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'काशी' ने कृष्ण को भगवान से इंसान बनाया

काशीनाथ सिंह का जन्मदिन है आज. उनका उपन्यास है उपसंहार. भारत की पौराणिक कथाओं में इंट्रेस्ट रखने वाले ध्यान दें. इसको पढ़ना अचीवमेंट है

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1 जनवरी 2016 (अपडेटेड: 1 जनवरी 2016, 10:56 AM IST)
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  काशी जाकर दशाश्वमेध घाट पर बेतकल्लुफ होकर बैठो. सांझ होते ही घंटियों की अनवरत आवाज आती है कानों में. फिर थोड़ी देर में गंगा आरती शुरू होती है. आंखें जगमग से थक गई हों तो मूंद लो. मुंदी आंखों में जो शक्लें घूमती हैं उनमें एक होंगे काशीनाथ सिंह. वही काशीनाथ सिंह जिनके उपन्यास 'काशी का अस्सी' पर मोहल्ला अस्सी फिल्म बनी थी. जो रिलीज नहीं हुई. उन्हीं काशीनाथ सिंह का आज जन्मदिन है. उनका एक और उपन्यास है 'उपसंहार' . राजकमल पब्लिकेशन से छपी है. इसमें कृष्ण दिखते हैं. महाभारत के बाद वाले कृष्ण. उस लड़ाई पर पछताते हुए कृष्ण. महाभारत में अपने किए जरूरी -गैरजरूरी चाल कुचालों पर सोचते कृष्ण. अपने खून पसीने पर खड़ी की द्वारिका को तबाह होता देखते कृष्ण. दिग्विजयी देवता से थके हारे आदमी बने कृष्ण की तकलीफ काशीनाथ के अंदाज में हो तो वह ऐसी होगी. बानगी देखिए-  
बरामदे की छत अद्भुत बनाई थी - विश्वकर्मा ने. चांदनी जब उससे छनकर फर्श पर आती थी तो सफेद कालीन जामुनी रंग की हो जाती थी और उसमें लहरों जैसी सलवटें उभर आती थीं. डोंगी जैसी आरामकुर्सी पर अधलेटे कृष्ण जमुना में विहार करते नजर आते थे. सबसे बड़ी बात यह कि उनके चेहरे और देह का रंग भी बदलकर सलेटी से पहले जैसा नीला हो जाता था. और आज तो उनके दोनों पाँव सामने फर्श पर बैठे दारुक की गोद में थे. जैसे - वह माँझी हो और डोंगी खे रहा हो. ‘धीरे-धीरे पंजे भी दबा दे दारुक तो अच्छा हो.’ ऊपर झाड़-फानूस की ओर देखते हुए कृष्ण बोले. जीवन में पहली बार कृष्ण ने अपने पाँव दारुक की गोद में दिए थे. ‘दादा, इधर कुछ दिनों से परेशान देख रहा हूँ मैं.’ दारुक ने कहा. कृष्ण कुछ नहीं बोले, जैसे सुना न हो. ‘आप तो लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुख सबमें समान रहते थे. क्या हो गया इस बीच?’ कृष्ण वैसे ही लेटे पड़े रहे, शायद इस दुविधा में कि कुछ कहें या न कहें. लेकिन दारुक से न कहें तो किससे कहें? ‘दारुक, तीस-पैंतीस साल हो गए, न कभी हस्तिनापुर याद आया, न कुरुक्षेत्रा, न महाभारत! मैं भूला ही रहा. चाहा भी नहीं कि कभी याद आए. मैं इस बीच द्वारका को समृद्ध, सम्पन्न और सुदृढ़ करने में लगा रहा. एक ऐसा गणराज्य बनाने में, जो दूसरे राज्यों के आगे मिसाल हो. जहाँ एक राजा न हो, राज्य का हर नागरिक राजा हो. जो भी राज्य का निर्णय हो, हर नागरिक का निर्णय हो. तुम्हीं बताओ, मैं उस तन्त्र को कैसे स्वीकार करता, जिसके विरुद्ध सारा जीवन लड़ता रहा. ‘लेकिन दारुक! इधर लगातार मेरे भीतर कुछ गूँज हो रही है. उथल-पुथल मची हुई है. वह जगे में नहीं, सोए में भी सुनाई देती है. महाभारत शुरू होने के पहले ही जब दोनों पक्षों की सेनाएँ आमने-सामने डँट गईं, तो धृतराष्ट्र ने संजय से जानकारी चाही. संजय ने गान्धारी वगैरह को बुलवाकर सबके सामने कहा - ‘यतो कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः’ यानि जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं जय है. यह मैंने सुना था. इधर बार-बार यही प्रतिध्वनि मेरे कानों में गूँज रही है कि क्या सचमुच मैंने महाभारत में अठारह दिन धर्माचरण किया था, जिससे विजय मिली?’ कृष्ण थोड़ी देर चुप रहे और सोचते रहे. ‘दारुक, कल आधी रात के आस-पास की घटना है. मुझे गहरी नींद आई ही थी कि कमरे में दरवाजों के पास से कोई चीज घिसटती हुई सी लगी, जैसे कोई घड़ियाल या मगर मेरी पलंग की ओर बढ़ा आ रहा हो. मैंने अदेर रोशनी की. देखा तो टूटी टाँग के साथ घिसटता हुआ दुर्योधन. उसने सिर उठाया और अपनी नहीं, मेरी आवाज में बोला. और वही बोला, जो युद्ध समाप्त होने पर पांडवों से बोला था मैं. आश्चर्य! ‘सुनो, पांडवो सुनो! कौरव महायोद्धा थे. तुम धर्मयुद्ध में किसी प्रकार उन्हें पराजित नहीं कर सकते थे. इसलिए मैंने तुम्हारे कल्याण के लिए छल, कपट और माया के सहारे उनका संहार किया. दुर्योधन को धर्मयुद्ध में परास्त करना यमराज के लिए भी असम्भव था. अतएव भीम ने किन उपायों से उसे मारा, इसे लेकर आलोचना करने का कोई प्रयोजन नहीं है. हम लोग कृतकार्य हुए, विजयी हुए. सायंकाल उपस्थित है. हम लोग घर चलें, विश्राम करें.’ ‘मैं दुर्योधन को रोकूँ या उससे कुछ पूछूँ, इसके पहले ही वह गायब हो गया. ‘इसी तरह दारुक! दो दिन पहले सूर्योदय के समय एक विचित्र घटना घटी. ‘तुम्हें पता है कि मैं उस समय समुद्र में स्नान करता हूँ और सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर उपासना करता हूँ, जब वे उदित होते हैं. जैसे ही मैंने सूर्योपासना खत्म की और आंखें खोलीं, बगल में खड़े कर्ण को देखा. वह भी भीगे वस्त्रों में. मुसकराया - ‘चकित मत हो वासुदेव! ये कुंडल देखकर. काम हो जाने के बाद इन्द्र ने इन्हें वापस कर दिया था मुझे.’ ‘कवच नहीं दिया?’ ‘दे रहा था, मैंने ही नहीं लिया.’ कहा - ‘अब लेकर क्या करूँगा? जब जरूरत थी तब तो मांग लिया था. अब किस काम का?’ ‘हम दोनों बाहर आए. उसका सीना बाणों से बिंधा हुआ था. उसके वस्त्रों से रक्त टपक रहा था.’ ‘अकेला था मैं और अर्जुन के साथ इन्द्र था, तुम थे, मां कुन्ती थीं. मेरे साथ कोई नहीं था. मुझे तुम्हें धन्यवाद देना था. मैंने तुमसे कहा था कि अर्जुन को मत बताना कि वह मेरा भाई है, वरना गांडीव तानते समय उसके हाथ कांप जाएंगे, निशाना चूक जाएगा. तुमने मेरे वचन की रक्षा की, धन्यवाद! ‘हम दोनों श्यामशिला पर कुछ देर बैठे रहे. वह बोलता रहा - ‘लेकिन तुमने मुझे फोड़कर अपने पक्ष में जो करने की कोशिश की थी, वह तुम्हारी गरिमा के अनुकूल नहीं था. यह नहीं करना था तुम्हें....ऐसे ही जब मेरे रथ का पहिया कीचड़ में धंस गया था, मैं विरथ था, अस्त्रहीन भी था, मैंने अर्जुन से कहा था कि देखो, क्षत्रियोचित आचरण करो, मुझे रथ पर आ जाने दो, धनुष-बाण ले लेने दो, तब बाण चलाओ, लेकिन तुमने उससे कहा - ‘नहीं, यही अवसर है, मार दो! मेरी शिकायत यह नहीं है कि तभी उसने मुझे मार गिराया. शिकायत यह है कि तुमने मुझे उसके सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का रूप नहीं देखने दिया. मैं तो रथ पर बैठने के बाद भी मारा जाता, क्योंकि अर्जुन की मृत्यु के मेरे सारे बाण खत्म हो चुके थे, उन्हें पहले ही व्यर्थ कर चुके थे तुम. फिर भी युद्ध करते हुए उसके कौशल मैं भी देखता और यह ब्रह्मांड भी....दुख इसी बात का है कि उसके धनुर्धारी होने का कौशल न तुमने भीष्म के युद्ध में देखने दिया, न द्रोण और न जयद्रथ के.’ वह उठ खड़ा हुआ. ‘सुनो, मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ.’ मैंने कहा. ‘वासुदेव! तुम्हें जो करना था, कर दिया. अब कहोगे क्या?’ वह जाते-जाते रुक गया. बोला - ‘एक बात और! और यह अन्तिम बात! वासुदेव, कहा था तुमसे कि मैंने एक स्वप्न देखा है, जैसे तुम एक रक्तरंजित पृथ्वी को हाथ से पकड़कर फेंक रहे हो और उस अग्निस्तूप के ऊपर खड़े युधिष्ठिर स्वर्णपात्र में घृतपायस खा रहे हैं. कहा था न? वासुदेव, इस कथन को थोड़ा ठीक कर लो. खाना चाह रहे हैं, लेकिन खा नहीं पा रहे हैं. और खाएँगे कैसे? मुँह ही नहीं खुल रहा है....’ मैं उसे देखता रहा और वह सूर्य की किरणों में खो गया.

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