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आपका ये हक किसी ने छीना तो सुप्रीम कोर्ट बीच में खड़ा है

1946 देश के संविधान को बनाने के लिए संविधान सभा बनाई गई. दो सौ सालों से ज्यादा की गुलामी ने हमारे संविधान निर्माताओं को एक चीज को सीखा दी थी. यहीं की किसी भी हाल में देश के नागरिकों को सत्ता के अत्याचार से बचाना है. और इसी विचार को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण हुआ.

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fundamenal rights of citizen
मौलिक अधिकार (फोटो-विकीमीडिया)
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15 मार्च 2024
Updated: 15 मार्च 2024 22:10 IST
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27 फरवरी 2024. हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा चुनावों के लिए वोटिंग चल रही थी. प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार है. लिहाज़ा पार्टी को पूरा विश्वास था कि उसे सारे वोट मिलेंगे. पर यहां एक खेल हो गया. दरअसल कांग्रेस के 6 विधायक बागी हो गए और उन्होंने बीजेपी कैंडिडेट हर्ष महाजन के पक्ष में वोटिंग कर दी.

हिमाचल विधानसभा के स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने 29 फरवरी, 2024 को पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने के लिए 6 विधायकों,

-सुधीर शर्मा

-राजेंद्र राणा

-इंद्रदत्त लखनपाल

-रवि ठाकुर

-देवेंद्र भुट्टो

-चैतन्य शर्मा

को विधानसभा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया.

अयोग्य करार देने के बाद इन विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी गयी. इन्हीं विधायकों ने स्पीकर के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. किस बिनाह पर? यही की उन्हें कानून के हिसाब से लोगों ने चुन कर भेजा है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनता द्वारा चुना जाना एक मौलिक अधिकार नहीं है जिसके लिए आपने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. आप इसके लिए हाई कोर्ट के पास क्यों नहीं गए? कोर्ट ने यहां मौलिक अधिकार की बात की. MLA का चुना जाना कोई मौलिक अधिकार नहीं है. हमने सोचा क्यों न चर्चा की जाए मौलिक अधिकारों की.    

1946 देश के संविधान को बनाने के लिए संविधान सभा बनाई गई. दो सौ सालों से ज्यादा की गुलामी ने हमारे संविधान निर्माताओं को एक चीज को सीखा दी थी. यहीं की किसी भी हाल में देश के नागरिकों को सत्ता के अत्याचार से बचाना है. और इसी विचार को ध्यान में रखकर संविधान का निर्माण हुआ.

संविधान को देखे तो मोटा माटी एक बात समझ आती है. इसमें नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों पर डिटेल में बात हुई है. जिसमें मुख्यता दो तरह के अधिकार हैं.

-संवैधानिक अधिकार (constitutional rights)
-मौलिक अधिकार (fundamental rights)

अब जब दोनों ही संविधान का हिस्सा हैं तो इन दोनों के अलग अलग नाम क्यों हैं? इसको आसान भाषा में एक उदाहरण से समझते हैं. एक वाक्य पर गौर कीजिए . सारी स्विफ्ट डिजायर कार है, लेकिन क्या सारी कार स्विफ्ट डिजायर हो सकती हैं? जवाब है नहीं. क्यों? स्विफ्ट डिजायर एक तरह की कार है लेकिन देश में और भी कई कार है जो स्विफ्ट से अलग हैं. वैसे ही मूल अधिकार संविधानिक अधिकार जरूर हैं लेकिन संविधान में मौजूद सारे अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं हैं.

अब इसकी वजह क्या है? हमारा संविधान कई हिस्से या पार्ट्स में बटा हुआ है. इसमें से पार्ट 3 में जगह मिली है fundamental rights ya मौलिक अधिकारों को. जिसमें से एक अधिकार है , राइट टू स्पीच जिससे लोगों को बोलने की आजादी मिलती है. लेकिन संविधान के अलग अलग पार्ट्स में नागरिकों के लिए कई अन्य अधिकार भी है. जैसे राइट टू प्रॉपर्टी या संपत्ति का अधिकार. जो भी अधिकार संविधान के पार्ट 3 में है उन्हें fundamental rights या मौलिक अधिकार कहा जाता है. इसके अलावा संविधान में मौजूद दूसरे अधिकारों को constitutional rights कहा जाता है.

 

बात करेंगे मौलिक अधिकारों की

-संविधान का भाग 3

भारत के संविधान के भाग तीन में मौलिक अधिकार जिन्हें Fundamental Rights कहा जाता है, उनकी बात की गई है. भाग में में आर्टिकल 12 से 35 तक का हिस्सा आता है. तो पहले नजर डालते हैं इन अधिकारों पर.

-समानता का अधिकार (आर्टिकल 14-18)

-स्वतंत्रता का अधिकार (आर्टिकल 19-22)

-शोषण के विरुद्ध अधिकार (आर्टिकल 23-24)

-धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (आर्टिकल  25-28)

-सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (आर्टिकल 29-30)

-संवैधानिक उपचारों का अधिकार(आर्टिकल 32)

इन अधिकारों के अलावा एक और भी अधिकार था जो संविधान ने दिया था. ये था आर्टिकल 31 यानी संपत्ति का अधिकार. पर 44 वें संशोधन के जरिए इसे मूल अधिकार से कानूनी अधिकार बना दिया गया.  आपने  जाना की ये अधिकार हमे स्टेट से protection दिलाने के लिए है. हालांकि इसमें कुछ अधिकार स्टेट और लोगों दोनों से बचाते है जैसे मसलन आर्टिकल 17 छुआछूत से बचाता है. ये अधिकार कैसे हमारी रक्षा करते हैं, इसके लिए सबसे पहले समझते हैं कि ये स्टेट क्या है?

भारतीय नागरिकों को उनके मूल अधिकार के मामले में राज्य या स्टेट शब्द खूब इस्तेमाल किया गया है. संविधान के आर्टिकल 12 में स्टेट की परिभाषा दी गई है. पर ये स्टेट कौन है? क्या सिर्फ सरकार को स्टेट कहेंगे? 

-केंद्र की विधायिका और कार्यपालिका. साथ ही उसके सभी अंग

-राज्य की विधायिका, कार्यपालिका और उसके सभी अंग

-सभी लोकल अथॉरिटीज़ जैसे म्यूनिसिपल कारपोरेशन, नगर पालिका, नगर पंचायत आदि.

-ज़िला पंचायत, मंडल पंचायत, ग्राम पंचायत

साथ ही सरकारों के अंतर्गत काम करने वाले विभाग. जैसे सीबीआई, लोकपाल, मानवाधिकार आयोग आदि.

ये सभी स्टेट कहलाते हैं.

 

आर्टिकल 13

संविधान के इस अनुच्छेद का उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि, सरकार द्वारा बनाये जा रहे कानूनों से किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो. मौलिक अधिकार देश के नागरिकों को सम्मान से जीने का अधिकार देते हैं. इसके अलावा आर्टिकल 13 में 'राज्य के नीति निदेशक' तत्वों के प्रोटेक्शन की बात भी कही गई है. आर्टिकल 13 ये सुनिश्चित करता है कि कानून बनाते समय सरकार नीति निदेशक तत्वों का ध्यान रखे. पर कोई ऐसा कानून न बनाये जिससे लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो.

अब एक-एक करके समझते हैं, सारे मूल अधिकारों के बारे में. हालांकि उस पर बढ़ने से पहले एक ट्रिविया जानिए। संविधान में लिखे मूल अधिकार भारत के नागरिकों के लिए हैं। लेकिन कुछ ऐसे अधिकार हैं जो भारतीय और भारत आने वाले विदेशियों- दोनों को मिलते हैं. अब वापिस मूल अधिकारों पर चलते हैं.  

‘समानता का अधिकार’ 

आर्टिकल 14 से 18 तक समानता के अधिकार के बारे में बताया गया है. पर ये समानता कहां और किसके सामने हो? इसलिए संविधान ने इन चीजों के बारे में भी बताया है. तो संविधान कहता है कि

-समानता में सबसे जरुरी ये है कि सरकार सबको एक बराबर समझे। इसके लिए अंग्रेजी में एक वाक्यांश है, ‘ equality before law’ यानी कानून की नजर में सब बराबर हैं.संविधान के आर्टिकल 14 के तहत हमे ये अधिकार मिलता हैं. इसके अलावा एक और अधिकार है. साल 2019 में आयुष्मान खुराना की एक फिल्म आयी थी. आर्टिकल 15. संविधान में मौजूद ये आर्टिकल 15 देश के हर नागरिक को भेदभाव से बचाता है. कैसा भेदभाव ? धर्म, नस्ल, जाती, लिंग और जन्मस्थान की वजह से किस व्यक्ति से भेदभाव नहीं किया जा सकता.संविधान ने बराबरी की बात सिर्फ सामाजिक लेवल पर नहीं की है. इसके अलावा सरकारी नौकरियों में भी बराबर मौके की बात हुई है. संविधान का आर्टिकल 16 ये गारेंटी देता है कि देश में किसी भी व्यक्ति को सरकारी नौकरी या किसी सरकारी रोजगार में उस व्यक्ति की-  

-धर्म,

-नस्ल,

-जाति,

-लिंग,

-जन्मस्थान

-वर्तमान में वो कहां रह रहा है. इस सबके कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता

हालांकि इसकी एक सीमा है.देश के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने के लिए रिजर्वेशन की व्यवस्था की गयी है.ये आर्टिकल इस बात की इजाजत देता है.इसके अलावा महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष अधिकार हैं. गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए विशेष अधिकार की व्यवस्था है,

-इसके अलावा छूआछूत से रक्षा भी समानता के अधिकार के तहत मिलती है. समानता के मामले में संविधान ने ये भी ध्यान रखा है कि  भारत के राष्ट्रपति की इजाजत के बिना कोई भी किसी तरह की उपाधि या टाइटल नहीं ले सकता. यानी किसी को सर बोलने की मजबूरी नहीं है.  अब चलते हैं दुसरे अधिकार की तरफ.  

‘स्वतंत्रता का अधिकार’

संविधान के आर्टिकल 19 से 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार की बात की गई है. किस तरह की स्वतंत्रता होगी, ये इस अधिकार के द्वारा डिफाइन किया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि स्वतंत्रता को किसी भी डेमोक्रेसी में सबसे अहम माना जाता है. इसके अनुसार एक व्यक्ति को

-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

-बिना हथियार के एकत्र होने की स्वतंत्रता

-संगठन बनाने की स्वतंत्रता

-किसी भी पेशे को अपनाने की स्वतंत्रता

-देश के किसी भी हिस्से में रहने की आजादी

ये सब अधिकार मिलते हैं. यहाँ एक चीज ध्यान रखने वाली है कि इन सभी अधिकारों की भी एक सीमा है.जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अगर कोई समाज में द्वेष फैलाता है तो राज्य उसके अधिकारों को वापस ले सकता है. साथ ही आदवासियों के लिए संरक्षित क्षेत्र और जंगलों में बसना निषेध होता है. 
-आर्टिकल 20 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंड नहीं दिया जा सकता. साथ ही किसी अपराध के लिए अभियुक्त को खुद उसी के विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.  इसके कुछ एक्सेप्शन हैं. मसलन  अगर कोई व्यक्ति आरोपी है, वो अपनी फिंगरप्रिंट, फोटो या सिग्नेचर देने से मना नहीं कर सकता।

- इस अधिकार का एक पहलू ये भी है कि किसी व्यक्ति को उतनी ही सजा दी जा सकती है. जितनी अपराध करते वक्त कानून में तय थी.अगर किसी व्यक्ति ने कोई ऐसा काम किया जो उस समय पर अपराध नहीं था और उसके लिए कोई सजा नहीं बनी थी, पर बाद में उसपर कानून बन गया. तो बाद में उस व्यक्ति को सजा नहीं दी जा सकती।  

-आर्टिकल 21. ये आर्टिकल जीने का अधिकार और सम्मान का अधिकार देता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे सम्मानित ज़िंदगी जीने के लिए महत्वपूर्ण बताया है.  ये सबसे ज़रूरी मौलिक अधिकार है क्योंकि जीने का अधिकार न हो तो बाकी सारे अधिकार बेकार हो जाएंगे. आर्टिकल 21 में 21(A) के बारे में भी जान लें. ये है Right To Education. यानी 6 से 14 साल की उम्र के हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से नुफ्त शिक्षा मिलनी चाहिए
 

-आर्टिकल 22:

-ये आर्टिकल व्यक्ति को गिरफ्तारी और हिरासत में लिए जाने पर सुरक्षा प्रदान करता है. इसमें अरेस्ट और उसके बाद के प्रोसेस की व्याख्या की गई है. कुछ अधिकार हैं जो गिरफ्तारी के समय दिए जाते हैं.मसलन
-हिरासत में लिए गए व्यक्ति को ये बताना जरूरी है कि उसे क्यों गिरफ्तार किया गया है. साथ ही उसे वकील भी मुहैया कराना होगा.
-गिरफ्तारी के 24 घंटों के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है.
-मजिस्ट्रेट ने जितनी अवधि बताई हो, उससे ज़्यादा किसी को हिरासत में नहीं रखा जा सकता. पर ये कानून उनलोगों को नहीं बचाते जो

- दुश्मन देश का नागरिक है 
-जिन्हें Preventive Detention वाले कानूनों जैसे UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया है.

 

‘शोषण के विरुद्ध अधिकार’

संविधान का आर्टिकल 23 और 24 लोगों को शोषण के विरुद्ध अधिकार देता है. इसका मुख्य उद्देश्य मानव तस्करी, बंधुआ मजदूरी और किसी भी तरह की जबरन मजबूरी प्रर रोक लगाता है. इस अधिकार के तहत बच्चों से काम करवाने पर प्रतिबंध है.

-आर्टिकल 23(1) कहता है कि किसी इंसान से बंधुआ मजदूरी या बेगारी नहीं कराई जा सकती. बिना मेहताने के न स्टेट काम करा सकता है, न कोई प्राइवेट सिटीजन.
-इसके अलावा किसी भी रुप में मानवों की खरीद फरोख्त नहीं हो सकती.
-जबरदस्ती वैश्यवृत्ति नहीं कराई जा सकती
-उन्हें देवदासी या दास बनाकर नहीं रखा जा सकता.

हालांकि विशेष परिस्थिति में स्टेट आपको कुछ काम करने के लिए बाध्य कर सकता है. मसलन युद्ध की स्थिति में. लेकिन तब भी मेहनताना देना जरूरी होता है. और काम पर मूल अधिकारों वाले बाकी सारे नियम लागू होते हैं. आर्टिकल 23 के बाद आता है आर्टिकल 24. जो कहता है, 14 साल से कम उम्र के बच्चों को किसी भी फैक्ट्री या किसी मजदूरी वाले काम में नहीं लगाया जा सकता.

 

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार’

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. संविधान का ये आर्टिकल भारत के इस चरित्र को दिखाता है. भारत में सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है, पर राज्य या स्टेट का कोई आधिक्कारिक धर्म नहीं है. हर व्यक्ति को अपने धर्म पर विश्वास करने, पालन करने,  और अपने धर्मार्थ संस्थानों की स्थापना और रखरखाव करने का अधिकार है.

 

‘सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार’

ये अधिकार सभी लोगों पर नहीं बल्कि अल्पसंख्यक समूहों के लिए है.आर्टिकल 29 और 30, दोनों ही देश में रहने वाले अल्पससंख्यकों को कुछ अधिकारों की गारंटी देते हैं. आर्टिकल 29 कहता है कि किसी भी नागरिक या नागरिकों के वर्ग को अपनी अलग भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार है. इसके अलावा  आर्टिकल 29 में कहा गया है कि धर्म, नस्ल, जाति, भाषा या उनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. अगला है आर्टिकल 30. आर्टिकल  30 (1) अल्पसंख्यक समुदायों को एक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उसका प्रशासन चलाने का अधिकार देता है. साथ ही 30(2 ) ये कहता है कि सरकार को शैक्षणिक संस्थानों को सहायता देते समय धर्म या भाषा की परवाह किए बिना सबको समान नजर से देखना होगा. किसी भी माईनॉरिटी समूह द्वारा चलाए जा रहे किसी भी शैक्षणिक संस्थान के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए.

‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार’

संविधान का आर्टिकल 32 संवैधानिक उपचारों से जुड़ा अधिकार है. संवैधानिक उपचार को ऐसे समझिए कि अगर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो उन अधिकारों की रक्षा के लिए व्यक्ति कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है. ये कानून भारत के हर नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए देश की सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिका दायर करने का अधिकार देता है. यानी कुलजमा बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट देश के सभी लोगों के मौलिक अधिकार की रक्षक है. यहां ये समझना जरूरी है कि आर्टिकल 32 अपने आप में कोई अधिकार नहीं है, बल्कि दूसरे अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके, इसके लिए एक उपाय की तरह है. बाबासाहेब डॉ अंबेडकर भी आर्टिकल 32 को संविधान का सबसे महत्वपूर्ण आर्टिकल कहा करते थे. उन्होंने इसे संविधान की 'आत्मा और हृदय' बताया था.

तो हमने मूल अधिकारों के बारे में समझा. आगे चलते हैं और संविधान में सरकार को जो जिम्मेदारियां दी गई हैं उनको जानते हैं. ये भी हमारे एक तरह समाझिक और आर्थिक अधिकारों हैं. इन्हे directive principles of State policy ke naam से जाना जाता है. अगर किसी मूल अधिकार का हनन होता है तो आर्टिकल 32 के तहत हम कोर्ट में जा सकते हैं.  पर directive principles of State policy ना लागू की जाए तो हम कोर्ट का दरवाजा नहीं खतखटा सकते.

Directive Principles of State Policy और मूल अधिकारों में अंतर

Directive Principles of State Policy असल में स्पेन के संविधान से उपजा था. इसके बाद इसे आयरलैंड के संविधान में लाया गया. और आखिरकार भारत के संविधान निर्माताओं ने भी इसे संविधान में जगह दी. यभारतीय संविधान के आर्टिकल 36 से 51 तक Directive Principles of State Policy है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि Directive Principles किसी स्टेट की आदर्श स्थिति को बताता है. साथ ही ये मौलिक अधिकारों के अंतर्गत नहीं आते. इसमें  वे सभी आदर्श शामिल हैं जिनका पालन राज्य को देश के लिये नीतियाँ और कानून बनाते समय ध्यान में रखना चाहिये. जैसे यूनिफॉर्म सिविल कोड. आर्टिकल 44 . सरकार को ये दिशा निर्देश देता है कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किया जाए. लेकिन अभी तक पूरे देश में ये  लागू नहीं हुआ है. लेकिन इसके लिए आप आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट नही जा सकते.

मूल अधिकारों में कटौती

आपने एक शब्द सुना होगा, इमरजेंसी या आपातकाल इस दौरान देश में राष्ट्रपति का शासन होता है. और इसी दौरान एक चीज होती है, वो है आपके मूल अधिकारों का सस्पेन्शन.

इमरजेंसी

देश में इमरजेंसी का मतलब है गवरनेन्स का ऐसा रूप जिसमें सरकार राष्ट्रपति के अंतर्गत काम करती है. इस दौरान देश में रहने वालों के मूल अधिकार सस्पेंड कर दिए जाते हैं. संविधान के आर्टिकल 352 से 360 तक इमरजेंसी के प्रावधान दिए गए हैं. इसके पीछे का तर्क है कि किसी भी भीतरी या बाहरी हमले की स्थिति में देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को सुनिश्चित किया जा सके. मूल अधिकारों में कटौती की बात संविधान के दो आर्टिकल 358 और 359 में बताई गई है. इसका ओरिजिन देखें तो ये जर्मनी के संविधान से लिया गया है.

आर्टिकल 358

-जैसे ही नैशनल इमरजेंसी की घोषणा होती है.

-आर्टिकल 19 के तहत मिले मूल अधिकारों को तभी निलंबित किया जा सकता है जब इमरजेंसी किसी हमले या युद्ध की स्थिति में लगाई गई हो.

-इमरजेंसी खत्म होने के साथ ही आर्टिकल 19 फिरसे लागू हो जाता है और मूल अधिकार वापस से मिल जाते हैं.

 

आर्टिकल 359

आर्टिकल 359 थोड़ा सा अलग है. इसमें मूल अधिकार नहीं बल्कि उनका लागू होना निलंबित कर दिया जाता है. इस दौरान प्रेसिडेंट के ऑर्डर से कोर्ट में मूल अधिकारों के लिए अपील करने का अधिकार छिन जाता है.

-इस दौरान केवल वही मूल अधिकार सस्पेंड होते हैं जिनका जिक्र राष्ट्रपति ने अपने आदेश में किया हो.

-यह सस्पेंशन आपातकाल के दौरान या उससे कम अवधि के लिए हो सकता है.

-अप्रूवल के लिए इस आदेश को संसद के दोनों सदनों के सामने रखा जाना चाहिए.

-संविधान का 44वां संशोधन कहता है कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए अदालत में जाने के अधिकार को निलंबित नहीं कर सकते.

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