तसलीम-आरिफ कव्वाल सैदपुर बदायूंनी. ये है इनका पूरा तखल्लुस. यूपी और इसके आस पासइनके कलाम को सुनने वाले बहुत सारे हैं. यूं समझ लो कि यूपी के दीनी मुसलमानों मेंइस्लाम का टेस्ट इन्हीं दोनों के कैसेट सुन सुनकर डेवेलप हुआ था. ये 'वाकया' सुनातेथे तो लोग टेप रिकॉर्डर के पास जमे रहते थे. अम्मियां चूल्हे के नजदीक टेप रिकॉर्डररखती थीं. अब्बा लोग अपनी सिलाई मशीन के पास खींचते रहते थे. मोहल्ले में कहींमिलाद शरीफ होती थी तो मौलाना साहब के आने से पहले तसलीम-आरिफ की कव्वाली समांबांधती थी.वाकया हजरत अबू बकर सिद्दीकी, हजरते शब्बीर की दास्तान, वाकया जंग ए खंदक, रोजेदारबीवी ईमानदार शौहर, ऐसे न जाने कित्ते कैसेट थे जो एक घर से दूसरे घर चक्कर काटतेरहते थे. सुपरहिट कैसेट था शहीदाने कर्बला. इसके कई सारे पार्ट्स आए और देखते देखतेगायब हो जाते थे. हाल ये था कि यहां इस्लाम का मतलब तसलीम-आरिफ की कव्वालियों नेसिखाया. हर कलाम में इंसानियत का संदेश होता था.फिर ये सूफियाना कलाम से आगे बढ़े. मुकाबला कव्वाली के कैसेट आने लगे. जलसों मेंन्योता दिया जाता था. वहां इनके नाम से इतनी भीड़ आ जाती थी कि पैर रखने की जगहनहीं मिलती थी. लोग सर्दियों की रातों में अपने घर से रजाई लेकर जाते थे. कुलमिलाकर मामला ये है कि तसलीम-आरिफ कैसेट के जमाने वालों के लिए याद रखने वाले नामहैं. 'शैतान मेरी लैला, ऐटम बम है तेरी जवानी' जैसी कव्वालियां 3gp फॉर्मैट मेंलोगों के मोबाइल में चलते मिलते हैं. हमको पता चला कि इनके बारे में लोग अपने मन सेबातें बनाते रहते हैं. किसी को कुछ अता पता नहीं है. तो हमने पता किया. दोनों लोगोंसे बात की. और जो निकलकर आया वो पूरा का पूरा आपके सामने पेश है.पहले लगाया तसलीम साहब का नंबर. उन्होंने अपने बारे में काफी कुछ बताया है.सवाल- तसलीम साहब हम आपके कैसेट सुनते सुनते बड़े हुए हैं. घर के बड़े बुजुर्ग कहतेथे कि तसलीम और आरिफ भाई भाई हैं? आप बताइए कि सच्चाई क्या है, ताकि मैं उनको छातीचौड़ी करके बता सकूं. तसलीम- दोस्त हैं हम. सवाल- मुलाकात कैसे हुई? तसलीम- मैंबचपन से ही गाता था तो ये कॉपी कर लेते थे. मेरे भाई ने एकाध बार मुझसे पूछा कि तुमवहां गाने गए थे क्या? मैंने कहा नहीं गया था. फिर बोले कि वहां तुम्हारा कलाम कोईगा रहा था. तब मुझे पता चलो और आरिफ को साथ बुला लिया. (यहां पर एक छोटी सीकनफ्यूजन है. तसलीम ने बताया कि 18 साल की उम्र में मुलाकात हुई थी, आरिफ ने कहा किछठीं क्लास में थे तब हुई थी.) सवाल- कहीं से प्रॉपर ट्रेनिंग ली है गाने की? याखानदान में गाने की परंपरा रही? तसलीम- बचपन से गाने का शौक था. जुनून था. तो पहलेखुद ही गाना शुरू किया. और ज्यादा सफाई लाने के लिए उस्ताद जाफर बदायूंनी केशागिर्द हुए. सवाल- आपका एक कैसेट काफी हिट हुआ था, शहीदाने कर्बला. उसके कईपार्ट्स आए, इसके लिए कैसे तैयारी हुई? या अचानक दिमाग में खयाल आया था. तसलीम-देखिए मोहर्रम आता है तो ऐसे कलाम की जरूरत होती है. वाकया लिखा जाता है. शायर उसकेलिए कलाम लिखते हैं. फिर तर्ज बनती है. कि कैसे इसको गाना है. फिर रिकॉर्डिंग होतीथी और कैसेट मार्केट में आ जाता था. एक कैसेट आने पर कामयाब हुआ तो सिलसिला चलपड़ा. सवाल- सुनते हैं कि आप और आरिफ अलग हो गए हैं? तसलीम- हां, काफी वक्त हो गया.10 साल होने को आए. थोड़ा मनमुटाव हो गया था. उनका तरीका अलग है. सवाल- आप लोगकव्वालियों की लाइव परफार्मेंस के लिए बुलाए जाते हैं. वहां आयोजक लोग किच किच नहींकरते पैसे देने में? रिकॉर्डिंग वाले में पैसे का क्या सीन रहता है? तसलीम- होताहै. कभी कभी कोई दिक्कत खड़ी करता है लेकिन बहुत कम ऐसा होता है. रिकॉर्डिंग काजमाना बहुत बदल गया है. पहले स्टूडियो वाले हमें बुलाकर पैसे देते थे और अपने कैसेटबेचते थे. लेकिन अब हमको उन्हें पैसे देने पड़ते हैं. क्योंकि कैसेट और सीडी काजमाना चला गया. अब सब यूट्यूब पर आता है. सवाल- आजकल नया क्या कर रहे हैं? तसलीम-खुद का स्टूडियो चालू किया है बदायूं में. वहां नए आर्टिस्ट्स को मौका दिया जाताहै. जो गरीब हैं लेकिन टैलेंट की कमी नहीं है उनको आगे ला रहे हैं. अभी मेरा नयावीडियो 'नाना मदीना छूट गया' आया है यूट्यूब पर. इसके अलावा जहां बुलाए जाते हैंवहां प्रोग्राम करते हैं.फिर हमने आरिफ को फोन मिलाया. बातचीत का ब्यौरा कुछ यूं है.सवाल- तसलीम साहब से कब मुलाकात हुई? आरिफ- 1976 के आस पास की बात है. शायद पांचवींया छठीं क्लास में पढ़ते थे. (इसी कनफ्यूजन की बात किए थे हम. लेकिन हमको पता थादोनों के बीच कुट्टी हो चुकी है इसलिए ज्यादा जख्म नहीं कुरेदे. अल्ला जाने किसलेवल का मनमुटाव है.) सवाल- आपकी लाइव कव्वाली सुनने वाले आपस की नोक झोंक बहुतएंजॉय करते हैं. लास्ट में वो हार जीत का फैसला भी कर लेते हैं. ये क्या सीन है? येमैच फिक्स तो नहीं रहते? आरिफ- ये मुकाबले जैसा कुछ होता नहीं है. एक ही शायर दोनोंतरफ के कलाम लिखता है. बीच में चुहल वही डालता है. इसमें हार जीत वाली कोई बात नहींहोती. सवाल- खुद भी लिखते हैं या शायर ही लिखते हैं? आरिफ- कभी कभी मन बना तो खुदलिख देते हैं या शायर को समझा देते हैं इस मसले पर लिखना है. सवाल- मुकाबलों औररिकॉर्डिंग के अलावा आजकल क्या कर रहे हैं? आरिफ- यही सब चल रहा है. वतन से बाहर भीकई बार जा चुके हैं प्रोग्राम करने. अभी साउथ अफ्रीका गए थे. भोजपुरी फिल्मों मेंभी कव्वाली गाई है. सवाल- अच्छा कभी ये हुआ है कि प्रोग्राम गड़बड़ हुआ हो या लोगोंने हूट किया हो? आरिफ- ऐसा होता है कभी कभी कि प्रोग्राम में खलल आ गया हो. कहींबीच ऑडिएंस में किसी ने झगड़ा किया हो. या कहीं प्रोग्राम की परमिशन नहीं थी औरआयोजकों ने बुला लिया. ऐसे में दिक्कत पेश आती है लेकिन हूटिंग जैसी हालत का सामनाकभी नहीं हुआ. प्रोग्राम भी मान के चलो कि सौ में चार ही फेल होते हैं. आपकी फेवरेटकव्वाल कौन हैं जिनके साथ आपका मुकाबला होता है? आरिफ- टीना परवीन. लखनऊ की हैं.हमारे साथ कई बार मुकाबले में रही हैं और हमने साथ में रिकॉर्डिंग भी की है. सवाल-आजकल हर आर्टिस्ट अपने को सोशल मीडिया पर स्टैबलिश करता है. फेसबुक ट्विटर से लोगउनसे डायरेक्ट जुड़ जाते हैं? आप क्यों नहीं सोशल मीडिया पर खुद को स्थापित करते?आरिफ- जिंदगी में इतने मसाइल हैं कि इसके लिए वक्त नहीं मिलता. अक्सर टूर औरप्रोग्राम में दिन कटते हैं. काम बहुत ज्यादा है. बेटा चलाता है ये सब, घर में सबचलाते हैं. हमारी सलाह- अपने बेटे से ही कहें या अपने मैनेजर वगैरह से बात कर लें.लेकिन सोशल मीडिया पर आ जाएं. आपके फैन्स को सीधे जुड़ने में आराम रहेगा. आरिफ-(हंसते हुए) आइए कभी बदायूं मिलते हैं, बातें करते हैं. मैं देहली आऊंगा तो मुलाकातहोगी. हमने कहा 'अरे पक्का होगी मुलाकात और ढेर सारे किस्से भी सुनेंगे.'तसलीम आरिफ ने पहले कव्वालियों के कैसेट निकाले, उसमें कामयाब होने के बाद लाइवशोज़ करने लगे.हमने ये सीरीज शुरू की है. जिसमें देश के हर स्टेट से कुछ खास पर्सनैलिटीज केकिस्से हम आपको बताएंगे. आप भी अपने किसी पसंदीदा कलाकार का नाम और काम बताना. औरये सीरीज कैसी लग रही है ये भी बताना.अब लल्लनटॉप शो का एक सेशन भी देख लो, जिसमें शायर इर्शाद कामिल कुछ सुना रहे हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:क्विज़: नुसरत फतेह अली खान को दिल से सुना है, तो इन सवालों का जवाब दोउसने ग़ज़ल लिखी तो ग़ालिब को, नज़्म लिखी तो फैज़ को और दोहा लिखा तो कबीर को भुलवादियाजगजीत सिंह, जिन्होंने चित्रा से शादी से पहले उनके पति से इजाजत मांगी थीवो मुस्लिम नौजवान, जो मंदिर में कृष्ण-राधा का विरह सुनकर शायर हो गयावो ‘औरंगज़ेब’ जिसे सब पसंद करते हैं