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शिवराज सिंह चौहान : ABVP का वो नेता जो एमपी से दिल्ली गया और लौटा तो मुख्यमंत्री बन गया

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पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री की इस कड़ी में बात मध्यप्रदेश के उस मुख्यमंत्री की, जो नरेंद्र मोदी जैसे धाकड़ नेता की नाराज़गी से लेकर भीषण भ्रष्टाचार के आरोप और एक बंटी हुई पार्टी की कलह से लेकर किसानों पर चली गोलियां – हर तरह के क्राइसिस को मैनेज करने में माहिर रहा और इसीलिए जब किसी लहर के चर्चे मुल्क ने सुने नहीं थे, एक फैक्टर बनकर उभरा. नाम – शिवराज सिंह चौहान. किस्सा शुरू करने से पहले उनको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

शिवराज सिंह चौहान के MP से दिल्ली जाने और लौटकर मुख्यमंत्री बनने की कहानी। Part 1

साल 2014. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 1925 से जिस काम में लगा हुआ था, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ उसका एक अहम पड़ाव पूरा हुआ. लेकिन संघ सरकारों की तरह पांच साल की इकाई में नहीं सोचता. वो सोचता है दशकों में. तो 2014 खुद को दोहराता रहे इसलिए ज़रूरी था कि मोदी के साथ संघ की नर्सरी से निकले सबसे काबिल लोगों टीम जुड़े. और इसके लिए एक नेता को दिल्ली तलब किया गया. नेता जिसे संघ और भाजपा ने खुद बड़ी ज़िम्मेदारी के लिए तैयार किया था. नेता मोदी से मिलते हैं. हमने सुना है कि मोदी ने ऑफर दिया – मेरे कृषि मंत्री बन जाओ. जवाब मिला – सोचकर बताता हूं.

मोदी जब प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने शिवराज सिंह चौहान को अपना मंत्री बनने का ऑफर दिया था.

ये नेता फिर अपनी राजधानी लौट गया. अगले रोज़ मोदी ने अखबार में उन नेताओं के बयान पढ़े जो इस नेता और हमारी कहानी के नायक की सदारत में 2018 के विधान सभा चुनाव लड़ना चाहते थे. सत्ता को अपनी मुट्ठी में बंद रखने वाले मोदी को ये इनकार की तरह सुनाई दिया. मुल्क का सबसे ताकतवर आदमी बनने के कुछ हफ्तों के भीतर.

अंक 1 – पूत के पांव-पांव पालने में

एक ऐसा इंटरव्यू नहीं होता या चुनावी सभा नहीं होती जिसमें शिवराज ये न बताएं कि वो एक किसान के बेटे हैं. भोपाल तब एक छोटी सी तहसील हुआ करता था. ज़िला लगता था सीहोर. इसी सिहोर के जैत गांव में 5 मार्च, 1959 को प्रेम सिंह चौहान और सुंदर बाई चौहान के यहां शिवराज का जन्म हुआ. 16 के थे, तभी एबीवीपी से जुड़ गए. कॉलेज गए तो स्टूडेंट्सद यूनियन के अध्यक्ष हुए. फिर भोपाल की बर्कतुल्ला यूनिवर्सिटी से फिलॉसफी में एमए किया. यहां शिवराज पहली बार शिखर पर पहुंचे. गोल्ड मेडल हासिल किया.

16 साल की उम्र में ही शिवराज सिंह चौहान एबीवीपी से जुड़ गए थे.

शिवराज इमरजेंसी में जेल भेजे गए थे. इन्हें भी कैलाश जोशी की तरह मीसा वाली जेल फली. बाहर आकर उन्होंने ग्रो ही किया. एबीवीपी के संगठन मंत्री बना दिए गए. शिवराज 84 में कहां थे पूछने पर बुरा नहीं मानेंगे. बता देंगे कि उस साल एबीवीपी का प्रदेश मंत्री बना था. फिर शिवराज को बनाया गया मध्यप्रदेश बीजेपी युवा मोर्चा का अध्यक्ष. पर शिवराज का मोमेंट आया अक्टूबर 1989 में जाकर. इस साल युवा मोर्चा ने एक क्रांति मशाल यात्रा निकाली. जब यात्रा भोपाल में खत्म हुई तो इसमें एक लाख से ज़्यादा युवा पहुंचे. इस भीड़ ने शिवराज को बना दिया नेता. पदयात्राएं खूब करते थे तो पांव-पांव वाले भैया के नाम से मशहूर हो गए. इस नेता पर नज़र पड़ी भावी (और पूर्व) सीएम सुंदरलाल पटवा की.

शिवराज की क्रांति मशाल यात्रा ने शिवराज को नेता बना दिया.

1990 में हुए विधानसभा चुनाव में शिवराज में युवा मोर्चा वालों को 23 टिकिटें दिलाईं. शिवराज का नाम तो तय था. लेकिन वो बुधनी से लड़ेंगे, इसकी भूमिका बनाई 1989 में विदिशा से सांसद बने राघवजी ने. राघवजी को दिल्ली की राह पकड़नी थी. तो वो इलाके में अपने लोग बैठाना चाहते थे. शिवराज का सितारा जब लगातार मज़बूत हो रहा था, राघवजी की उनसे करीबी रही थी. तो राघवजी की सलाह रही कि शिवराज बुधनी से लड़ें. ये एक फंसी हुई सीट थी. लेकिन शिवराज लड़े और जीते.

अंक 2 – शहर दिल्ली जाकर ठहर, पनपे

लखनऊ और विदिशा दोनों जगहों से चुनाव जीतने के बाद वाजपेयी ने विदिशा सीट छोड़ दी. उपचुनाव हुए तो शिवराज बीजेपी के प्रत्याशी बने, चुनाव लड़े और जीतकर संसद पहुंचे.
लखनऊ और विदिशा दोनों जगहों से चुनाव जीतने के बाद वाजपेयी ने विदिशा सीट छोड़ दी. उपचुनाव हुए तो शिवराज बीजेपी के प्रत्याशी बने, चुनाव लड़े और जीतकर संसद पहुंचे.

1991 में राघवजी ने विदिशा से सांसदी का पर्चा भरा. लेकिन उसी चुनाव में वाजपेयी को लखनऊ के अलावा एक सुरक्षित सीट से लड़वाने की बात हुई. विदिशा ऐसी ही एक सीट थी. राघवजी को अटल के लिए जगह बनानी पड़ी. अटल विदिशा से जीतें ये मध्यप्रदेश भाजपा के लिए नाक का सवाल था. इसलिए अटल के चुनाव में काम करने भेजा गया शिवराज जैसे जुझारू नेताओं को. अटल जीत गए. उन्होंने लखनऊ सीट अपने पास रखी और विदिशा में उपचुनाव का ऐलान हुआ. भाजपा से कौन लड़ा? वो शिवराज, जिनका चुनाव में बढ़-चढ़कर किया काम वाजपेयी की नज़र में आ गया था. अटल से शिवराज का ये परिचय शिवराज को आने वाले वक्त में बड़ा काम आया.

Shivraj Singh Chauhan, Chief Minister of Madhya Pradesh (Shivraj Singh Chouhan) with Uma Bharti, former Chief Minister of Madhya Pradesh and BJP Leader in Bhopal, Madhya Pradesh, India. (Politics, Politician). Photographs by Pankaj Tiwari
शिवराज सांसद बनकर दिल्ली पहुंचे और वहां उमा भारती की टीम में शामिल हो गए.

सांसदी जीतकर शिवराज दिल्ली गए तो दीदी की टीम में शामिल हो गए. टीकमगढ़ से आने वाली उमा दीदी. उमा भारती युवा मोर्चा की अध्यक्ष रही थीं. और गोविंदाचार्य की करीबी थीं. तो उमा के मार्फत शिवराज का परिचय गोविंदाचार्य से हुआ. वो देशभर से भाजपा के लिए ओबीसी चेहरे तैयार कर रहे थे. शिवराज उन्हें जम गए. नतीजा – 1992 में शिवराज भाजपा युवा मोर्चा के अखिल भारतीय महासचिव बन गए. इसके बाद शिवराज लगातार विदिशा से सांसदी जीते. लेकिन उन्हें युवा मोर्चा और संगठन की कमेटियों में व्यस्त रखा गया. वो न दिल्ली में उठे, न मध्यप्रदेश लौट पाए. क्योंकि दोनों जगहों पर उनकी सक्रियता को काबू में रखा गया.

Shivraj Vajpayee
दिल्ली की सियासत में पहुंचे शिवराज ने बीजेपी के सभी बड़े नेताओं से नज़दीकी बना ली.

लेकिन इस वक्त का शिवराज ने बखूबी इस्तेमाल किया. केंद्र की राजनीति में जितने बड़े नाम थे, उनसे राबता कायम किया. अरुण जेटली, लालकृष्ण आडवाणी और प्रमोद महाजन. इस परिचय ने काम किया. 2000 में शिवराज एक और सीढ़ी चढ़े. भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. इसी साल शिवराज विक्रम वर्मा के खिलाफ मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष का चुनाव लड़े. कुशाभाऊ ठाकरे की नाराज़गी मोल लेकर. और हार गए. लेकिन ये बात चल पड़ी कि शिवराज दिल्ली से भोपाल आने में खासी रुचि रखते हैं.

अंक 3 – शिवराज की घर-वापसी

Bharatiya Janata Party leader and former Madhya Pradesh Chief Minister, Uma Bharti, attend a public rally in Amritsar. Bharatiya Janata Party (BJP) leader and former Madhya Pradesh Chief Minister, Uma Bharti (C), along with former Indian Prime Minister Atal Bihari Vajpayee (R), attend a public rally near Jalianwala Bagh in Amritsar September 25, 2004. REUTERS/Munish Sharma - RP5DRIAGBAAA
2003 में उमा भारती को मध्य प्रदेश की राजनीति में भेजा गया.

1990 में हुए चुनाव में भाजपा का स्कोर था – 320 में 220. लेकिन इसके बाद पार्टी उस हद तक गुटबाज़ी का शिकार हुई थी कि दिग्विजय को जीतने के लिए ज़्यादा कुछ करना नहीं पड़ा. मैनेजमेंट से काम चल गया. पार्टी अब और वॉकओवर नहीं देना चाहती थी. तो 2003 में उमा भारती को एमपी भेजा गया. उमा भारती का उठान पूरी दुनिया ने देखा. लेकिन शिवराज ने बंद दरवाज़ों के पीछे तरक्की की. वो दिल्ली में ही रहे लेकिन उन्हें प्रमोशन देकर राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया. उमा भारती ने मई 2003 में चुनाव से पहले एक संकल्प पत्र जारी किया था. ये जारी होने के ठीक एक दिन पहले महू में तैयार हुआ था. और इसे तैयार करने वालों में थे कप्तान सिंह सोलंकी, गौरीशंकर शेजवार, कैलाश जोशी और अनिल माधव दवे के अलावा शिवराज सिंह चौहान.

शिवराज सिंह चौहान ने दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार गए. लेकिन इस चुनाव ने उन्हें बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर दिया.
शिवराज सिंह चौहान ने दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार गए. लेकिन इस चुनाव ने उन्हें बड़े नेता के तौर पर स्थापित कर दिया.

चुनाव में महामंत्री शिवराज से कहा गया कि राघोगढ़ से दिग्विजय के खिलाफ लड़ें. लगा कि शिवराज को सक्रियता के दिखाने के अपराध में शहीद किया जा रहा है. क्योंकि बाकी मध्यप्रदेश में भले दिग्विजय को बंटाधार कहें, राघोगढ़ में दिग्विजय सिंह तब भी राजा साहब ही कहलाते थे. लेकिन शिवराज का पर्चा भरवाने खुद अरुण जेटली, उमा भारती और कैलाश जोशी पहुंचे. भाजपा में शायद ही किसी को लगा होगा कि शिवराज ये चुनाव जीतेंगे. और शिवराज पूरे 21 हज़ार 164 वोट से हारे भी. लेकिन शिवराज को दिग्विजय की टक्कर में खड़ा करके पार्टी ने संदेश दे दिया था – शिव ही सुंदर है.

अंक 4 – चूकें मत चौहान

सुंदरलाल पटवा उमा भारती की मध्यप्रदेश में एंट्री से खुश नहीं थे.

2003 में उमा भारती सीएम बनी भी नहीं थी कि उनकी ‘सक्रियता’ भाजपा में कई नेताओं को खलने लगी थी. पटवा गुट उमा के प्रदेश लौटने से पहले ही विरोध में था. लेकिन वोट भाजपा को उमा के चेहरे और तेवर पर ही मिला था. और ये उमा भी जानती थीं और भाजपा भी. लेकिन तिरंगा विवाद ने उमा को एक बार जो सत्ता से बाहर किया उनके विरोधियों को मौका मिल गया. चूंकि उमा ने अपने कार्यकाल के दौरान ज़्यादा दोस्त बनाए नहीं थे, इसीलिए जब तिरंगा विवाद से उमा को छुटकारा मिला भी उन्हें सीएम पद पर वापसी के लिए ज़रूरी मदद नहीं मिली.

उमा भारती को लगता था कि बाबूलाल गौर उतना ही करेंगे, जितना उमा कहेंगी.

उमा को लगा था कि बाबूलाल गौर उनके खड़ाउं रखकर राज करेंगे. समय पर कुर्सी खाली भी करेंगे. लेकिन बाबू लाल गौर ने जड़ें पकड़ लीं और उमा को ये बताया जाने लगा कि उन्हें इंतज़ार करना चाहिए. बुरी तरह बिफरी उमा लगातार अपने पाले वाले सांसद-विधायक लेकर शक्ति प्रदर्शन करने लगीं. 2005 के दशहरे को उमा के घर एक विधायकों का एक बड़ा मिलन समारोह हुआ. 92 खुद आए. 18 ने समर्थन का फैक्स किया. उमा भारती उस दिन राजभवन में इन विधायकों की परेड करा देतीं तो सरकार गिर जाती. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. मध्यप्रदेश की राजनीति की में उमा भारती के ताबूत की ये आखिरी कील थी. इसके बाद पार्टी ने चुन-चुनकर उमा से विधायकों को तोड़ा.

उधर भाजपा हाईकमान ने मध्यप्रदेश में अपने भविष्य को टटोलना शुरू किया. बाबूलाल गौर की भूमिका पूरी हो चुकी थी. अब पार्टी वहां एक ऐसा सीएम चाहती थी जो सूबे में पार्टी को एक सूत्र में बांध सके. सरकार भी चला सके और चुनाव भी जिता सके. और ये सब बिना हाईकमान की आंख में किरकिरी बने.

Sunder Lal Patwa Feature
सुंदरलाल पटवा ने अखबार में एक आर्टिकल लिखा और फिर शिवराज को राज देने की रही-सही कसर भी पूरी हो गई.

मई 2005 में भाजपा के संगठन चुनाव होने थे. तय था कि शिवराज महामंत्री से प्रमोट होकर अध्यक्ष बन जाएंगे. इसलिए भी कि कैलाश जोशी उम्र के कारण दोबारा अध्यक्ष नहीं बनते. और इसलिए भी कि हाईकमान ने उमा भारती को बिहार चुनाव में काम करने भेज दिया था. रही सही कसर पूरी हो गई जब भाजपा में गुटबाज़ी पर सुंदरलाल पटवा का एक लेख अखबार में छपा. इस लेख की आखिरी लाइन थी – ‘चूकें मत चौहान.’

अंक 5 – अब आया वध का समय

Babulal Gaur Shivraj
बाबूलाल गौर के सीएम रहते शिवराज एक दिन विधानसभा की कार्यवाही देखनेे पहुंच गए. वहां शिवराज को देखकर मौजूद विधायक मेज पीटने लगे. केंद्रीय नेतृत्व के लिए संकेत साफ था.

उमा भारती ने गौर के खिलाफ कैंपेन तेज़ किया तो एक दिन शिवराज सिंह चौहान विधानसभा की कार्रवाई देखने पहुंचे. विधायक उन्हें देखकर मेज़ पीटने लगे. बाहर निकले तो विधायक भी साथ में निकले और इर्द-गिर्द जमा हो गए. भाजपा का संसदीय बोर्ड समझ गया कि समय आ गया है. अरुण जेटली ने बाबूलाल गौर को फोन मिलाया. गौर इंदौर के राजवाड़ा में दुर्गावाहिनी के कार्यक्रम में थे. शोर था. गौर ने कहा आवाज़ नहीं आ रही. लेकिन वो संदेश समझ गए. शिवराज सिंह चौहान भोपाल आ रहे थे. उमा को मालूम चला तो उन्होंने गौर से कहा आप कसम से बंधे हैं. इस्तीफा मत दीजिए. गौर जानते थे कि उनके पास शिवराज के लिए जगह बनाने के अलावा कोई चारा नहीं है. इसीलिए जब उमा ने उन्हें इस्तीफा देने से मना किया तो गौर ने शपथ में टेकनीकल समस्या बता दी. उमा भागते भागते दिल्ली पहुंची. वहां प्रमोद महाजन ने डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनों के सामने उमा से कह दिया – मुख्यमंत्री शिवराज ही बनेंगे. बस.

अंक – 6 बड़े बेआबरू होकर…

शिवराज के जब मुख्यमंत्री बनने की बात आई तो उमा भारती ने विरोध कर दिया और मीटिंग छोड़कर बाहर निकल आईं.
शिवराज के जब मुख्यमंत्री बनने की बात आई तो उमा भारती ने विरोध कर दिया और मीटिंग छोड़कर बाहर निकल आईं.

दिल्ली से इशारा होते ही शिवराज भोपाल शताब्दी में बैठ गए. गाड़ी जब भोपाल पहुंची तो लगभग 60 विधायक शिवराज की आगवानी के लिए स्टेशन पर थे. इसी शाम मध्यप्रदेश भाजपा के मुख्यालय दीनदयाल परिसर में विधायक दल की मीटिंग हुई. दिल्ली से अरुण जेटली, प्रमोद महाजन, राजनाथ सिंह और संगठन महामंत्री संजय जोशी आए. सिर्फ विशेष उपस्थिति देने नहीं. किसी भी बगावत की गुंजाइश खत्म करने. बैठक शुरू हुई. थोड़ी ही देर में उमा खड़ी हो गईं. बोलीं विधायक दल का नेता वोटिंग से चुनो. संजय जोशी ने लगभग धकियाकर उन्हें बैठा दिया.173 विधायक अपनी पूर्व मुख्यमंत्री के साथ ये होता देख सन्न. उमा थोड़ी देर बाद उनके बचे-खुचे विधायकों के साथ बाहर कर दी गईं. उमा के समर्थकों ने दीनदयाल परिसर का गेट तोड़ दिया. पुलिस को लाठियां भांजनी पड़ीं. उमा भारती बाहर आकर गुस्से में बोलते-बोलते एक लाल बत्ती लगी एंबेसडर पर चढ़ गईं और चेतावनी दी कि वो अपने अपमान का बदला लेंगी. लेकिन समय आने पर किसी चीज़ को रोका नहीं जा सकता. 154 विधायकों ने शिवराज को मुख्यमंत्री चुन लिया.

बीजेपी के 173 में से 154 विधायकों ने शिवराज को विधायक दल का नेता चुन लिया और वो बाबूलाल गौर को हटाकर मुख्यमंत्री बन गए.

मुख्यमंत्री के अगले एपिसोड में आपको बताएंगे यहां से आगे कि कहानी. कि शिवराज ने कैसे एक भाजपा हाईकमान के मार्फत हुई एक राजनीतिक नियुक्ति से लेकर एक घाघ राजनेता तक का सफर पूरा किया.

पार्ट 2 – शिवराज सिंह चौहान : एमपी का वो मुख्यमंत्री जिसने उमा और कैलाश विजयवर्गीय को किनारे लगा दिया


बाबूलाल गौर:शराब की दुकान छोड़ी,खेती की, फिर मजदूरी, एक दिन एमपी के सीएम बन गए

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