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क्या जिनको कोरोना हो चुका है उनको वैक्सीन लगवाने की जरूरत नहीं है?

क्या है वैक्सीन और एंटीबॉडी का रिश्ता?

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14 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 14 दिसंबर 2020, 07:08 AM IST)
कोरोना की वैक्सीन और एंटीबॉडी पर बहस कहाँ जाकर रुकेगी? (सांकेतिक तस्वीर- PTI)
नयी बहस. क्या कोरोना वैक्सीन के लिए अब पैसे देने होंगे? ख़बर तो यही कहती हैं. (सांकेतिक तस्वीर- PTI)
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कोरोना की वैक्सीन अब पब्लिक यूज के लिए देश दुनिया में खुलने लगी है. ऐसे में एक सवाल बड़ा है. क्या सभी लोगों को वैक्सीन नहीं लगाई जाएगी? कहा जा रहा है कि जिनको कोरोना हो चुका है वो इससे इम्यून हो चुके हैं. इसलिए उन्हें वैक्सीन नहीं लगेगी. आखिर ये इम्युनिटी का गुणा गणित क्या है? इस आर्टिकल में हम यही समझेंगे. हमारे शरीर का जो सिस्टम बीमारियों से लड़ता है उसे इम्यून सिस्टम कहते हैं. जब हमें कोई इंफेक्शन होता है तो उससे लड़ने के लिए हमारे शरीर में उस बीमारी के एंटीबॉडीज़ बनते हैं. इस एंटीबॉडी का काम होता है शरीर में घुसे वायरस और बैक्टीरिया पर हमला करना. हमला करके उसे निष्क्रिय कर देना. बीमारी के खत्म होने के बाद भी ये एंटीबॉडी कुछ वक्त तक हमारे शरीर में बची रहती है. ताकि अगर फिर कभी वही बीमारी हमें हो तो शरीर उससे लड़ने के लिए तैयार रहे. कुछ बीमारियों के केस में ये एंटीबॉडी एक बार बनने के बाद जीवनभर काम करती हैं. क्या कोरोना में भी ऐसा ही हो रहा है? इसका जवाब है नहीं. सेरो सर्वे में ये बात सामने आई थी कि जो लोग कोरोना से ग्रस्त हो चुके थे, उनके शरीर से कुछ समय बाद एंटीबॉडी ग़ायब हो चुकी थी. कई लोग कोरोना से दूसरी बार भी संक्रमित हुए. वैक्सीन कैसे काम करती है? जब शरीर में वैक्सीन डाली जाती है, तो वैक्सीन के माध्यम से शरीर को धोखा दिया जाता है. कैसे? वैक्सीन के माध्यम से शरीर में मरा हुआ वायरस या वायरस का खोल डाला जाता है. शरीर को धोखा होता है कि ज़िंदा वायरस आ गया. इम्यून सिस्टम एंटीबॉडी बनाकर शरीर को इम्यून बना देता है. लेकिन इस सबसे अलग शरीर का एक और ट्रीविया है. उस ट्रीविया का नाम है टी सेल. एंटीबॉडी शरीर से भले ही चली जाए, लेकिन शरीर में ये टी सेल बना रहता है. और यही टी सेल बॉडी को इम्यून सिस्टम को याद दिलाता है कि अगर कोई रोग दोबारा लौटकर आए, तो उसे फिर से हराना है. ICMR के प्रमुख डॉ. रमन गंगाखेडकर ने भी अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा है,
“अगर आपके शरीर में एंटीबॉडी नहीं है, तब भी कोई घबराने की बात नहीं है. क्योंकि आपके शरीर को पता है कि किसी रोग से कैसे लड़ना है. दोबारा हमला होने पर शरीर फिर से एंटीबॉडी बना लेगा.”
और इसी काम में शरीर की मदद करता है टी सेल. फिर से एंटीबॉडी बनवा देता है. लेकिन लोग दोबारा क्यों इंफ़ेक्ट हो रहे हैं?  क्योंकि पहली बार में उनके शरीर में वायरस की कम मात्रा गयी होगी. इस वायरस की मात्रा को वायरस लोड कहते हैं. इसके कम या ज़्यादा होने से भी समीकरण गड़बड़ा सकते हैं. कम वायरस के साथ बॉडी को कम मेहनत करनी पड़ी होगी. लिहाज़ा लोग दोबारा इंफ़ेक्ट हो गए. तो वैक्सीन एंटीबॉडी वालों को नहीं लगनी चाहिए? आप रात को जब सोने जाते हैं, तो घर का दरवाज़ा अंदर से बंद करते हैं तो बीच वाली सिटकनी लगाते हैं. ऊपर वाली सिटकनी लगाते हैं. उसमें एकाध ताला या लॉक भी मार देते हैं. क्यों? एक्स्ट्रा सिक्योरिटी के लिए ताकि कोई बाहरी न घुस आए. अब आपके शरीर में एंटीबॉडी है. या नहीं है और फिर भी शरीर जानता है कि कैसे कोरोना का दोबारा हमला होने पर एंटीबॉडी बनानी है. तो भी एक्स्ट्रा सिक्योरिटी के लिए वैक्सीन लगाने में कोई हर्ज नहीं है. क्योंकि वायरस है, इंफ़ेक्ट कर सकता है.

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