प्रणब मुखर्जी. सियासत का वो चेहरा, जिसने 43 बरस तक लुटियंस दिल्ली के सियासीसमीकरणों को समझने-बूझने, समझाने, सुलझाने और (कुछ चंद लोगों की नजरों में) उलझानेमें लगा दिए. इसके बाद लुटियंस दिल्ली की सबसे ऊंची जगह, यानी रायसीना हिल्सपहुंचे. नॉर्थ और साउथ ब्लाॅक में उन्होंने बतौर रक्षा, विदेश और वित्त मंत्री एकलंबा समय गुजारा. 2012 में वे भारत के 13वें राष्ट्रपति बने और अपने सियासी करियरको अलविदा कह दिया था. लेकिन अपने लंबे राजनीतिक जीवन में प्रणब दा को कई बार मातभी खानी पड़ी थी. हम उन पांच अवसरों की चर्चा करने जा रहे हैं, जब उन्हें मात खानीपड़ी थी.पहली हार1977 का लोकसभा चुनाव आया और इस चुनाव में इंदिरा विरोधी लहर चल रही थी. आपातकाल कीज्यादतियों के कारण कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) जनता की नजरों से उतर गई थी. विपक्षीएकता के नाम पर बनी जनता पार्टी ने तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) के साथगठबंधन किया था. हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) तक भी कांग्रेस(रिक्विजिशनिस्ट) के साथ ही थी.इस चुनाव में बंगाल की मालदा लोकसभा सीट पर कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) ने वित्त उपमंत्री प्रणब मुखर्जी को मैदान में उतारा. तब उनका मुकाबला मार्क्सवादी कम्युनिस्टपार्टी के दिनेश चंद्र जोरदार से हुआ. यहां से स्थानीय कांग्रेसी नेता ए.बी.ए. गनीखान चौधरी की दावेदारी को दरकिनार कर प्रणब मुखर्जी को टिकट दिया गया था. इसके कारणगनी खान चौधरी व्यंग्यात्मक लहजे में प्रणब मुखर्जी को Rootless Wanderer भी कहाकरते थे. लेकिन उनके ऐसा कहने का कांग्रेस आलाकमान पर कोई असर तो पड़ना नहीं था.प्रणब दा को टिकट मिल गया तो मिल गया. प्रणब मुखर्जी ने दिनेश चंद्र जोरदार सेजोरदार चुनावी मुकाबला किया, लेकिन अंततः इस मुकाबले में उन्हें हार का स्वाद चखनापड़ा. वे करीब 30 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे.1977 का लोकसभा चुनाव हार गए थे प्रणब मुखर्जी.दूसरी हार1979-80 का लोकसभा चुनाव. लगभग दो साल पहले कांग्रेस बंट चुकी थी. तब प्रणब मुखर्जीइंदिरा गांधी की कांग्रेस (ई) अथवा इंका के साथ आ चुके थे. इस चुनाव के लिए प्रणबदा ने इंका अध्यक्ष इंदिरा के सामने चुनाव लड़ने की जिद पकड़ ली. वे इंदिरा के पासपहुंचे और बोले- मैडम, मैं भी चुनाव लडूंगा और इस बार बोलपुर से लडूंगा. तब इंदिरागांधी ने उनकी पत्नी सुर्वा मुखर्जी से बात की और फिर उन्हें समझाया- प्रणब,तुम्हें फील्ड की सियासत की कुछ समझ नहीं है, इसलिए चुनाव लड़ने की मत सोचो. वैसेभी वह इलाका वामपंथियों का गढ़ है. तुम्हारी पत्नी भी नहीं चाहती कि तुम चुनावीमैदान में उतरो. इस पर प्रणब ने उन्हें यह कहकर कन्विंस करने की कोशिश की कि चूंकिवो गांव से उठकर यहां तक पहुंचे हैं और उस इलाके की नस-नस से वाकिफ हैं, इसलिएउन्हें चुनाव जीतने में कोई दिक्कत नहीं होगी.इंदिरा ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिशें की, लेकिन प्रणब दा नहीं माने. अंततःइंदिरा गांधी को प्रणब दा की जिद के आगे झुकना पड़ा. प्रणब दा बोलपुर पहुंचे औरपर्चा भरा. दिन-रात मेहनत करके चुनाव प्रचार किया, लेकिन जब नतीजा सामने आया, तबइंदिरा गांधी की आशंका सही निकली. प्रणब दा को सीपीएम के सारादीश राय से मात हाथलगी थी.इसके बाद प्रणब मुख़र्जी निराश होकर कोलकाता में बैठ गए. पूरे देश में इंका को भारीसफलता मिली थी. 353 सीटें मिली थीं इंका को. लेकिन तब भी प्रणव दा चुनाव हार गए थे.वे कोलकाता के अपने घर में ही बैठे थे, तभी उन्हें इंदिरा गांधी ने फोन किया औरदिल्ली पहुंचने को कहा.प्रणब मुखर्जी डनहिल की पाइप पीने के शौकीन थे.इसके बाद बुझे मन से प्रणब दा ने दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और जब वे दिल्ली एयरपोर्टपर उतरे, तब उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि उन्हें रिसीव करने के लिए खुद संजयगांधी खड़े थे. संजय गांधी उन्हें लेकर सीधे 12 विलिंग्डन क्रिसेंट (जो तब इंदिरागांधी का आवास हुआ करता था) पहुंचे. अपनी जिद के कारण शर्मिंदा प्रणब दा ने किसीप्रकार इंदिरा गांधी का सामना किया. लेकिन इंदिरा ने प्रणब की आशंका के ठीक उलटउनसे व्यवहार किया. प्रणब दा को आशंका थी कि इंदिरा गांधी नाराज होंगी, लेकिनइंदिरा ने बेहद गर्मजोशी दिखाते हुए उनसे कहा- प्रणब, मैंने तुमसे कहा था ना किचुनाव लड़ने की जिद मत करो. खैर, कोई बात नहीं. जल्दी से अपने घर जाओ और कैबिनेटसचिव के फोन का इंतजार करो. * नई सरकार के गठन के दौरान शपथ लेने वाले मंत्रियों कोकैबिनेट सचिव के द्वारा ही औपचारिक सूचना दी जाती है. इसके बाद 14 जनवरी को मकरसंक्रांति के दिन इंदिरा गांधी और उनके मंत्रिमंडल ने शपथ ग्रहण की. प्रणब दा कोइस्पात और खान मंत्री बनाया गया था. इंदिरा गांधी को प्रणब दा पर इतना भरोसा था किवे अक्सर कहा करती थीं- प्रणब के मुंह से कभी कोई बात नहीं निकलवाई जा सकती. उनकेमुंह से सिर्फ धुआं ही निकलता है. प्रणब मुखर्जी डनहिल पाइप पीने के शौकीन थे, इसीवजह से इंदिरा गांधी ने उनके बारे में ‘धुआं’ निकलने वाली बात कही थी.तीसरी हारइस हार ने प्रणब मुखर्जी को अंदर तक हिला दिया था. अक्टूबर का महीना. 1984 का साल.प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या और उसके बादराजीव गांधी और उनकी नई टीम (जिसमें अरुण नेहरू, अरुण सिंह और सुमन दुबे जैसे नएलोगों की किचेन कैबिनेट बन चुकी थी) का प्रणब मुखर्जी के प्रति अविश्वास की भावना.इस कोटरी ने कथित तौर पर राजीव गांधी के मन में प्रणब मुखर्जी के प्रति इतनीकड़वाहट भर दी कि राजीव ने पहले उन्हें कैबिनेट से हटाया और 16 महीने बाद अप्रैल1986 में पार्टी से ही निकाल दिया. अब प्रणब मुखर्जी की हालत ऐसी कि ‘काटो तो खूननहीं.’ उन्हें खुद नहीं पता था कि आखिर उनका गुनाह क्या है, जो पहले उन्हें कैबिनेटसे हटाया गया और अब पार्टी से भी निकाल दिया गया. ऐसे में निराश प्रणब मुखर्जी नेअपनी नई पार्टी बनाई और उसका नाम रखा- राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा). और इसपार्टी का पहला लिटमस टेस्ट था 1987 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव.इसी वर्ष प्रणब दा का राज्यसभा का तीसरा कार्यकाल भी समाप्त हो रहा था, लिहाजाउन्हें अपनी पार्टी के लिए इतने विधायक चाहिए थे कि वे पुनः राज्यसभा पहुंच सकें.उधर राजीव गांधी की कांग्रेस (ई) यानी इंका भी डेढ़ दशक बाद पहली बार बंगालविधानसभा चुनाव में जी-तोड़ मेहनत करती दिख रही थी. और करती भी क्यों नहीं, 1984 केलोकसभा चुनाव में बंगाल में कांग्रेस को वैसी ही सफलता मिली थी, जैसी 2019 केलोकसभा चुनाव में बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को मिली थी. उस वक्त भी केन्द्र मेंसत्तारूढ़ पार्टी (इंका) की राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी (सीपीएम) के साथ बुरी तरहठनी हुई थी. ठीक वैसे ही, जैसे आज बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच ठनी हुई है.ऐसे तीखे माहौल के बीच प्रणब मुखर्जी का राज्य की राजनीति में अपनी जगह बनाना आसाननहीं था. लेकिन उनकी अपनी सियासी मजबूरियां थीं. उन्हें सियासत में जमे रहना था औरसाथ ही इंकाइयों को अपनी अहमियत का अहसास भी कराना था. इसी उद्देश्य से उनकीराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) ने लगभग ढाई सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ेकर दिए. साथ ही अपने सीमित संसाधनों के साथ चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया. अब ऐसेमें एक तरफ काडर बेस पार्टी सीपीएम का ग्रासरूट संगठन, जबकि दूसरी तरफ लोकसभा में400 से ज्यादा सांसदों वाली इंका का संसाधन. जाहिर सी बात है कि इतने तीखे औरनुकीले चुनावी अभियान के बीच प्रणब मुखर्जी का अपनी जगह बना पाना कोई आसान काम नहींथा.इसलिए जब चुनाव नतीजा आया, तो उसमें इंका के लिए तो सरप्राइज था, लेकिन प्रणब दा कीराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) के लिए कोई सरप्राइज नहीं था. सीपीएम अपनेवाममोर्चा के साथी दलों (सीपीआई, फॉरवर्ड ब्लाक एवं आरएसपी) के साथ एकबार फिर बड़ीजीत दर्ज करने में कामयाब रहा था, जबकि इंका को इतने बड़े और तीखे चुनाव अभियान केबावजूद कुछ खास हासिल नहीं हुआ था. प्रणब दा की पार्टी की हालत तो इतनी पतली थी किउसके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. इस हार ने उन्हें अंदर तक हिलादिया था, क्योंकि इसके कुछ ही दिनों के बाद उनका राज्यसभा का कार्यकाल भी खत्म होगया और वे लुटियंस दिल्ली का अपना सरकारी बंगला छोड़ कर ग्रेटर कैलाश के अपने निजीमकान में शिफ्ट होने पर मजबूर हो गए थे.राजीव गांधी के साथ प्रणब मुखर्जी.लेकिन इसी बीच दिल्ली की सियासत में एक बड़ा बवंडर खड़ा हो गया, जिससे इंका हाईकमानऔर राजीव गांधी को प्रणब मुखर्जी की अहमियत का बड़ी शिद्दत से अहसास करवा दिया. एकऐसा बवंडर, जिसने इंका (यानी आज की कांग्रेस) की चूलें ऐसी हिलाईं, जिससे पार्टी आजतक उबर नहीं पाई और कभी भी अपने दम पर बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी.उस वक्त The Hindu अखबार की संवाददाता चित्रा सुब्रह्मण्यम ने स्वीडिश रेडियो कीखबर के हवाले से एक ऐसी रिपोर्ट छाप दी, जिसने हिंदुस्तान की सियासत में हंगामाखड़ा कर दिया. इस रिपोर्ट ने ढाई साल पहले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिट चुकेविपक्ष में जान फूंक दी, साथ ही इंका के अंदर की सियासत को भी सड़क पर ला दिया. यहमामला स्वीडन से हुई बोफोर्स तोप की खरीद में दलाली से जुड़ा था और बकौल चित्रासुब्रह्मण्यम, यह दलाली दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान के करीबी लोगों तक पहुंची थी.अब जाहिर है कि हंगामा तो होना ही था, क्योंकि कुछ महीने पहले से ही जर्मन पनडुब्बीकी खरीद का मामला भी इसी प्रकार की सुर्खियां बटोर रहा था. जर्मन पनडुब्बी की खरीदमें अनियमितता के मुद्दे पर राजीव गांधी की कैबिनेट से इस्तीफा दे चुके पूर्व वित्तऔर रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने (जो कभी राजीव को विवेकानंद का अवतार तककहते नहीं थकते थे) अब इस मुद्दे को उठा लिया और अपनी सभाओं में शेरवानी की पाॅकेटसे एक पर्ची निकालकर लोगों को ये बताने लगे- बोफोर्स के दलालों का नाम इस पर्ची मेंहै. आपलोग हमें वोट देकर सत्ता में लाइये और सत्ता में आते ही मैं इन सभी दलालों कोजेल में डाल दूंगा. वीपी सिंह यहां तक दावा करते कि बोफोर्स दलाली की रकम के बड़ेहिस्से को स्विस बैंक में LOTUS नाम से एक अकाउंट खोलकर, उसमें जमा किया है. बकौलवीपी, LOTUS का हिंदी में अर्थ कमल अथवा राजीव होता है.अब ये सब बातें सुनकर जनता भी राजीव गांधी के खिलाफ होने लगी और उनके खिलाफ‘गली-गली में शोर है ….. जैसे नारे लगने लगे. साथ ही हताश विपक्ष भी (लेस्ट से लेकरराइट तक) वीपी सिंह के पीछे इकट्ठा होने लगा.राजीव के खिलाफ वीपी सिंह के इस अभियान में राजीव के वैसे करीबी लोग, मसलन अरुणनेहरू भी शामिल हो गए, जिन्होंने राजीव को उकसाकर प्रणब मुखर्जी की इंका सेमुअत्तली करवाई थी. वहीं उनके दूसरे युवा सहयोगियों, मसलन अभिताभ बच्चन और अरुणनेहरू ने सियासत से ही तौबा कर लिया. लिहाजा राजीव गांधी एकदम अकेले पड़ने लगे,क्योंकि जिस युवा ब्रिगेड के उकसावे पर उन्होंने प्रणब मुखर्जी और कमलापति त्रिपाठीजैसे वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगाया था, अब वे सभी उनका साथ छोड़ चुके थे.यह स्थिति प्रणब मुखर्जी की इंका में वापसी की जमीन तैयार करने के लिए एकदम माकूलथी. दोनों तरफ (राजीव और प्रणब) से पहल हुई और तब 1989 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहलेप्रणब मुखर्जी ने अपनी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस (इंदिरा) का इंका में विलय करदिया. साढ़े तीन साल के वनवास के बाद अंततः प्रणब दा की घर वापसी हो गई थी. लेकिनसंसद और सरकार का हिस्सा बनने में अभी भी चार साल बाकी थे. चार साल बाद 1993 मेंनरसिंह राव की सरकार में बतौर वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी की केन्द्रीयमंत्रिमंडल में वापसी हुई थी.4 साल बाद 1993 में प्रणब मुखर्जी की केन्द्रीय मंत्रिमंडल में वापसी हुई थी.चौथी हारवीपी सिंह सरकार के पतन के बाद साल 1990 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन चाहतेथे कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनें, लेकिन राजीव गांधी कुछ और ही सोच रहे थे.यह दावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गांधी परिवार के वफादार रहे माखनलाल फोतेदार कीकिताब ‘द चिनार लीव्ज’ में किया गया है.किताब में फोतेदार ने लिखा है कि 1990 में जब वीपी सिंह के इस्तीफे के संबंध मेंराजनीतिक स्थिति पर विचार-विमर्श करने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति वेंकटरमन सेमुलाकात की, तो राष्ट्रपति ने जोर देते हुए उनसे कहा था कि राजीव को मुखर्जी कासमर्थन करना चाहिए. फोतेदार लिखते हैं- मैंने राष्ट्रपति वेंकटरमन से मुलाकात की औरराजनीतिक स्थिति पर उनके साथ चर्चा की. मैंने उन्हें बताया कि वर्तमान हालात मेंकेवल कांग्रेस पार्टी ही समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चल सकती है और एक मजबूत वस्थिर सरकार दे सकती है. उन्होंने आगे लिखा है- मैंने उनसे आग्रह किया कि वह अगलीसरकार का नेतृत्व करने के लिए राजीव को आमंत्रित करें, क्योंकि राजीव लोकसभा मेंअकेले सबसे बड़े दल के नेता थे. इस पर वेंकटरमण ने मुझसे जोर देते हुए कहा कि मुझेराजीव गांधी को यह बताना चाहिए कि अगर वह प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब मुखर्जी कासमर्थन करते हैं, तो वे उन्हें उसी शाम उन्हें पद की शपथ दिलाएंगे. आगे फोतेदारलिखते हैं- जब मैंने ये बात राजीव गांधी को बताई, तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ. उसकेबाद उन्होंने जनता दल के टूटे धड़े के नेता चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री पद के लिएसमर्थन देने वाली चिट्ठी राष्ट्रपति भवन भेज दी थी. जाहिर है इस बार भी प्रणबमुखर्जी को मात खानी पड़ी थी.पांचवीं हारएक बार फिर प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए.सोनिया गांधी के साथ प्रणब मुखर्जी.2004 का साल. फील गुड और इंडिया शाइनिंग के शोर-शराबे के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्रीअटल बिहारी वाजपेयी ने आठ महीने पहले ही लोकसभा को भंग कर दिया और लोकसभा चुनावकरवा दिए. अब अचानक सामने आई इस परिस्थिति ने कांग्रेस को भी लोकसभा चुनाव कीतैयारियों में झोंक दिया.उधर पश्चिम बंगाल में नए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुख्यमंत्री बनने केबाद यह पहला लोकसभा चुनाव था. लिहाजा उनकी भी प्रतिष्ठा दांव पर थी. ऐसे मेंकांग्रेस हाइकमान ने अपने वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी को भी लोकसभा चुनाव लड़ाने काफैसला कर दिया. प्रणब मुखर्जी को बंगाल की जंगीपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया गया.इसके बाद वे जंगीपुर पहुंचे और अपना चुनावी अभियान शुरू किया. स्थानीय लोगों सेमिलते-जुलते और साथ ही अपनी पुरानी आदत के मुताबिक बच्चों के बीच चाॅकलेट भीबांटते.लेकिन जब लोकसभा चुनाव का नतीजा आया, तो बीजेपी सीधे जमीन पर आ गिरी. ‘फील गुड’ और‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा बुरी तरह पिट चुका था. लेकिन इसके साथ ही बंगाल, केरल औरत्रिपुरा में कांग्रेस भी पिट चुकी थी. गनीमत बस इतनी थी कि प्रणब मुखर्जी और अधीररंजन चौधरी जैसे चंद कांग्रेसी नेता एवं ममता बनर्जी के रूप में तृणमूल कांग्रेसअपना खाता खोलने में कामयाब हो पाया था. इन तीनों राज्यों में लेफ्ट की आंधी नेकम्युनिस्टों को लोकसभा में अबतक की सबसे बड़ी सदस्य संख्या (64 एमपी) तक पहुंचादिया था. लेकिन पूरे देश से आए चुनावी नतीजों के मुताबिक, कांग्रेस 145 सीटों केसाथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी और उसे लेफ्ट के साथ-साथ राष्ट्रीय जनतादल, लोक जनशक्ति पार्टी और तमिलनाडु की डीएमके का भी समर्थन प्राप्त था. लिहाजा अबसरकार के नेता, यानी प्रधानमंत्री की तलाश शुरू हुई.सबसे पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हुई और उसमें सोनिया गांधी को संसदीय दल कानेता चुना गया. इसके बाद सोनिया गांधी राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिलनेराष्ट्रपति भवन पहुंचीं, लेकिन सरकार बनाने का कोई दावा पेश नहीं किया. वे लौटीं औरएकबार फिर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाई. इस बैठक में उन्होंने अपनी ‘अंतरात्माकी आवाज’ पर प्रधानमंत्री पद को स्वीकार न करने का ऐलान कर दिया. यह बात और है किसोनिया गांधी के संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद से ही भाजपा और विपक्ष की तरफसे उनके विदेशी मूल के मुद्दे पर प्रदर्शन शुरू हो गया था. मध्य प्रदेश कीमुख्यमंत्री उमा भारती केदारनाथ जाने की धमकी दे रही थीं, तो सुषमा स्वराज बालमुड़वाकर पूरी जिंदगी हरे चने खाकर गुजारने की बातें कर रहीं थी.खैर, बात जो भी रही हो, लेकिन सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दियाथा और तब सबकी नजर प्रणब मुखर्जी पर चली गई. वरिष्ठता और अनुभव के लिहाज से वेप्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे फिट उम्मीदवार माने जा रहे थे. और अब तो उन्होंनेलोकसभा चुनाव जीतकर वह दाग भी धो दिया था, जिसे कुछ लोग उनसे जोड़कर देखा करते थेकि वे पिछले दरवाजे (राज्यसभा) से संसद पहुंचने वाले राजनेता हैं और उनका कोईजनाधार नहीं है. हालांकि राजनीतिक हलकों में प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा केसाथ-साथ दो और कांग्रेसी नेताओं (मनमोहन सिंह और अर्जुन सिंह) के नाम भी चल रहे थे,लेकिन वे दोनों ही पिछले दरवाजे, यानी राज्यसभा के सदस्य थे.मनमोहन सिंह के साथ प्रणब मुखर्जी.काफी हंगामे के बाद भी जब सोनिया गांधी नहीं मानीं, तब नए नेता के चुनाव के लिए एकबाद फिर कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाने की नौबत आ गई. लेकिन याद रखिए, इस बारसंसदीय दल की बैठक नहीं बुलाई गई, बल्कि सभी कांग्रेसी लोकसभा सदस्यों से एकड्राफ्ट पर दस्तखत करवाए गए, जिसमें मनमोहन सिंह को कांग्रेस संसदीय दल का नेताचुने जाने की बात की गई थी. इसके बाद सभी सहयोगी दलों की ओर से मनमोहन सिंह केसमर्थन की चिट्ठी राष्ट्रपति को भेजी गई. तब जाकर 22 मई, 2004 को डॉक्टर मनमोहनसिंह देश के प्रधानमंत्री बने. इस प्रकार प्रणब मुखर्जी एक बार फिर मात खा गए. यहमात उन्हें उस व्यक्ति के हाथों मिली थी, जिन्हें 1982 में बतौर वित्त मंत्री प्रणबदा ने अपने हस्ताक्षर और मुहर से 1982 में रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाने की सिफारिशप्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजी थी. अक्टूबर 2017 में प्रणब मुखर्जी की किताब ‘दकोअलिशनंस इयर्स’ के विमोचन के मौके पर मनमोहन सिंह ने कहा भी था- प्रणब मुखर्जी केपास यह मानने के वाजिब कारण हैं कि वे मुझसे बेहतर प्रधानमंत्री साबित हो सकते थे.ऐसी शख्सियत के मालिक थे स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी, जिनके बारे में अक्सर लोग यह कहतेमिल जाते हैं कि वे इस देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए तमाम आवश्यक योग्यता रखतेथे.--------------------------------------------------------------------------------विडियो- इंदिरा गांधी क्यों कहती थीं कि प्रणब के मुंह से सिर्फ धुआं निकल सकता है,कांग्रेस का राज नहीं