The Lallantop
Advertisement

'उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी'

एक कविता रोज़ में आज गिरीश चन्द्र तिवारी की एक कविता.

Advertisement
pic
10 सितंबर 2019 (अपडेटेड: 10 सितंबर 2019, 08:36 AM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
पहाड़ का एक कवि था जो अपना परिचय इस तरह से देता था-
पांच-छह साल की उम्र से गाय-बछड़ो के ग्वाले जाने लगा, तभी से बीड़ी शुरू कर दी थी. कोई पढ़ाई-लिखाई नहीं. सीधे कक्षा छह में भरती हुआ. पढ़ाई में बहुत कमजोर. उद्दंडताएं तमाम थीं. बीड़ी, चिलम, अतर से लेकर जितने अवगुण थे, सारे समाए हुए. कोई ऐसा उल्लेखनीय गुण नहीं था जिसकी चर्चा की जाए. बल्कि अवगुणों पर चर्चा करो तो एक-एक अवगुण की मैं परत-दर-परत खोल सकता हूं. चिलम कैसे बनाई जाती, उसमें अतर(चरस) कैसे भरी जाती है, ये बता सकता हूं आपको.
कवि का नाम था गिरीश चन्द्र तिवारी. लेकिन पहाड़ में सब प्यार से 'गिर्दा' कहा करते. उत्तराखंड आंदोलन के दौरान गिर्दा और उनकी कविताएं पहाड़ के लोगों के मुंह पर चढ़ गईं. गिर्दा आंदोलन के मंच से होते हुए खेतों तक फ़ैल गए. खेतों में घास काटती औरते गिर्दा को गुनगुना रही होती, "हम लड़ते रेया भूली, हम लड़ते रुलो". [हम लड़ते रहे दीदी, हम लड़ते रहेंगे.] किसी कवि के जीवन का हासिल क्या है? क्या ये कि वो तमाम तरह के साहित्यिक पुरुस्कारों से नवाजा जाए. या फिर ये कि उसकी कविताएं कोर्स की किताबों में शामिल कर ली जाएं. या फिर कोई अध्येता उसकी कविताओं पर पीएचडी करे. इस सब कसौटियों पर गिर्दा एक असफल कवि हैं. लेकिन ऐसा बहुत ही कम होता होगा कि किसी कवि की अंतिम यात्रा में हजारों लोग उसकी कविता समवेत स्वर में गाएं. रोते जाएं और गाते जाएं.
ततुक नि लगा ऊदेग,घुनन मुनइ की नि टेक जैंता एक दिन ते आलो, ऊ दिन यो दुनि में... [इतना उदास मत हो, सर को घुटनों में मत रख. एक दिन निश्चित ही आएगा, जब इस दुनिया में...]
आज इन्हीं गिर्दा का जन्मदिन है. पहाड़ के विनाश पर आप उनकी हिंदी में लिखी गई यह कविता पढ़िए.

बोल व्योपारी तब क्या होगा?

एक तरफ बर्बाद बस्तियां - एक तरफ हो तुम। एक तरफ डूबती कश्तियां - एक तरफ हो तुम। एक तरफ हैं सूखी नदियां - एक तरफ हो तुम। एक तरफ है प्यासी दुनियां - एक तरफ हो तुम।

अजी वाह! क्या बात तुम्हारी, तुम तो पानी के व्योपारी, खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी, बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,

सारा पानी चूस रहे हो, नदी-समन्दर लूट रहे हो, गंगा-यमुना की छाती पर कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,

उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी, जिस दिन डोलगी ये धरती, सर से निकलेगी सब मस्ती,

महल-चौबारे बह जायेंगे खाली रौखड़ रह जायेंगे बूंद-बूंद को तरसोगे जब- बोल व्योपारी - तब क्या होगा ? नगद - उधारी - तब क्या होगा ??

आज भले ही मौज उड़ा लो, नदियों को प्यासा तड़पा लो, गंगा को कीचड़ कर डालो,

लेकिन डोलेगी जब धरती - बोल व्योपारी - तब क्या होगा ? वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी - तब क्या होगा ? योजनकारी - तब क्या होगा ? नगद-उधारी तब क्या होगा ? एक तरफ हैं सूखी नदियां - एक तरफ हो तुम। एक तरफ है प्यासी दुनियां - एक तरफ हो तुम।


वीडियो- एक कविता रोज: सीलमपुर की लड़कियां

Advertisement

Advertisement

()