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इंडियन नेवी आधे घंटे लेट होती तो लक्षद्वीप हाथ से निकल जाता

लक्षद्वीप आईलैंड्स का सबसे पुराना जिक्र ग्रीक टेक्स्ट Periplus of Erytharean Sea में मिलता है. भारत की आजादी के समय लक्षद्वीप किसका हिस्सा होगा, पक्का नहीं था. जिन्ना भी पूरी फ़िराक में थे हड़पने की. फिर लक्षद्वीप भारत का हिस्सा कैसे बना?

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कमल
| मानस राज
5 जनवरी 2024 (अपडेटेड: 30 जनवरी 2024, 07:48 PM IST)
lakshadweep explainer
आसान भाषा में- लक्षद्वीप
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समंदर में स्नोर्कलिंग कर लौटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तस्वीरें आपने देखी होंगी. मोदी लक्षद्वीप की यात्रा पर थे. लक्षद्वीप के बारे में बचपन से हम सुनते आए. एक द्वीप है. छोटा सा. लेकिन इसकी कहानी बहुत लम्बी है. भारत जब आजाद हुआ. 1947 में. लक्षद्वीप किसका हिस्सा होगा, पक्का नहीं था. जिन्ना भी पूरी फ़िराक में थे हड़पने की. फिर लक्षद्वीप भारत का हिस्सा कैसे बना?

चलिए आज आपको बताते हैं लक्षद्वीप की पूरी कहानी.  
लक्षद्वीप का इतिहास क्या है ?
लक्षद्वीप भारत का हिस्सा कैसे बना ?
और भारत के लिए लक्षद्वीप का महत्व क्या है ?


शुरुआत करते हैं जियोग्राफी से. भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट से 200 से 440 किमी दूर अरब सागर में द्वीपों का एक समूह है. इन्हें ही लक्षद्वीप कहा जाता है. हालांकि इनका हमेशा से नाम ये नहीं था. पहले इन्हें  लक्कादीव-मिनिकॉय-अमिनीदिवि, इन तीन द्वीपों के नाम से जाना जाता था. लक्षद्वीप शब्द आया है संस्कृत के शब्द 'लखद्वीप' से जिसका मतलब होता है हजार टापू. हालांकि वर्तमान में ये  35 टापू हैं. पहले इनकी संख्या 36 थी. फिर समंदर में एक डूब गया. लक्षद्वीप एक केंद्र शासित प्रदेश है. जिसकी राजधानी का नाम है, कवारत्ती.        

जियोग्राफी के बाद अब नंबर आता है हिस्ट्री का.  
लक्षद्वीप आईलैंड्स का सबसे पुराना जिक्र ग्रीक टेक्स्ट Periplus of Erytharean Sea में मिलता है. जिक्र ये भी मिलता है कि 5वीं सदी आते-आते बौद्ध धर्म लक्षद्वीप पहुंच गया था. बौद्ध जातक कथाओं में भी लक्षद्वीप का जिक्र मिलता है. माना जाता है कि बौद्ध भिक्षु संघमित्र यहां आए थे. इसके अलावा संगम काल में चेरा साम्राज्य ने इन आईलैंड्स पर राज किया. चेरा साम्राज्य के राजा चेरामन पेरूमाल के समय में यहां कुछ बसाहट शुरू हुई थी. बाद में यहां इस्लाम धर्म का आगमन हुआ. इस्लाम धर्म की शुरुआत के करीब 3 दशक बाद. माना जाता है कि ऊबैदुल्लाह नाम के एक संत इस्लाम को लक्षद्वीप लेकर आए. ऊबैदुल्लाह मदीना में पैदा हुए थे और और इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर के रिश्तेदार थे. इन्हीं  ऊबैदुल्लाह के एक बेटे हुए, अबू बकर इब्न ऊबैदुल्लाह. उनकी लिखी एक किताब, फुथुहथुल जाजइर में लक्षद्वीप में इस्लाम के आगमन का जिक्र है.  लक्षद्वीप में एंड्रोट नाम की जगह में  ऊबैदुल्लाह की कब्र आज भी है. बहरहाल आगे बढ़ें तो 11 वीं सदी में लक्षद्वीप पर चोल  साम्राज्य का शासन हो गया. और वे इसे अपने समुद्री पोर्ट के तौर पर इस्तेमाल करने लगे.  

 ऊबैदुल्लाह की कब्र 

1498 में वास्को डी गामा भारत आया. साथ साथ पुर्तगाली भी आए. पुर्तगालियों ने गोवा, दमन दीव पर कब्ज़ा किया. और साथ ही लक्षद्वीप को अभी अपनी कॉलोनी का हिस्सा बना लिया. लक्षद्वीप के अगाती और मिनीकॉय टापुओं पर पुर्तगालियों ने कुछ किले और चर्च बनाए. स्थानीय मुस्लिम आबादी ने पुर्तगालियों का विरोध किया. जिसके चलते 1540 तक पुर्तगालियों को लक्षद्वीप छोड़ना पड़ा.        
लक्षद्वीप के इतिहास में अगला बड़ा चैप्टर आता है 1787 में. जब लक्षद्वीप मैसूर के टीपू सुल्तान के अधीन आ गया. लेकिन फिर जब तीसरे एंग्लो मैसूर युद्ध में टीपू की हार हुई. और लक्षद्वीप का प्रशासन    
ब्रिटिशर्स के हाथ चले गया. अंग्रेज़ों ने लक्षद्वीप के कुछ द्वीप केरल के अरक्कल सुल्तान को लीज़ पर दे दिया. बदले में अंग्रेज़ों को यहां से टैक्स मिलता था. आगे चलकर जब सुल्तान टैक्स नहीं चुका पाए तो उन्होंने लक्षद्वीप वापस ले लिया.  और इसे मद्रास प्रेसिडेंसी से जोड़कर मालाबार का हिस्सा बना दिया। और वहीं से अंग्रेज़ इसका प्रशासन संभालने लगे.  

यहां से है हम पहुचंते हैं सीधे 1947 पर. अंग्रेजों की भारत से रुखसती हो रही थी. वो एक बिखरे हुए भारत को छोड़कर जा रहे थे, जिसे एक करने का दारोमदार सरदार पटेल के कंधों पर था. 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज भारत से चले गए. बंटवारे में लक्षद्वीप का सवाल ही नहीं था क्योंकि ये पहले से ही मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा था. लेकिन फिर हुआ यूं की जिन्ना की नज़र लक्षद्वीप पर अटक गई. 
आप पूछेंगे क्यों? मामला सिर्फ जमीन का नहीं था.  मध्यकाल से ही लक्षद्वीप हिन्द महासागर के ट्रेड रूट का एक अहम पड़ाव बन चुका था. यहां से हिन्द महासागर और अरब सागर, दोनों पर नज़र रखी जा सकती थी. इसलिए मिलिट्री और बिजनेस, दोनों के हिसाब से ये बड़ा महत्व रखता था. इसके अलावा लक्षद्वीप की अधिकतर आबादी मुस्लिम थी. इस नाते मोहम्मद अली जिन्ना को लगता था कि उनका हक़ पहले है.  

बहरहाल ये देखिए कि 15 अगस्त के बाद क्या हुआ. कुछ ही रोज बाद पाकिस्तान ने कब्ज़े के इरादे से अरेबियन सागर में एक फ्रिगेट लक्षद्वीप के लिए रवाना कर दिया। दूसरी तरफ भारत के सामने  
साढ़े पांच सौ से ज्यादा रियासतों का सवाल था. लक्षद्वीप वरीयता में नीचे आता था. लेकिन सरदार पटेल चौकन्ने थे. पाकिस्तान से पहले ही उन्होंने सेना को लक्षद्वीप का टारगेट दे दिया था. पाकिस्तानी फ्रिगेट जब लक्षद्वीप पहुंची तो देखा कि वहां पहले से तिरंगा लहरा रहा है. कई जगह तो ये भी जिक्र मिलता है कि पकिस्तान को पहुंचने में महज आधे घंटे की देरी न हुई होती तो लक्षद्वीप उनका होता.      
 

अब देखिए लक्षद्वीप केंद्र शासित प्रदेश कैसे बना. 
साल 1956 में केंद्र सरकार ने राज्यों का पुनर्गठन किया, जिसके तहत 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बने. इन केंद्र शासित प्रदेशों में एक लक्षद्वीप भी था. हालांकि तब इसका नाम लक्षद्वीप नहीं था. तीन इकाइयां थीं. लक्कादीव, मिनीकॉय और अमिनदिवी. लक्षद्वीप को इसका नाम मिला 1973 में. सही सही बताएं तो 1 नवम्बर 1973. इससे कुछ साल पहले ही यानी 1964 में  कवारत्ती को लक्षद्वीप का हेड्कॉर्टर घोषित कर दिया गया था.  जो एक हिसाब से इसकी राजधानी हुई. और तबसे प्रशासन का काम यहीं से होता है.  

अब सारी कहानी जानने के बाद चलिए ये भी जान लेते हैं कि लक्षद्वीप भारत के लिए महत्त्व क्या रखता है.  
- यूं लक्षद्वीप महज़ 32 स्क्वायर किलोमीटर में फैला है. लेकिन इसके कारण भारत को समंदर के 20000 स्क्वायर किलोमीटर तक एक्सेस मिल जाता है.  दरअसल 1982 में यूनाइटेड नेशंस लॉ ऑफ सी कंवेंशन्स के नियमों के मुताबिक, किसी देश के तट से 12 नॉटिकल माइल्स यानी 22 किलोमीटर तक के एरिया पर उसी देश का अधिकतर होगा. जिसके चलते लक्षद्वीप भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. 
- इसके अलावा इस क्षेत्र लक्षद्वीप आइलैंड्स के पास है नाइन डिग्री चैनल. यानी एक समुद्री रास्ता है. जो  फारस की खाड़ी और पूर्वी एशिया को जोड़ने वाला सबसे सीधा रुट है. 
- लक्षद्वीप की मालदीव्स, श्रीलंका जैसे देशों से निकटता के चलते ये इंटरनेशनल रिलेशंस के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. 
- अब सबसे जरूरी बात.  लक्षद्वीप के कावारत्ती में भारतीय नौसेना का बेस 'INS द्वीपरक्षक' है. इस नेवल बेस को 30 अप्रैल 2012 को कमीशन किया गया था. हालांकि 1980 से ही इंडियन नेवी के इंस्टॉलेशन यहां मौजूद हैं. लेकिन ये नेवल बेस पर्शियन गल्फ और ईस्ट एशिया के ट्रेड रुट पर है. इसी रुट पर सोमालियाई पाइरेट्स का भी खतरा रहता है, यानी सामरिक दृष्टि से इसका महत्व कितना है, आप समझ ही गए होंगे.  


आखिर में बात बिजनेस की करें तो यहां मिनरल्स और मछलियों का भंडार है. इसलिए आर्थिक दृष्टि से ये भारत के लिए काफी मायने रखता है. भारत की महत्वकांक्षा इसे मालदीव जैसा टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की है. जिसकी बाद PM मोदी ने भी की.     
चलिए उम्मीद है हमारी इस कोशिश से आपकी जानकारी में इजाफा हुआ होगा. 

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