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90 के दशक में ही इस आदमी ने बोला था, नरेंद्र भाई पीएम बनने के लिए तैयार हो जाइए

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हूं शुन कहू छू ते तमने समजे छे? यानी मैं जो कह रहा हूं, वो आप समझ रहे हैं क्या, ये सवाल उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर बार उनके मुखारबिंदु से आता है. पत्रकार नर्वस हो जाते हैं. वो हर बात में 0.0001% का आंकड़ा भी देते हैं. पर उनसे पलट के सवाल पूछे नहीं जाते. उनकी संपत्ति में 300 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई जाती है, पर खबर तुरंत हटा भी ली जाती है. इसके साथ एक जरूरी बात भी उठती है. 2025 में नरेंद्र मोदी 75 साल के हो जाएंगे. मोदी सरकार ने कई सारे टारगेट 2022 तक के रखे हैं, जब भारत आजादी की 75वीं सालगिरह मनाएगा.

तो नरेंद्र मोदी भी तो मार्गदर्शक मंडल में जा सकते हैं उस वक्त? कौन होगा इनका उत्तराधिकारी? लोगों से बात करिए तो कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ बन सकते हैं, पर उनमें वो इंटरनेशनल हो जाने वाली बात नहीं है. एक उड़ती-उड़ती सी आवाज अमित शाह का नाम लेती है. पर अमित शाह का रईस फकीरों वाला अंदाज लोगों को जोर से बोलने से हिचका देता है. हालांकि सबको पता है कि अगर पूछा गया भाजपा का किंग कौन, तो नाम शाह का ही आएगा.

ये जो बात है कि अमित शाह के बारे में कुछ भी बोलने से पहले इंसान एक गहरी सांस ले लेता है, वही बात शाह को भारतीय राजनीति में अश्वमेध का घोड़ा बनाती है. भाई जहां भी गया, लाइन सी खेंच दी.

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दुश्मनी याद रहती है

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अब राज्यसभा पहुंच चुके हैं. रईस फकीर हैं, कभी भी झोला उठाकर कहीं भी पहुंच सकते हैं. 9 जुलाई, 2014 को ये भाजपा के अध्यक्ष बने थे. तब से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी ने आकाश में मार की है, तो अमित शाह ने देश के कोने-कोने में जाकर. साहेब के साथ इनका रिश्ता पुराना रहा है. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे, तब शाह होम मिनिस्टर हुआ करते थे. दोनों लोगों के बारे में कहा जाता है कि ये दुश्मनी नहीं भूलते. कोई एक भूल भी गया, तो दूसरा याद दिला देता है.

जब तड़ीपार हुए

जुलाई, 2010 में केंद्र में यूपीए सरकार थी. उसी वक्त सीबीआई ने अमित शाह को सोहराबुद्दीन के कथित फेक एनकाउंटर केस में गिरफ्तार किया था. ये आरोप लगाया गया कि शाह मारने वालों के सरदार थे. तब शाह को अहमदाबाद की साबरमती जेल में तीन महीने गुजारने पड़े थे. बाद में उनको तड़ीपार भी किया गया था. कहा गया कि वो गुजरात में रहेंगे, तो गवाहों को धमका देंगे. शाह सुप्रीम कोर्ट गये और सितंबर 2012 में उनको गुजरात में घुसने का मौका मिला.

जिंदगी का सबसे मुश्किल वक्त

दिसंबर, 2012 में नरेंद्र मोदी फिर से गुजरात के सीएम बने. पर अमित शाह को कोई पद नहीं मिला. क्योंकि ये कोर्ट के चक्कर लगा रहे थे. खुद को बचा रहे थे. 2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद ही शाह के खिलाफ सीबीआई कोर्ट ने केस डिसमिस कर दिया. सीबीआई ने इस केस को लेकर कोई अपील भी नहीं की. अमित शाह के जीवन में 2010 से लेकर 2014 तक का वक्त सबसे मुश्किल रहा था. 2010 से 2012 तक शाह को पत्नी के साथ दिल्ली के गुजरात भवन में रहना पड़ा था.

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जो हार जाए, वो अमित शाह नहीं

भाजपा ने इस बात को कुछ यूं लिया था. उनका मानना था कि कांग्रेस ही अमित शाह को टारगेट कर रही है. और इसके मास्टरमाइंड हैं सोनिया गांधी के सलाहकार अहमद पटेल. अहमद पटेल के खिलाफ अमित शाह का गुस्सा यहीं से पैदा हुआ है. यही वजह थी कि इस राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल को लेकर जो फाइट हुई, वो शायद भारत के इतिहास में कभी नहीं हुई थी. रात को 3 बजे फैसला आया. अमित शाह ने हर दांव चल दिया था पर आखिरी मोर्चे पर अपनी ही गलती के कारण पिछड़ गए. कांग्रेस के दो विधायकों को फोड़ लिया था, जिन्होंने वफादारी दिखाने के लिए अपने वोट अमित शाह को दिखा दिए. इलेक्शन कमीशन ने दोनों के वोट रद्द कर दिए और अहमद पटेल राज्यसभा पहुंच गए. पर क्या ये अमित शाह की हार हो गई?

कुछ समय पहले एक वीडियो आया था, जिसमें एक डॉक्टर एक घायल शेर का इलाज कर रही थी. एक मनोचिकित्सक भी बैठा था वहां. उसने बुरी तरह से पिटे हुए शेर की आंखों की स्टडी की. बाद में कहा कि मार तो बहुत खाया था, पर संतुष्ट था कि मैंने भी मारा दम भर के, पानी पिला दिया.

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पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण

ये पहला ऐसा मौका है, जब भाजपा देश की राजनीति में बुरी तरह से हावी है. इसकी शुरुआत अमित शाह ने 2014 के चुनाव में ही कर दी थी. जब राहुल गांधी की उनके ही क्षेत्र में खटिया खड़ी कर दी थी. इससे पहले माननीयों के क्षेत्र में विपक्षी हमलावर नहीं होते थे. तब किसी ने ये नहीं सोचा था कि ये अटैक और ज्यादा बढ़ेगा. अगर पिछले तीन सालों में देखें तो भाजपा ने जम्मू कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट और साउथ तक अपनी पकड़ मजबूत की है. सत्ता का खून इनकी शिराओं में इस कदर जोर मार रहा है कि कई बार मामला कोर्ट तक पहुंच जा रहा है. पर इनकी बुलेट ट्रेन रुक नहीं रही.

लोकल लेवल पर काम, लोकल लेवल पर असर

यूपी जैसे विविधताओं वाले राज्य में कुशल प्रबंधन के जरिए अमित शाह ने 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में जोरदार जीत हासिल की. जब सारे लोग बछड़े के कटने पर हल्ला मचा रहे थे, उस वक्त अमित शाह उड़ीसा में भाजपा का जनाधार मजबूत कर रहे थे. वहां के लोकल चुनावों में इसका नतीजा देखने को मिला भी है. जबकि कुछ समय पहले तक भाजपा हिंदुत्व प्रभावित राज्यों को छोड़कर बाकी जगहों पर कोशिश भी नहीं करती थी. पर अमित शाह ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात बार-बार दोहराकर देश के हर राज्य में अपनी धाकड़ उपस्थिति दर्ज कराई है.

धीरे-धीरे पैठ बनाई

22 अक्टूबर, 1964 को मुंबई में जन्मे शाह 1997 में सरखेज से पहली बार विधायक बने थे. उपचुनाव में जीते थे. पर उसके बाद 1998, 2002 और 2007 में भी जीते. 2012 में नरनपुरा से विधायक बने. इनके पिता अनिलचंद्र शाह का प्लास्टिक पाइप का बिजनस था. शाह परिवार ही बिजनस में था. अमित शाह भी बायोकेमिस्ट्री पढ़ने के बाद पापा के साथ लग गये थे. पर वो बचपन से ही आरएसएस से भी जुड़े थे. शाखा में आना-जाना लगा रहता था. कहा जाता है कि इसी दौरान वो 1982 के आस-पास नरेंद्र मोदी से मिले थे. मोदी तब तक कुछ अपनी पैठ बना भी चुके थे. इसके बाद ही 1983 में अमित शाह ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जॉइन कर लिया. और नरेंद्र मोदी से एक साल पहले 1986 में भाजपा जॉइन कर ली. युवा मोर्चा में इनकी पैठ बनी. उसके जनरल सेक्रेट्री बन गये. 1991 के लोकसभा चुनावों में गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी के लिए प्रचार भी किया.

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गुजरात में शुरुआत

1995 में गुजरात में भाजपा ने पहली बार अपनी सरकार बनाई. केशुभाई पटेल सीएम बने. इससे पहले तक वहां कांग्रेस का ही रौला था. मोदी और शाह दोनों लोगों ने कांग्रेस को वहां से खत्म करने के लिए गांव-गांव जाकर माहौल बनाया था. उनका तरीका वही था, जो आज है. किसी भी पार्टी के दूसरे सबसे ताकतवर लोकल नेता को तोड़ लो. क्योंकि उनको अपनी पार्टी में मौका तो मिलता नहीं. तो सीधे मुद्दे की बात करो और आसमान पर चढ़ा दो. कल के राज्यसभा चुनाव में इसकी बानगी दिखी थी.

जब एक साल में घाटे वाले बैंक को फायदे में ला दिया

इसके बाद दोनों लोगों ने कोऑपरेटिव में कांग्रेस को कमजोर करना शुरू किया. 1999 में शाह अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक के प्रेसिडेंट चुने गये. य़े इंडिया का सबसे बड़ा कोऑपरेटिव बैंक था. इनमें चुनाव जाति के आधार पर होता था. जिसमें पटेल और क्षत्रिय मुख्य थे. शाह दोनों में से किसी में नहीं आते थे, पर जीत गए. ये बैंक घाटे में चलता था, पर शाह ने एक साल में ही मामला बदल दिया. फायदे में करा दिया. इन पर ये आरोप लगते रहे कि बैंक के डायरेक्टर में आधे से ज्यादा भाजपा के ही लोग रखे जाते हैं. तब तक मोदी का कद भाजपा में बढ़ गया था. उन्होंने इनको गुजरात स्टेट फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनवा दिया. 1995 से लेकर 2001 तक मोदी गुजरात से बाहर रहे. लोग पूछते हैं कि फिर अचानक से माहौल बदला तो मोदी को ही सीएम क्यों बनाया गया? उनकी पकड़ कमजोर क्यों नहीं हुई? बता दें कि इतने सालों तक अमित शाह गुजरात में ही थे.

गुजरात मंत्रिमंडल के वनमैन आर्मी

2002 में जब मोदी चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने तो शाह उनके सबसे कम उम्र के मंत्री बने. पर उनको होम मिनिस्ट्री सहित 12 विभाग दिए गए थे. ये सारे महत्वपूर्ण विभाग थे. ऐसा लग रहा था कि शाह ही पूरा मंत्रिमंडल संभाले हुए हैं. ये आरोप अभी भी लगता है उन पर. शाह को कांग्रेस से शुरू से ही प्रॉब्लम रही है. जब 2004 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने विवादित पोटा कानून हटाने की बात की तो अमित शाह ने गुजरात में वैसा ही बिल पास करा लिया. यही नहीं, धर्मांतरण को लेकर भी कानून बनवा दिया. आरएसएस और भाजपा को तभी लग गया था कि ये आदमी बहुत आगे जाएगा.

BAD-नामी

इसी दौरान इन पर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और 2002 के दंगों से जुड़े तमाम केस दर्ज होते गए. एक विधानसभा चुनाव में धांधली करने का भी आरोप लगा. इन चीजों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. 2009 में भी एक मामला हुआ था, जिसका आरोप इन पर 2013 में लगा. कोबरापोस्ट ने एक ऑडियो टेप रिलीज किया था, जिसमें कहा गया कि अमित शाह और पुलिस ऑफिसर जी एल सिंघल बात कर रहे थे. कथित तौर पर एक लड़की और एक पुलिस ऑफिसर प्रदीप शर्मा की खुफियागीरी करने की बात की जा रही थी. बाद में वो लड़की खुद 2014 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची और कहा कि ये खुफियागिरी उसकी पर्सनल रिक्वेस्ट पर की गई थी. वो गुजरात सरकार का धन्यवाद करती हैं कि उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी ली उन्होंने.

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सीट कितनी भी मिलें, सरकार बननी चाहिए

जब 2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा का पीएम कैंडिडेट चुना गया, तब राजनाथ सिंह ने शाह को भाजपा का जनरल सेक्रेट्री बनवाया. और उनको यूपी का जिम्मा दिया गया. यूपी जीतना बहुत जरूरी होता है केंद्र में सरकार बनाने के लिए. शाह ने यूपी के सारे जातिगत समीकरण और धार्मिक समीकरण तोड़ दिए. ये तरीका अभी भी वो आजमा रहे हैं. अभी भी जाति के समीकरण तोड़े जा रहे हैं. ऐसा लगता है कि उनकी पहुंच के साथ इंसान मजबूर हो जाता है वोट करने के लिए. शाह के पास दूसरा तरीका भी है. बिहार में हार के दो साल बाद उसी तरीके से सरकार बना ली. इसी तरीके से उत्तराखंड में बनाई थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने गिरा दी. पर फिर पहले तरीके से बना ली.

अमित शाह ने नरेंद्र मोदी की क्षमता सबसे पहले भांप ली थी!

ऐसी कहानियां हैं कि 90 के दशक में एक रेस्टोरेंट के बाहर अमित शाह ने मोदी से कहा था कि नरेंद्र भाई देश का पीएम बनने के लिए तैयार हो जाइए. उस वक्त नरेंद्र भाई सीएम भी नहीं थे. पर ये बात अतिशयोक्ति नहीं लगती क्योंकि जिस तरीके से शाह काम कर रहे हैं, लगता है कि उनको पता था कि भारत में रहना है, तो क्या करना है. पहले तो अपनी ही पार्टी में वाजपेयी-आडवाणी नाम के हिमालय को गिराकर मोदी-शाह का सहयाद्री पर्वत खड़ा कर लिया. ये आसान थोड़े था!

Shah president of India's ruling BJP gestures as he celebrates with party supporters after learning of the initial poll results inside the party headquarters in New Delhi

चप्पा चप्पा भाजप्पा

अमित शाह कहते हैं कि जब मैं मरूंगा तो मुझे मालूम है कि आप लोग एनकाउंटर से जुड़ी बातें ही मेरी स्मृति में लिखेंगे. तो मैं अपनी इमेज बदलने की कोशिश क्यों करूं. शाह ने भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना दी है. इनके 11 करोड़ सदस्य हैं. पार्टी अध्यक्ष के तौर पर इन्होंने साल भर में 110 दिन का टूर किया है. गलती करने पर सांसदों और विधायकों को खूब लताड़ा भी है. कई नेता इनसे मिलने के बाद रोते हुए बाहर निकले हैं. ऐसी खबरें आती रहती हैं. कहा जाता है कि पिछले तीन सालों में इन्होंने लगभग 541 किलोमीटर प्रतिदिन के हिसाब से यात्रा की है अगर सारी हवाई यात्रा वगैरह मिला दें तो. तो इनकी इसी अदा पर भाजपा का कार्यकर्ता फिदा रहता है. किसी भी कार्यकर्ता से पूछ लीजिए, अमित शाह के नाम पर इमोशनल हो जाता है. शाह का उद्देश्य ही है पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक चप्पा चप्पा भाजप्पा. ‘ब्राह्मण-बनिया’ के टैग लगी पार्टी को दलितों का वोट दिलवा देना हंसी-खेल तो नहीं ही है. बस अगर पत्रकारों को लेकर ये अपना रुख बदल लें, तो ठीक रहेगा. जिस तंज से और बिना किसी का सम्मान किए, ये जो जवाब देते हैं, वो थोड़ा अखर जाता है. घमंड करना अच्छी बात थोड़े है. पर ये भी है कि उनका दिन चल रहा है.


वीडियो में देखें लल्लनटॉप बुलेटिन

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