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वो हीरोइन, जो कांग्रेस राज में जेल में रोया करती थी

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25 जून.1975. देश में पहली और आखिरी बार इमरजेंसी लगी. मुनादी पिट गई. बिना आवाज किए. कि अब राज कांग्रेस का नहीं. इंदिरा गांधी का नहीं. उनके सपूत संजय गांधी का. जो खाता न बही. जो संजय कहें. बस वही और उतना ही सही. बची खुची खुरचने के लिए चापलूस थे.

जो हरकतें हुईं. उन्हें पढ़कर तारीख शरम कर जाए. मगर अफसोस भर से क्या होगा. जो कुछ सबक न लिए. तो आज इसकी बरसी पर ये छह किस्से पढ़ें. देखें. सुनें. और याद करें. कि हर चुप्पी जुल्मी का लहू बढ़ाती है. और हर आवाज उसे हिलाती है.

1. इमरजेंसी के कुछ रोज बाद की बात. दूरदर्शन और आकाशवाणी युवा नेता संजय गांधी की ठीक से कवरेज नहीं कर रहा था. मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को मैडम के घर बुलाया गया. पर मिले संजय और उनके गुर्गे. मंत्री जी को हौंकने की कोशिश हुई. पढ़ा-लिखा खुद्दार आदमी. बिदक गया. पलटकर बोला. तमीज से पेश आइए मिस्टर. आपकी मम्मी की कैबिनेट का मंत्री हूं. उनके बुलावे पर आया हूं.

बुलावा आ गया. रुखसती का. गुजराल गए और विद्या चरण शुक्ल आए. पापा एमपी के सीएम रहे थे. भाई भी. यानी चम्मच क्या फर्श भी चांदी का. उन्हें पता था. सिंहासन के पाए कैसे चमकाए जाते हैं सूबेदारी बचाने के लिए. बिछ गए. मगर कालीन नहीं कंगूरों पर नजर जाती है. इसलिए गुजराल की हिम्मत याद आती है. विद्या की महीन हंसी, महंगे सफारी सूट और पाइप से उठता धुंआ नहीं.


2. एक औरत थी. बहुत काबिल. फिल्मों में हीरोइन बनती थी. स्नेहलता नाम था. सिर्फ पुतला नहीं थी. दिमाग थी. इसलिए जानती थी. इंदिरा राज देश को तबाह कर रहा था. लोहिया की चेली थी. समाजवाद की वकील. इमरजेंसी का विरोध कर रही थी. उठाकर जेल में डाल दिया सरकार के कारिदों ने. इल्जाम. बड़ौदा डायनामाइट केस में मदद का. ये केस लादा गया था जॉर्ज फर्नांडिस पर. कागज ही कागज थे. जॉर्ज का तो कुछ पता नहीं था. तो उन्हें घेरने के लिए साथ वालों को लपेट लिया गया.

बेंगलुरु जेल में थी स्नेहलता. रात रात भर चीखती. इतना टॉर्चर. राजनीतिक बंदियों सी सहूलियत नहीं. बहुत बीमार पड़ गई. फेफड़े सड़ गए. जब छोड़ी गई तो लाश होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा था. उसी जेल में अटल और आडवाणी भी बंद थे. आवाजें सुनते थे और बेबसी की सांस लेते थे. स्नेहलता ने ये काम ज्यादा दिन तक नहीं किया. मर गई. वैसे ही, जैसे हजारों मरे थे. ज्यादातर के नाम नहीं थे. वे भारत भाग्य विधाता के झुनझुने की आवाज सुनने में मगन तंत्र के लिए हवा भर थे.


3. सैफ अली खान. उनकी पहली बीवी. अमृता सिंह. उनकी मम्मी. रुखसाना सुल्तान. दिल्ली की सोशलाइट. बड़ों के बीच उठना. बैठना. सलीका.

70 के दौर में संजय के करीब आईं. उनकी प्रेरणा से यूथ कांग्रेस का काम करने लगीं. मुसलमानों की बस्ती में अलख जगाना. महंगी कार से उतर. शिफॉन की साड़ी का आंचल संभाल. पर्ल के मोतियों के बीच मुस्कुराते हुए. मलिन बस्तियों में.

मगर ये बस्तियां मोतियों की इज्जत करना नहीं जानती थीं. इसलिए इन्हें मर जाना चाहिए था. ये तय किया संजय गांधी ने. उन्हें पसंद नहीं आया. कि सुंदर जामा मस्जिद के बाहर फूहड़ गरीब इंसानों की झुग्गियां नजर आएं. डीडीए उपाध्यक्ष जगमोहन को इशारा हुआ. बुलडोजर पहुंच गए. लोगों को लगा, लोकशाही है. विरोध करने लगे. मिली गोलियां. बने लाशें. जो बचे. वो भागे. जो पकड़े गए. उन्हें ट्रकों में ठूंस यमुना पुश्ता में फेंक दिया गया. टीन की छतों के नीचे. सड़ने को. मरने को. पतित पावनी गंगा की बहन. यम की बहन. यमुना के पास. पूरी मुक्ति.


4. किशोर कुमार को लगता था कि वो फकीर है. उसे नहीं पता था. अब देश में अनुशासन पर्व लागू हो चुका है. ये भी एक संत के ही बोल थे. बिनोवा भावे. इंदु बेटी के पिता तुल्य. बेटी के बेटे संजय के गुर्गे चाहते थे. ये तो फर्जी सितारे हैं. सत्ता के सामने कोर्निश करें. ज्यादातर ने की. दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन वगैरह.

खांडवा का लाल अड़ गया. नहीं करेंगे. नहीं गाएंगे. यूथ कांग्रेस की रैली में. क्या कर लोगे. वही. जो खिसियानी हुकूमत को आता है. बैन. किशोर कुमार बैन. रेडियो पर बैन. टीवी पर बैन.


5. मौसम की कला और विज्ञान बिगड़ चुके थे. इस रात की सुबह नजर नहीं आ रही थी. लेकिन वो आ गई. एक दिन. अचानक. बिना बताए. ये बताया देश को. कुलदीप नैयर नाम के पत्रकार ने. एक पार्टी में थे वो. आईबी का पुरानी पहचान वाला अफसर आया. जानता था. नैयर सरकारी कलमगो नहीं. बोला. आदेश आया है. हालात पता किए जाएं. लोग कांग्रेस से कित्ते खुश हैं. नैयर भांप गए. कुछ देर में कमल नाथ से मिले. संजय गांधी की अंदरूनी कोटरी का हिस्सा. नैयर ने दाग दिया. बिना तैयारी के सवाल. चुनाव कब हैं. नाथ बोले, आपको किसने बताया. यानी खबर कनफर्म थी.

नेता छूटे. नेहरू की बेटी दुनिया भर में हो रही थू थू से परेशान थी. या उसे ये गलतफहमी थी कि जनता अभी भी उन्हें ही मानती है. हो तो ये भी सकता है कि जनता की चुप्पी और विपक्ष की कमजोरी को उन्होंने आला लगाकर बड़ा कर लिया. हालांकि साहबजादे अभी भी लाठी राज में ही भरोसा कर रहे थे.

खैर. इमरजेंसी हटी. चुनाव हुए. लोगों ने इंद्री बचाने के लिए इंदिरा को विदा कर दिया.


6. एक नेता का मुकाबला कैसे हो. नेतागीरी से. रैली का. जवाबी रैली से. भाषणों से. बयानों से. कार्यक्रमों से. मगर तब क्या हो. जब एक नेता के भाषण की काट के लिए एक हीरोइन की बिकिनी का सहारा लिया जाए. ऐसा ही हुआ. संजय राज का एक और उज्जड कारनामा.

मार्च 1977. विरोधी दल के नेताओं ने तय किया. दिल्ली में साझी रैली की जाए. इतवार का दिन. सरकार ने तय किया. दूरदर्शन पर बॉबी दिखाई जाए. जवानों की सुपरहिट लव स्टोरी. जिसमें गाने थे. और एक कमसिन हीरोइन की बिकिनी थी. राज कपूर की खूबसूरत सनसनी.

तो एक तरफ डिंपल की बिकिनी औऱ दूसरी तरफ बातों से जादू पैदा करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी. रामलीला मैदान खचाखच भरा था. बारिश के बावजूद. रात 9 बजे अटल की बारी आई. और जो उन्होंने बोला तो आसमां में लिख गया. सिंहासन खाली करो कि जनता आती है. तालियां थीं कि रुक नहीं रही थीं.

वाजपेयी की पंक्तियां ये थीं.

बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने

कहने सुनने को बहुत हैं अफसाने

खुली हवा में जरा सांस तो ले लें

कब तक रहेगी आजादी कौन जाने.

तो आपको और मुझे ये आजाद देश मुबारक. बोलने की आजादी बचाकर रखें. ये जाएगी तो गुलाम बनते देर नहीं लगेगी. अपने ही तंत्र का. नाम तब भी लोकतंत्र ही होगा.

और अब देखें ये वीडियो. इमरजेंसी के किस्से. सौरभ द्विवेदी की जुबानी.


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