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केसवानंद भारती नहीं रहे, जिनके केस ने याद दिलाया था कि सरकार संविधान से ऊपर नहीं हो सकती

केसवानंद भारती केस के बारे में सिविल सर्विसेज और कानून की पढ़ाई करने वाले ज़रूर पढ़ते हैं.

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केसवानंद भारती केस में 68 दिनों की सुनवाई के बाद 68 दिनों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल, 1973 को आज़ाद भारत का सबसे बड़ा फैसला सुनाया. फाइल फोटो
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स्वाति
6 सितंबर 2020 (अपडेटेड: 6 सितंबर 2020, 06:14 AM IST)
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सिविल सर्विसेज या कानून की पढ़ाई करने वाले एक चर्चित केस के बारे में ज़रूर पढ़ते हैं- केसवानंद भारती बनाम केरल राज्य. इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया था. इन्हीं केसवानंद भारती का 79 साल की उम्र में निधन हो गया. वो केरल के कासरगोड में इडनीर मठ के मुखिया थे. इस केस ने आज़ाद भारत को याद दिलाया कि संविधान किसी भी सरकार से ऊपर है.
केसवानंद भारती केस का किस्सा पढ़ा जाना चाहिए. ताकि सनद रहे. कि अदालतों का संविधान के लिए वफादार होना कितना जरूरी है. कि जब अदालतें सरकार के आगे घुटने टेक देती हैं, तो देश का कितना बुरा हाल होता है. कि देश के भले के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और मजबूत होना कितना जरूरी है. ये वो केस है, जिसे अगर इंदिरा जीत जातीं, तो शायद इस देश पर हमेशा के लिए कांग्रेस का राज हो जाता. ये किस्सा है केसवानंद भारती बनाम केरल सरकार केस का. सुप्रीम कोर्ट में 68 दिनों तक बहस चलती रही. और 68 दिनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने आजाद भारत के न्यायिक इतिहास का सबसे अहम फैसला सुनाया. वो तारीख थी- 24 अप्रैल, 1973.
क्या था केसवानंद भारती बनाम केरल सरकार का ये ऐतिहासिक केस
केरल सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए. इनकी मदद से सरकार केसवानंद भारती के इडनीर मठ के मैनेजमेंट पर कई सारी पाबंदियां लगाने की कोशिश कर रही थी. केसवानंद भारती ने सरकार की इन कोशिशों को अदालत में चुनौती दी. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया. आर्टिकल 26 भारत के हर नागरिक को धर्म-कर्म के लिए संस्था बनाने, उनका मैनेजमेंट करने, इस सिलसिले में चल और अचल संपत्ति जोड़ने का अधिकार देता है. केसवानंद भारती का कहना था कि सरकार का बनाया कानून उनके संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है. केसवानंद को बस केरल सरकार से नहीं लड़ना था. उनका मुकाबला केंद्र सरकार से था. केंद्र सरकार, जिसकी मुखिया थीं इंदिरा गांधी.
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इंदिरा गांधी चाहती थीं कि फैसला सरकार के पक्ष में हो. उन्होंने न्यायपालिका पर हावी होने, उसे छोटा करने की लगातार कोशिश की. आपातकाल लगाने के काफी पहले से इंदिरा गांधी का न्यायपालिका के साथ टकराव चल रहा था. उनके फैसलों को लगातार चुनौती दी जा रही थी. जितना ज्यादा ये हो रहा था, इंदिरा उतनी ही तानाशाह होती जा रही थीं.

सरकार और न्यायपालिका में पहले से ही तनाव था
इससे पहले आर सी कूपर, माधवराव सिंधिया और गोलकनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के खिलाफ फैसला सुनाया था. ये फैसले इंदिरा गांधी सरकार के तीन बड़े फैसलों के खिलाफ थे. पहला था बैंकों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ. दूसरा, भारत में मिले देसी रियासतों को दिए जाने वाला पैसों (प्रिवि पर्स) को बंद करने के खिलाफ. और तीसरा ये कि संसद संविधान में लोगों को दिए गए बुनियादी अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) में संशोधन नहीं कर सकती है. इन तीनों मामलों में सरकार के खिलाफ दलील दे रहे थे नानी पालखीवाला. मशहूर न्यायविद्. जब-जब भारतीय लोकतंत्र को बचाने वाले सबसे बड़े शूरमाओं का जिक्र होगा, तब-तब पालखीवाला का नाम लिया जाएगा. मगर इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में मनमाने संशोधन करके कोर्ट के इन फैसलों को अंगूठा दिखा दिया था. अगर केसवानंद भारती केस में सरकार हार जाती, तो ये सारे संशोधन भी बेमानी साबित होते. इसीलिए सरकार किसी भी कीमत पर इस केस को जीतना चाहती थी.
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जस्टिस एस एम सीकरी तब भारत के चीफ जस्टिस थे. उनके अलावा इस बेंच में 12 और जज भी थे. फैसला बंटा हुआ था. सात जज सरकार के फैसले के खिलाफ थे. छह जज इसके पक्ष में थे. जाहिर है, बहुमत जीता.

कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की सुनवाई के लिए 13 जजों की एक बेंच बनाई. इसकी अगुआई कर रहे थे तब के चीफ जस्टिस एस एम सीकरी. जब फैसला आया, तो जज बंटे हुए थे. सात एक तरफ. छह एक तरफ. फैसला सरकार के खिलाफ था. जिधर बहुमत था, उसका पक्ष फैसला बना. कि संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता है. संसद इसे किसी भी संशोधन से नहीं बदल सकती. बुनियादी ढांचे का मतलब है संविधान का सबसे ऊपर होना, कानून का शासन, न्यायपालिका की आजादी, संघ और राज्य की शक्तियों का बंटवारा, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभुता, गणतंत्रीय ढांचा, सरकार का संसदीय तंत्र, निष्पक्ष चुनाव वगैरह वगैरह. इसे 'बेसिक स्ट्रक्चर' थिअरी कहते हैं. जिन सात जजों की वजह से ये फैसला दिया गया, उनके नाम थे- CJI एस एम सीकरी, जस्टिस के एस हेगड़े, ए के मुखरेजा, जे एम शेलात, ए न ग्रोवर, पी जगमोहन रेड्डी और एच आर खन्ना. जो इसके खिलाफ थे, उनके नाम हैं- जस्टिस ए एन रे, डी जी पालेकर, के के मैथ्यु, एम एच बेग, एस एन द्विवेदी और वाई के चंद्रचूड़.
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राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी केस में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा के खिलाफ फैसला सुनाया. आधार था चुनावी धांधली. इंदिरा किसी भी कीमत पर सत्ता नहीं छोड़ना चाहती थीं. सरकार बचाने के लिए उन्होंने देश में आपातकाल लगा दिया. इंदिरा ने इमरजेंसी के दौरान एक से एक तानाशाही संशोधन किए. इन्हें बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया. अगर ऐसा न हुआ होता, तो देश में दिखावे का लोकतंत्र तक न बचता.

इंदिरा गांधी का 'गंदा' खेल ये वक्त आते-आते इंदिरा गांधी का रवैया बहुत तानाशाही हो चुका था. वो इस फैसले से बौखला गईं. वो किसी भी कीमत पर इसे पलटना चाहती थीं. जो छह जज फैसले के खिलाफ थे, उनमें से एक जस्टिस ए एन रे को चीफ जस्टिस बनाया गया. तारीख थी- 26 अप्रैल, 1973. ए एन रे CJI बनने की वरीयता में तीन जजों के पीछे थे. जस्टिस शेलाट, जस्टिस ग्रोवर और जस्टिस हेगड़े उऩसे ऊपर थे. और ये तीनों फैसले के पक्ष में थे. साफ था कि इसी वजह से उनको किनारे कर ए एन रे को CJI बना दिया गया. इसके बाद शुरू हुआ गंदा खेल. 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी केस में फैसला सुनाया. चुनावी धांधली और गड़बड़ी के आधार पर कोर्ट ने इंदिरा की चुनावी जीत को रद्द करने का फैसला दिया. इंदिरा अब पद पर नहीं रह सकती थीं. 25 जून, 1975 को अपनी सरकार बचाने के लिए इंदिरा ने इमरजेंसी लगा दी.
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जस्टिस ए एन रे सीनियॉरिटी में नीचे थे. इसके बावजूद उन्हें CJI बनाया गया. शायद इंदिरा को पहले से ही अंदाजा था. कि आने वाले समय में उनके सामने परेशानियां आ सकती हैं. CJI ए एन रे ने सरकार की तरफ से रिव्यू पिटिशन दायर किए बिना पुनर्विचार के लिए 13 जजों की एक बेंच बना दी. बाद में जब इस बात का खुलासा हुआ, तब CJI पर अपने साथी जजों का काफी दबाव बन गया. उन्हें ये बेंच भंग करनी पड़ी. इन्हीं वजहों से भारतीय न्यायपालिका में ए एन रे के नाम पर हमेशा के लिए दाग लग गया.

CJI तब CJI नहीं रहे, इंदिरा सरकार के 'आदमी' हो गए
इंदिरा को लगा, अपनी मनमानी के लिए ये सही समय है. उनके अटॉर्नी जनरल नीरेन डे 'बेसिक स्ट्रक्चर' वाले फैसले पर पुनर्विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. CJI मास्टर ऑफ द रोस्टर होता है. यानी कौन सा केस कौन सा जज सुनेगा, ये तय करने का सबसे अहम अधिकार CJI के पास होता है. इसी का फायदा उठाकर ए एन रे ने इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए एक 13 जजों की बेंच बनाई.
बिना रिव्यू पिटिशन के ही CJI ने पुनर्विचार बेंच बना दी
साफ था कि CJI इंदिरा सरकार का अजेंडा पूरा कर रहे हैं. एक बार फिर पालखीवाला सामने आए. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक दलील दी. उन्होंने कहा कि कोर्ट को अपना 'बेसिक स्ट्रक्टर' वाला फैसला नहीं पलटना चाहिए. कहते हैं कि पालखीवाला की ये बहस सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की सबसे प्रभावी, सबसे बेहतरीन दलीलों में से एक थी. शायद सबसे ऊपर थी. फिर पता चला कि इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए सरकार की ओर से कोई रिव्यू पिटिशन दायर ही नहीं की गई थी. बिना रिव्यू पिटिशन के CJI ने बेंच कैसे बना दी? ये बहुत बड़ा स्कैंडल था. बेंच के बाकी जजों ने सवाल उठाया. CJI के ऊपर अपने साथी जजों का काफी दबाव था. इसी दबाव के कारण 12 नवंबर, 1975 को CJI को बेंच भंग करनी पड़ी. अगर ऐसा न हुआ होता, तो सरकार को संविधान के बुनियादी ढांचे में भी मनमाना बदलाव करने की छूट मिल जाती. इस 'बेसिक स्ट्रक्चर थिअरी' ने भारतीय लोकतंत्र को बचाया.
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नानी पालखीवाला ने इस केस में जो दलीलें दीं, उसे आजाद भारत के न्यायिक इतिहास की सबसे बेहतरीन दलील माना जाता है. वो सरकार के खिलाफ दलील दे रहे थे. हम सबको पालखीवाला का नाम याद रहना चाहिए. हमारे लोकतंत्र को बचाने में इस इंसान ने जो किया, उसके लिए हमें उनका एहसानमंद होना चाहिए.

इंदिरा ने कैसे तानाशाही वाले संशोधन किए
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सरकार ने कई संशोधन किए. 39वां संशोधन, जिसके मुताबिक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर और प्रधानमंत्री के चुनाव को किसी भी तरह की चुनौती नहीं दी जा सकती है. भले ही चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई हो. इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस में इंदिरा के चुनाव को चुनौती दी गई थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस केस में इंदिरा के खिलाफ फैसला सुनाया था. वो मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पेंडिंग था. जाहिर था, इंदिरा ने ये संशोधन खुद को बचाने के लिए किया था. 41वां संशोधन. जिसके मुताबिक राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपालों के खिलाफ किसी भी तरह का केस दर्ज नहीं हो सकेगा. न उनके कार्यकाल के दौरान, न कार्यकाल खत्म होने के बाद.
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केसवानंद भारती बनाम केरल सरकार का ये केस याद रखा जाना चाहिए. इसे स्कूल-कॉलेज के सिलेबस में नत्थी कर दिया जाना चाहिए. ताकि हर किसी को मालूम रहे. कि सरकार का काम संविधान के मुताबिक देश को चलाना है. उसे मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती है. किसी को भी तानाशाह होने की, सबसे ताकतवर होने की छूट नहीं दी जा सकती है. देश की भलाई इसी में है कि सरकार और न्यायपालिका जैसी संस्थाएं अपने-अपने हिस्से का काम ईमानदारी से करें. बिना एक-दूसरे पर हावी हुए.

ये इतिहास हमारा सबक है इन सब संशोधनों को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने गैर-संवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया. ये संविधान का 'बेसिक स्ट्रक्चर' वाला फैसला ही था, जिसकी वजह से ये मुमकिन हो पाया. वरना तो सोचिए क्या होता? सरकारें कुछ भी करतीं और उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता था. इन संवैधानिक पदों पर बैठा इंसान कितना भी बड़े से बड़ा अपराध कर जाए, लेकिन उसे सजा नहीं होती. अगर संसद सच में संविधान के मूल ढांचे से ज्यादा ताकतवर मान ली जाती, तो हर आने वाली सरकार को अपनी मनमानी चलाने का हक मिल जाता. सब अपने हिसाब से, अपनी सहूलियत के हिसाब से संशोधन करते रहते. लोकतंत्र बस नाम का लोकतंत्र रहता. हम में से हर किसी को ये फैसला, ये पूरा घटनाक्रम याद रखना चाहिए. कहते हैं. जो मुल्क अपने इतिहास से सबक सीखता है, वो ही अपना भविष्य बेहतर बना पाता है. केसवानंद भारती बनाम केरल सरकार हमारा सबक है.


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