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वे पांच मौके, जब प्रणब मुखर्जी बुरी तरह से मात खा गए

मनमोहन सिंह ने क्यों कहा था कि प्रणब उनसे बेहतर पीएम साबित हो सकते थे.

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Pranab Mukherjee
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी. (फोटो: एपी)
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अभय शर्मा
3 सितंबर 2020 (अपडेटेड: 4 सितंबर 2020, 01:54 PM IST)
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प्रणब मुखर्जी. सियासत का वो चेहरा, जिसने 43 बरस तक लुटियंस दिल्ली के सियासी समीकरणों को समझने-बूझने, समझाने, सुलझाने और (कुछ चंद लोगों की नजरों में) उलझाने में लगा दिए. इसके बाद लुटियंस दिल्ली की सबसे ऊंची जगह, यानी रायसीना हिल्स पहुंचे. नॉर्थ और साउथ ब्लाॅक में उन्होंने बतौर रक्षा, विदेश और वित्त मंत्री एक लंबा समय गुजारा. 2012 में वे भारत के 13वें राष्ट्रपति बने और अपने सियासी करियर को अलविदा कह दिया था. लेकिन अपने लंबे राजनीतिक जीवन में प्रणब दा को कई बार मात भी खानी पड़ी थी. हम उन पांच अवसरों की चर्चा करने जा रहे हैं, जब उन्हें मात खानी पड़ी थी.

पहली हार

1977 का लोकसभा चुनाव आया और इस चुनाव में इंदिरा विरोधी लहर चल रही थी. आपातकाल की ज्यादतियों के कारण कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) जनता की नजरों से उतर गई थी. विपक्षी एकता के नाम पर बनी जनता पार्टी ने तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) के साथ गठबंधन किया था. हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) तक भी कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) के साथ ही थी.
इस चुनाव में बंगाल की मालदा लोकसभा सीट पर कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) ने वित्त उप मंत्री प्रणब मुखर्जी को मैदान में उतारा. तब उनका मुकाबला मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दिनेश चंद्र जोरदार से हुआ. यहां से स्थानीय कांग्रेसी नेता ए.बी.ए. गनी खान चौधरी की दावेदारी को दरकिनार कर प्रणब मुखर्जी को टिकट दिया गया था. इसके कारण गनी खान चौधरी व्यंग्यात्मक लहजे में प्रणब मुखर्जी को Rootless Wanderer भी कहा करते थे. लेकिन उनके ऐसा कहने का कांग्रेस आलाकमान पर कोई असर तो पड़ना नहीं था. प्रणब दा को टिकट मिल गया तो मिल गया. प्रणब मुखर्जी ने दिनेश चंद्र जोरदार से जोरदार चुनावी मुकाबला किया, लेकिन अंततः इस मुकाबले में उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा. वे करीब 30 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे.
President Pranab Mukherjee

1977 का लोकसभा चुनाव हार गए थे प्रणब मुखर्जी.

दूसरी हार

1979-80 का लोकसभा चुनाव. लगभग दो साल पहले कांग्रेस बंट चुकी थी. तब प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की कांग्रेस (ई) अथवा इंका के साथ आ चुके थे. इस चुनाव के लिए प्रणब दा ने इंका अध्यक्ष इंदिरा के सामने चुनाव लड़ने की जिद पकड़ ली. वे इंदिरा के पास पहुंचे और बोले-
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तब इंदिरा गांधी ने उनकी पत्नी सुर्वा मुखर्जी से बात की और फिर उन्हें समझाया-
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इस पर प्रणब ने उन्हें यह कहकर कन्विंस करने की कोशिश की कि चूंकि वो गांव से उठकर यहां तक पहुंचे हैं और उस इलाके की नस-नस से वाकिफ हैं, इसलिए उन्हें चुनाव जीतने में कोई दिक्कत नहीं होगी.
इंदिरा ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिशें की, लेकिन प्रणब दा नहीं माने. अंततः इंदिरा गांधी को प्रणब दा की जिद के आगे झुकना पड़ा. प्रणब दा बोलपुर पहुंचे और पर्चा भरा. दिन-रात मेहनत करके चुनाव प्रचार किया, लेकिन जब नतीजा सामने आया, तब इंदिरा गांधी की आशंका सही निकली. प्रणब दा को सीपीएम के सारादीश राय से मात हाथ लगी थी.
इसके बाद प्रणब मुख़र्जी निराश होकर कोलकाता में बैठ गए. पूरे देश में इंका को भारी सफलता मिली थी. 353 सीटें मिली थीं इंका को. लेकिन तब भी प्रणव दा चुनाव हार गए थे. वे कोलकाता के अपने घर में ही बैठे थे, तभी उन्हें इंदिरा गांधी ने फोन किया और दिल्ली पहुंचने को कहा.
Pranabmukherjee

प्रणब मुखर्जी डनहिल की पाइप पीने के शौकीन थे.

इसके बाद बुझे मन से प्रणब दा ने दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और जब वे दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरे, तब उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि उन्हें रिसीव करने के लिए खुद संजय गांधी खड़े थे. संजय गांधी उन्हें लेकर सीधे 12 विलिंग्डन क्रिसेंट (जो तब इंदिरा गांधी का आवास हुआ करता था) पहुंचे. अपनी जिद के कारण शर्मिंदा प्रणब दा ने किसी प्रकार इंदिरा गांधी का सामना किया. लेकिन इंदिरा ने प्रणब की आशंका के ठीक उलट उनसे व्यवहार किया. प्रणब दा को आशंका थी कि इंदिरा गांधी नाराज होंगी, लेकिन इंदिरा ने बेहद गर्मजोशी दिखाते हुए उनसे कहा-
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* नई सरकार के गठन के दौरान शपथ लेने वाले मंत्रियों को कैबिनेट सचिव के द्वारा ही औपचारिक सूचना दी जाती है. इसके बाद 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन इंदिरा गांधी और उनके मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण की. प्रणब दा को इस्पात और खान मंत्री बनाया गया था. इंदिरा गांधी को प्रणब दा पर इतना भरोसा था कि वे अक्सर कहा करती थीं-
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प्रणब मुखर्जी डनहिल पाइप पीने के शौकीन थे, इसी वजह से इंदिरा गांधी ने उनके बारे में ‘धुआं’ निकलने वाली बात कही थी.

तीसरी हार

इस हार ने प्रणब मुखर्जी को अंदर तक हिला दिया था. अक्टूबर का महीना. 1984 का साल. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या और उसके बाद राजीव गांधी और उनकी नई टीम (जिसमें अरुण नेहरू, अरुण सिंह और सुमन दुबे जैसे नए लोगों की किचेन कैबिनेट बन चुकी थी) का प्रणब मुखर्जी के प्रति अविश्वास की भावना.
इस कोटरी ने कथित तौर पर राजीव गांधी के मन में प्रणब मुखर्जी के प्रति इतनी कड़वाहट भर दी कि राजीव ने पहले उन्हें कैबिनेट से हटाया और 16 महीने बाद अप्रैल 1986 में पार्टी से ही निकाल दिया. अब प्रणब मुखर्जी की हालत ऐसी कि ‘काटो तो खून नहीं.’ उन्हें खुद नहीं पता था कि आखिर उनका गुनाह क्या है, जो पहले उन्हें कैबिनेट से हटाया गया और अब पार्टी से भी निकाल दिया गया. ऐसे में निराश प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई पार्टी बनाई और उसका नाम रखा- राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा). और इस पार्टी का पहला लिटमस टेस्ट था 1987 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव.
इसी वर्ष प्रणब दा का राज्यसभा का तीसरा कार्यकाल भी समाप्त हो रहा था, लिहाजा उन्हें अपनी पार्टी के लिए इतने विधायक चाहिए थे कि वे पुनः राज्यसभा पहुंच सकें. उधर राजीव गांधी की कांग्रेस (ई) यानी इंका भी डेढ़ दशक बाद पहली बार बंगाल विधानसभा चुनाव में जी-तोड़ मेहनत करती दिख रही थी. और करती भी क्यों नहीं, 1984 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में कांग्रेस को वैसी ही सफलता मिली थी, जैसी 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को मिली थी. उस वक्त भी केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी (इंका) की राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी (सीपीएम) के साथ बुरी तरह ठनी हुई थी. ठीक वैसे ही, जैसे आज बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच ठनी हुई है.
ऐसे तीखे माहौल के बीच प्रणब मुखर्जी का राज्य की राजनीति में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था. लेकिन उनकी अपनी सियासी मजबूरियां थीं. उन्हें सियासत में जमे रहना था और साथ ही इंकाइयों को अपनी अहमियत का अहसास भी कराना था. इसी उद्देश्य से उनकी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) ने लगभग ढाई सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए. साथ ही अपने सीमित संसाधनों के साथ चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया. अब ऐसे में एक तरफ काडर बेस पार्टी सीपीएम का ग्रासरूट संगठन, जबकि दूसरी तरफ लोकसभा में 400 से ज्यादा सांसदों वाली इंका का संसाधन. जाहिर सी बात है कि इतने तीखे और नुकीले चुनावी अभियान के बीच प्रणब मुखर्जी का अपनी जगह बना पाना कोई आसान काम नहीं था.
इसलिए जब चुनाव नतीजा आया, तो उसमें इंका के लिए तो सरप्राइज था, लेकिन प्रणब दा की राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) के लिए कोई सरप्राइज नहीं था. सीपीएम अपने वाममोर्चा के साथी दलों (सीपीआई, फॉरवर्ड ब्लाक एवं आरएसपी) के साथ एकबार फिर बड़ी जीत दर्ज करने में कामयाब रहा था, जबकि इंका को इतने बड़े और तीखे चुनाव अभियान के बावजूद कुछ खास हासिल नहीं हुआ था. प्रणब दा की पार्टी की हालत तो इतनी पतली थी कि उसके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. इस हार ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था, क्योंकि इसके कुछ ही दिनों के बाद उनका राज्यसभा का कार्यकाल भी खत्म हो गया और वे लुटियंस दिल्ली का अपना सरकारी बंगला छोड़ कर ग्रेटर कैलाश के अपने निजी मकान में शिफ्ट होने पर मजबूर हो गए थे.
Pranab Mukherjee With Rajiv Gandhi

राजीव गांधी के साथ प्रणब मुखर्जी.

लेकिन इसी बीच दिल्ली की सियासत में एक बड़ा बवंडर खड़ा हो गया, जिससे इंका हाईकमान और राजीव गांधी को प्रणब मुखर्जी की अहमियत का बड़ी शिद्दत से अहसास करवा दिया. एक ऐसा बवंडर, जिसने इंका (यानी आज की कांग्रेस) की चूलें ऐसी हिलाईं, जिससे पार्टी आज तक उबर नहीं पाई और कभी भी अपने दम पर बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी.
उस वक्त The Hindu अखबार की संवाददाता चित्रा सुब्रह्मण्यम ने स्वीडिश रेडियो की खबर के हवाले से एक ऐसी रिपोर्ट छाप दी, जिसने हिंदुस्तान की सियासत में हंगामा खड़ा कर दिया. इस रिपोर्ट ने ढाई साल पहले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिट चुके विपक्ष में जान फूंक दी, साथ ही इंका के अंदर की सियासत को भी सड़क पर ला दिया. यह मामला स्वीडन से हुई बोफोर्स तोप की खरीद में दलाली से जुड़ा था और बकौल चित्रा सुब्रह्मण्यम, यह दलाली दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान के करीबी लोगों तक पहुंची थी. अब जाहिर है कि हंगामा तो होना ही था, क्योंकि कुछ महीने पहले से ही जर्मन पनडुब्बी की खरीद का मामला भी इसी प्रकार की सुर्खियां बटोर रहा था. जर्मन पनडुब्बी की खरीद में अनियमितता के मुद्दे पर राजीव गांधी की कैबिनेट से इस्तीफा दे चुके पूर्व वित्त और रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने (जो कभी राजीव को विवेकानंद का अवतार तक कहते नहीं थकते थे) अब इस मुद्दे को उठा लिया और अपनी सभाओं में शेरवानी की पाॅकेट से एक पर्ची निकालकर लोगों को ये बताने लगे-
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वीपी सिंह यहां तक दावा करते कि बोफोर्स दलाली की रकम के बड़े हिस्से को स्विस बैंक में LOTUS नाम से एक अकाउंट खोलकर, उसमें जमा किया है. बकौल वीपी, LOTUS का हिंदी में अर्थ कमल अथवा राजीव होता है.
अब ये सब बातें सुनकर जनता भी राजीव गांधी के खिलाफ होने लगी और उनके खिलाफ ‘गली-गली में शोर है ….. जैसे नारे लगने लगे. साथ ही हताश विपक्ष भी (लेस्ट से लेकर राइट तक) वीपी सिंह के पीछे इकट्ठा होने लगा.
राजीव के खिलाफ वीपी सिंह के इस अभियान में राजीव के वैसे करीबी लोग, मसलन अरुण नेहरू भी शामिल हो गए, जिन्होंने राजीव को उकसाकर प्रणब मुखर्जी की इंका से मुअत्तली करवाई थी. वहीं उनके दूसरे युवा सहयोगियों, मसलन अभिताभ बच्चन और अरुण नेहरू ने सियासत से ही तौबा कर लिया. लिहाजा राजीव गांधी एकदम अकेले पड़ने लगे, क्योंकि जिस युवा ब्रिगेड के उकसावे पर उन्होंने प्रणब मुखर्जी और कमलापति त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगाया था, अब वे सभी उनका साथ छोड़ चुके थे.
यह स्थिति प्रणब मुखर्जी की इंका में वापसी की जमीन तैयार करने के लिए एकदम माकूल थी. दोनों तरफ (राजीव और प्रणब) से पहल हुई और तब 1989 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले प्रणब मुखर्जी ने अपनी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) का इंका में विलय कर दिया. साढ़े तीन साल के वनवास के बाद अंततः प्रणब दा की घर वापसी हो गई थी. लेकिन संसद और सरकार का हिस्सा बनने में अभी भी चार साल बाकी थे. चार साल बाद 1993 में नरसिंह राव की सरकार में बतौर वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी की केन्द्रीय मंत्रिमंडल में वापसी हुई थी.
Pranab Mukherjee

4 साल बाद 1993 में प्रणब मुखर्जी की केन्द्रीय मंत्रिमंडल में वापसी हुई थी.

चौथी हार

वीपी सिंह सरकार के पतन के बाद साल 1990 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन चाहते थे कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनें, लेकिन राजीव गांधी कुछ और ही सोच रहे थे. यह दावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गांधी परिवार के वफादार रहे माखनलाल फोतेदार की किताब ‘द चिनार लीव्ज’ में किया गया है.
किताब में फोतेदार ने लिखा है कि 1990 में जब वीपी सिंह के इस्तीफे के संबंध में राजनीतिक स्थिति पर विचार-विमर्श करने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति वेंकटरमन से मुलाकात की, तो राष्ट्रपति ने जोर देते हुए उनसे कहा था कि राजीव को मुखर्जी का समर्थन करना चाहिए. फोतेदार लिखते हैं-
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उन्होंने आगे लिखा है-
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आगे फोतेदार लिखते हैं-
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जाहिर है इस बार भी प्रणब मुखर्जी को मात खानी पड़ी थी.

पांचवीं हार

एक बार फिर प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए.
Pranab Mukherjee With Sonia Gandhi

सोनिया गांधी के साथ प्रणब मुखर्जी.

2004 का साल. फील गुड और इंडिया शाइनिंग के शोर-शराबे के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आठ महीने पहले ही लोकसभा को भंग कर दिया और लोकसभा चुनाव करवा दिए. अब अचानक सामने आई इस परिस्थिति ने कांग्रेस को भी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में झोंक दिया.
उधर पश्चिम बंगाल में नए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव था. लिहाजा उनकी भी प्रतिष्ठा दांव पर थी. ऐसे में कांग्रेस हाइकमान ने अपने वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी को भी लोकसभा चुनाव लड़ाने का फैसला कर दिया. प्रणब मुखर्जी को बंगाल की जंगीपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया गया. इसके बाद वे जंगीपुर पहुंचे और अपना चुनावी अभियान शुरू किया. स्थानीय लोगों से मिलते-जुलते और साथ ही अपनी पुरानी आदत के मुताबिक बच्चों के बीच चाॅकलेट भी बांटते.
लेकिन जब लोकसभा चुनाव का नतीजा आया, तो बीजेपी सीधे जमीन पर आ गिरी. ‘फील गुड’ और ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा बुरी तरह पिट चुका था. लेकिन इसके साथ ही बंगाल, केरल और त्रिपुरा में कांग्रेस भी पिट चुकी थी. गनीमत बस इतनी थी कि प्रणब मुखर्जी और अधीर रंजन चौधरी जैसे चंद कांग्रेसी नेता एवं ममता बनर्जी के रूप में तृणमूल कांग्रेस अपना खाता खोलने में कामयाब हो पाया था. इन तीनों राज्यों में लेफ्ट की आंधी ने कम्युनिस्टों को लोकसभा में अबतक की सबसे बड़ी सदस्य संख्या (64 एमपी) तक पहुंचा दिया था. लेकिन पूरे देश से आए चुनावी नतीजों के मुताबिक, कांग्रेस 145 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी और उसे लेफ्ट के साथ-साथ राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी और तमिलनाडु की डीएमके का भी समर्थन प्राप्त था. लिहाजा अब सरकार के नेता, यानी प्रधानमंत्री की तलाश शुरू हुई.
सबसे पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हुई और उसमें सोनिया गांधी को संसदीय दल का नेता चुना गया. इसके बाद सोनिया गांधी राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंचीं, लेकिन सरकार बनाने का कोई दावा पेश नहीं किया. वे लौटीं और एकबार फिर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाई. इस बैठक में उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर प्रधानमंत्री पद को स्वीकार न करने का ऐलान कर दिया. यह बात और है कि सोनिया गांधी के संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद से ही भाजपा और विपक्ष की तरफ से उनके विदेशी मूल के मुद्दे पर प्रदर्शन शुरू हो गया था. मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती केदारनाथ जाने की धमकी दे रही थीं, तो सुषमा स्वराज बाल मुड़वाकर पूरी जिंदगी हरे चने खाकर गुजारने की बातें कर रहीं थी.
खैर, बात जो भी रही हो, लेकिन सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था और तब सबकी नजर प्रणब मुखर्जी पर चली गई. वरिष्ठता और अनुभव के लिहाज से वे प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे फिट उम्मीदवार माने जा रहे थे. और अब तो उन्होंने लोकसभा चुनाव जीतकर वह दाग भी धो दिया था, जिसे कुछ लोग उनसे जोड़कर देखा करते थे कि वे पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से संसद पहुंचने वाले राजनेता हैं और उनका कोई जनाधार नहीं है. हालांकि राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा के साथ-साथ दो और कांग्रेसी नेताओं (मनमोहन सिंह और अर्जुन सिंह) के नाम भी चल रहे थे, लेकिन वे दोनों ही पिछले दरवाजे, यानी राज्यसभा के सदस्य थे.
Pranab Mukherjee With Manmohan Singh

मनमोहन सिंह के साथ प्रणब मुखर्जी.

काफी हंगामे के बाद भी जब सोनिया गांधी नहीं मानीं, तब नए नेता के चुनाव के लिए एक बाद फिर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाने की नौबत आ गई. लेकिन याद रखिए, इस बार संसदीय दल की बैठक नहीं बुलाई गई, बल्कि सभी कांग्रेसी लोकसभा सदस्यों से एक ड्राफ्ट पर दस्तखत करवाए गए, जिसमें मनमोहन सिंह को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने की बात की गई थी. इसके बाद सभी सहयोगी दलों की ओर से मनमोहन सिंह के समर्थन की चिट्ठी राष्ट्रपति को भेजी गई. तब जाकर 22 मई, 2004 को डॉक्टर मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने. इस प्रकार प्रणब मुखर्जी एक बार फिर मात खा गए. यह मात उन्हें उस व्यक्ति के हाथों मिली थी, जिन्हें 1982 में बतौर वित्त मंत्री प्रणब दा ने अपने हस्ताक्षर और मुहर से 1982 में रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाने की सिफारिश प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजी थी. अक्टूबर 2017 में प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द कोअलिशनंस इयर्स’ के विमोचन के मौके पर मनमोहन सिंह ने कहा भी था-
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ऐसी शख्सियत के मालिक थे स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी, जिनके बारे में अक्सर लोग यह कहते मिल जाते हैं कि वे इस देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए तमाम आवश्यक योग्यता रखते थे.


विडियो- इंदिरा गांधी क्यों कहती थीं कि प्रणब के मुंह से सिर्फ धुआं निकल सकता है, कांग्रेस का राज नहीं

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