दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में केंद्र सरकार के कृषि क़ानूनों के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं. और ऐसे में दो भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बयानआए हैं. बयान ऐसे जो केंद्र के दावों से उलट जाते हैं. पहला राज्य : हरियाणा सीएममनोहर लाल खट्टर. उन्होंने 29 सितम्बर को ही ऐलान कर दिया कि हरियाणा सरकार दूसरेराज्यों के किसानों से फ़सल नहीं ख़रीदेगी. उनका वीडियो वायरल हुआ था. ख़बरें भीचली थीं. कुछ दिनों बाद ख़बर आयी कि सरकार ने कहा कि दूसरे राज्यों के किसानों कोअपनी फ़सल हरियाणा में बेचने के लिए राज्य के पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना होगा. औरआख़िर में 28 नवंबर को मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि बग़ल के राज्य राजस्थान में बाजरासस्ता है, तो लोग वहां से ख़रीदकर हरियाणा में बेच रहे हैं. राजस्थान का बाजराहरियाणा में बिकने नहीं दिया जाएगा.हरियाणा की अनाज मंडियों में बाजरा ₹2,150/ क्विंटल की दर से खरीदा जा रहा है, जबकिपड़ोसी राज्य राजस्थान में ₹1300 के भाव पर बाजरा बिक रहा है। इसलिए वहां से बाजरालाकर हरियाणा में बेचने की शिकायतें मिल रही हैं। वहां का बाजरा यहां बिकने नहींदिया जाएगा।— Manohar Lal (@mlkhattar) November 28, 2020 दूसरा राज्य : मध्य प्रदेश सीएमशिवराज सिंह चौहान. समाचार एजेंसी ANI ने ट्वीट किया कि शिवराज ने कहा है कि दूसरेराज्यों से कोई बेचने आया तो ट्रक ज़ब्त कर लिया जाएगा, और उसे जेल भेज दिया जाएगा.मैंने तय किया है कि जितनी पैदावार किसान की यहां होगी उतनी खरीद ली जाएगी। लेकिनअगर बाहर से कोई आया, अगल-बगल के राज्यों से बेचने या बेचने का प्रयास भी किया तोउसका ट्रक राजसात करवाकर उसे जे़ल भिजवा दिया जाएगा: म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान pic.twitter.com/t2RuUb1ZIn— ANI_HindiNews (@AHindinews) December 3, 2020 अब चलिए दो और ट्वीट्स पर नज़र मारलेते हैं. पहला ट्वीट : नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्रीकोई भी व्यक्ति अपना उत्पाद, दुनिया में कहीं भी बेच सकता है, जहां चाहे वहां बेचसकता है।लेकिन केवल मेरे किसान भाई-बहनों को इस अधिकार से वंचित रखा गया था। अब नए प्रावधानलागू होने के कारण, किसान अपनी फसल को देश के किसी भी बाजार में, अपनी मनचाही कीमतपर बेच सकेगा: PM — PMO India (@PMOIndia) September 18, 2020 दूसरा ट्वीट :नरेंद्र सिंह तोमर, केंद्रीय कृषि मंत्रीकिसान भाई, विपक्ष द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार से रहें सावधान...कृषि विधेयक ने किया है तरक्की का प्रावधान... अनुबंध खेती से किसानों को निर्धारितदाम पाने की मिलेगी गारंटी, किसान किसी भी करार से बंधा नहींहोगा...#MSPhaiAurRahega #JaiKisan pic.twitter.com/k2kJDX14rC — Narendra SinghTomar (@nstomar) September 22, 2020 सवाल : जब केंद्र सरकार एक देश और एक मंडी कादावा कर रही है और ये कह रही है कि कोई भी किसान अपना प्रोडक्ट कहीं भी जाकर बेचसकता है, तो इसमें हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के नए ऐलान कैसे कारगरहो सकते हैं? कैसे कोई राज्य किसानों को अपने यहां अनाज बेचने से रोक सकता है? इससवाल का जवाब जानने के लिए सबसे पहले क़ानूनों का रूख करें. जून में संसद द्वारापास किया गया एसेंशियल कमोडिटी एक्ट और सितम्बर में पास किए गए कृषि क़ानूनों मेंकहीं भी ये प्रावधान नहीं है कि कोई भी राज्य किसी भी किसान को उसका उत्पाद बेचनेसे रोक सकता है. तो? सबसे पहले हमने जय किसान आंदोलन और स्वराज इंडिया के नेता अविकसाहा से बात की. अविक साहा ने कहा, “ये मूलतः ग़ैरक़ानूनी है. आप किसी किसान कोउसका उत्पाद बेचने से रोक नहीं सकते हैं. अगर मध्य प्रदेश या हरियाणा के लोगों कोनासिक के अंगूर खाने हों या पहाड़ों में पैदा किए जा रहे सेब खाने हों, और इनराज्यों में उत्पादन ही नहीं है तो आप क्या उगाने लगेंगे? अभी से नहीं, ये बहुतपहले से है कि किसान अपने उत्पाद किसी भी राज्य में जाकर बेच सकते हैं. और इसप्रचारित और विवादित क़ानून के बाद राज्य इससे मना नहीं कर सकते हैं.” लेकिन बातइतनी ही नहीं है. किसानों के मुद्दों पर गहरी नज़र बनाए वक़ील-विशेषज्ञ कुछ महीनबातें बताते हैं. सबसे पहले चंडीगढ़ हाईकोर्ट में वक़ील राजीव गोदारा कहते हैं,“देखिए, हो सकता है कि ये MSP वाली फ़सलों के लिए राज्य सरकारें कह रही हों. सारीफ़सलों के लिए नहीं. लेकिन वो किस आधार पर किन फ़सलों की बिक्री रोकेंगी, ये तोउनकी पूरी मंशा सामने आने के बाद ही पता चलेगा. आधे-अधूरे और इतने अस्पष्ट बयान केआधार पर साफ़ नहीं कहा जा सकता है.” सुप्रीम कोर्ट के वक़ील अनस तनवीर हमसे बातचीतमें बताते हैं, “अभी किसानों की सबसे बड़ी लड़ाई फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्ययानी MSP को लेकर है. वो केंद्र से इस बारे में स्पष्टीकरण चाहते हैं.” अनस तनवीरआगे समझाते हैं, “देखिए, किसान तो पहले से ही अपनी उपज दूसरे राज्यों में ले जाकरबेचते रहे हैं. अब राज्यों के पास ख़रीद-बिक्री का जो हिसाब होता है, उसके आधार परराज्य ये तय कर सकते हैं कि वो कौन-सा अनाज कब ख़रीदेंगे. ये उनके अधिकार में है.ये हमेशा से होता आया है कि राज्य अपने गोदामों की क्षमता के अनुसार ख़रीद करते रहेहैं.” यानी विशेषज्ञों की मानें, तो राज्यों के पास अनाजी फ़सलों को लेकर ये अधिकारहैं कि वो ख़रीद बिक्री को नियंत्रित करें, लेकिन जैसा शिवराज क़ह रहे हैं किकिसानों को जेल में डाल दिया जाएगा, वो मुमकिन है? अनस तनवीर बताते हैं, “ये अधिकारकिसी भी हाल में राज्यों के पास नहीं है. आप ख़रीद-बिक्री ही नियंत्रित कर सकतेहैं. नोटिस जारी कर सकते हैं. बहुत हुआ तो किसानों को ख़ाली हाथ लौटा सकते हैं.लेकिन किसानों के पास राइट टू ट्रेड है. यानी बिज़नेस करने का अधिकार. आप उसकोक्रिमिनलाइज़ नहीं कर सकते हैं. आप किसी भी हाल में किसानों को जेल में नहीं डालसकते हैं.” तो राज्यों को इतनी ताक़त मिलती कैसे है? और उपाय क्या हैं? और इस पूरेझंझावात के पीछे का दांवपेंच क्या है? हमसे बातचीत में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठवक़ील प्रशांत भूषण बताते हैं, “आप ऐसे समझिए. जब इस बिल को सुप्रीम कोर्ट मेंचैलेंज किया जाएगा, तो सबसे पहला सवाल यही उठेगा कि इस बिल को बनाने में राज्यों कीसहमति क्यों नहीं ली गयी?” राज्यों की सहमति इसलिए क्योंकि कृषि उत्पादों कीख़रीद-फ़रोख़्त केंद्र नहीं राज्यों के हाथों में है. प्रशांत भूषण आगे कहते हैं,“राज्य देशव्यापी क़ानून तो नहीं बना सकते हैं, लेकिन राज्यों से विमर्श की बात होसकती है. जहां तक बात मध्य प्रदेश की है, अगर उन्हें दूसरे किसानों को अपना उत्पादबेचने से रोकना है, तो उन्हें इसके लिए विधानसभा से क़ानून पारित कराना होगा. तभीआप इसे क़ानूनी तरीक़े से अंजाम दे पाएंगे.” यानी क्या बात साफ़ हुई? बात ये किराज्य सारे उत्पादों को प्रतिबंधित नहीं कर सकते हैं. कृषि अधिकतर राज्यों कीज़िम्मेदारी है, और चूंकि केंद्र का क़ानून है तो ये सवाल उठ सकते हैं कि राज्योंसे विमर्श क्यों नहीं हुआ और राज्य फ़सलों को रोक तो सकते हैं लेकिन किसानों काआपराधिक ट्रीटमेंट नहीं कर सकते हैं. किसी भी अवस्था के लिए क़ानून ज़रूरी है.