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इजरायल के सबसे बड़े दुश्मन को इजरायली PM के साथ नोबेल पीस प्राइज़ क्यों मिला था?

उस नेता की मौत में मोसाद का क्या रोल था?

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यासिर अराफ़ात को सबसे बदतर नोबेल पीस प्राइज़ विनर क्यों कहा गया?
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अभिषेक
10 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 9 दिसंबर 2020, 03:45 AM IST)
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मिस्र की राजधानी काहिरा. 1929 में यहां एक लड़का पैदा हुआ. पिता फ़िलिस्तीनी मूल के थे. मिस्र में उनका टेक्सटाइल का कारोबार था. लड़के ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. 1948 में इजरायल की स्थापना हुई. इसके तुरंत बाद अरब देशों ने इजरायल पर हमला कर दिया. लड़के ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी. और, इजरायल के ख़िलाफ़ लड़ने चला गया. हालांकि, मिस्र की सेना ने उसे लड़ाई के मैदान से वापस लौटा दिया. इस लड़के का नाम था यासिर अराफ़ात.
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बचपन में यासिर अराफ़ात.

अराफ़ात, काहिरा में फिलिस्तीनी स्टूडेंट्स का गुट चलाते थे. 1959 में उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘फ़तह’ बनाया. इसका मकसद था, फ़िलिस्तीन की मुक्ति. इस काम में इजरायल रोड़ा था. इस गणित से, 'इजरायल' फ़तह का सबसे बड़ा दुश्मन था.
PLO के साथ अराफ़ात
आठ साल बाद ‘फ़तह’ एक दूसरे बड़े गुट का हिस्सा बना. फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (PLO). ये 1964 में बना था. इसमें कई छोटे-मोटे गुट जुड़े थे. ये सब अलग-अलग इजरायल से लड़ रहे थे. PLO की पहली बैठक में लक्ष्य तय किया गया. क्या? फ़िलिस्तीन में इजरायल की संप्रभुता को खत्म करना. और, इजरायल को हमेशा के लिए नक्शे से मिटा देना. ऐसा क्यों?
दरअसल, 1948 से पहले इजरायल नाम का कोई देश था ही नहीं. फ़िलिस्तीन में यहूदी और अरब साथ-साथ रहते थे. लेकिन उनके बीच तालमेल नहीं था. आए दिन यहां पर दंगे भड़कते थे. यहूदी, अपने लिए अलग इलाके की मांग कर रहे थे. उस वक़्त फिलिस्तीन पर ब्रिटेन का राज था. 1947 में अंग्रेज़ मामले को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) चले गए. UN ने माना कि यूरोप से पलायन कर रहे यहूदियों के लिए अलग देश होना चाहिए. फ़िलिस्तीन को बांटकर नया देश बनाया गया.
14 मई, 1948 को यहूदियों ने आज़ादी का ऐलान कर दिया. उन्होंने अपने देश का नाम रखा, इजरायल. अगले दिन अमेरिका ने इजरायल को मान्यता दे दी. इससे नाराज़ अरब देशों ने इजरायल पर हमला कर दिया. इजरायल ने अरब देशों को हरा दिया. साथ ही, फ़िलिस्तीन के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा भी कर लिया.
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यासिर अराफ़ात की वॉल पेंटिंग.

फ़िलिस्तीन की पुरानी स्थिति लौटाने के लिए PLO, इजरायल को नेस्तनाबूद करना चाहता था. इसके लिए वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे. सशस्त्र संघर्ष, इजरायली नागरिकों पर हमले, इजरायली विमानों की हाईजैकिंग. PLO इसके लिए कुख्यात था.
इजरायल ने मारने की तैयारी कर ली थी
फिर साल आया 1969 का. यासिर अराफ़ात PLO के मुखिया बने. PLO ने इजरायल पर हमला जारी रखा. 1972 में म्युनिख में ओलिंपिक हो रहा था. आतंकी संगठन ‘ब्लैक सेप्टेम्बर’ ने 11 इजरायली खिलाड़ियों की हत्या कर दी. कहा जाता है कि अराफ़ात ने इस हमले में ब्लैक सेप्टेम्बर की मदद की थी.
इजरायल ने फौरन जवाबी कार्रवाई की. लेबनान और सीरिया में PLO के ठिकानों पर बम गिराए. मोसाद ने ‘ऑपरेशन रॉथ ऑफ़ गॉड’ चलाया. और, हमले में शामिल आतंकियों को चुन-चुनकर मारा. इस ऑपरेशन के बारे में विस्तार से जानना हो, तो आप ‘म्युनिख़’ फ़िल्म देख सकते हैं.
यासिर अराफ़ात भी इजरायल के निशाने पर थे. लेकिन उनकी खुशकिस्मती थी कि बच जाते थे. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने यासिर अराफ़ात को जान से मारने की तैयारी कर ली थी. लेकिन अंतिम समय में मन बदल लिया. 23 अक्टूबर, 1982. यासिर अराफ़ात एथेंस एयरपोर्ट पहुंचे. वहां एक प्राइवेट प्लेन उनका इंतज़ार कर रहा था. साथ ही, मोसाद के दो एजेंट्स भी. वे टारगेट कंफर्म करने एयरपोर्ट पर आए थे.
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1982 में इजरायल ने अराफ़ात को मारने की पूरी प्लानिंग कर ली थी.

कंफर्म करते ही एजेंट्स ने जानकारी एयरफ़ोर्स तक पहुंचाई. फौरन दो इजरायली लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी. उन्होंने अपना टारगेट सेट कर लिया था. लेकिन अधिकारी आख़िरी बार कंफ़र्म कर लेना चाहते थे. ऐसा हो नहीं पाया. ऐसे में लड़ाकू विमानों को वापस लौटने का हुक्म दिया गया.
बातचीत की मेज से नोबेल तक का सफ़र
इजरायल ने PLO को काफी नुकसान पहुंचाया था. एक ऐसा समय भी आया, जब अराफ़ात ने इजरायल के साथ बातचीत की कोशिश की. सुलह का रास्ता अपनाने पर जोर दिया. 1992-93 में ओस्लो में PLO और इजरायल के बीच कई दौर की मुलाक़ात हुई. इसमें इजरायल-फ़िलिस्तीन के बीच के रिश्ते को सुधारने पर सहमति बनी.
आखिरकार, 10 सितंबर 1993 को PLO ने इजरायल को मान्यता दे दी. बदले में इजरायल ने PLO को फ़िलिस्तीन का आधिकारिक प्रतिनिधि माना. 13 सितंबर को व्हाइट हाउस के लॉन में समझौते पर दस्तखत हुए. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी वहीं पर मौजूद थे.
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व्हाइट हाउस के लॉन में यित्ज़ाक राबिन और यासिर अराफ़ात.

इस समझौते से शांति का रास्ता खुला था. साथ में दुनिया के सबसे सम्मानित अवॉर्ड्स का पिटारा भी. यासिर अराफ़ात के साथ-साथ इजरायल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और विदेश मंत्री शिमेन पेरेज को 1994 के नोबेल पीस प्राइज़ के लिए चुना गया. 10 दिसंबर, 1994 की तारीख़ को तीनों का नाम ‘नोबेल विजेताओं’ की लिस्ट में शामिल हो चुका था.
अराफ़ात को नोबेल दिए जाने की खूब आलोचना हुई. दुनिया के कई देश अराफ़ात को आतंकवादी मानते थे. सैकड़ों नागरिकों की हत्या में अराफ़ात का हाथ था. और, अब उनको शांति का दूत बताकर पेश किया जा रहा था.
क्या नोबेल पीस अवॉर्ड से सब ठीक हो गया?
बिल्कुल नहीं. नवंबर, 1995 में प्रधानमंत्री राबिन की हत्या हो गई. एक यहूदी कट्टरपंथी ने तेल अवीव में रैली के बाद उनको गोली मार दी. हत्यारा PLO के साथ हुए समझौते से नाराज़ था.
उधर फ़िलिस्तीन में अराफ़ात का विरोध हुआ. एक बड़ा धड़ा इजरायल को मान्यता दिए जाने से नाराज़ हो गया. दूसरे आतंकी गुटों ने इजरायल पर हमला जारी रखा. अराफ़ात इसको रोक नहीं पाए. ओस्लो शांति समझौते को कभी ठीक से लागू नहीं किया जा सका. जिन इलाकों पर से इजरायल ने अपना दावा छोड़ा था, वहां वो वापस लौट आए. और मज़बूती के साथ.
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पेरिस के अस्पताल में ही अराफ़ात की मौत हो गई. बाद के सालों में उनकी मौत को लेकर कई कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ चलीं.

इजरायल ने यासिर अराफ़ात को नज़रबंद कर दिया. अक्टूबर, 2004 में उनकी तबीयत बिगड़ गई. इजरायल ने इलाज़ के लिए बाहर जाने की इजाज़त दे दी. अराफ़ात को पेरिस लाया गया. 11 नवंबर को अस्पताल में उनकी मौत हो गई.
बाद के सालों में ख़ूब सारी थ्योरियां चली. एक थ्योरी ये भी थी कि मोसाद ने अराफ़ात को अस्पताल में ज़हर देकर मार दिया. हंगामा हुआ तो फ़िलिस्तीन की सरकार ने फिर से जांच की परमिशन दे दी. नवंबर, 2012 में उनकी लाश को कब्र से निकाला गया. जांच हुई. लेकिन ज़हर वाली बात की पुष्टि नहीं हो पाई.
मार्च, 2012 में ‘टाइम्स ऑफ़ इजरायल’ में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई. दिग्गज अमेरिकी पत्रकार जे नॉर्डलिंगर ने लिखा, यासिर अराफ़ात, ‘नोबेल पीस प्राइज़ के इतिहास के सबसे नाक़ाबिल विजेता’ हैं.

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