पिछड़ों का मसीहा बनने के लिए IIT, IIM जैसे संस्थानों में OBC आरक्षण लागू किया था अर्जुन सिंह ने?
आरक्षण की कहानी पार्ट-4: इंद्रा साहनी केस और 50 फीसदी कोटे की लिमिट पर सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था

"धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी भी आधार पर राज्य अपने किसी भी नागरिक से कोई भेद भाव नहीं करेगा. ये मैं नहीं कह रहा . ये भारत के संविधान में लिखा है”
यह डायलॉग है आयुष्मान खुराना का. फिल्म का नाम है आर्टिकल 15. आज हम भी आर्टिकल 15 की ही बात करेंगे. लेकिन फिल्म की नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 15 की, जो यह कहता है कि राज्य शिक्षा के मामले में किसी भी व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करेगा एवं सबको समान अवसर उपलब्ध कराएगा. इसी समान अवसर को सुनिश्चित करने के लिए और समाज के दबे-कुचले वर्गों के शैक्षणिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. उनके लिए अलग-अलग कैटेगरी बनाई गई है, ताकि उनका सामाजिक-शैक्षणिक उत्थान हो सके. इसी के तहत अलग-अलग वर्ग के लोगों के लिए समय-समय पर अलग-अलग प्रकार से आरक्षण दिए जाते रहे हैं. और आखिर में इस आरक्षण का आधार जाति या जातीय समूह हो जाता है. कई बार यह प्रक्रिया शांतिपूर्वक पूरी हो जाती है, तो कई बार बवाल का रूप ले लेती है. ऐसा ही एक बवाल हुआ साल 2006 में. आइए जानते हैं क्यों हुआ था यह बवाल?
यह 2006 का साल था और अप्रैल का महीना. केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक हो रही थी. तभी इस बैठक में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने एक प्रस्ताव रख दिया. इस प्रस्ताव का मज़मून यह था कि 'सभी सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्गों यानी OBC को 27 फीसदी आरक्षण देने की मंडल कमीशन की सिफारिशों को कैबिनेट स्वीकार करे.'यह भी पढ़ें- आरक्षण की कहानी पार्ट-1: भारत में छुआछूत का गटर, जिसने रिजर्वेशन की जरूरत पैदा की
उनका यह प्रस्ताव सुनकर सब सकते में आ गए. सकते में आने का कारण भी था, क्योंकि डेढ़ दशक पहले मंडल पार्ट वन (सरकारी नौकरियों में OBC को 27 फीसदी आरक्षण) लागू करने वाले वीपी सिंह का हश्र सभी देख चुके थे. लेकिन इसके बावजूद किसी के पास अर्जुन सिंह के प्रस्ताव का विरोध करने का साहस नहीं था. साहस होता भी कैसे? क्योंकि 2 साल पहले जब UPA सरकार बन रही थी, तब इस वादे को UPA के काॅमन मिनिमम प्रोग्राम में भी शामिल किया गया था और अर्जुन सिंह ने कैबिनेट में इसका भी हवाला दिया था. नतीजतन कैबिनेट ने अर्जुन सिंह के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी और इसके लिए आवश्यक संविधान संशोधन की तैयारी शुरू हो गई.

2006 में किए गए प्रावधान के बाद IIM अहमदाबाद जैसे संस्थान भी आरक्षण के दायरे में आ गए.
कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए इस प्रस्ताव के तहत OBC को सरकारी एवं सरकार द्वारा सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी. उच्च शिक्षण संस्थान मतलब IITs, IIMs, एम्स समेत सभी मेडिकल-इंजीनियरिंग संस्थान और केन्द्रीय विश्वविद्यालय इत्यादि. अब तक इस प्रकार के आरक्षण का लाभ सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति (SC-STs) के छात्रों को ही मिल रहा था.
यह भी पढ़ें- आरक्षण की कहानी पार्ट-2: संविधान सभा में आरक्षण पर बहस में किसको SC-ST माना गया?इन छात्रों को यह सुविधा संविधान लागू होने के समय से ही हासिल थी, क्योंकि उनके लिए संविधान के आर्टिकल 15 में क्लाॅज 4 जोड़कर विशेष उपबंध किए गए थे. OBC के छात्रों को इस प्रकार की कोई सुविधा प्राप्त नहीं थी. उन्हें तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण
भी 1990 में जाकर मिल सका था. वह भी तमाम कोर्ट केसेज के बाद 1993 से लागू हो पाया था. अब 93वें संविधान संशोधन विधेयक के तहत आर्टिकल 15 में क्लाॅज 5 जोड़ कर 15 (5) बनाया गया. नए आर्टिकल 15 (5) के तहत केन्द्रीय शिक्षण संस्थानों, केन्द्रीय सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों और निजी शिक्षण संस्थानों में OBC कैटेगरी के स्टूडेंट्स के लिए 27 फीसदी सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया. देशव्यापी विरोध और सुप्रीम कोर्ट का स्टे जैसे ही शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण के इस प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी, उसके बाद पूरे देश में हंगामा मच गया. एम्स, IIT, IIM, यूनिवर्सिटीज समेत देश के तमाम टाॅप सरकारी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र सड़क पर आ गए. Youth for equality के नाम से उनका संगठन बन गया और फिर 1990 के मंडल विरोधी आंदोलन वाली तस्वीर सड़कों पर दिखने लगी. हंगामा शांत करने के मकसद से केन्द्र सरकार ने घोषणा कर दी कि 'OBC आरक्षण की वजह से जनरल पूल की सीटों में जितनी कमी आएगी, उतनी सीटें एक्सट्रा बढ़ा दी जाएगी.' लेकिन इसपर भी छात्र नहीं माने और बवाल बढ़ता चला गया. नौबत यहां तक आ गई कि एम्स की इमरजेंसी सेवाएं प्रभावित होने लगी. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और भारी बवाल को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसपर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी.

शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण के विरोध में एम्स, IITs और IIMs के स्टूडेंट्स सड़क पर उतर गए थे.
अर्जुन सिंह ने ऐसा क्यों किया
राजनीतिक गलियारों में इस बात पर अक्सर चर्चा होती है कि आखिर अर्जुन सिंह को इस गड़े मुर्दे को उखाड़ने की क्या जरूरत थी? आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जिससे अर्जुन सिंह इस बोतलबंद जिन्न को बाहर निकालने को मजबूर हुए?
यह भी पढ़ें- आरक्षण की कहानी पार्ट-3; मंडल कमीशनः आरक्षण का छाता जो पिछड़ों के लिए घनी छांव लेकर आयादरअसल इस कहानी की तह तक जाने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. कांग्रेस पर गांधी परिवार की कमान 1991 में ही छूट गई थी, जब राजीव गांधी की हत्या हो गई थी. उस वक्त राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभालने से इनकार कर दिया था. लेकिन 4 साल बीतते-बीतते उनकी राजनीतिक जिज्ञासा बढ़ने लगी. लेकिन तब तक पीवी नरसिंह राव अपने पांव जमा चुके थे. ऐसे में उन्हें कमजोर किए बिना 10 जनपथ अपना रसूख बढ़ा नहीं सकता था. लिहाजा ऐसे वक्त में सोनिया के काम आए अर्जुन सिंह. अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी और नटवर सिंह ने नरसिंह राव से बगावत कर अपनी कांग्रेस (तिवारी) बनाई. नतीजा यह हुआ कि 1996 में नरसिंह राव सत्ता गंवा बैठे. सत्ता गंवाने के बाद उन्हें कांग्रेस की कमान भी छोड़नी पड़ गई और अब कांग्रेस की कमान सीताराम केसरी के हाथ आ गई. केसरी के जमाने में कांग्रेस (तिवारी) का कांग्रेस में विलय हो गया.
फिर आई 14 मार्च 1998 की रात, जब एक नाटकीय घटनाक्रम में आधी रात को सीताराम केसरी को हटाकर उनकी जगह सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया. कहा जाता है कि केसरी को उठाकर बगले के कमरे में बंद तक कर दिया गया था. राजनीतिक टिप्पणीकार मानते हैं कि उस आधी रात के ऑपरेशन के पीछे यदि कोई मास्टरमाइंड था तो वह अर्जुन सिंह थे.

1998 में रातोंरात सीताराम केसरी (बीच में) को हटाकर उनकी जगह सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने में अर्जुन सिंह की बड़ी भूमिका थी.
लेकिन 2004 में जब कांग्रेस को सत्ता मिली तो सत्ता में नरसिंह राव के करीबियों की तूती बोलने लगी. मनमोहन सिंह, शिवराज पाटिल, प्रणव मुखर्जी - ये सब वही लोग थे जो नरसिंह राव के ज़माने में भी टाॅप लेवल पर थे. वहीं अर्जुन सिंह और नटवर सिंह जैसे 10 जनपथ के सिपहसलार नाम के मंत्री बनाए गए. सरकार के डिसीजन मेकिंग में उनका रोल नहीं था. इस बीच वोल्कर मामले में नटवर सिंह निबटा दिए गए. अर्जुन सिंह को भी किसी राजभवन में एडजस्ट किए जाने की बातें हवा में तैरने लगी. स्वाभाविक था कि अर्जुन सिंह इससे विचलित थे. ऐसे में उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का ऐसा जिन्न बाहर निकाला जिससे कि उन्हें किनारे लगाना असंभव हो जाए. आखिर पिछड़े वर्गों के नए-नवेले मसीहा को कैबिनेट से हटाने की हिमाकत भला कौन कर सकता था.
इसके अलावा अर्जुन सिंह को इस बात की भी टीस थी कि 'गांधी परिवार की इतनी वफादारी के बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पद के लायक नहीं समझा गया.' इस टीस को उन्होंने अपनी किताब 'एक सहयात्री इतिहास का' में भी व्यक्त किया है.
सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण के पक्ष में फैसला
अप्रैल 2008 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया कि OBC को शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण देने का केन्द्र सरकार का फैसला न्यायसंगत है और चूंकि यह संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित नहीं करता, साथ ही इंद्रा साहनी मामले में लगाए गए 50 % के कैप के दायरे में भी है, इसलिए इसे 2008-09 के शैक्षणिक सत्र से लागू किए जाने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों की तरह इस मामले में भी OBC के संपन्न तबकों यानी क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर करने का फैसला सुनाया. कोर्ट के इस जजमेंट के बाद उच्च शिक्षण संस्थानों में OBC आरक्षण का रास्ता साफ हो गया.

मंडल कमीशन की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट ने भी न्यायसंगत ठहराया, लेकिन क्रीमी लेयर को बाहर कर दिया.
इंद्रा साहनी केस, क्रीमी लेयर और 50 फीसदी कैप क्या है?
अगस्त 1990 में जब वीपी सिंह सरकार ने सरकारी नौकरियों में OBC तबके को 27 फीसदी आरक्षण देने का ऐलान किया, तब काफी हंगामा मचा. स्टूडेंट्स आत्मदाह तक करने लगे. इसके विरोध में वकील इंद्रा साहनी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं. उनके अलावा भी कई अन्य लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. इसी दरम्यान सोशलिस्ट नेता मधु लिमये भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए. लेकिन लिमये ने आरक्षण का विरोध नहीं किया. उनका विरोध इस बात पर था कि पिछड़े वर्गों में क्रीमी लेयर यानी संपन्न तबकों की पहचान कर उन्हें इस प्रस्तावित आरक्षण से वंचित किया जाए.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वीपी सिंह सरकार की अधिसूचना पर स्टे लगा दिया. साथ ही सभी याचिकाओं को क्लब करते हुए 9 जजों की बेंच को सौंप दिया. अब चूंकि सबसे पहली याचिका इंद्रा साहनी की ही पड़ी थी, इसलिए इसे Indra sawhney vs Union of India
केस कहा गया. 2 साल बाद इस केस का फैसला आया और इस केस की 4 बातें प्रमुख थीं.
1.केन्द्र सरकार का सरकारी नौकरियों में OBC तबके को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला सही है.
2. OBC तबके के संपन्न लोगों यानी क्रीमी लेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाएगा.
* क्रीमी लेयर की सीमा का निर्धारण केन्द्र सरकार करती है. समय-समय पर इसमें फेरबदल भी होता रहता है. मौजूदा समय में 8 लाख रुपए या इससे ज्यादा की सालाना आय वाले लोगों को क्रीमी लेयर के दायरे में रखा गया है और ऐसे लोग आरक्षण के लाभ से वंचित रहेंगे.
3. आरक्षण की सीमा किसी भी परिस्थिति में 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकती. अर्थात आधी सीटें हर हालत में विशुद्ध मेरिट के आधार पर भरी जानी चाहिए.
4. केन्द्र सरकार एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करे, जो समय-समय पर यह जांच करता रहे कि किस जाति या जाति समूह को OBC वर्ग में शामिल किए जाने की आवश्यकता है.
*सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश का पालन करते हुए 1993 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (N.C.B.C.) का गठन किया गया. इस आयोग को अगस्त 2018 में 102वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान कर दिया गया. संवैधानिक दर्जा देने के साथ यह भी प्रावधान किया गया कि अब राज्य सरकारें सिर्फ अपनी मर्जी से किसी भी जाति को OBC की स्टेट लिस्ट (जिसके तहत राज्य सरकारों की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिया जाता है) में शामिल नहीं कर सकतीं. उन्हें अब इसके लिए भी N.C.B.C. से परामर्श करना होगा. इससे पहले OBC की स्टेट लिस्ट में किसी भी जाति को शामिल करने के मामले में राज्य सरकारों पर कोई चेक & बैलेंस नहीं था. इसके अलावा N.C.B.C. पिछड़े वर्गों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को सुधारने के लिए आरक्षण के अलावा दूसरे उपाय करने के लिए भी केन्द्र सरकार को सुझाव देता रहेगा. साथ ही OBC लिस्ट में शामिल किसी भी जाति की सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति का अवलोकन करता रहेगा. हालांकि इसके सुझाव सरकार पर बाध्यकारी नहीं होंगे.
इस प्रकार अब OBC आरक्षण को मिलाकर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की स्थिति इस प्रकार बन रही थी :अनुसूचित जाति - 15 फीसदी,
अनुसूचित जनजाति - 7.5 फीसदी,
OBC वर्ग - 27 फीसदी.
यानी अब कुल मिलाकर 49.5 फीसदी (15 + 7.5 + 27) आरक्षण हो चुका था और इसे अब और बढ़ाया जाना संभव नहीं था. लेकिन इतने पर ही यह बवाल थमने वाला नहीं था. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षणजिस समय से वीपी सिंह ने सरकारी नौकरियों में OBC आरक्षण का सुर्रा छोड़ा था, उसी समय से जनरल कैटेगरी के गरीब लोगों को भी आरक्षण देने की मांग उठने लगी थी. ख़ुद वीपी सिंह ने भी इस संबंध में आवश्यक उपाय किए जाने का आश्वासन दिया था. बाद के दिनों में प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने बतौर प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम दिए अपने पहले ही संदेश में आरक्षण दिए जाने के पैरामीटर्स में सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन शब्द के होने पर सवाल उठाए और इस पैरामीटर्स में 'आर्थिक पिछड़ापन' शब्द जोड़ने की बात कही. लेकिन वे कुछ करते इसके पहले ही उनके नाम के आगे भूतपूर्व लग गया. इसके बाद आए पीवी नरसिंह राव. उन्हीं के समय में इंद्रा साहनी केस का जजमेंट आया. इसके बाद उन्होंने जनरल कैटेगरी के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा की. लेकिन फिर बात वहीं अटक गई जहां चंद्रशेखर ने इशारा किया था. आरक्षण के पैरामीटर्स में 'आर्थिक पिछड़ापन' जैसा शब्द शामिल नहीं था. लिहाजा यह मामला सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाया और निरस्त कर दिया गया.