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'अच्छी नस्ल' के नाम पर जापान में हजारों विकलांगों की हुई थी नसबंदी, दशकों बाद अब मिला न्याय

जापान की आला अदालत ने देश के Eugenics Law को असंवैधानिक क़रार दिया है और सरकार को निर्देश दिए हैं कि पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए. जापान की सरकार ने स्वीकार किया है कि बिना सहमति के 16,500 नसबंदी ऑपरेशन किए गए थे. पीड़ितों में नौ साल के बच्चे भी थे.

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राजधानी टोक्यो में सुप्रीम कोर्ट के बाहर क़ानून के पीड़ित. अपने वकील और समर्थकों के साथ. (फ़ोटो - एजेंसी)
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9 जुलाई 2024
Updated: 9 जुलाई 2024 22:39 IST
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जापान में 50 के दशक से लेकर 90 के दशक तक एक क़ानून था. इसके तहत 16,500 विकलांगों की जबरन नसबंदी कर दी गई थी. पीड़ितों ने दशकों तक लड़ाई की, और अब जाकर कुछ के हिस्से ‘न्याय’ आया है. जापान की आला अदालत ने देश के यूजेनिक्स क़ानून (Japan Eugenics Law) को असंवैधानिक क़रार दिया है और सरकार को निर्देश दिए हैं कि पीड़ितों को मुआवज़ा दिया जाए.

इसीलिए, आज समझेंगे जापान में ये क़ानून आया कैसे, इसके पीछे क्या विचार था, दुनिया भर में इस प्रथा के क्या सुराग़ मिलते हैं.

यूजेनिक्स मतलब?

जैसे रेस में दौड़ने वाले घोड़ों की या कॉम्पटीशन में हिस्सा लोने वाले कुत्तों की एक ख़ास तरह से ब्रीडिंग करवाई जाती है, उसी तरह कुछ लोगों का विचार है कि इंसान की भी नस्ल 'अच्छी' हो, इसके लिए ख़ास तरह से ब्रीडिंग करवाई जाए. इस विचार और प्रथा के लोग दावा करते हैं कि जेनेटिक्स और विरासत के वैज्ञानिक नियमों में हेरफेर कर के लोगों को 'परफ़ेक्ट' बनाया जा सकता है.

साल 1883 में ब्रिटिश खोजकर्ता और प्राकृतिक वैज्ञानिक फ्रांसिस गॉल्टन ने इस शब्द की ईजाद की थी. वो चार्ल्स डार्विन के 'प्राकृतिक चयन' (natural selection) वाले सिद्धांत से प्रभावित थे, और उन्होंने यहीं से तुर्रा निकाला कि अगर प्रकृति ख़ुद सबसे फ़िट को चुन रही है, तो सबसे फ़िट बनाया भी जा सकता है. ऐतिहासिक तौर पर ये प्रथा नस्लवाद और भेदभाव का सबब बनी है. 'वांछनीय' गुणों वाले लोगों को और बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, वहीं औरों को बच्चा न पैदा करने के निर्देश दिए जाते थे, नीतियां बनाई जाती थीं. फिर समय के साथ सत्ता में बैठे लोग तय करने लगे कि कौन से लक्षण 'अच्छे' हैं, कौन से 'बुरे'. ग़रीब, शारीरिक अपंगता या मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों को टारगेट किया जाने लगा.

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तब जेनेटिक्स समझने वाला विज्ञान भी इतना आधुनिक नहीं था. धीरे-धीरे लोगों को इसके पीछे के पाखंड का एहसास हुआ. आज की तारीख़ में यूजेनिक्स को अनैतिक ही माना जाता है. हालांकि, जेनेटिक्स पर खोज जारी है और इसमें कई ऐसे धाराएं हैं, जो अमुक बीमारी के लिए सेलेक्टिव ब्रीडिंग को एक इलाज के तौर पर देखती हैं.

जापान में यूजेनिक्स

यूरोप से निकलकर अमेरिका, फिर पूरी दुनिया में इस विचार/प्रथा को शह मिली. 1880 के उत्तरार्ध में जापान के यमातो समुदाय में ‘शुद्ध ख़ून’ की अवधारणा प्रचलित होने लगी थी. फिर 20वीं सदी की शुरुआत आते-आते मुल्क की राजनीति, स्वास्थ्य क्षेत्र और सामाजिक आंदोलनों में यूजेनिक्स चर्चा का मौज़ू बन गया. 'शुद्ध ख़ून' बनाम 'मिश्रित ख़ून' की धारणा चल पड़ी. समाज में अपनी जड़ें जमाने लगी.

समाज में चर्चा हुई, तो सत्ता ने इस विचार को अपनाया. नीतियां बनीं. पहले 1938 में ‘रेस यूजेनिक प्रोटेक्शन लॉ’ का प्रस्ताव रखा गया. मगर वो रिजेक्ट हो गया. फिर 1940 में ‘नैशनल यूजेनिक लॉ’ पारित किया गया. 1940 से 1945 के बीच इस क़ानून के तहत 454 जापानियों की नसबंदी की गई. एक तरफ़, ये क़ानून था. दूसरी तरफ़, आबादी में ‘बुद्धिमान या श्रेष्ठ तत्वों’ वालों को ये प्रोत्साहन दिया जा रहा था कि वो ख़ूब बच्चे पैदा करें.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद - 1948 में - जापानी सरकार ने नैशनल यूजेनिक प्रोटेक्शन क़ानून लागू कर दिया. लगभग 25,000 लोगों की जबरन सर्जरी करवाई गई. उन्हें ‘हीन’ माना गया, इसीलिए उनसे बच्चा पैदा करने का अधिकार छीन लिया गया. पिछले साल जून में प्रकाशित एक संसदीय रिपोर्ट के मुताबिक़, पीड़ितों में नौ साल के बच्चे भी थे. जब उनकी सर्जरी करवाई जा रही थी, तब उनमें से ज़्यादातर शारीरिक और मानसिक तौर पर विकलांग थे.

japan eugenics victims
जापान के विकलांग बच्चे. (फ़ोटो - मिंट प्रेस न्यूज़)

क़ानून को 1996 में निरस्त कर दिया गया था. सहमति या जानकारी के बिना नसबंदी को मजबूर हुए पीड़ितों ने देश की अलग-अलग अदालतों का रुख किया. सालों तक मुक़दमे चलते रहे. जापान टाइम्स के अनुसार, 39 लोगों ने 12 ज़िला न्यायालयों और उनकी शाखाओं में इसी से संबंधित केस दायर किए थे. उनमें से छह लोगों की मृत्यु हो चुकी है.

सरकार ने क्या किया? कोर्ट ने क्या कहा?

जापान की सरकार ने स्वीकार किया है कि बिना सहमति के 16,500 नसबंदी ऑपरेशन किए गए थे. शुरू में तो सरकार का तर्क था कि पीड़ित मुआवज़ा नहीं मांग सकते, क्योंकि अब क़ानून नहीं है और बहुत समय बीत चुका है. 

सालों के मुक़दमेबाज़ी के बाद 2019 में सरकार ने माफ़ी मांगी. साथ ही क़ानून के पीड़ित हर व्यक्ति को 3.2 मिलियन येन (~16.5 लाख रुपये) का एकमुश्त मुआवज़ा देने के लिए विधेयक पारित किया. कुछ पीड़ितों को हर्ज़ाना दिया भी गया. लेकिन उनमें से कुछ ने लड़ाई जारी रखी, क्योंकि उन्हें लगता था कि और मुआवज़ा मिलना चाहिए. इनके अलावा 8,500 और लोग बीच में फंसे हुए हैं. अफ़सर कहते हैं कि उन्होंने सहमति दी थी. पीड़ितों के वकील कहते हैं कि उन्हें मजबूर किया गया था.

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इस पूरे मसले पर अदालतें असमंजस में रहीं. जापान में केस की समय सीमा को लेकर प्रावधान हैं. उसी की वजह से गरारी अटकी हुई थी. कई पीड़ित अपना केस इसी वजह से हार भी गए. फिर 2022 में ओसाका के हाई कोर्ट ने 55 मिलियन येन (2.84 करोड़ रुपये) मुआवज़ा देने का निर्देश दिया. साथ में ये भी कहा कि इस मामले में समय सीमा वाले प्रावधान को मानना न्यायसंगत नहीं होगा.

बीती 3 जुलाई को जापान की सुप्रीम कोर्ट ने पांच संबंधित मुक़दमों पर फ़ैसला सुनाया. समय सीमा वाले नियम को ख़ारिज किया और पीड़ितों को दिए गए 3.2 मिलियन येन को ‘बहुत कम’ बताया. सरकार को निर्देश दिए कि पीड़ितों को 16.5 मिलियन येन (85 लाख रुपये) और उनके जीवनसाथी को 2.2 मिलियन येन (11 लाख रुपये) का भुगतान करें. 

और दुनिया में क्या हाल है?

जापान के अलावा जर्मनी, स्वीडन, अमेरिका और यहां तक ​​कि भारत में भी ‘अनैच्छिक नसबंदी’ के लिए कार्यक्रम चलाए गए हैं. 

20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप में यूजेनिक्स की पकड़ बन रही थी. कई ​​प्रमुख वैज्ञानिक और नीति विशेषज्ञ जबरन नसबंदी और विवाह प्रतिबंध जैसे ‘उपायों’ की वकालत कर रहे थे. नाज़ी जर्मनी ने तो इस प्रैक्टिस को अपने चरम और सबसे भयावह स्तर पर अपनाया. अडॉल्फ़ हिटलर के राज में ‘मास्टर रेस’ के मुग़ालते ने साठ लाख यहूदियों का नरसंहार कर दिया.

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आज की तारीख़ में आधुनिक यूजेनिक्स (नियो-यूजेनिक्स) में जेनेटिक इंजीनियरिंग, प्रसव-पूर्व जांच (prenatal screening) और प्रजनन तकनीकों के इर्द-गिर्द नैतिक बहसें हो रही हैं. कुछ लोगों का तर्क है कि ये प्रगति का संकेतक है और इससे जेनेटिक बीमारियों को रोका जा सकता है. वहीं, और लोग कहते हैं कि इससे नई तरह का भेदभाव और ग़ैर-बराबरी पैदा हो जाएगी.

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