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बेट्टा, काम टालना ही कला है, बाकी सब तो विज्ञान है

करने के लिए ढेर सारा काम होता है. लेकिन सब ज़रूरी काम टाल देते हैं. क्योंकि दिमाग में सिर्फ गेम ऑफ़ थ्रोंस का नया एपिसोड चलता रहता है.

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26 जून 2016 (अपडेटेड: 26 जून 2016, 09:24 AM IST)
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हमारा मास्टर्स का आखिरी साल था. फाइनल सेमेस्टर में थीसिस लिखनी थी. 100 से 120 पन्नों की. 3 महीने का समय था. हिसाब लगाया कि अगर अभी से थोड़ा-थोड़ा लिखना शुरू करेंगे तो अच्छी खासी थीसिस तैयार हो जाएगी. हाथ घुमा कर अपनी ही पीठ ठोकी. शाबाश लड़की. यू कैन डू इट. चाहे जो हो जाए. अगर हर रोज़ 10 पन्ने भी लिखेंगे तो 15 से 20 दिन में थीसिस कम्पलीट कर लेंगे. एडिट भी हो जाएगी. उसके बाद भी बहुस्सारा टाइम बच जाएगा रिवीजन करने के लिए. प्लान एकदम परफेक्ट था. कैल्कुलेशन भी हमने अपने 991MS साइंटिफिक कैलकुलेटर पर की थी. लेकिन एक प्रॉब्लम थी. इस तरह के लॉन्ग टर्म प्लानिंग वाले कामों में हमारा रिकॉर्ड हद्द बुरा रहा है. वो भी ऐसे प्लान जिसमें कंसिस्टेंसी चाहिए.

हर सुबह उठ कर हम सोचते थे. आज तो बवाल ही काटना है. कम से कम 50 पन्ने लिख के ख़त्म करने हैं. आज तो हमको कोई रोक ही नहीं सकता. आज तो जो हैं हमइ हम हैं. और 15 मिनट तक मन लगा कर खूब लिखते थे. पूरे 2 पन्ने. इन '2 पन्नों' के लिए खुद को इनाम देना तो बनता था. बस एक छोटा सा ब्रेक. आय डिज़र्व दिस. थोड़ी देर फेसबुक. गिन के 10 मिनट.


'अरे, रीतिका की इंगेजमेंट हो गई? ये जो उसका कजिन है, ये तो तनिषा की पार्टी में भी आया था. ओह्हो, तो ये डीजे है. कूल.' और कुल 3 घंटे 43 मिनट बाद जब फ़ोन 'लो बैटरी' दिखाने लग जाता, हम अपनी फ्रेंड के कजिन की पहली गर्लफ्रेंड के पड़ोसी के ससुर की बड़ी बेटी की बेस्ट फ्रेंड के प्रोफाइल पर पड़े होते. वो भी गोवा में बीच पार्टी करते हुए.

'शिट! बहुत टाइम वेस्ट कर लिया. अब फेसबुक बंद'.

'लड़की, अब तो बैठ जाओ लिखने.'

'एक मिनट. यूट्यूब की ये क्या नोटीफिकेशन आई है. सुपरवुमन का नया वीडियो! इत्ता  सा ही तो है. बस 7 मिनट. एक ही वीडियो देखेंगे. प्रॉमिस.'

खुद ही खुद से वादे किए जाते. बस एक वीडियो. और उसी क्रम में अठ्ठाईसवां वीडियो देखने के बाद जो फीलिंग होती थी. कमाल की फील होती थी. क्योंकि उसमें होती थी बहुत सारी थकान, बहुत सारी एन्क्ज़ाइटी और परात भर गिल्ट.

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''थीसिस, थीसिस, फोकस, फोकस" अपनी ही आवाज़ में दिमाग में यही दो शब्द इको होते रहते थे. सिर के अन्दर दो आवाज़ें चलती रहती थी. एक बोलती थी, 'बेट्टा, काम पूरा कर लो. वर्ना कल कॉलेज में बहुत बुरा हाल होगा. इस आवाज़ का वॉल्यूम बिलकुल मिनिमाइज़ कर दिया जाता था. वो दूसरी वाली आवाज ज्यादा अच्छी लगती थी. क्योंकि वो इंटरेस्टिन्ग बातें करती थी. लाउडस्पीकर लगा के. 'वो जो ड्रेस देखी थी कल दुकान में, कित्ती सही थी यार. और परसों जो पिज़्ज़ा खाया था, गज़ब टेस्टी था.' और फिर सिर्फ एक पैराग्राफ लिखते-लिखते ही ऐसी जबर नींद आती थी कि अगर यमराज भी आकर उठाने की कोशिश करता तो उसको भी गरिया के भगा देते. 

फिर टाइम तो भाईसाब ना आपके लिए रुका है ना हमारे लिए रुकता. बीत गया. सिर्फ 3 दिन बचे थे. 3 दिनों में 120 पन्नों की कॉपी लिखी गई, एडिट हुई. बाइंड करवाई गई और डेडलाइन के एक घंटे बाद जमा कर दी गई. उस दिन लगा था कि अगर 'फ़्लैश-द फास्टेस्ट मैन अलाइव' भी हमसे कॉम्पटीशन करता, तो उसको भी हम पक्का हरा देते.

खैर कॉलेज तो ख़त्म हो गया लेकिन ये आदत साला ऐसे चिपक के बैठी है हमसे जैसे लोहे की कढ़ाई में कटहल की ग्रेवी. हमारे ही कंधे पर बैठकर हमारे साथ जगत भ्रमण कर रही है. और हमारे पूरे होते कामों में बहुत ही रिलीजिअसली लंगड़ी फंसाती रही है. ये जो काम टालने की आदत है, अंग्रेजी में इसको कहते हैं, प्रोक्रैस्टिनेशन. हमारे पिताजी में भी है. हम में भी आ गई. और ऐसी आ गई कि ये प्रोक्रैस्टिनेशन वाला आर्टिकल लिखने के लिए भी खुद को मोटिवेट करने में हमको पूरा एक हफ्ता लग गया.

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काम टालने की बीमारी यूनिवर्सल है. कभी ना कभी तो आप भी कुछ काम टालते ही होंगे. झूठ मत बोलना. कमरे की दीवार से जाले निकालने हों. वीकेंड पर किसी पुराने फ्रेंड को फ़ोन करना हो. या कार की सर्विसिंग करवानी हो. सोचते होंगे, 'अभी थोड़ी देर में कर लेंगे'. फिर ये 'थोड़ी देर' वाला टाइम कभी नहीं आता. या फिर तब आता है जब कोई डेडलाइन आ जाए. जब बीच बजरिया कार बंद पड़ जाए, तो उसको सर्विसिंग के लिए ले ही जाना पड़ता है.


वो लोग वाकई बहुत महान होते हैं. जो रोज़ का काम रोज़ निपटा सकते हैं. मतलब उनमे ज़रूर कोई दैवीय शक्ति होती होगी. जो अपने वक़्त और अपने काम को तरीके से बांट लेते हैं. फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं. जिनके सामने फाइलें भर-भर के काम रखा होगा. लेकिन वो फेसबुक पर 'Which Indian snack are you'  वाली क्विज खेल रहे होंगे. और आप मानो या ना मानो, इनके जैसा टैलेंट दैवीय शक्तिधारकों में भी क्या ही होता होगा. 

कैसे? अरे आसान थोड़ी होता है आधे घंटे में 3 हफ्ते का काम निपटाना. मतलब डेडलाइन सामने सुरसा की तरह अपना मुंह बढ़ाती जा रही है. दिमाग में एक से एक केमिकल लोचे चल रहे हैं. बॉस सामने है. लेकिन मजाल है जो चेहरे पर टेंशन की एक लकीर भी दिख जाए. अन्दर ही अन्दर ऐन्गज़ाइटी बढ़ती जा रही है. बढ़कर अपने चरम का छज्जा छू लेती है. और उसी छज्जे से दिमाग का दरवाज़ा ऐसा खुल जाता है. कि पूरे शरीर से क्रिएटिव जूस बहने लगता है.

एक से एक आईडिया आते हैं. ऐसे आईडिया जो सिर्फ प्रेशर में  ही निकलते हैं. जब डेडलाइन सामने हो. सब कुछ स्लो मोशन में चलने लगता है. उस पल में सिर्फ आप और आपका काम. उन्हीं पलों में मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. और जब डेडलाइन के ठीक सामने काम पूरा हो जाता है. उस सुकून, उस खुशी को शब्दों में एक्सप्लेन ही नहीं किया जा सकता. इतना प्यार आता है अपने आप पर कि खुद को ही कस कर भींचें और अपने ही गले लग जाएं. माथे पर जो ये पसीने की तीन बूँदें चमकती है. वो इस मिशन फ़तेह का मोमेंटो होती हैं.


काम टालना एक हुनर है. हर किसी में होता है. बस इस हुनर का इस्तेमाल करना आना चाहिए. क्योंकि फायदा तभी होता है जब आखिरी मोमेंट में काम करने के लिए खुद को ट्रेन कर लिया जाए. बिना किसी स्ट्रेस के, बिना हाथ पांव फूले. डर भले ही लगता रहे, लेकिन दिमाग भी चलता रहे. वर्ना तो बंधु, उस आधे घंटे में कई छोटे-छोटे हार्ट अटैक आ सकते हैं. अपने एक्सपीरियंस से बता रहे हैं. क्योंकि यही तो कला है. बाकी सब तो विज्ञान है. 

credit: gifey
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