हजारी प्रसाद द्विवेदी यानी हिंदी का हरफनमौला साहित्यकार. कब उनकी मारी गप्प,उसमें जरा सा कल्प यानी कल्पना जोड़कर अच्छी-खासी गल्प बन जाएगी कोई नहीं जानता.बाणभट्ट की आत्मकथा उनका एक बहुचर्चित उपन्यास है. हजारी प्रसाद द्विवेदी काजन्मदिन 19 अगस्त को होता है. पढ़िए उनके उपन्यास का प्रमुख अंश---------------------------------------------------------------------------------भैरवी ने एक बार मुझे नीचे से ऊपर तक ध्यान से देखा. बोली, ‘‘तू ब्राह्मण है?’’‘‘मेरा जन्म ब्राह्मण-वंश में ही हुआ है, मातः!’’ ‘‘वैदिक क्रिया का अभ्यास है?’’‘‘बहुत थोड़ा.’’ ‘‘इस साधना-गृह में तूने क्या किया है?’’ मैं ठीक समझ नहीं सका किभैरवी मुझसे क्या जानना चाहती हैं. कोई वैदिक क्रिया मैंने यहां नहीं की है; परप्रांगण-गृह में एक गीली मिट्टी की वेदी अब भी है, मुझे उसकी सफाई तो देनी ही होगी.फिर प्रसंगवश भट्टिनी की बात भी चल सकती है. इस समय तक वाममार्गी साधकों के सम्बन्धमें मेरे मन में श्रद्धा का भाव नहीं था. विशेषकर इन भैरवियों के सम्बन्ध में मैंनेऐसी बातें सुन रखी थीं, जिनसे उनके विषय में श्रद्धा नहीं बढ़ सकती. इसलिए मैंनेअपने को दबाया. बोला, ‘‘इस गृह में मैं बहुत थोड़ी देर ही रहा हूं, देवि! यहां मैंनेकोई वैदिक या अवैदिक अनुष्ठान नहीं किया.’’ भैरवी भी मेरे मुख को देखकर समझ गई किमैं कुछ छिपा रहा हूं. बोलीं, ‘‘ठीक-ठीक बता, नहीं तो अमंगल होगा.’’ इस बार मैंडरा. इन भैरवियों से मंगल चाहे न हो, अमंगल अवश्य होता है. मेरा ऐसा विश्वास था.हाथ जोड़कर बोला, ‘‘अज्ञ जन के ऊपर दया होनी चाहिए, मातः!’’ भैरवी ने स्मित हास्यकिया. यह हंसी नारी-जनोचित बिलकुल नहीं थी. उसमें किसी प्रकार के शील, विनय, लज्जाया माधुर्य का एकदम अभाव था. वह रूखी नहीं थी, रहस्यपूर्ण थी. उल्का के क्षणभंगुरप्रकाश की भांति वह हंसी मेरे मन में आशंका को दीप्त कर गई. मैंने फिर भीत-भीत भावसे कहा, ‘‘अपराध क्षमा हो, मातः!’’ भैरवी ने कहा, ‘‘इधर आओ.’’ और फिर ज़रा ज़ोर सेपुकारकर कहा, ‘‘आर्य, यह देखो कौन है?’’ भैरवी मुझे टूटी दीर्घिका (तालाब) के घाटपर ले गईं. यहां पहले से ही तीन व्यक्ति उपस्थित थे. दो तो कोई साधक भैरव और भैरवीथे, पर एक महात्मा उनमें विशेष थे. वे व्याघ्र-चर्म पर अर्द्धशायित अवस्था में लेटेहुए थे. उनके शरीर से एक प्रकार का तेज निकल रहा था. सिर पर केश नहीं के समान थे;पर कान की शष्कुलियां श्वेत केशों से आच्छादित थीं. ललाट-मंडल की सहज वलियांकूर्चप्रदेश तक व्याप्त हो गई थीं. आंखों के ऊपर की दोनों भ्रूलताएं मिल गई थीं औरसारा मुखमंडल छोटे-छोटे श्मश्रु-लोमों से परिव्याप्त था. उनकी आंखें बहुत ही आकर्षकथीं. उन्हें देखकर बड़ी-बड़ी समुद्री कौड़ियों का भ्रम होता था. ऐसा जान पड़ता था कि वेआंखें पूरी-पूरी कभी खुली ही नहीं थीं. सदा आधी ही खुलती रहने के कारण उनके नीचेमांस-खंड फूल उठे थे और कोनों में एक प्रकार की स्थायी सिकुड़न आ गई थी. उनके वेशमें कोई विशेष साम्प्रदायिक चिह्न नहीं था; केवल दाहिनी ओर रखा हुआ पान-पात्र देखकरअनुमान होता था कि वे कोई वाममार्गी अवधूत होंगे. उनके पहनावे में एक छोटा-सावस्त्रा-खंड था, जो लाल नहीं था और तन ढकने के लिए पर्याप्त तो किसी प्रकार नहींथा. उनकी तोंद कुछ ज्यादा निकली दिखती थी, यद्यपि वह उतनी अधिक निकली हुई थी नहीं.भैरवी ने उनके पास आकर कहा, ‘‘बाबा, यह देखो, यह व्यक्ति साधना-गृह को भ्रष्ट करआया है.’’ बाबा की आंखें मुंदी हुई थीं. भैरवी की वाणी सुनकर वे ज़रा सचेत हुए औरउन्होंने अपनी आधी खुली आंखों से क्षण-भर के लिए मेरी ओर ताका. वह दृष्टि बहुत हीपवित्र जान पड़ी. बाबा ने फिर आंखें बन्द कर लीं. थोड़ी देर तक उसी अवस्था में रहनेके बाद बोले, ‘‘मायाविनी! मायाविनी! मायाविनी!!’’ मुझे ऐसा लगा, मानो वे प्रत्यक्षसबकुछ देख रहे हैं, जैसे त्रिकाल उनके हाथ में आमलक फल के समान सुदर्श है. भैरवी नेफिर एक बार मेरे विरुद्ध अभियोग किया. बाबा ने बच्चे की भांति हंसते हुए कहा,‘‘क्यों रे, वहां क्यों गया था? पगले, वह मायाविनी है, उसके जाल में फंस गया.’’ यहकहकर उन्होंने चंडी मंडप की मूर्ति की ओर इशारा किया. फिर बोले, ‘‘अकेला था?’’ मुझेऐसा लगा कि बाबा जान गए हैं, उनसे कुछ छिपाना व्यर्थ है. परन्तु बाबा का अभिप्रायकुछ और ही था. मैं समझ नहीं सका और गिड़गिड़ाकर बोल उठा, ‘‘कल रात को दो दुखिनीस्त्रिायों को लेकर इस गृह में आश्रय लिया था, बाबा! इस गृह में हमने खाया-पिया हैऔर जूठन से इसे अपवित्र किया है. मैं जिस दुखिनी कन्या को आश्रय देने के लिए यहांले आया था, उसने महावराह की पूजा भी की है.पर सबकुछ अनजान में हुआ है. अपराध क्षमाहो, आर्य!’’ यह कहकर मैंने भयपूर्वक प्रणिपात किया. बाबा बोले, ‘‘डरता है रे!’’मैंने संक्षेप में उत्तर दिया, ‘‘हां बाबा!’’ बाबा कुछ इस प्रकार सजग हो गए, जैसेकिसी बच्चे को कोई तमाशा देखने को मिल गया हो. उठकर सीधे बैठ गए और कौतूहल के साथबोले, ‘‘इधर आ!’’ मैं जब उनके पास गया, तो उन्होंने मेरा ललाट छू दिया. मेरे दोनोंभ्रुओं के मध्यभाग को उन्होंने अपने अंगुष्ठ से दबाया और फिर हटा लिया. मेरा सिरचकरा गया. क्षण-भर में मेरे सामने एक भयंकर दृश्य उपस्थित हो गया. मैंने देखा किभट्टिनी और निपुणिका नाव में बैठी पूरब की ओर जा रही हैं. उधर पूर्वी आकाश कालेबादलों से छा गया है. बादलों के आगे-आगे पिंगल वर्ण की धूलि दौड़ रही है और उसके भीआगे छोटे-छोटे तालचंचु पक्षियों का एक दल धूल और बादलों के साथ खेलता हुआ भागा जारहा है. मैं किनारे पर खड़ा हूं. बादल और घने हो गए. वायुमंडल में थोड़ी सर्दी काआभास मिला. फिर भयंकर प्रभंजन के साथ-ही-साथ आकाश-मंडल में विकट विद्युत्-स्फोटहुआ. गंगा की लहरें एक-दूसरे से क्रुद्ध भाव से भिड़ गईं. आकाश धूलि से, दिङ्मंडलअन्धकार से और गंगा का प्रवाह फेन-पुंज से आच्छादित हो गया. देखते-देखते भट्टिनी कीनौका अन्धकार में अदृश्य हो गई. मेरे हृदय और मस्तिष्क निष्क्रिय-निश्चेष्ट हो गए.मुंह से आवाज नहीं निकली. पैरों के नीचे पृथ्वी कुम्भकार के चक्र की भांति घूमनेलगी. इसी समय बिजली चमकी. नाव धारा में बैठ गई. निपुणिका और भट्टिनी पानी में कूदपड़ीं. फिर अन्धकार, गर्जन, फूत्कार! मेरा मस्तक झनझना उठा. शिराएं इस प्रकार स्फीतहो उठीं, जैसे वे रक्त के दबाव को अधिक नहीं सह सकेंगी. बादल फैलते गए, आंधी का वेगबढ़ता गया, गर्जन का शब्द ऊंचा होता गया, फूत्कार का विकट विराव दिङ्मंडल मेंव्याप्त होता गया. मैं चिल्ला उठा, ‘‘त्रहि आर्य, त्रहि!’’ इस समय मेरे ललाट मेंफिर एक बार अंगुलि-स्पर्श का अनुभव हुआ. गंगा की धारा शान्त हो गई, आकाश स्वच्छ होगया और भुवन-मंडल प्रसन्न जान पड़ा. मैंने देखा, भट्टिनी नौका में आराम कर रही हैं.निपुणिका उनके पैरों के पास बैठी हुई कुछ कह रही है. भट्टिनी का मुख प्रसन्न है,आंखें उत्सुकता से भरी हैं और कपोलपालि विकसित है. फिर मैंने बाबा की ओर देखा, उनकीअधखुली आंखों में मीठी-मीठी हंसी है. मैंने भीत-भीत भाव से कहा, ‘‘बाबा, यह क्यादेखा मैंने? ऐसा ही होनेवाला है क्या?’’ बाबा बच्चों के समान विनोद करते हुए बोले,‘‘मैं क्या जानूं?’’ फिर उनकी आंखें मुंद गईं. कुछ भावावेश की-सी अवस्था में बोले,‘‘कितनी माया जानती है, पगली!’’ फिर मुझे लक्ष्य करके बोले, ‘‘क्यों रे, डरता हैक्या?’’ ‘‘मेरा अपराध क्षमा करें, आर्य!’’ ‘‘तूने कोई अपराध किया है रे?’’ ‘‘मैंसाधारण मनुष्य हूं, आर्य! अपराध करता ही रहता हूं; किन्तु जान-बूझकर कभी किसी काअनिष्ट नहीं किया है. मैं अमंगल से डरता हूं.’’ ‘‘ब्राह्मण है?’’ ‘‘हां, आर्य!’’‘‘तेरी जाति ही डरपोक है. क्यों रे, महावराह पर तेरा विश्वास नहीं है?’’ ‘‘है,आर्य!’’ ‘‘झूठा! तेरी जाति ही झूठी है! क्यों रे, तू आत्मा को नित्य मानता है?’’‘‘मानता हूं, आर्य!’’ ‘‘पाखंडी! तेरे सब शास्त्रा पाखंड सिखाते हैं! क्यों रे,कर्मफल मानता है?’’ बाबा के इस प्रश्न का उत्तर अब सहज ही मैं नहीं दे सका. फिर नजाने मेरी जाति पर कौन-सा विशेषण बैठा दिया जाए. ज़रा-सा वक्रभंगी से कतरा जाने कीचेष्टा करते हुए मैंने कहा, ‘‘कैसे कहूं बाबा!’’ बाबा हंसे. बोले, ‘‘बता न, तूकर्मफल मानता है या नहीं?’’ ‘‘मानता हूं, आर्य!’’ ‘‘तो अमंगल से क्यों डरता है?मिथ्याचारी है तू!’’ ‘‘हां, आर्य, सो तो हूं.’’ ‘‘तो कुछ सच्ची बात सीख न!’’ ‘‘क्याआर्य?’’ ‘‘यही कि डरना नहीं चाहिए. जिस पर विश्वास करना चाहिए, उस पर पूरा विश्वासकरना चाहिए, चाहे परिणाम जो हो. जिसे मानना चाहिए, उसे अन्त तक मानना चाहिए.’’‘‘माया-पंक में डूबा हुआ संसार-कीट हूं, आर्य! बहुत-कुछ समझता हूं; पर कर नहींपाता.’’ ‘‘प्रपंची! तेरी जाति ही प्रपंची है. सौ बात क्यों समझता फिरता है? एक कोसमझ और उसी को कर. क्यों रे, उस लड़की पर तेरी ममता है न?’’ यह अजीब प्रश्न है. क्याजवाब दूं? चुप रहना ही ठीक समझा. बाबा ने इसी समय उस भैरवी से कहा, ‘‘महामाया! सबठीक है न?’’ भैरवी ने कहा, ‘‘अभी ठीक हो जाता है.’’ यह कहकर वे और दोनों अन्य साधकभी उठ पड़े. मैं अकेला रह गया. बाबा ने मुझसे फिर पूछा, ‘‘क्यों रे, बताता क्योंनहीं?’’ मैंने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘उस कन्या का सेवक होना गौरव का विषय है, आर्य! मैंउसके मंगल के लिए प्राण तक दे सकता हूं.’’ बाबा हंसते रहे. बोले, ‘‘ना रे पागल,प्राण मैं नहीं मांगता. मैं जानना चाहता हूं कि उस कन्या पर तेरी ममता है या नहीं.सीधा क्यों नहीं कहता कि है. तेरी जाति ही टेढ़ी है. हां रे, और महावराह पर तेरीममता है?’’ ‘‘है आर्य!’’ ‘‘मान ले कि एक निशाचर अचानक आकर तुझे धर दबाए और अपनेबाएं हाथ में तेरी स्वामिनी को और दाहिने हाथ में महावराह की मूर्ति को लेकर बोलेकि तू अपना प्राण देकर किसी एक को बचा सकता है, तो तू किसे बचाने के लिए प्राण देनापसन्द करेगा?’’ बाबा बेढब जीव हैं. ऐसा भी प्रश्न किया जाता है! मैं चुप हो रहा.थोड़ी देर तक सोचकर बोला, ‘‘मैं दोनों को बचाना चाहूंगा.’’ बाबा क्रोध से कांप उठे,‘‘फिर झूठ बोलता है, जन्म का पातकी, कर्म का अभागा, मिथ्यावादी, पाषंड!! महावराह कोबचाएगा तू, दम्भी!’’ मैं हतचेष्ट, निर्वाक् स्तब्ध! बाबा का क्रोध वास्तविक नहींथा. मेरी परीक्षा लेने के लिए ही उन्होंने यह रूप धारण किया था. मैं विचलित हो गया.मेरी इच्छा के विरुद्ध जैसे किसी ने मुझसे कहलवा लिया, ‘‘प्राण देकर मैं भट्टिनी कोबचाऊंगा.’’ बाबा हंसने लगे. उनकी अर्द्धमुद्रित आंखें चमक उठीं. बोले, ‘‘अभागा,सारी जिन्दगी में तूने यही एक बात सच कही है. क्यों रे, लजाता है? दुत् पगले, उसमायाविनी के जाल में फंस रहा है? क्या बुरा है रे, त्रिपुर-सुन्दरी ने जिस रूप मेंतेरे मन को लुभाया है, उसे साहसपूर्वक स्वीकार क्यों नहीं करता? तू अभागा ही बनारहेगा, भोले! तेरे मन में महावराह से अधिक पूज्य भावना उस लड़की के प्रति है. है नरे? फिर झूठ बोलेगा भाग्यहीन?’’ ‘‘ना बाबा, झूठ क्या मैं समझ-बूझकर बोल रहा हूं,कोई बुलवा रहा है. भट्टिनी के प्रति मेरी पूज्य भावना है, यह ठीक बात है.’’ ‘‘हां,तू अब ठीक कह रहा है. भुवनमोहिनी का साक्षात्कार पाकर भी तू भटकता फिर रहा है पागल!देख रे, तेरे शास्त्रा तुझे धोखा देते हैं. जो तेरे भीतर सत्य है, उसे दबाने कोकहते हैं; जो तेरे भीतर मोहन है, उसे भुलाने को कहते हैं; जिसे तू पूजता है, उसेछोड़ने को कहते हैं. मायाविनी है यह मायाविनी, तू इसके जाल में न फंस. समस्त पुरुषोंको भरमा रही है, स्त्रिायों को सता रही है, माया का दर्पण पसारे है. तू उसे नहींदेखता, मैं देख रहा हूं. तुझे देखकर वह हंस रही है.’’ मैं मुग्ध-सा बना बाबा की ओरदेख रहा था. उनका प्रत्येक वाक्य मेरे अन्तस्तल में उथल-पुथल मचा देता था जैसेवर्षों की गंदगी साफ हो रही हो. बाबा की बातें जितनी विचित्र थीं, उतनी ही भेदक भी.थोड़ी देर तक अभिभूत-सा बना रहने के बाद मैंने हाथ जोड़कर पूछा, ‘‘क्यों बाबा, मैंनेजो कुछ देखा है, वही घटनेवाला है क्या?’’ बाबा ने निर्ममता के साथ कहा, ‘‘तो बुराक्या है रे? इसके झांसे में क्यों आता है? घटने न दे, कितना आनन्द आ जाएगा! तूभूलता है, पागल! इसे लीला में रस मिलता है न! अच्छा, ठीक बता, तू उस लड़की को क्यासमझता है?’’ ‘‘मैं...मैं...मैं...’’ ‘‘धिक् मूर्ख, कुछ बता न! जो बात तेरे मन मेंपहले आवे, वही कह जा.’’ ‘‘वह पवित्रता की मूर्ति है, आर्य!’’ ‘‘तू पशु नहीं है!’’मैं कुछ भी समझ न सका. इसी समय महामाया नामक भैरवी आईं. बाबा ने उनसे कहा,‘‘महामाया, यह पशु नहीं जान पड़ता; किन्तु वीर भी नहीं है. अमंगल से डरा हुआ है. इसेआज का प्रसाद देना. अमंगल से इसका चित्त विक्षिप्त हो रहा है.’’ महामाया क्षण-भरठिठककर खड़ी रहीं. फिर विनीत भाव से बोलीं, ‘‘अधिकारी है, आर्य?’’ बाबा फिर हंसे,‘‘तुम भी अभी उसके जाल से नहीं निकलीं, महामाया! कह तो दिया, पशु नहीं है. अधिकारीनहीं होगा, तो क्या कर लेगा? तुम्हें बदनाम करता फिरेगा, यही न? डरती हो. दुत्पगली, तू भी डरती है?’’ महामाया ने कहा, ‘‘जो आज्ञा, आर्य!’’ बाबा ने कहा, ‘‘ठहरोमहामाया, तुम्हें प्रत्यय दिला दूं.’’.यह कहकर उन्होंने मुझे पास बुलाया. न जानेक्या फिर देखने को मिले, यह सोचकर मैं डरता-डरता उनके पास गया. उन्होंने मेराउत्तरीय हटा दिया और मेरु-दंड की धीरे-धीरे परीक्षा की. आधी पीठ तक आकर उन्होंनेहाथ हटा लिया. बोले, ‘‘मैं ठीक कह रहा हूं, महामाया! यह देखो, इसकी कुंडलिनी जाग्रतहै.’’ महामाया भैरवी ने भी हाथ से उस स्थान को छूकर देखा. आश्वस्त होकर बोलीं, ‘‘तोजैसी आज्ञा हो, बाबा!’’ ‘‘इसे कुएं के पास बैठा लेना!’’ फिर मेरी ओर देखकर बोले,‘‘अमंगल दूर हो जाएगा, पर तू अमंगल को मंगल क्यों नहीं मान लेता? आज पूर्णिमा लगतेही इन लोगों की गोपन साधना होगी. महामाया तुझे प्रसाद देंगी. उसे तू निष्ठा के साथग्रहण कर और देख बाबा, भटकता न फिर. इस ब्रह्मांड का प्रत्येक अणु देवता है. देवताने जिस रूप में तुझे सबसे अधिक मोहित किया है, उसी की पूजा कर. आ, तुझे मन्त्र बतादूं.’’ मैं बाबा के पास इस प्रकार खिंच गया, जैसे लोहा चुम्बक से खिंच जाता है.उन्होंने मुझे एक मन्त्र बताया और कहा, ‘‘जब तेरे चित्त में भय, लोभ और मोह कासंचार हो, तो तू इसे ही जपा कर.’’ मैंने भक्तिपूर्वक बाबा की बात स्वीकार की. थोड़ीदेर तक बाबा निश्चल-से बैठे रहे. फिर किसी के पैरों की आहट सुनकर उन्होंने आंखेंखोलीं. बोले, ‘‘कौन है?’’ ‘‘विरतिवज्र हूं, आर्य!’’ ‘‘आओ.’’ विरतिवज्र की अवस्थापच्चीस के नीचे ही जान पड़ती थी. उनका मुखमंडल स्वच्छ, मोहनीय और आकर्षक था.उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं के समान चीवर धारण किया था; पर चीवर का रंग पीला न होकरलाल था. चांदनी में वह रंग और भी खिल उठा था. उनका कंठ-स्वर भी कोमल और बालकोचितथा. बाबा को भूमिष्ठ होकर प्रणाम करके वे एक स्थान पर शान्त-भाव से बैठे रहे. बाबाउसी प्रकार झीमते-से रहे. फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने पूछा, ‘‘क्या निश्चय किया है,विरति?’’ ‘‘कुछ समझ नहीं सका, आर्य! मेरे आदिगुरु अमोघवज्र ने मुझे ऐसा कुछ करने कोनहीं कहा था. उन्होंने केवल नैरात्म्य की भावना में स्थिर रहने का उपदेश दिया था.एक बार मेरा चित्त जब बहुत उत्क्षिप्त हो गया था तब गुरु भी चिन्तित हुए. अपनेमानसिक उत्क्षेप का कारण तो आपसे निवेदन कर ही चुका हूं. एक दिन अचानक उन्होंनेमुझे बुलाकर कहा, ‘आयुष्मान, मैं अब अधिक दिन नहीं रह सकूंगा. तू कौलाचार्य अघोरभैरव के पास जा. वे ही तेरी व्यवस्था कर देंगे.’ उसी दिन से मैं आर्य की खोज मेंथा. पर मैं अपने आदिगुरु की बात ठीक नहीं समझ सका कि क्यों उन्होंने मुझे आपके पासभेजा!’’ ‘‘नैरात्म्य-भावना तुम्हारी समझ में आई है?’’ ‘‘नहीं, आर्य!’’ ‘‘तुम्हारेऊपर कोई विश्वास करे, तो उसे छोड़ सकने का साहस है तुममें?’’ ‘‘नहीं, आर्य!’’ ‘‘तुमऔर मैं का भेद भूलने में तुम्हें रस मिलता है?’’ ‘‘हां, आर्य!’’ ‘‘पुरुष और स्त्राीका भेद तुम भूल सकते हो?’’ ‘‘नहीं, आर्य!’’ ‘‘बुद्ध और बद्ध का भेद तुम्हें अच्छालगता है या बुरा?’’ ‘‘अच्छा, आर्य!’’ ‘‘साधु आयुष्मान्, तुम सत्यवादी हो. अमोघवज्रने समझ-बूझकर ही तुम्हें मेरे पास भेजा है. तुम सौगत-तन्त्र के अधिकारी नहीं हो,तुम कौल-मार्ग में विचर सकते हो. पर आयुष्मान्, बिना शक्ति के साधना तो इस मार्गमें नहीं चल सकती. इस बात का एक निश्चय तो तुम्हें करना ही पड़ेगा.’’