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दुनिया के इन देशों में बॉर्डर पार करना इतना आसान है, भारत-म्यांमार का मामला क्या है?

एक नियम जिसका नाम है, फ्री मूवमेंट रिजीम या FMR. इसके कारण दोनों देशों के लोग बॉर्डर पार कर एक-दूसरे की सीमा में आ सकते हैं. लेकिन घुसपैठ, आतंकी हमलों जैसी तमाम दिक्कतों के चलते अब भारत सरकार FMR को ख़त्म करने जा रही है.

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indo myanmar free movement regime
फ्री मूवमेंट रिजीम- भारत म्यांमार
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7 फ़रवरी 2024
Updated: 7 फ़रवरी 2024 20:50 IST
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9 जून 2015, भारतीय सेना की एलीट फोर्स, पैरा स्पेशल फोर्सेज ने भारत-म्यांमार सीमा पर एक उग्रवादी गुट के कैंप पर सर्जिकल स्ट्राइक की. पूरे कैंप को तबाह कर दिया. ये ऑपरेशन दरअसल इंडियन आर्मी के एक काफिले पर हुए अटैक का बदला था. भारत म्यांमार की सीमा पिछले काफ़ी समय से घुसपैठ झेल रही थी. ड्रग ट्रैफिकिंग और हथियारों की तस्करी भी इलाके में पांव पसारने लगी. 
इन सबका एक बड़ा कारण म्यांमार से होने वाले घुसपैठ थी. लेकिन इस घुसपैठ को समर्थन मिलता था सरकार की एक पॉलिसी से. एक नियम जिसका नाम है, फ्री मूवमेंट रिजीम या FMR.  इसके कारण  दोनों देशों के लोग बॉर्डर पार कर एक-दूसरे की सीमा में आ सकते हैं. लेकिन घुसपैठ, आतंकी हमलों जैसी तमाम दिक्कतों के चलते अब भारत सरकार FMR को ख़त्म करने जा रही है.  
 तो समझते हैं- 
●भारत-म्यांमार के बीच फ्री मूवमेंट रीजीम क्या है? 
●दुनिया में किन देशों के बीच फ्री बॉर्डर मूवमेंट है?
●और भारत सरकार अब म्यांमार बॉर्डर पर सुरक्षा बढ़ाने के लिए कैसी दीवार बनाने जा रही है?

शुरुआत से शुरू करते हैं. साल 1826 तक भारत के नॉर्थ-ईस्ट के अधिकतर राज्य बर्मा के अधीन थे. भारत पर ब्रिटेन का कब्जा हो चुका था. 1824 में अंग्रेजों और बर्मा के बीच युद्ध शुरू हुआ. 1826 में ये युद्ध रुका. ब्रिटिश राज और बर्मा के बीच एक संधि हुई. इसे Treaty of Yandaboo नाम से जाना जाता है. इस संधि का नतीजा ये हुआ कि भारत और बर्मा के बीच बॉर्डर अस्तित्व में आया.यही बॉर्डर अब इंडिया और म्यांमार का इंटरनेशनल बॉर्डर माना जाता है. 
वर्तमान में म्यांमार और भारत के बीच 1,643 किलोमीटर की ज़मीनी सीमा है. भारत के चार राज्य - अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम - म्यांमार से लगे हुए हैं. इसमें अरुणाचल प्रदेश की 520 किलोमीटर, नागालैंड से 215 किलोमीटर, मणिपुर से 398 किलोमीटर और मिज़ोरम से 510 किलोमीटर की सीमा म्यांमार से लगती है. जब ये बॉर्डर बना था, तब प्रैक्टिकल कारणों से सीमा का निर्धारण हुआ था. लेकिन एक दिक्कत ये थी कि इस बॉर्डर के निर्धारण में वहां रहने वाले लोगों की कोई राय नहीं ली गई. सत्ता के हुक्मरानों ने जमीन पर एक लकीर खींच दी जिससे कई लोग एक होते हुए भी दो देशों के कहलाये जाने लगे. नागालैंड में नागा समुदाय के लोग वहीं मणिपुर और मिज़ोरम में कुकी, चिन और मिज़ो समुदाय के लोग बड़ी संख्या में इससे प्रभावित हुए. इंडियन एक्स्प्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर के मोरेह इलाके में ऐसे कई गांव हैं, जिसके कुछ घर म्यांमार में हैं, कुछ भारत में. 
ऐसा ही कुछ मंज़र नागालैंड में भी देखने को मिलता है. नागालैंड के मोन जिले में सीमा रेखा लोंगवा गांव के मुखिया के घर से होकर गुजरती है. माने उनका घर दोनों देशों में है. ऐसे हाल में ये स्वाभाविक था कि लोग एकदूसरे से जुड़े रहे. बॉर्डर के निर्धारण के बाद भी लोगों ने बॉर्डर पार आना-जाना जारी रखा. बड़ी संख्या में लोगों के रिश्तेदार और परिचित लोग बॉर्डर के दूसरी तरफ रहते थे इसलिए बॉर्डर पार करना उनके लिए आम बात हो गई. इस क्षेत्र में अधिकतर इलाके जंगल है इसलिए कुछ जगहों पर बॉर्डर पार करना चुनौती भरा तो है पर नामुमकिन नहीं है.

लोगों का आना-जाना एक जमीनी सच्चाई है लेकिन दो देशों की सीमा यूं ही पार की जा सके. ये भी किसी हाल में जायज नहीं ठहराया जा सकता. इस दिक्कत से निपटने के लिए दोनों देशों की सरकार के बीच 2018 में एक समझौता हुआ. इसी समझौते का नाम है फ्री मूवमेंट रिजीम. नरेंद्र मोदी सरकार की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत साल 2018 में इसे लागू किया गया था. इसके तहत, दोनों देशों की जनजातियां बिना पासपोर्ट या वीज़ा के एक-दूसरे के क्षेत्रों में 16 किलोमीटर तक आ-जा सकती हैं. इसे लाने का उद्देश्य दोनों देशों के बीच होने वाले लोकल ट्रेड को सपोर्ट करना भी था. बॉर्डर के करीब रहने वाले म्यांमार के लोगों को बिजनेस, पढ़ाई या स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से भी भारत उनके लिए बेहतर विकल्प है. इसलिए इस फ्री मूवमेंट रिजीम को लागू किया गया था. 
FMR अपने आप में एक अनूठा फैसला था. लेकिन ऐसा नहीं कि ये पहला मामला हो, जब दो देश अपनी सीमा पर खुली आवाजाही की अनुमति दे रहे हैं. दुनिया भर में उदाहरणों को देखें तो
 

- 1995 में हुए Schengen Agreement के तहत यूरोपियन यूनियन के 20 से अधिक देशों में लोग बिना वीजा के आ-जा सकते हैं. लोगों को इसके लिए बस अपना पासपोर्ट दिखाना होता है.  
दूसरा उदाहण है- नॉर्डिक पासपोर्ट यूनियन- इस समझौते के तहत नॉर्डिक देश यानी डेनमार्क, आइसलैंड, फ़िनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन में लोग सिर्फ अपनी कोई नैशनल आईडी जैसे ड्राइविंग लाइसेंस दिखाकर दूसरे देशों में जा सकते हैं.
इसके अलावा UK और आयरलैंड के लोगों को दोनों देशों में वीजा फ्री एंट्री की सहूलियत है.  और भी कई देश हैं जो अपने नागरिकों को कुछ देशों में इस तरह के फ्री मूवमेंट की परमिशन देते हैं. 
जैसे यूनियन स्टेट में बेलारूस और रूस. भारत की नेपाल और भूटान के साथ ट्रीटी ऑफ पीस एंड फ्रेंडशिप. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच Trans-Tasman Travel Arrangement इन देशों के लोगों को फ्री मूवमेंट की परमिशन देता है.    

 FMR पालिसी को ख़त्म क्यों किया जा रहा है? 
दरअसल FMR योजना लोगों के लिए भले के लिए लाई गई थी. लेकिन इसका नाजायज फायदा उठाया उग्रवादियों और घुसपैठियों ने. पिछले कुछ सालों में ऐसा कई बार हुआ है कि उग्रवादी संगठनों ने सीमा पार कर भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला किया है. ये लोग FMR पॉलिसी का इस्तेमाल म्यांमार में संरक्षण हासिल करने के लिए करते हैं. इसलिए अब सरकार ने फैसला किया है कि FMR पालिसी को बंद कर दिया जाएगा. इस मामले में गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान भी किया है. सरकार के इस कदम के पीछे कुछ त्वरित वजहें भी हैं. पूरा घटनाक्रम समझने के लिए चलते हैं फरवरी 2021 में. क्या हुआ था तब?

म्यांमार में तख्तापलट हुआ. सेना ने देश की सत्ता अपने हाथ में ले ली और दो साल के लिए देश में मिलिट्री रूल लागू कर दिया. नोबेल पीस प्राइज़ विजेता और देश की प्रधानमंत्री आंग सान सू की को गिरफ्तार कर लिया गया. सेना के जनरल मिन आंग हलिंग ने खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया. इसके बाद दौर शुरू हुआ कत्लेआम का. जिसने भी मिलिट्री रूल का विरोध किया, उसकी आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया. कहीं डर के बल पर, कहीं ताकत के बल पर, तो कहीं बंदूक की गोली से. 
 

देश कि स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती गई और इसने जन्म दिया गृह युद्ध को. फरवरी 2021 में तख्तापलट के बाद से अवैध प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी है.  इस दौरान करीब 40 हजार शरणार्थियों से मिजोरम में पनाह ली. वहीं करीब 4 हजार रिफ्यूजी मणिपुर पहुंचे. फिर मई 2023 में रिफ़्यूजी संकट के बीच मणिपुर के हालात खराब होने लगे. कुकी और मैतेई समुदाय के बीच शुरू हुए इस संघर्ष ने कई सवालों को जन्म दिया. सरकार के सामने रिफ़्यूजी संकट भी बढ़ता जा रहा था. मणिपुर हिंसा का एक कारण म्यांमार से आए रिफ़्यूजी भी बताए जाते हैं. अब क्षेत्र में अशांति फैली तो ड्रग तस्करों और हथियारों की सप्लाई के लिए भी बॉर्डर्स का इस्तेमाल किया जाने लगा. यानी भारत में रिफ़्यूजी, हथियार, ड्रग्स सब आ रहे थे. वो भी उस फ्री मूवमेंट रिजीम की आड़ लेकर जिसे भारत और म्यांमार ने क्षेत्रीय लोगों को सहूलियत के लिए लागू किया था.

इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2024 में भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि भारत और म्यांमार की 1643 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ या फेन्सिंग की जाएगी. साथ ही दोनों देशों की सीमा के बीच एक कंटीली दीवार होगी. सरकार ने हाल ही में पूरी सीमा पर स्मार्ट जाली लगाने का काम शुरू किया है. गृहमंत्री के अनुसार इससे पूर्वोत्तर के राज्यों में अवैध प्रवासियों, ड्रग तस्करों और अपराधियों को रोकने में मदद मिलेगी. ये अकेला फैसला नहीं है.  हाल ही में भारत सरकार ने अपने नागरिकों को म्यांमार के रखाईन प्रांत की यात्रा न करने की एडवाइजरी जारी की है. साथ ही पहले से वहां मौजूद लोगों को तत्काल रखाईन छोड़ने के लिए कहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि

"लगातार बिगड़ती सुरक्षा स्थिति, लैंड्लाइन और बाकी कम्युनिकेशन सेवाओं का ठप पड़ना और जरूरी चीजों की कमी को देखते हुए सभी भारतीय नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे म्यांमार के रखाईन की यात्रा न करें."

ये सब फैसले सरकार की उस नीति का हिस्सा है. जिसके तहत उत्तर पूर्व की सीमा की सुरक्षा बढ़ाने की कोशिश हो रही है. और इसी के तहत अब सरकार ने सीमा पर फेन्सिंग लगाने का फैसला किया है. सीमा पर फेंसिंग का ये अकेला उदाहरण नहीं है. अमेरिका और मेक्सिको के बीच अवैध घुसपैठ का मुद्दा पिछले सालों में काफी गरमाया है. मेक्सिको से लगी सीमा पर दीवार बनाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रैम्प ने तो एक बार सर्कार ठप करने की धमकी दे डाली थी. ये मुद्दा वर्तमान में भी गरमाया हुआ है, जब अमेरिका के अगले चुनाव काफी नजदीक हैं.

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