इतने आसान तरीके से मुझे किसी ने इनकम टैक्स का ताम-झाम नहीं समझाया
2018-19 आम बजट आने ही वाला है, तैयारी कर लीजिए!
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फोटो - thelallantop
'इनकम टैक्स' से संबंधित टर्मीनलॉजी जैसे कि - टैक्स रिटर्न, टैक्स रिबेट, सेक्शन 80C वगैरह - सब अगले लेवल की बातें हैं जो तब तक हमको समझ नहीं आनी जब तक हमको इनकम टैक्स की बेसिक जानकारी न हो जाए. और एक बार हमको इनकम टैक्स की पूरी गणित समझ आ गई तो बाकी चीज़ें हमारे लिए बाएं हाथ का खेल होंगी – फिर चाहे बात इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल करने की हो या रिबेट पाने की. तो आइए हम इनकम टैक्स का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पाठ सबसे आसान भाषा में जानते हैं.
इनकम टैक्स को कैलक्यूलेट करना इसलिए मुश्किल है क्यूंकि इसमें साधारण अंक-गणित से इतर छः और कैलकुलेशन यानी छः और दिक्कते हैं. इन छः दिक्कतों को बताने से पहले आपको कुछ महत्वपूर्ण बातें बताना चाहेंगे
सभी आय वार्षिक आधार पर हैं.
आपका टैक्स काटने के लिए आपको हर स्लैब से गुज़रना होगा. आइए बताते हैं कैसे – तो आपका टोटल टैक्स हुआ – 412,500 ( 12,500 + 100,000 + 300,000) न कि 600,000. तो कैलकुलेशन तो ज़्यादा करना पड़ा लेकिन पैसे काफी बच गए. नहीं?
उत्तर बहुत सिंपल है – तीन लाख पचास हज़ार तक की आय उसमें रखी गई है क्यूंकि उसके बाद यदि आपकी आय एक रुपया भी अधिक हुई तो 87 A के अंतर्गत एक रुपया भी इनकम टैक्स रिबेट नहीं मिलेगा. अब यदि तीन लाख स्लैब रखा जाता तो तीन लाख एक रुपए वाले को भी रिबेट नहीं मिलता. अभी कम से कम ढाई हज़ार ही सही, या तीन लाख के अमाउंट के ऊपर ही सही, रिबेट तो साढ़े तीन लाख तक की आय वालों को भी मिल रहा है न?
ये सब आर्दश परिभाषाएं हैं, हम अपने कैलकुलेशन की तरफ लौटते हैं.
CESS गणितीय हिसाब से सबसे छोटी दिक्कत है. बस जो भी ऊपर के गुणा भाग से इनकम टैक्स बना आपका उसका तीन प्रतिशत सरकार को और दे दीजिए, तो सेस भी हो गया.
तो इस स्थिति से निपटने के लिए होता है - मार्जिनल रिलीफ. मतलब जब आप सरचार्ज के दायरे में आएं तो यह सुनश्चित करने के लिए कि जितनी आपकी इनकम बढ़ी उससे ज़्यादा कहीं आपका टैक्स न बढ़ जाए आपको मार्जिनल रिलीफ दिया जाता है, या टैक्स में छूट दी जाती है.
इनकम टैक्स को कैलक्यूलेट करना इसलिए मुश्किल है क्यूंकि इसमें साधारण अंक-गणित से इतर छः और कैलकुलेशन यानी छः और दिक्कते हैं. इन छः दिक्कतों को बताने से पहले आपको कुछ महत्वपूर्ण बातें बताना चाहेंगे
- ये दिक्कतें टैक्स कैलक्यूलेट करने भर की हैं, लेकिन इन कैलकुलेशन की दिक्कतों के वजह से ही इनकम टैक्स और अधिक 'सामजिक' हो पाता है और एक निम्नवर्गीय के ऊपर मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय की तुलना में अपेक्षाकृत कम भर पड़ता है.
- हर बजट में इनकम टैक्स का स्लैब और राशियां बदलती रहती हैं, लेकिन फिर भी एक बार आपको नीचे बताई गईं छः चीज़ें आ गईं तो इनकम टैक्स कैलक्यूलेशन में बस संख्याएं बदलने की जरूरतें पड़ेंगी.
इनकम टैक्स कैलकुलेट करना इसलिए मुश्किल है क्यूंकि ये ‘फ्लैट’ नहीं है. फ्लैट क्या होता है आइये समझें :- लेकिन इससे इतर भारत (और लगभग हर देश) में टैक्स के 'स्लैब', या हिंदी में कहें तो स्तर/श्रेणियां, हैं. यानी एक निश्चित राशी तक कुछ और टैक्स और उसके बाद कुछ और. नीचे हमने वर्ष 2017-18 के विभिन्न स्लैब दिए हुए हैं. और उनकी काल्पनिक 'फ्लैट टैक्स प्रणाली' से तुलना भी की है:कैलक्यूलेशन # 1:
स्लैब
सभी आय वार्षिक आधार पर हैं.
केवल टैक्स स्लैब ही दिक्कत नहीं है, टैक्स स्लैब में भी एक 'कैच' है. इस कैच को एक सिंपल से उदहारण से समझते हैं: ...लेकिन नहीं!कैलक्यूलेशन # 2:
एक 'कैच'
आपका टैक्स काटने के लिए आपको हर स्लैब से गुज़रना होगा. आइए बताते हैं कैसे – तो आपका टोटल टैक्स हुआ – 412,500 ( 12,500 + 100,000 + 300,000) न कि 600,000. तो कैलकुलेशन तो ज़्यादा करना पड़ा लेकिन पैसे काफी बच गए. नहीं?
ये भी गणित के हिसाब से तो दिक्कत है लेकिन इसका भी अन्य की तरह ही आर्थिक फायदा ही है. अब देखिए ढाई लाख वार्षिक आय पर तक तो आपको वैसे ही छूट मिल रही है. तो, 87 A का दायरा हो जाता है – ढाई से साढ़े तीन लाख तक.कैलक्यूलेशन # 3:
87 A रिबेट या छूट
- जिसकी आय तीन लाख होगी उसे भी 2,500 रूपये का रिबेट मिलेगा क्यूंकि तीन लाख आय वाले को अन्यथा इनकम टैक्स यूं देना पड़ता = (300,000 – 250,000)x5/100 = 2,500 (जब हमने दूसरी कैलक्यूलेशन डिस्कस की तो जाना कि ढाई लाख तक कोई टैक्स नहीं और बाकी पर पांच प्रतिशत)
- और, जिसकी आय तीन लाख पचास हज़ार होगी उसे भी 2,500 रूपये का रिबेट मिलेगा. क्यूंकि महत्तम 2,500 रुपए की छूट मिलती है.
उत्तर बहुत सिंपल है – तीन लाख पचास हज़ार तक की आय उसमें रखी गई है क्यूंकि उसके बाद यदि आपकी आय एक रुपया भी अधिक हुई तो 87 A के अंतर्गत एक रुपया भी इनकम टैक्स रिबेट नहीं मिलेगा. अब यदि तीन लाख स्लैब रखा जाता तो तीन लाख एक रुपए वाले को भी रिबेट नहीं मिलता. अभी कम से कम ढाई हज़ार ही सही, या तीन लाख के अमाउंट के ऊपर ही सही, रिबेट तो साढ़े तीन लाख तक की आय वालों को भी मिल रहा है न?
- यदि आपकी आय पचास लाख (वार्षिक) से कम है तो इस दिक्कत/कैल्क्यूलेशन को स्किप कीजिए. लेकिन यदि आपकी आय पचास लाख से अधिक है तो जो भी टैक्स बना ऊपर के चार कैल्क्यूलेशन के बाद उस टैक्स का दस प्रतिशत आपको और देना पड़ेगा. और यदि आपकी आय एक करोड़ से अधिक है तो आपको, जो भी ऊपर के चार कैल्क्यूलेशन के बाद टैक्स बना उस टैक्स का पन्द्रह प्रतिशत और देना पड़ेगा.कैलक्यूलेशन # 4:
सरचार्ज
सेस भी एक तरह का टैक्स ही है बस इसमें और टैक्स में अंतर यही होता है कि CESS (सेस) किसी विशेष प्रयोजन के लिए होता है और यदि उस विशेष प्रयोजन के लिए जितने रुपए चाहिए होते हैं उतने इकट्ठे हो जाएं तो CESS लिया जाना बंद हो जाता है.कैलक्यूलेशन # 5:
सेस!
ये सब आर्दश परिभाषाएं हैं, हम अपने कैलकुलेशन की तरफ लौटते हैं.
CESS गणितीय हिसाब से सबसे छोटी दिक्कत है. बस जो भी ऊपर के गुणा भाग से इनकम टैक्स बना आपका उसका तीन प्रतिशत सरकार को और दे दीजिए, तो सेस भी हो गया.
एक स्थिति पर गौर करें - यदि आपकी इनकम है पचास लाख तब आपको कुछ भी सरचार्ज नहीं देना लेकिन यदि आपकी इनकम हो गई पचास लाख दस रूपये तो पूरे टैक्स पर सरचार्ज हो गया 10 प्रतिशत यानी तनख्वाह बढ़ी दस रुपए और टैक्स बढ़ गया लगभग एक लाख पैंतीस हज़ार रूपये. तो इससे अच्छा तो आप अपने बॉस से कहोगे कि मेरी दस रुपया तनख्वाह बढ़ाओ ही मत (वो भी सालाना).कैलक्यूलेशन # 6:
मार्जिनल रिलीफ:
तो इस स्थिति से निपटने के लिए होता है - मार्जिनल रिलीफ. मतलब जब आप सरचार्ज के दायरे में आएं तो यह सुनश्चित करने के लिए कि जितनी आपकी इनकम बढ़ी उससे ज़्यादा कहीं आपका टैक्स न बढ़ जाए आपको मार्जिनल रिलीफ दिया जाता है, या टैक्स में छूट दी जाती है.
अंततः : ऊपर के सभी तरह के कैलक्यूलेशन्स में टैक्स रिबेट आदि को नहीं लिया गया है और केवल विशुद्ध इनकम टैक्स की बात की गई है. यदि आप 80C या इनकम टैक्स की ऐसी किसी अन्य धारा के अंतर्गत आयकर में छूट पाते हैं तो आपको उसी के अनुसार अपने कैलकुलेशन करने होंगे. लेकिन फिर भी ऊपर की छः गणनाओं से आपको पूरी सहायता मिलेगी.
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