चीन में गूगल नहीं है. नहीं! माने, है तो लेकिन न के बराबर. यहां मेरी हालत तो ऐसीहै कि बाइक की चाबी दो मिनट न मिले तो मन करता है गूगल कर लूं.गूगल किसी साधन से बढ़कर एक ज़रूरत बन गया है. आज के टाइम में पढ़ाई, खेल, पिच्चर,साइंस, जो बोलो वो, गूगल पर अवेलेबल है. ऐसे में चीन में क्या होता होगा? माने वहांजब वहां किसी को मालूम करना होगा कि हौज़ खास विलेज मेट्रो स्टेशन से कितनी दूर हैतो वो क्या करता होगा? गूगल नहीं तो फिर क्या?चीन में 2009 में सर्च इन्जंस के इस्तेमाल के मामले में गूगल 36.2% था और 2013 मेंमात्र 1.7%. चीन में गूगल के हत्थे एक और मुसीबत चढ़ी रहती है. सेंसरशिप. चीन कीसरकार गूगल पर हंटर लेके सवार रहती है. लोगों को वही देखने को मिलता है जो सरकारचाहती है. जैसे 2012 में चीनी गूगल पर 'Jiang' सर्च करना बैन था. इस कीवर्ड को सर्चकरने पर कोई भी रिज़ल्ट नहीं दिखता था. चीनी भाषा में जिआंग का मतलब नदी होता है.लेकिन साथ ही ये एक कॉमन सरनेम भी होता है. और उसी वक़्त जिआंग जेमिन की मौत कीखबरें भी आ रही थीं जो सरकार देश की जनता को नहीं बताना चाहती थी. जिआंग जेमिन चीनीकम्युनिस्ट पार्टी के फॉर्मर जनरल थे. चीनी सरकार ऐसे ही तमाम तरीकों से गूगल परपूरी तरह कंट्रोल रखती है.चीनी गूगलसवाल अब भी वही है - गूगल नहीं तो फिर क्या? वहां लोग कुछ भी ढूंढ़ने के लिएइन्टरनेट का इस्तेमाल ही नहीं करते क्या? अगर करते है तो किसका? कोई तो सर्च इंजनहोगा न?-------------------------------------------------------------------------------- गूगल नहीं तो फिर क्या? जवाब है बाईडू. चीन का अपना गूगल. चीनी गूगल. बाईडू. आजके वक़्त में जब गूगल सर्च इंजन का पर्याय बन चुका है तब चीन बाईडू से दुनिया खंगालरहा है. इसीलिए बाईडू हुआ चीन का गूगल.बाईडू की वो बात जो सबसे पहले नोटिस की जाती है वो है उसका लोगो. एक भालू का पंजा.बड़ा सा. नीले रंग का. ये उस शिकारी को दर्शाता है जो अपने शिकारी को उसके पैरों केनिशानों से ढूंढ़ता है और उसका शिकार कर लेता है. बाईडू वही शिकारी है. चीज़ों कोढूंढ-ढूंढ कर लाता है. उसे ट्रैक करके. चीनी इन्टरनेट यूज़र्स तक. बड़ी बात ये है कि2000 में शुरू हुआ बाईडू आज NASDAQ में लिस्टेड है. जैसे इंडिया में बॉम्बे स्टॉकएक्सचेंज यानी BSE है वैसे ही अमरीका का अपना NASDAQ है. NASDAQ में किसी कंपनी काशामिल होना ये बताता है कि रुपये-पैसे के मामले में उस कंपनी की कुछ औकात है. बाईडूNASDAQ में 2007 में शामिल हुआ था. मात्र 7 साल में ये कारनामा कर दिखाना कोई हल्काकाम नहीं है. इससे ये साफ़ मलूम चलता है कि बाईडू ने काफ़ी तेज़ तरक्की की है.बाईडू के ऐडमिनिस्ट्रेशन की मानें तो उनका अगला स्टेप है इंडिया की मार्केट मेंघुसना. बीते वर्ष सितम्बर में बाईडू ने गुड़गांव में अपना ऑफिस खोला है. यहां इंडियाकी डोमेस्टिक मार्केट के हिसाब से सोच-समझकर ऐप्स तैयार की जा रही हैं. बाईडू कीतीन ऐप्स इंडियन मार्केट में काफी हिट भी हुई हैं. डीयू बैट्री सेवर और स्पीडबूस्टरके 80 लाख मंथली यूज़र हैं. जबकि फाइल एक्स्प्लोरर के 1 करोड़.DU Battery Saver, Speedbooster, and ES File Explorerचीनी भाषा, संस्कृति का अच्छा ज्ञान बाईडू की सबसे बड़ी ताकत है. हुआ ये है कि अपनेइस ज्ञान की बदौलत चीनी यूज़र्स को उनके अनुसार सर्च रिज़ल्ट देने में सहूलियत रहतीहै. उससे चीनी यूज़र्स को भी अपने मन मुताबिक़ रिज़ल्ट पाने में आसानी होती है. हरसर्च इंजन में एक फॉर्मूला होता है जिसके मुताबिक़ वो सर्च रिज़ल्ट्स देता है. इसफ़ॉर्मूला को अल्गॉरिदम का नाम दिया गया है. इस अल्गॉरिदम के हिसाब से सर्च कियेजाने वाले शब्दों को आपसे जुड़े तमाम फैक्टरों से जोड़कर उनका सर्च रिज़ल्ट दिया जाताहै. गूगल बाकी दुनिया पर छाया हुआ है. मगर चीन में लगभग ज़ीरो ही है. चीन वो देश हैजहां इन्टरनेट की घुसपैठ उस हद तक नहीं हो पायी है जितनी बाकी देशों में है. चीनमें गूगल 1.7% है जबकि दुनिया भर में 90% गूगल का इस्तेमाल किया जाता है. ये ऑनलाइनसर्च मार्केट के आंकड़े हैं. दुनिया भर में बाईडू की सर्च मार्केट मात्र 1% ही है.गूगल भले ही दुनिया भर में तमाम सर्विसेज़ देता है, मगर चीन में उसका इतना भौकालनहीं बन पा रहा है. वहीं बाईडू ऐसी सर्विसें दे रहा है जैसे गुमशुदा लोगों की तलाश,सीनियर सिटिज़न की सर्च, पेटेंट की सर्च और साथ ही चीन में रहने के लिए या बाकीचीज़ों की लीगल ज़रूरतें.इन सभी और कई और वजहों से चीन में बाईडू भले ही टॉप पर चल रहा हो लेकिन दुनिया मेंतो गूगल ही नम्बर एक है. और इसमें कोई शक ही नहीं है. विदेशी इन्वेस्टर्स इसमेंइन्वेस्ट करने से कतराते हैं क्यूंकि ये सिर्फ चीन तक ही लिमिटेड है. साथ ही चीनमें डोमेस्टिक कम्पटीशन भी बढ़ता जा रहा है. अगर गूगल चीन की मार्केट में अपना शेयरबढ़ा सके, तो गूगल का चीन में बिज़नेस बढ़ सकेगा. और साथ ही शायद बाईडू को किनारे कियाजा सके. फिलहाल ये काफी टेढ़ी खीर मानी जा रही है.