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भारतीय भिक्षु ने कैसे जापान को हमेशा के लिए बदल दिया?

बोधिसेना 8 वीं सदी की शुरुआत में मदुरई से जापान पहुंचे थे.

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मदुरई से चीन और जापान की यात्रा करने वाले बोधिसेना ने जापान में बौद्ध धर्म को फैलाया (सांकेतिक तस्वीर: tibetanspirit.com)
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कमल
23 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 19 अगस्त 2022, 09:24 PM IST)
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साल 2000 की बात है. आज यानी 23 अगस्त की तारीख थी. राष्ट्रपति के आर नारायणन ने जापान के प्रधानमंत्री योशिरो मोरी का भारत में स्वागत किया. जापान का कोई प्रधानमंत्री 10 साल भारत आया था. भारत जापान संबंधों (India Japan History) के नजरिए से ये काफी अहम दौरा था. यूं तो भारत और जापान के रिश्ते 1947 के बाद मधुर रहे थे, लेकिन 1998 में पोखरण परिक्षण के बाद जापान ने भारत पर इकोनॉमिक सैंक्शन लगा दिए थे. 2000 में योशिरो मोरी की दौरे के बाद रिश्ते दुबारा सुधरे. और 2005 के बाद जापान दूसरा ऐसा देश बन गया जिसके साथ भारत हर साल वार्षिक शिखर सम्मलेन करता है. पहला देश रूस था, जिसके साथ वार्षिक शिखर सम्मलेन की शुरुआत साल 2000 में हुई थी.

जापान और भारत के रिश्तों में कई अहम पड़ाव रहे हैं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस और INA के जापान के साथ रिश्ते हों या स्वामी विवेकानंद की यात्रा, इतिहास में काफी ऐसे मोड़ आए हैं, जो भारत और जापान को नजदीक लाते हैं. 1893 में विश्व धर्म कांग्रेस में भाग लेने के लिए स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए तो पहले जापान में रुके थे. इस विजिट के दौरान अपने खतों में वो लिखते हैं,

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आज हम बात करने वाले हैं जापान और भारत के रिश्तों की. लेकिन आधुनिक इतिहास में नहीं बल्कि उससे बहुत-बहुत पहले, 7 वीं सदी की, जहां भारत जापान रिश्तों के पहले निशान मिलते हैं. तब भारत से चला एक बौद्ध भिक्षु जापान पहुंचा और उसने सबसे पहले बुद्ध की आंखें खोली. क्या है पूरी कहानी, चलिए जानते हैं.

मदुरई से चीन 

कहानी की शुरुआत होती है 8 वीं सदी से. मदुरई तब पांड्य राजाओं की राजधानी हुआ करता था. कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में इसे दक्षिण की मथुरा लिखते हैं. पाण्ड्य राजवंश का विशाल साम्राज्य धनधान्य से भरपूर था. लेकिन 20-22 साल के बोधिसेना का दिल मदुरई में नहीं था. हालांकि इस विलासिता से ऊबकर ही वो शाक्य मुनि की शरण में गया था. लेकिन अब आगे की यात्रा करनी थी.

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बोधिसेना (तस्वीर: https://japan-forward.com )

कहानी कहती है कि एक रोज़ मंजुश्री उसके सपने में आए और कहा, वुटाई की पहाड़ पर जाओ, वहां मैं तुमसे मिलूंगा. बौद्ध धर्म के महायान स्कूल में मंजुश्री को सर्वोच्च बुद्धिमता का प्रतीक माना जाता है जो अलग-अलग रूपों में धरती पर पैदा होते हैं. जैसे ही बोधिसेन को ये स्वप्न आया वो अपने रास्ते पर निकल गया. माउंट वुटाई चीन में था. इसलिए बोधिसेना ने समंदर का रास्ता पकड़ा और एक नाव बैठकर मेलशिया-फिलीपींस के रास्ते माउंट वुटाई तक पहुंच गए. यहां पहुंचकर बोधिसेना को पता चला कि मंजुश्री ने दोबारा जन्म लिया है लेकिन जापान में. चीन में तब बुद्ध धर्म का खूब प्रचार प्रसार हो चुका था. इसलिए बुद्ध धर्म की दीक्षा देते हुए बोधिसेना यूं ही विचरने लगे. 

कुछ साल बाद, लगभग 730 ईस्वीं में वो टैंग साम्राज्य की राजधानी चांग आन पहुंचे. यहां बोधिसेना की मुलाकात एक जापानी राजदूत से हुई जो खुद बौद्ध धर्म में दीक्षित था. उसने जापान के सम्राट की ओर से बोधिसेना को जापान आने का न्योता दिया. एक लम्बी समुद्री यात्रा के बाद बोधिसेना जापान के नानिवा तक पहुंचे, आज इस जगह का नाम ओसाका है. बहरहाल नानिवा में बोधिसेना की मुलाक़ात ग्योकी नाम के एक बौद्ध भिक्षु से हुई. 

मंजूश्री और बोधिसेना

चार्ल्स एलियट नाम के एक लेखक हैं. जापानी बुद्धिज़्म नाम की एक किताब में एलियट लिखते हैं कि अगस्त 736 में ग्योकि और बोधिसेना की मुलाक़ात हुई. और दोनों ने एक दूसरे को देखते ही पहचान लियाा. तब के शाही दस्तावेज़ बताते हैं कि ग्योकि ने बोधिसेना को देखते ही एक कविता गाई. हिंदी में तर्जुमा कुछ इस प्रकार है, 

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तब बोधिसेना ने जवाब दिया, 

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कहने का अर्थ है कि ग्योकि ने बोधिसेना से कहा कि दोनों पिछले जन्म में गौतम बुद्ध के शिष्य थे. और बोधिसेना ने जवाब दिया कि ग्योकि ही मंजूश्री का पुनर्जन्म हैं. 
इसके बाद ग्योकि बोधिसेना को अपने साथ नारा ले गए. जो तब जापान के सम्राट शोमू की राजधानी हुआ करती थी. सम्राट खुद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे. उन्होंने बोधिसेना का स्वागत किया, उनके रहने की व्यवस्था करवाई. अब देखिए बोधिसेना के आने का जापान पर क्या असर हुआ?

शिंटो धर्म और बुद्ध धर्म 

जापान में तब बौद्ध धर्म को आए दो ही सदी हुई थीं. बुद्ध के अनुयायी कम संख्या में थे और जापान का पारम्परिक शिंटो धर्म मुख्यधारा का धर्म हुआ करता था. जिसमें माना जाता है कि सभी चीजों में एक पवित्र आत्मा होती है, जिसे कामी कहा जाता है. बहरहाल जापान के पड़ोस यानी चीन में बौद्ध धर्म खूब फ़ैल रहा था, और इसी का थोड़ा बहुत असर जापान पर भी दिखने लगा था. सम्राट शोमू बुद्ध धर्म के अनुयायी थे और उनके राजा बनने के बाद बुद्ध भिक्षुओं को राजदरबार में ऊंचे ओहदे, गवर्नरशिप मिलने लगी. ये बात जापान के अभिजात वर्ग को पसंद नहीं थी. वो नहीं चाहते थे कि उनका राजा शिंटो परंपरा से भटके. इसी के चलते सम्राट शोमू और शिंटो सरदारों में तनातनी होने लगी. 

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ग्योकि जिन्हें मंजूश्री का पुनर्जन्म माना जाता है (तस्वीर: Wikimedia Commons/jnn) 

इसी बीच दो घटनाएं हुई. साल 735 ईस्वीं में जापान में चेचक की महामारी फ़ैली और एक तिहाई आबादी ख़त्म हो गई. ये महामारी नारा तक भी पहुंची. और राजपरिवार के कई लोगों को अपने साथ ले गई. राजा की सुप्रीम काउंसिल के 10 में से 4 लोग भी इस बीमारी से मारे गए. ये सभी लोग फुजिवारा वंश से आते थे. जो जापान का एक ताकतवर परिवार था. नियम था कि जापान के सम्राट की शादी इसी वंश से होगी. साथ ही सुप्रीम काउंसिल के 4 पदों पर फुजिवारा वंश के लोगों का अधिकार था. इस सिस्टम के तहत ये पक्का किया जाता था की सम्राट पर फुजिवारा वंश का चेक करे.  

ट्रिविया- द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के सम्राट का नाम हिरोहितो था. इन हिरोहितो से पहले तक जापान के हर सम्राट की शादी फुजिवारा वंश की लड़की से ही होती थी.

कुल मामला ये था कि फुजिवारा वंश राज परिवार में अच्छा ख़ासा दखल रखता था. लेकिन ये लोग शिंटो धर्म के अनुयाई थे. और नहीं चाहते थे कि बौद्ध धर्म ताकतवर हो. जबकि सम्राट शोमू पूरे जापान में बुद्ध धर्म फैलाना चाहते थे. इसलिए जैसे ही उनके सुप्रीम काउंसिल के 4 फुजिवारा सरदारों की मौत हुई, उन्होंने उन पदों पर दूसरों को रख दिया. ये फुजिवारा वंश के लिए अपमान की बात थी. 

जापान में बगावत 

उसी दौर में एक और चीज हुई. गेंबो नाम का एक बौद्ध अनुयायी राजदरबार का खासमखास था. उसने चीन जाकर बुद्ध सूत्रों को संकलित किया था और जापान लेकर आया था. साथ ही जब चेचक फैला तो उसने सम्राट की मां की जान मन्त्र तंत्र से बचाई थी, ऐसा सम्राट का मानना था. इसी के चलते वो कुछ ही सालों में शोमू के दरबार में काफी ताकतवर हो गया था. एक दिन यूं हुआ कि गेंबो ने एक महिला से प्रणय निवेदन किया. ये महिला एक फुजिवारा सरदार ‘हिरोतसुगु’ की पत्नी थी. जैसे ही हिरोतसुगु को पता चला उसने शोमू से शिकायत की. लेकिन गेंबो ने उल्टा इल्जाम लगाकर उसका ही तबादला करवा दिया. 

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सम्राट शोमू और हिरोतसुगु की बगावत (तस्वीर: Wikimedia Commons)

फुजिवारा वंश पहले ही नाराज था. इसलिए इस घटना से आहात होकर हिरोतसुगु ने बगावत कर दी. सम्राट शोमू इस बगावत को दबाने में तो सफल हो गए, लेकिन उन्हें समझ आ गया कि देश को एक करने के लिए कुछ करना होगा. उन्होंने गेंबो को भी सजा दी और उसे राजधानी से बाहर भेज दिया. अब तक देश बारूद के ढेर पर खड़ा हो चूका था. जनता के एक बड़े तबके को लगने लगा था कि सम्राट बौद्ध बौद्ध भिक्षुओं के हाथ ही कठपुतली बन चुका है. साथ ही शिंटो सरदार ये बात फैलाने में लगे थे कि शिंटो धर्म से अलग होने के चलते ही देवताओं का प्रकोप हुआ है और देश में चेचक फैला है. 

तो इसी सब राजनैतिक उठापठक के बीच बोधिसेना का जापान में आगमन हुआ. सम्राट शोमू इस चिंता में थे कि देश को एक कैसे किया जाए. इसके लिए बड़ा जरूरी था कि शिंटो और बुद्ध धर्म में मतभेद दूर किए जाएं. और इसके लिए एक ऐसे प्रामणिक व्यक्ति की जरुरत थी जिसकी बात दोनों धर्मों के लोग सुने. सम्राट शोमू को लगा कि इस काम के लिए ग्योकि सबसे सही व्यक्ति हैं. आपको याद होगा कि जब बोधिसेना पहुंचे तो उनकी पहली मुलाकात ग्योकि से हुई थी. अब ये ग्योकि जो थे, वो बड़े धर्मात्मा टाइप के इंसान थे. उन्होंने नारा के किसानों को भरपूर मदद की थी और दान धर्म के लिए भी जाने जाते थे. यानी शिंटो जनता में उनकी छवि अच्छी थी. और उनकी कही बात का वजन था.  लेकिन बुद्ध धर्म का क्या? वो ग्योकि की बात क्यों सुनते?

बोधिसेना ने बुद्ध की आंखें खोलीं 

यहीं पर बोधिसेना ने एक बड़ा असर डाला. वो संस्कृत के ज्ञाता थे, साथ ही बुद्ध की धरती से आए थे. इसलिए जब उन्होंने कहा कि ग्योकि मंजूश्री के अवतार हैं तो बौद्ध लोगों में ग्योकि की परमाणिकता तय हो गई. इसके बाद ग्योकि जंगल में ध्यान करने चले गए. और लौटकर उन्होंने बुद्ध धर्म को एक नई परिभाषा दी, जिसमें शिंटो धर्म के तत्व भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि वायरोचना बुद्ध और अमातेरासु देवी की पूजा साथ-साथ की जा सकती है. शिंटो धर्म में अमातेरासु को सूर्य की देवी माना जाता है. 

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टोडाजी बौद्ध मंदिर (तस्वीर: Wikimedia Commons)

इसके बाद ग्योकि ने सम्राट से कहा कि वो बोधिसेना की देखरेख में एक बौद्ध टेम्पल का निर्माण करें. इसके बाद नारा में टोडाजी टेम्पल का निर्माण शुरू हुआ. इस मंदिर को बनाने में 20 साल का वक्त लगा. और लगभग 26 लाख मजदूरों ने इसे बनाने में सहयोग दिया. मंदिर के अंदर वायरोचना बुद्ध की प्रतिमा लगाई गयी. वायरोचना बुद्ध गौतम बुद्ध से अलग हैं. बुद्ध धर्म की मान्यता के अनुसार वायरोचना आद्य बुद्ध है. जिनका जन्म नहीं होता. किसी-किसी स्कूल में इन्हें शून्यता का प्रतीक भी माना जाता है.

बहरहाल सम्राट शोमू के लिए मंदिर का निर्माण बहुत अहमियत रखता था. क्योंकि उन दो दशकों में जापान भीषण आपदा से गुजरा था. महामारी और राजनैतिक अस्थिरता के कारण जनता सशंकित थी. इसलिए शोमू चाहते थे कि इस मंदिर के उद्घाटन से जनता में शुभ संकेत जाए कि मानों बुद्ध के आने से देश का भाग्य बदल जाएगा. टोडाजी मंदिर के निर्माण से पहले ही ग्योकि की मृत्यु हो चुकी थी. मृत्यु से पहले उन्होंने सम्राट से कहा था कि मंदिर का उद्घाटन बोधिसेना से ही करवाएं. 752 में बोधिसेन ने टोडाजी मंदिर का उद्घाटन किया, जिसे बुद्ध परंपरा में “आई ओपनिंग सेरेमनी” कहा जाता है. इस मौके पर बुद्ध की मूर्ति के चेहरे पर आंखें पेंट की जाती हैं मानों वो एक लम्बे ध्यान के बाद आंखें खोल रहे हों. 

बारमोन सोजो

जापान के नारा में वायरोचना बुद्ध का ये 1300 साल पुराना मंदिर आज भी मौजूद है. ये दुनिया में लकड़ी से बनी सबसे बड़ी इमारत है. और इसकी छत का भार ही 3 हजार टन के बराबर है. इस मंदिर के अंदर बुद्ध की जो मूर्ति है वो दुनिया में कांसे की बनी सबसे बड़ी मूर्ति है. बहरहाल आगे की कहानी यूं है कि बोधिसेना इसके बाद नारा के माउंट टोमी पर गए. उन्होंने सम्राट से कहा कि वो इस पर्वत पर एक प्रार्थना हॉल बनवाएं. इसका कारण था कि ये पर्वत गृद्धकूट (गिद्ध के पंखो जैसा) पर्वत जैसा दिखाई देता था. गृद्धकूट पर्वत बिहार के राजगीर शहर में पड़ता है. इसी पर्वत पर बुद्ध ने कमल सूत्र की शिक्षा दी थी. कहानी कुछ यूं है कि एक दिन बुद्ध प्रवचन के लिए आए. शिष्यों ने उनसे तमाम सवाल पूछे लेकिन बुद्ध ने कुछ न कहा, सिर्फ एक फूल पकड़ लिया और मुस्कुरा दिए. बुद्ध की इस बात का मर्म उनका सिर्फ एक शिष्य समझ पाया था, जिन्हें महाकाश्यप के नाम से जाना जाता है. 

25 साल नारा में बिताने के बाद 760 ईस्वीं में बोधिसेना की मृत्यु हो गई. जापान में उन्हें बारमोन सोजो या ब्राह्मण बिशप के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि बुद्धिज्म के केगोन या हुयान स्कूल की स्थापना उन्होंने ही की थी. इसके अलावा उन्होंने जापान का संस्कृत से पहली बार परिचय कराया. जापानी भाषा की लिपि में करीब 47 अक्षर ऐसे हैं जो संस्कृत के आधार पर बनाए गए हैं. बोधिसेना के आगमन का सबसे बड़ा प्रभाव ये पड़ा कि उन्होंने जापान के शिंटो धर्म और बुद्ध धर्म में सामांजस्य बिठाया. इसी कारण जापान की आम जनता ने बुद्ध धर्म को आसानी से स्वीकार किया और आज भी जापान में शिंटो और बुद्ध धर्म को साथ में स्वीकार किया जाता है.

वीडियो देखें- अण्डमान निकोबार की आजादी का एक पहलू ये भी है.

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