गोदान फिल्म का वो गाना जिसे मोहम्मद रफी ने गा कर अमर कर दिया, दरअसल भोजपुरी में था
'पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा'
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पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा गाना रफी साहब और पंडित रविशंकर की बेहतरीन रचना है.
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निराला बिदेसिया
निराला बिदेसिया कला प्रेमी हैं. चाहे साहित्य हो या कला. उनका लेखन उनके इस प्यार को कभी कम नहीं होने देता. मुंशी प्रेमचंद पर उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर कुछ अच्छा लिखा तो हमने उनकी परमिशन से आपके लिए यहां पेश कर दिया.
आज 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती है. कल एक अगस्त को भोजपुरी के पहले सिने गीतकार मोती बीए की जन्मशताब्दी वाली जयंती. 1963, में एक फिल्म आयी थी-गोदान. प्रेमचंद की कहानी पर आधारित. हिंदी फिल्म. उस फिल्म के गीत लिखे थे अंजान साहब ने और संगीत दिया था पंडित रविशंकर ने. उस फिल्म का एक गीत था-पिपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा...यह गीत भोजपुरी में है. मोहम्मद रफी साहब की आवाज में. मोती बीए ने 1948 में यह किया था. दिलीप कुमार साहब की हिंदी फिल्म नदिया के पार में भोजपुरी गीत को लाया. उसका अपार विस्तार 1963 में प्रेमचंद की कहानी पर बनी हिंदी फिल्म गोदान में दिखता है,जब पंडित रविशंकर जैसे संगीतकार भोजपुरी गीत को संगीतबद्ध करते हैं.
यह पोस्ट बस ऐसे ही है. प्रेमचंद और मोती बीए, दोनों को याद करने के लिए. शेषनागियों को इत्तला करने के लिए भी कि भोजपुरी न तो उनकी वजह से थमी हुई है, न चल-बढ़ रही है. यह पोस्ट उनके लिए भी है, जो यह कहते हैं कि आज तो जो भोजपुरी की लोकप्रियता है, फलाना-फलाना की वजह से है. जो ऐसा मानते हैं, उन्हें गीत-संगीत और फिल्मी दुनिया में ही मोती बीए को जानना चाहिए. उसके बाद के सफर को भी.मोती बीए ने 1948 में बुनियाद रखी. उसके बाद कौन-कौन लोग आये भोजपुरी में, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं. किसने नहीं गाया भोजपुरी सिने गीत. लता मंगेशकर, मुकेश, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, तलत महमूद, महेंद्र कपूर, आशा भोसले आदि-आदि. कितने का नाम लिया जाए. पेशेवर रूप से जम चुके लोग, बड़े नाम अपनी मातृभाषा के लिए लगे रहे. चित्रगुप्त,एसएन त्रिपाठी,नजीर हुसैन जैसे कई लोग. हिंदी में उंचाई पर पहुंचकर भी भोजपुरी के लिए समर्पण के साथ काम करते रहे.
शैलेंद्र जैसे गीतकार, जिनकी पहचान बड़ी हो चुकी थी, वे भी भोजपुरी की पहली फिल्म बनने लगी तो गीतकार बनने आये. खुद से पहल कर जुड़े. यह पोस्ट उनके लिए भी है,जो आये दिन कहते रहते हैं कि अरे यार वे तो भोजपुरी में आकर फंस गये, नहीं तो वे तो दूसरी भाषा में क्रांति कर दिये होते. जो भोजपुरी में अपने काम करने को अहसानी तरीके से बताते हैं. बाद बाकि सब ठीक है. प्रेमचंद की जयंती पर प्रेमचंद को याद करते हुए अंजान साहब का लिखा हुआ शानदार गाना सुनिए. मोती बीए को भी याद करते रहिए कि उन्होंने कितनी मजबूत बुनियाद डाली थी.
गाना सुनिए, खो जाइए और गुनगुनाइए : वीडियो देखकर पूरा मजा लें.
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