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'बेला' हथिनी मैदान पर आई और पहली बार भारत ने इंग्लैंड को हरा दिया!

1971 में भारतीय टीम इंग्लैंड दौरे पर गई. ये वो दौरा था, जब नवाब मंसूर अली खां पटौदी की फॉर्म और नज़र कमज़ोर हो रही थी और टीम का जिम्मा अब एक मुंबईकर अजित वाडेकर पर आ गया था.

वाडेकर की कप्तानी में पहला दौरा इंग्लैंड का नहीं थी. पहला दौरा था वेस्टइंडीज़ का. वाडेकर की कप्तानी में इत्तेफाक से भारतीय टीम 1-0 से वो सीरीज़ जीत गई. इत्तेफाक इसलिए, क्योंकि उस वक्त ज़्यादातर क्रिकेट जानकार और अखबार उस जीत के लिए यही बातें दोहरा रहे थे.

और अब इंडियन टीम को इंग्लैंड जाना था. वो इंग्लैंड, जो उस वक्त दुनिया की नंबर एक टीम थी. सीरीज़ शुरू हुई और इंग्लैंड में पहले दोनों टेस्ट इतने करीबी रहे कि मैच किसी के भी खाते में जा सकता था. लेकिन इंडियन टीम ने दोनों मैच ड्रॉ करवाए और सीरीज़ को ज़िंदा रखा.

अब बारी आई तीसरे टेस्ट की. तीसरा टेस्ट खेला जाना था ओवल के मैदान पर. ये मैच 19 अगस्त को शुरू हुआ. इंग्लैंड ने पहले बैटिंग की और 355 रन बना दिए. इंडिया ने भी दिलीप सरदेसाई और फारुख इंजीनियर के अर्धशतकों से इंग्लैंड को जवाब दिया. लेकिन मैच के तीन दिन खत्म हो गए और भारत की पहली पारी अब भी जारी थी. लगने लगा था कि ये मैच भी बाकी दोनों टेस्ट की तरह ड्रॉ ही होगा.

Bella Elephant
ओवल के मैदान पर बेला नाम की हथिनी. फोटो: Twitter

चौथे दिन का खेल शुरू होने से पहले प्लेयर्स वार्मअप कर रहे थे. अचानक से मैदान पर एक महिला के साथ पड़ोस के रशियन सर्कस की बेला नाम की हथिनी आ जाती है. वो पूरे मैदान पर टहलने लगती है. कप्तान वाडेकर का ध्यान उस तरफ नहीं जाता, तो टीम के मैनेजर वाडेकर के पास आकर उन्हें वो हाथी दिखाते हैं और बोलते हैं-

”अजित, ये अच्छा मौका है. गणेश चतुर्थी का दिन है और गणेश जी यहां आए हैं, हमें हाथी देखने को मिला है. आज हम उनके आशीर्वाद से ये मैच जीत सकते हैं.”

बस मुंबईकर अजित वाडेकर को इससे मोटिवेशन मिला या क्या हुआ, ये तो नहीं पता लेकिन. उसी दिन 284 पर ऑल-आउट होकर 71 रनों से पिछड़ने वाली इंडियन टीम ने धमाकेदार वापसी की.

भगवत चंद्रशेखर ने उस मैच में कमाल का ऐसा स्पेल फेंका कि इंग्लैंड की टीम उस स्पेल में फंस गई. चंद्रशेखर ने उस पारी में एक, दो नहीं बल्कि छह विकेट चटकाए, जिसकी मदद से इंग्लैंड की टीम सिर्फ 101 रनों पर ढेर हो गई.

यानी इंडिया के सामने इंग्लैंड में पहली सीरीज़ जीत के लिए सिर्फ 173 रनों का लक्ष्य रखा गया. जवाब में इंडियन टीम टारगेट का पीछा करने पहुंची. दिलीप सरदेसाई के साथ मिलकर अजित वाडेकर ने उसी दिन टीम को जीत की पटरी पर डाल दिया. लेकिन 45 रन बनाकर वाडेकर रन-आउट हो गए. आउट होते ही वाडेकर वापस ड्रेसिंग रूम में गए और सो गए.

अब भी टीम को जीतने के लिए 97 रनों की ज़रूरत थी. लेकिन गुंडप्पा विश्वनाथ (33) और फारूख इंजीनियर (28 रन) ने बाद में टीम को मैच जिता दिया.

इंडियन टीम की जीत में उस वक्त इंग्लैंड के मैनेजर केन बैरिन्गटन इतने एक्साइटेड थे कि वो सीधे वाडेकर के पास ड्रेसिंग रूम में आ गए. उन्होंने ही वाडेकर को नींद से उठाया और कहा,

”अजित, गेटअप. यू हेव वॉन फोर दि फर्स्ट टाइम.”
(अजित उठो, तुम लोग पहली बार जीत गए हो.)

इसके बाद इंडियन टीम ने इंग्लैंड की गुलामी की ज़ंजीर को हमेशा के लिए तोड़ दिया. टीम इंडिया जब जीतकर लौटी, तो सेंटाक्रूज़ एयरपोर्ट से वानखेड़े स्टेडियम के बीच का पूरा रास्ता फैंस ने भर दिया. 1983 या 2011 की जीत से पहले भी भारतीय क्रिकेट में ऐसी तस्वीर देखी गई.


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