक समोसों की अगली खेप निकल चुकी थी और काउंटर के सामने भीढ़ बढ़ चुकी थी. हम लोग बहस करते-करते वैसे भी काफी कोने में आ गए थे. दोनों ने एक-दूसरे को देखा और समझ गए कि क्या करना है. इत्ती अच्छी अंडरस्टैंडिंग एलन डोनाल्ड और लांस क्लूसनर ने दिखा दी होती, तो साउथ अफ्रीका के पास आज एक वर्ल्ड कप हो सकता था. धीरे से सड़क पर आए. भीड़ हचककर थी. काफी नार्मल हरकत करते हुए हमने साइकिल उठाई और आगे बढ़ गए. पहिले थोड़ा धीरे-धीरे बढ़ाई साइकिल, फिर सीधे तानते चले गए. काफी दूर निकल आने के बाद डर गायब हो गया और लग रहा था कि कोई बैंक-वैंक लूटकर लौटे हों.
दोस्तों में रंगबाजी पेलने का एक और किस्सा हाथ लग गया था कि मुन्ना के यहां पांच प्लेट समोसा हुसड़ आए बिना पइसे के. समोसा काण्ड के नाम से ये किस्सा दूर-दूर तक फईल गया. अगले दिन पइसे देने का मन हुआ, लेकिन ये सोचकर नहीं दिए कि इत्ता कमाता है मुन्ना समोसा बेचकर, पांच-दस समोसों के पइसे न मिले, तो कंगला नहीं हो जाएगा.
आज तक भाईजी मुन्ना समोसे वाले के बीस रुपए हम लोगों पर उधार हैं.
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