IIM छोड़ ये आदमी बीजेपी में नहीं आता, तो 2014 चुनाव नहीं जीत पाते मोदी!
अटल की वजह से आया था पार्टी में, लेकिन अब सब बदल गया है.
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जब 2007 में राजनाथ सिंह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तो प्रोद्युत बोरा ने उन्हीं के कहने पर बीजेपी आईटी सेल बनाई थी.
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एक आदमी जिसने आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ाई की, एक आदमी जिसने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और येल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की, बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम किया, 2004 में भारतीय जनता पार्टी के साथ राजनीति की शुरुआत की, 2007 में बीजेपी की आईटी सेल बनाई, भाजपा की केंद्रीय कमिटी में रहा और फिर 2015 में मोदी और अमित शाह की जोड़ी को तानाशाह और पार्टी को तोड़ने वाला करार देते हुए पार्टी से अलग हो गया. उस आदमी का नाम है प्रोद्युत बोरा, जिसने अपने ही बनाए बीजेपी के आईटी सेल को अब का वो राक्षस करार दिया है, जिसे बनाया अच्छे काम के लिए गया था, लेकिन ताकत मिलने के साथ ही उसने खुद का और अपने ही लोगों का नुकसान शुरू कर दिया.

पीएम मोदी की एक सभा में बीजेपी की आईटी सेल.
आसाम में एक जगह है जोरहाट. वहां के रहने वाले थे लक्ष्मी प्रोवा बोरा और लक्ष्मी कांता बोरा. लक्ष्मी प्रोवा बोरा एक स्कूल टीचर थे, जबकि लक्ष्मी कांता बोरा असम सरकार में एकाउंटेंट थीं. 10 अप्रैल 1974 को उनके घर एक लड़के जन्म हुआ. नाम रखा गया प्रोद्युत बोरा. ये वही प्रोद्युत बोरा हैं, जिन्होंने साल 2007 में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी के लिए बाकायदा आईटी सेल बनाई थी और वो पार्टी थी भारतीय जनता पार्टी. प्रोद्युत बोरा बीजेपी छोड़ चुके हैं और उन्होंने असम में खुद की नई छोटी सी पार्टी बना ली है, जिसका नाम है लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी. भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के हेड अब अमित मालवीय हैं, लेकिन ये आईटी सेल कैसे बनी, इसके बारे में प्रोद्युत बोरा ने एक अंग्रेजी वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट से बात की है.
IIM से लेकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक से की पढ़ाई
प्रोद्युत बोरा के मुताबिक वो एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं. मिडिल क्लास के लड़कों का सपना होता है कि वो पढ़ाई करें और इतनी ही पढ़ाई करें कि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जाए. वो भी इससे अलग नहीं थे. असम के उत्तरी लखीमपुर के सेंट मैरी स्कूल से शुरुआती स्कूलिंग करने के बाद प्रोद्युत जोरहाट के कारमेल स्कूल और फिर वहां से देहरादून के राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज, नोएडा के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की. दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर पढ़ने के बाद प्रोद्युत बोरा मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के लिए आईआईएम अहमदाबाद चले गए. इसके अलावा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और येल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद प्रोद्युत बोरा ने अपनी नौकरी शुरू की.

प्रोद्युत ने IIM अहमदाबाद के साथ ही लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से भी पढ़ाई की है.
बोरा ने एशिया पैसिफिक कम्यूनिकेशन एसोसिएट्स से बतौर ट्रेनी नौकरी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिविट एसोसिएट्स जैसी इंटरनेशनल कंपनी में बतौर मैनेजमेंट कंसल्टेंट काम करना शुरू कर दिया. यहां भी वो ज्यादा दिन तक नहीं टिके और वो डिजिटल टाकिज कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए. ये डिजिटल टाकिल भारत की पहली डिजिटल फिल्ममेकिंग कंपनी थी. इन नौकरियों को करते-करते साल 2004 आ गया था और उनकी उम्र भी करीब 30 साल होने वाली थी.
30 साल की उम्र में शुरू की राजनीति
जब प्रोद्युत 30 साल के हो गए और अपना घर भी बसा लिया, तो उन्होंने राजनीति में उतरने का फैसला लिया. उनका मानना था कि वो कंपनियों को ये सलाह देते रहे हैं कि कंपनी में कैसे बदलाव लाया जा सकता है, तो वो राजनीति में आकर पार्टियों को सलाह दे सकते हैं कि देश में कैसे बदलाव लाया जा सकता है. प्रोद्युत बताते हैं कि 30 साल की उम्र में उन्हें लगता था कि वो दुनिया बदल सकते हैं. हालांकि इसी दौरान 2004 में लोकसभा चुनाव भी हुए थे. बीजेपी का शाइनिंग इंडिया का नारा पूरी तरह से नाकाम हो गया था और अटल बिहारी वाजपेयी की जगह मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे. लेकिन प्रोद्युत बोरा को वाजपेयी बहुत पसंद थे. उन्हें लगता था कि वाजपेयी को कुछ और दिन तक राजनीति में रहना चाहिए था. वो वाजपेयी को चुनाव जिताने में मदद करना चाहते थे, लेकिन वाजपेयी की बीमारी से उनका ये सपना पूरा नहीं हो सका.
राजनाथ सिंह ने सवाल पूछा और जवाब में बन गई बीजेपी की आईटी सेल

प्रोद्युत बोरा राजनाथ सिंह के मीडिया सलाहकार थे और बात-बात में ही आईटी सेल बनाने का आइडिया दे डाला था.
प्रोद्युत बताते हैं कि 2004 में वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. पार्टी में उन्हें पहली जिम्मेदारी दी गई और उन्हें सिद्धार्थ नाथ सिंह की देखरेख में बीजेपी के नेशनल मीडिया सेल में शामिल कर लिया गया. उस वक्त नेशनल मीडिया सेल के प्रभारी अरुण जेटली थे. इसके बाद 2006 में उन्हें राजनाथ सिंह का मीडिया सलाहकार बना दिया गया. 2007 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने थे. राजनाथ सिंह उस वक्त बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और प्रोद्युत बोरा उनके मीडिया सलाहकार थे. एक दिन चुनावी कैंपेन के दौरान जब राजनाथ सिंह और प्रोद्युत बोरा कानपुर से लखनऊ जा रहे थे, तो राजनाथ सिंह ने प्रोद्युत बोरा से पूछा कि बीजेपी को ऐसी कौन सी चीजों की ज़रूरत है, जो उसे और पार्टियों से आगे ले जा सकती है. प्रोद्युत बोरा किसी सियासी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थे और उनकी उम्र भी महज 33 साल थी, लिहाजा उन्हें कोई सियासी जवाब नहीं सूझा. लेकिन वो मैनेजमेंट के छात्र रह चुके थे. उन्होंने जवाब दिया-
राजनाथ के सवाल का जवाब देते हुए बोरा ने कहा-
उस वक्त को याद करते हुए प्रोद्युत बोरा कहते हैं कि सेल बनने के बाद पार्टी के कई लोगों ने मुझे मुबारकबाद दी, लेकिन वो लोग मुझे इन्कम टैक्स सेल बनाने की मुबारकबाद दे रहे थे.
11 साल में कितना बदल गई बीजेपी की IT सेल?

बीजेपी आईटी सेल को बनाने वाले ने उसे अब वो राक्षस करार दिया है, जो बनाने वाले को ही खा जाता है.
इस बात को 11 साल बीत चुके हैं. 11 साल पहले इस सेल को शुरू करने का मकसद पार्टी को ऑटोमेटिक मोड में लाना, वोटरों तक पहुंच बनाना और आईटी के मुद्दों पर पार्टी को सलाह देना था. लेकिन अब उन्हें उसी आईटी सेल को उपन्यास फ्रैंकस्टीन का वो राक्षस करार दिया है, जिस बनाया तो सुरक्षा के लिए गया था, लेकिन वो इतना ताकतवर हो गया कि उसने खुद का और खुद के लोगों का ही नुकसान कर दिया.
प्रोद्युत वोरा अब बीजेपी से अलग हैं. उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली है, लेकिन उन्हें अब भी वो दिन याद हैं, जब उन्हें बीजेपी आईटी सेल की कमान मिली थी. उस वक्त भारत में इंटरनेट की पहुंच आम लोगों तक बननी शुरू हुई थी, लेकिन सर्विस बेहद महंगी थी. इसके बाद भी उन्होंने देश के 15 राज्यों में आईटी सेल बनाई और 2009 के लोकसभा की तैयारियों में जुट गए. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब पार्टी की हार हुई थी और राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष नहीं रहे, तो बोरा अपने घर आसाम चले गए और पार्टी ने आईटी सेल की कमान अरविंद गुप्ता के हाथों में सौंप दी. अरविंद की नियुक्ति पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी ने की थी.
सिमी से की IT सेल की तुलना

2007 में जब राजनाथ सिंह बीजेेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब बीजेपी की आईटी सेल बनी थी.
2007 में बनी आईटी सेल के साथ ऐसा क्या हुआ कि वो इस स्तर पर पहुंच गई कि उसे राक्षस करार देने की नौबत आ गई. इस सवाल का जवाब देते हुए प्रोद्युत बोरा ने बीजेपी के आईटी सेल की तुलना भारत में प्रतिबंधित संगठन सिमी से कर डाली. उन्होंने कहा कि सिमी की स्थापना करने वाले मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीकी आज अमेरिका में प्रोफेसर हैं और उनका बनाया संगठन भारत में प्रतिबंधित है. जब उन्होंने इस संगठन को बनाया था तो उसका मकसद गरीब मुस्लिम छात्रों की मदद करना और उन्हें शिक्षित करना था, लेकिन बाद में ये संगठन आतंक से जुड़ गया. ठीक ऐसे ही जब आईटी सेल बनी थी, तो उसका मकसद लोगों को पार्टी से जोड़ना था, आईटी सेल के जरिए युवाओं को रोजगार देना था, उन्हें पार्टी की विचारधारा के बारे में बताना था, लेकिन 2014 के बाद से ये सब बदल गया. 2014 के बाद से आईटी सेल ध्रुवीकरण का हथियार बन गई. ऐसा इसलिए हुआ कि 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत से ही पूरी आईटी सेल गांधीनगर से संचालित होने लगी. इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी को 2014 में जो ऐतिहासिक जीत मिली थी, उसमें सबसे बड़ी भूमिका बीजेपी आईटी सेल की भी थी. अगर आईटी सेल इस आक्रामकता के साथ काम नहीं करती तो चुनावी तस्वीर शायद कुछ और ही होती. 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान आईटी सेल का एक मुखिया तो था, लेकिन उसे मोदी की टीम चलाने लगी थी. प्रोद्युत ने कहा-

बीजेपी से अलग होने के बाद प्रोद्युत वोरा ने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा. पार्टी सभी सीटों पर चुनाव हार गई.
प्रोद्युत साफ तौर पर कहते हैं कि वो राजनीति में बीजेपी या संघ की वजह से नहीं आए थे. वो सिर्फ और सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी की वजह से राजनीति में आए थे. जब मोदी और शाह की बीजेपी वाजपेयी के आदर्शों को नहीं संभाल सकती, तो वो क्या कोई विरासत संभालेगी. बीजेपी से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाने वाले प्रोद्युत ने 2018 में असम में हुए विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार भी उतारे. हर सीट पर उनका उम्मीदवार हार गया, लेकिन प्रोद्युत अभी नहीं हारे हैं. वो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं और वो असम में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं.
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पीएम मोदी की एक सभा में बीजेपी की आईटी सेल.
आसाम में एक जगह है जोरहाट. वहां के रहने वाले थे लक्ष्मी प्रोवा बोरा और लक्ष्मी कांता बोरा. लक्ष्मी प्रोवा बोरा एक स्कूल टीचर थे, जबकि लक्ष्मी कांता बोरा असम सरकार में एकाउंटेंट थीं. 10 अप्रैल 1974 को उनके घर एक लड़के जन्म हुआ. नाम रखा गया प्रोद्युत बोरा. ये वही प्रोद्युत बोरा हैं, जिन्होंने साल 2007 में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी के लिए बाकायदा आईटी सेल बनाई थी और वो पार्टी थी भारतीय जनता पार्टी. प्रोद्युत बोरा बीजेपी छोड़ चुके हैं और उन्होंने असम में खुद की नई छोटी सी पार्टी बना ली है, जिसका नाम है लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी. भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के हेड अब अमित मालवीय हैं, लेकिन ये आईटी सेल कैसे बनी, इसके बारे में प्रोद्युत बोरा ने एक अंग्रेजी वेबसाइट हफिंगटन पोस्ट से बात की है.
IIM से लेकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक से की पढ़ाई
प्रोद्युत बोरा के मुताबिक वो एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं. मिडिल क्लास के लड़कों का सपना होता है कि वो पढ़ाई करें और इतनी ही पढ़ाई करें कि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जाए. वो भी इससे अलग नहीं थे. असम के उत्तरी लखीमपुर के सेंट मैरी स्कूल से शुरुआती स्कूलिंग करने के बाद प्रोद्युत जोरहाट के कारमेल स्कूल और फिर वहां से देहरादून के राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज, नोएडा के दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाई की. दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में इंग्लिश लिटरेचर पढ़ने के बाद प्रोद्युत बोरा मैनेजमेंट की पढ़ाई करने के लिए आईआईएम अहमदाबाद चले गए. इसके अलावा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और येल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद प्रोद्युत बोरा ने अपनी नौकरी शुरू की.

प्रोद्युत ने IIM अहमदाबाद के साथ ही लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से भी पढ़ाई की है.
बोरा ने एशिया पैसिफिक कम्यूनिकेशन एसोसिएट्स से बतौर ट्रेनी नौकरी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिविट एसोसिएट्स जैसी इंटरनेशनल कंपनी में बतौर मैनेजमेंट कंसल्टेंट काम करना शुरू कर दिया. यहां भी वो ज्यादा दिन तक नहीं टिके और वो डिजिटल टाकिज कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए. ये डिजिटल टाकिल भारत की पहली डिजिटल फिल्ममेकिंग कंपनी थी. इन नौकरियों को करते-करते साल 2004 आ गया था और उनकी उम्र भी करीब 30 साल होने वाली थी.
30 साल की उम्र में शुरू की राजनीति
जब प्रोद्युत 30 साल के हो गए और अपना घर भी बसा लिया, तो उन्होंने राजनीति में उतरने का फैसला लिया. उनका मानना था कि वो कंपनियों को ये सलाह देते रहे हैं कि कंपनी में कैसे बदलाव लाया जा सकता है, तो वो राजनीति में आकर पार्टियों को सलाह दे सकते हैं कि देश में कैसे बदलाव लाया जा सकता है. प्रोद्युत बताते हैं कि 30 साल की उम्र में उन्हें लगता था कि वो दुनिया बदल सकते हैं. हालांकि इसी दौरान 2004 में लोकसभा चुनाव भी हुए थे. बीजेपी का शाइनिंग इंडिया का नारा पूरी तरह से नाकाम हो गया था और अटल बिहारी वाजपेयी की जगह मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गए थे. लेकिन प्रोद्युत बोरा को वाजपेयी बहुत पसंद थे. उन्हें लगता था कि वाजपेयी को कुछ और दिन तक राजनीति में रहना चाहिए था. वो वाजपेयी को चुनाव जिताने में मदद करना चाहते थे, लेकिन वाजपेयी की बीमारी से उनका ये सपना पूरा नहीं हो सका.
राजनाथ सिंह ने सवाल पूछा और जवाब में बन गई बीजेपी की आईटी सेल

प्रोद्युत बोरा राजनाथ सिंह के मीडिया सलाहकार थे और बात-बात में ही आईटी सेल बनाने का आइडिया दे डाला था.
प्रोद्युत बताते हैं कि 2004 में वो भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. पार्टी में उन्हें पहली जिम्मेदारी दी गई और उन्हें सिद्धार्थ नाथ सिंह की देखरेख में बीजेपी के नेशनल मीडिया सेल में शामिल कर लिया गया. उस वक्त नेशनल मीडिया सेल के प्रभारी अरुण जेटली थे. इसके बाद 2006 में उन्हें राजनाथ सिंह का मीडिया सलाहकार बना दिया गया. 2007 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने थे. राजनाथ सिंह उस वक्त बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और प्रोद्युत बोरा उनके मीडिया सलाहकार थे. एक दिन चुनावी कैंपेन के दौरान जब राजनाथ सिंह और प्रोद्युत बोरा कानपुर से लखनऊ जा रहे थे, तो राजनाथ सिंह ने प्रोद्युत बोरा से पूछा कि बीजेपी को ऐसी कौन सी चीजों की ज़रूरत है, जो उसे और पार्टियों से आगे ले जा सकती है. प्रोद्युत बोरा किसी सियासी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते थे और उनकी उम्र भी महज 33 साल थी, लिहाजा उन्हें कोई सियासी जवाब नहीं सूझा. लेकिन वो मैनेजमेंट के छात्र रह चुके थे. उन्होंने जवाब दिया-
'बतौर मैनेजमेंट छात्र हमें हमेशा कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट पढ़ाया जाता है. सिर्फ किसी प्रोडक्ट को कस्टमर को बेच देना ही काफी नहीं होता है, बल्कि आपको कस्टम के साथ एक रिश्ता भी कायम करना होता है और उसे बरकरार रखना होता है. तो जब कॉरपोरेट रिलेशनशिप मैनेजमेंट हो सकता है तो फिर वोटर रिलेशनशिप मैनेजमेंट क्यों नहीं?'इसके बाद राजनाथ सिंह ने प्रोद्युत से पूछा कि आईडिया तो अच्छा है, लेकिन ये होगा कैसे. इसका जवाब देने के दौरान प्रोद्युत को इस बात का बखूबी पता था कि भारत में फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल वेबसाइट्स आ गई हैं. इनकी वजह से आईटी इंडस्ट्री उछाल पर है, लेकिन इनका इस्तेमाल अभी कोई राजनैतिक पार्टी नहीं कर रही है. बोरा की सोच थी कि इसके जरिए नए लोगों को पार्टी के साथ जोड़ा जा सकता है और उसे वोट में तब्दील किया जा सकता है.
राजनाथ के सवाल का जवाब देते हुए बोरा ने कहा-
'सर पार्टी में पहले से ही 25 सेल हैं. हम एक नई सेल बनाते हैं और उसे नाम देते हैं आईटी सेल.'इस सवाल के कुछ ही महीनों के बाद बीजेपी ने अपनी आईटी सेल बना ली और प्रोद्युत बोरा को इसका पहला नेशनल कन्वीनर बनाया गया.
उस वक्त को याद करते हुए प्रोद्युत बोरा कहते हैं कि सेल बनने के बाद पार्टी के कई लोगों ने मुझे मुबारकबाद दी, लेकिन वो लोग मुझे इन्कम टैक्स सेल बनाने की मुबारकबाद दे रहे थे.
11 साल में कितना बदल गई बीजेपी की IT सेल?

बीजेपी आईटी सेल को बनाने वाले ने उसे अब वो राक्षस करार दिया है, जो बनाने वाले को ही खा जाता है.
इस बात को 11 साल बीत चुके हैं. 11 साल पहले इस सेल को शुरू करने का मकसद पार्टी को ऑटोमेटिक मोड में लाना, वोटरों तक पहुंच बनाना और आईटी के मुद्दों पर पार्टी को सलाह देना था. लेकिन अब उन्हें उसी आईटी सेल को उपन्यास फ्रैंकस्टीन का वो राक्षस करार दिया है, जिस बनाया तो सुरक्षा के लिए गया था, लेकिन वो इतना ताकतवर हो गया कि उसने खुद का और खुद के लोगों का ही नुकसान कर दिया.
प्रोद्युत वोरा अब बीजेपी से अलग हैं. उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली है, लेकिन उन्हें अब भी वो दिन याद हैं, जब उन्हें बीजेपी आईटी सेल की कमान मिली थी. उस वक्त भारत में इंटरनेट की पहुंच आम लोगों तक बननी शुरू हुई थी, लेकिन सर्विस बेहद महंगी थी. इसके बाद भी उन्होंने देश के 15 राज्यों में आईटी सेल बनाई और 2009 के लोकसभा की तैयारियों में जुट गए. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब पार्टी की हार हुई थी और राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष नहीं रहे, तो बोरा अपने घर आसाम चले गए और पार्टी ने आईटी सेल की कमान अरविंद गुप्ता के हाथों में सौंप दी. अरविंद की नियुक्ति पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन गडकरी ने की थी.
सिमी से की IT सेल की तुलना

2007 में जब राजनाथ सिंह बीजेेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब बीजेपी की आईटी सेल बनी थी.
2007 में बनी आईटी सेल के साथ ऐसा क्या हुआ कि वो इस स्तर पर पहुंच गई कि उसे राक्षस करार देने की नौबत आ गई. इस सवाल का जवाब देते हुए प्रोद्युत बोरा ने बीजेपी के आईटी सेल की तुलना भारत में प्रतिबंधित संगठन सिमी से कर डाली. उन्होंने कहा कि सिमी की स्थापना करने वाले मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीकी आज अमेरिका में प्रोफेसर हैं और उनका बनाया संगठन भारत में प्रतिबंधित है. जब उन्होंने इस संगठन को बनाया था तो उसका मकसद गरीब मुस्लिम छात्रों की मदद करना और उन्हें शिक्षित करना था, लेकिन बाद में ये संगठन आतंक से जुड़ गया. ठीक ऐसे ही जब आईटी सेल बनी थी, तो उसका मकसद लोगों को पार्टी से जोड़ना था, आईटी सेल के जरिए युवाओं को रोजगार देना था, उन्हें पार्टी की विचारधारा के बारे में बताना था, लेकिन 2014 के बाद से ये सब बदल गया. 2014 के बाद से आईटी सेल ध्रुवीकरण का हथियार बन गई. ऐसा इसलिए हुआ कि 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत से ही पूरी आईटी सेल गांधीनगर से संचालित होने लगी. इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी को 2014 में जो ऐतिहासिक जीत मिली थी, उसमें सबसे बड़ी भूमिका बीजेपी आईटी सेल की भी थी. अगर आईटी सेल इस आक्रामकता के साथ काम नहीं करती तो चुनावी तस्वीर शायद कुछ और ही होती. 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान आईटी सेल का एक मुखिया तो था, लेकिन उसे मोदी की टीम चलाने लगी थी. प्रोद्युत ने कहा-
'मैं तो उसी दिन पार्टी छोड़ देना चाहता था, जब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया. लेकिन उस वक्त मेरे साथियों ने कहा कि हर आदमी की तरह मोदी को भी दूसका चांस मिलना चाहिए. लोगों ने ये भी कहा कि दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट है, मीडिया है और तमाम चीजें हैं, इसलिए मोदी को दूसरा मौका मिलना चाहिए. उस वक्त मैं रुक गया. 10 महीनों तक इंतजार किया, लेकिन देखा कि कुछ बदलाव नज़र नहीं आ रहा है. मैं खुद से कुछ नहीं बदल सकता था, इसलिए 15 फरवरी 2015 को मैंने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि यही करना मेरे हाथ में था.'पार्टी बनाकर लड़ा विधानसभा चुनाव, हार गए और अब बारी लोकसभा की है

बीजेपी से अलग होने के बाद प्रोद्युत वोरा ने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा. पार्टी सभी सीटों पर चुनाव हार गई.
प्रोद्युत साफ तौर पर कहते हैं कि वो राजनीति में बीजेपी या संघ की वजह से नहीं आए थे. वो सिर्फ और सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी की वजह से राजनीति में आए थे. जब मोदी और शाह की बीजेपी वाजपेयी के आदर्शों को नहीं संभाल सकती, तो वो क्या कोई विरासत संभालेगी. बीजेपी से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाने वाले प्रोद्युत ने 2018 में असम में हुए विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार भी उतारे. हर सीट पर उनका उम्मीदवार हार गया, लेकिन प्रोद्युत अभी नहीं हारे हैं. वो 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं और वो असम में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं.
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बीजेपी की गलती है, इतने बेहूदे इंसान को कमान कैसे सौंपी?
बीजेपी IT हेड और कांग्रेस सोशल मीडिया टीम मेंबर को पहले कैसे पता चल गई चुनाव की डेट?
अमित शाहः गांधीवादी मां के लाल की लाइफ के 11 अनजाने फैक्ट्स
90 के दशक में ही इस आदमी ने बोला था, नरेंद्र भाई पीएम बनने के लिए तैयार हो जाइए
नरेंद्र मोदी सच में हिंदू विरोधी हैं, ये रहे सबूत
अमित शाह की संपत्ति बढ़ने पर सबसे सही बात इस आदमी ने बोली है!
क्या है प्रधानमंत्री युवा रोजगार योजना, जिसमें रोज 500-1000 रुपए मिलने की बात है ?
