बिहार के चंपारण सत्याग्रह को आज एक सौ दो साल पूरे हो गए. यह सत्याग्रह जितनाचंपारण के किसानों के लिए महत्वपूर्ण था, उतना ही अहम महत्मा गांधी के लिए भी था.इसका कारण ये था कि इससे पहले महात्मा गांधी को आंदोलन के लिए इतना बड़ा प्लेटफॉर्मनहीं मिला था. चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पर एक रिपोर्ट लिखी थी. डॉ. अशोकप्रियदर्शी ने. आज दो साल बाद वही पेश-ए-नज़र: ऐसे रची गई थी निलहों से मुक्ति कीकहानी बात 167 साल पुरानी है. 1850 के आसपास नील से अधिक नफा होने के चलते गन्ने कीखेती कम कर दी गई. जीरात और असामीवार तरीके से नील की खेती कराई जाने लगी. निलहोंकी दखल में जो जमीन थी, इसमें वे अपने हल बैल की सहायता से नील की खेती करते थे. वहया तो मालिक की जीरात की जमीन होती थी या फिर उसमें काश्तकारी के हक प्राप्त होतेथे. लेकिन निलहें जब चाहें, रैयतों से मजदूरी करा लिया करते थे और बदले में उन्हेंबहुत कम पैसे दिया करते थे. दूसरा तरीका था असामीवार. इसमें रैयतों द्वारा नील पैदाकिया जाता था. इसके कई प्रकार थे. लेकिन ‘तीन कठिया’ प्रथा काफी प्रचलित थी. इसप्रथा में निलहे रैयतों से प्रति बीघा तीन कट्ठा नील की खेती कराते थे. यहव्यवसायिक फसल थी लेकिन किसान इसे इसलिए नहीं करना चाहते थे क्योंकि इसका मुनाफानिलहे उठा लिया करते थे. परेशानी रैयतों को होती थी. ऐसे मामले की सुनवाई के लिए एकविशेष अदालत थी लेकिन इसमें ज्यादातर फैसला रैयतों के विरूद्ध हुआ करता था. कालांतरमें जर्मनी में कृत्रिम नील का उत्पादन किया जाने लगा. लिहाजा, इसका उत्पादन भारतमें कम हो गया. तब निलहे किसानों से लगान के अतिरिक्त 46 तरह का टैक्स वसूलने लगे.किसानों से टैक्स का ही दूसरा नाम अबवाब है. अबवाब लेना गैर कानूनी था. लेकिनचंपारण के निलहे इसकी परवाह नहीं करते थे. निलहों से मुक्ति के लिए रैयतों मेंछटपटाहट थी. तभी पश्चिम चंपारण के सतवरिया निवासी पंडित राजकुमार शुक्ल की मेहनतरंग लाई. शुक्ल को हथुआ राज में नौकरी मिली थी. एक दिन शुक्लजी की डयूटी चीनी मिलके लिए आए गन्ने को बैलगाड़ियों से उतरवाने और वजन कराने के लिए लगी. रैयतों केप्रति सहानुभूति दिखाने के कारण एक अंग्रेज मुलाजिम ने एक मोटा गन्ना उनके पेट मेंघुसेड़ दिया. प्रतिक्रिया में शुक्ल ने उसकी धुनाई कर दी. फिर भागकर गांव चले आए.लेकिन शुक्लजी गन्ने की चोट से उबर नहीं पाए. वह निलहों के विरूद्ध गोलबंदी करनेमें जुट गए. वे अपनी जेब से पैसा खर्च कर थाना और कोर्ट में रैयतों की मदद कियाकरते थे. इनके अभियान से प्रभावित होकर मोतिहारी के वकील गोरख प्रसाद, धरणीधरप्रसाद, कचहरी का कातिब पीर मोहम्मद मुनिस, संत राउत, शीतल राय और शेख गुलाब जैसेलोग हमदर्द बन गए. वह कानपुर गए. और ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी कोकिसानों का दुखड़ा सुनाया. विद्यार्थीजी ने 4 जनवरी 1915 को प्रताप में ‘चंपारण मेंअंधेरा’ नाम से एक लेख प्रकाशित किया. विद्यार्थीजी ने शुक्लजी को गांधीजी से मिलनेकी सलाह दी. तब शुक्लजी साबरमती आश्रम गए लेकिन गांधीजी पुणे गए हुए थे. इसलिए उनदोनों की मुलाकात नहीं हो पाई. शुक्ल ने आस नहीं छोड़ी. लखनऊ में 26 से 30 दिसंबर1916 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 31वां वार्षिक अधिवेशन था. बिहार से बड़ीसंख्या में लोग शामिल हुए थे. इसमें चंपारण के निलहों से उत्पीड़ित रैयतों केप्रतिनिधि के रूप में हरिवंश सहाय, गोरख प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, रामदयाल प्रसादसाहू, पीर मोहम्मद मुनिस और पंडित राजकुमार शुक्ल भी थे. अधिवेशन में पंडितराजकुमार शुक्ल गांधीजी के चरणों में लोट गए और कहा -‘निलहों के जुल्म से चंपारण केरैयतों को बचाइए. चंपारण चल कर रैयतों की दशा अपनी आंखों से देखिए.’ लेकिन गांधीजीचंपारण की दुर्दशा से अनभिज्ञ थे. लिहाजा, ब्रजकिशोर प्रसाद के माध्यम से उन्हेंजानकारी हुई. अधिवेशन में चंपारण से संबंधित प्रस्ताव पारित हुआ. शुक्लजी कोप्रसन्नता हुई लेकिन इतने से उन्हें संतोष नहीं था. उन्होंने गांधीजी से आग्रह कियाकि वे स्वयं चंपारण चलकर रैयतों की दशा अपनी आंखों से देख लें. अधिवेशन के बादगांधीजी कानपुर और अहमदाबाद गए तब भी शुक्लजी साथ रहे. चंपारण यात्रा की तिथिनिश्चित करने का गांधीजी से अनुरोध किया. इस पर गांधीजी ने चंपारण आने के वचन कोदुहराया. गांधीजी ने अपनी ‘आत्मकथा’ में लिखा भी - ‘राजकुमार शुक्ल बिहार के हजारोंलोगों पर से नील के कलंक को धो देने के लिए कृत संकल्प थे.’ राजकुमार शुक्ल ने 27फरवरी 1917 को दुखभरा पत्र पीर मोहम्मद मुनिस से लिखवाकर गांधीजी को भेजा. इस पत्रका प्रभाव गांधीजी पर इतना अधिक पड़ा कि चंपारण जाने का कार्यक्रम बना लिया. 7 मार्च1917 को कोलकाता जाने के कार्यक्रम के बारे में शुक्लजी को पत्र लिखा लेकिन यह पत्रशुक्लजी को नहीं मिला. उसके बाद गांधीजी ने एक तार किया. तब शुक्ल कोलकाता गए. उसकेबाद 9 अप्रैल 1917 को शुक्लजी के साथ गांधीजी मोतिहारी के लिए चल पड़े. गांधीजी नेचलते समय कहा कि-‘अनपढ़ निश्चयमान किसान ने मुझे जीत लिया.’ महात्मा गांधी मुजफ्फपुरपधारे. तब कृपलानी स्थानीय कॉलेज में प्राध्यापक थे. कृपलानी ने विद्यार्थियों केसाथ गांधीजी का स्वागत किया. फिर मुजफ्फरपुर के नागरिकों तथा वकीलों ने गांधीजी कोरैयतों की कहानी से अवगत कराया. गांधीजी ने नीलवर संघ के सचिव जेएम विल्सन सेमुलाकात की और फिर कमिश्नर एलएफ मौर्शेड से भी मिले. लेकिन अधिकारियों ने गांधीजीके काम में दिलचस्पी नहीं दिखाई. उसके बाद गांधीजी ने मोतिहारी प्रस्थान करने कानिर्णय लिया. दरभंगा के प्रसिद्ध वकील ब्रजकिशोर प्रसाद आए और एक कार्यक्रम तय हुआ.रामनवमी प्रसाद, धरणीधर जो उस समय दरभंगा के वकील थे, महात्माजी के साथ जाने के लिएचुने गए. गांधीजी 15 अप्रैल 1917 मोतिहारी पहुंचे. उनके पहुंचते ही लोगों का हुजूमउमड़ पड़ा. प्रत्येक व्यक्ति अपनी आपबीती सुनाने लगा. तभी गांधीजी को पता चला किजसौलीपट्टी गांव में एक संपन्न किसान पर निलहों द्वारा अत्याचार किया गया है.गांधीजी ने अगले ही दिन जसौलीपट्टी जाने का निश्चय किया. दोपहर में चण्डहिया गांवपहुंचे. तभी गांधीजी को एक दरोगा ने सूचना दी कि जिलाधीश उनसे मिलना चाहते हैं.लिहाजा, गांधीजी दरोगाजी के साथ एक बैलगाड़ी पर सवार होकर नगर की ओर लौट गए. महात्मागांधी ने जब आधी दूरी तय कर ली तब उन्हें पुलिस का एक उच्चाधिकारी मिला, जो धारा144 की नोटिस के साथ था. इस नोटिस में गांधीजी को अविलंब मोतिहारी छोड़ने का आदेशदिया गया था. गांधीजी ने इस नोटिस को अनदेखा कर दिया. तीसरे दिन गांधीजी पर आज्ञाउल्लंघन के मुकदमे की सुनवाई शुरू हो गई. गांधीजी ने आरोप को स्वीकार कर लिया.जिलाधीश ने गांधीजी को एक दिन के लिए अपना कार्य स्थगित करने की राय दी ताकि वहसरकार से समुचित परामर्श ले सकें. गांधीजी ने उनका विचार मान लिया. पहले और दूसरेदिन में पटना से ब्रजकिशोर प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, मजहरूलहक, मिस्टर पोलक, मिस्टर एंडूज आदि पहुंचे थे. सभी ने मिलकर एक योजना बनाई कि सरकारइस विषय में सख्ती दिखाए तो क्या करना चाहिए. तीसरे दिन सरकार से सूचना मिली किगांधीजी पर से धारा 144 हटा ली गई है. उच्चाधिकारियों को आदेश मिला कि वे उनकी पूरीसहायता करें. गांधी जी की यह पहली विजय थी. मोतिहारी के बाद गांधीजी बेतिया गए.रैयतों का बयान लेना जारी रहा. लेकिन निलहों में खलबली थी. इसलिए गांधीजी को भगानेके हर कुचक्र रचे जा रहे थे. निलहे अखबारों में भी मनगढ़ंत खबरें प्रकाशित करवानेलगे. लेकिन कुछ दिनों बाद बिहार राज्य के गवर्नर गेट महोदय ने गांधीजी को कुछनिलहों के प्रतिनिधियों के साथ रांची में बुलवाया. उसके बाद जांच कमिटी गठित की गई.इसमें गांधीजी भी सदस्य बनाए गए. यह महात्मा गांधी की दूसरी विजय थी. जांच कमिटी केसदस्यों में कोई एक मत नहीं था. निलहों के प्रतिनिधियों में असंतोष था. लेकिन बहुमतके आधार पर सरकार ने 4 मार्च 1918 में चंपारण अधिनियम पास किया. लिहाजा, ‘तीन कठियाप्रथा’ समाप्त कर दी गई. निलहों ने मालगुजारी के रूप में जो भी अधिक वसूला थाउन्हें उसे लौटाना पड़ा. रैयतों का लगान घटा दिया गया. अबवाब अवैध घोषित हुआ. उसकेलिए दंड का विधान बना. निलहों को धीरे धीरे चंपारण सदा के लिए छोड़ना पड़ा. तब रैयतराहत की सांस लेने लगे. भारत में महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा की यह पहली विजयथी. वो पत्र जो पंडित राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को चंपारण आने के लिए भेजा था:मान्यवर महात्मा, दिनांक-27 फरवरी 1917 किस्सा सुनतेहो रोज औरों के, आज मेरी भी दास्तान सुनो. आपने उस अनहोनी को प्रत्यक्ष कर कार्यरूप में परिणत कर दिखलाया, जिसे टॉलस्टॉय जैसे महात्मा केवल विचार करते थे. इसी आशाऔर विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं.हमारी दुख भरी कथा दक्षिण अफ्रीका में हुए अत्याचार से , जो आप और आपके अनुयायी वीरसत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ, कहीं अधिक है. हम अपना वो दुख, जो हमारी 19लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहींसमझते. बस, केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आंखों से देख लीजिए, तबआपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में यहां की प्रजा, जिसकोब्रिटिश छत्र की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्टसहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रहा है. हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा कीओर आकृष्ट कराना चाहते हैं, जो लखनऊ-कांग्रेस के समय और फिर वहां से लौटते समयकानपुर में आपने की थी, अर्थात, ‘ मैं मार्च-अप्रैल महीने में चंपारण आऊंगा.' बस अबसमय आ गया है श्रीमान, अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें. चंपारण की 19 लाख दुखी प्रजाश्रीमान के चरण कमल के दर्शन के लिए टकटकी लगाए बैठी है. और, उन्हें आशा ही नहींबल्कि पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान श्रीरामचंद्रजी के चरण स्पर्श सेअहल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान के चंपारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं काउद्धार हो जाएगा. श्रीमान का दर्शनाभिलाषी राजकुमार शुक्ल--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी डॉ. अशोक प्रियदर्शी ने 11 अप्रैल, 2017 को लिखी थी जिसे 11 अप्रैल, 2019को अपडेट किया गया.-------------------------------------------------------------------------------- वीडियो देखें: रिलीज़ होने से ठीक पहले इस बड़े विवाद में फंस गई है 'कलंक' -