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क्यों बाबरी विध्वंस के बाद भी एसबी चव्हाण ने गृह मंत्री पद नहीं छोड़ा था?

मराठवाड़ा का एक खांटी कांग्रेसी नेता जो लो प्रोफाइल बने रहना पसंद करता था. लेकिन लो प्रोफाइल रहकर भी इस नेता ने एक बार देश का बजट पेश किया, दो बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का ओहदा संभाला, योजना आयोग का उपाध्यक्ष रहा, शिक्षा मंत्री रहा, रक्षा मंत्री रहा और लगभग 7 साल तक देश के गृह मंत्री की कुर्सी भी संभाली. उसके कार्यकाल में बाबरी मस्जिद विध्वंस और बंबई सीरियल बम ब्लास्ट जैसी घटनाएं हुईं, लेकिन उसे कभी इस्तीफा नहीं देना पड़ा. पॉलिटिकल किस्से में आज बात करेंगे शंकरराव भाऊराव चव्हाण यानी एसबी चव्हाण की, जिनकी आज पुण्यतिथि है.

सियासत में एंट्री

एसबी चव्हाण की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुई. बाद में वे मद्रास यूनिवर्सिटी चले गए. वहां से बीए किया. फिर उस्मानिया यूनिवर्सिटी से एलएलबी कर वकालत करनी शुरू कर दी. आगे चलकर हैदराबाद में निजामशाही के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय हो गए और यहीं से सियासत का रास्ता पकड़ लिया. इसी आंदोलन के दौरान उनकी दोस्ती एक और आंदोलनकारी पीवी नरसिंह राव से हुई, जो आगे चलकर उनके लिए बड़े काम की साबित हुई. 1956 में विधान परिषद के रास्ते उनकी विधायी पारी शुरू हुई. फिर 1957 में भाकुर से कांग्रेस के टिकट पर बॉम्बे स्टेट असेंबली का चुनाव जीतकर पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचे. 1962 से लाल बत्ती भी मिलने लगी. लेकिन देश के लोगों ने पहली बार उनका नाम 1975 में सुना, जब इंदिरा गांधी ने उन्हें महाराष्ट्र का निजाम सौंप दिया. लेकिन 1977 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद चव्हाण ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. चव्हाण ने कुछ ही दिन बाद शरद पवार के साथ पार्टी भी छोड़ दी. लेकिन 1980 आते-आते फिर इंदिरा गांधी के साथ चले गए थे.

इंदिरा गांधी के साथ एस बी चव्हाण (बीच में).
इंदिरा गांधी के साथ एसबी चव्हाण (बीच में).

बाद में जब इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की तब उन्होंने एस बी चव्हाण को कई बड़ी जिम्मेदारियां सौंपीं. इंदिरा ने उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष तो बनाया ही, साथ ही साथ उन्हें अपनी कैबिनेट में भी जगह दी. पहले वे शिक्षा मंत्री बनाए गए. बाद में इंदिरा के आखिरी दिनों में उन्हें रक्षा मंत्रालय में शिफ्ट कर दिया गया.

एसबी चव्हाण बनाम शरद पवार- पार्ट 1

एसबी चव्हाण और शरद पवार. दोनों महाराष्ट्र के बड़े नेता. 70 के दशक में दोनों एक-दूसरे के मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे थे. यानी जब एसबी चव्हाण मुख्यमंत्री थे तो शरद पवार उनकी सरकार में मंत्री बने थे. और जब शरद पवार मुख्यमंत्री बने तब एसबी चव्हाण उनकी सरकार में मंत्री बन गए थे. लेकिन दोनों का स्वभाव एकदम अलग. शरद पवार जहां जमीनी नेता माने जाते हैं, वहीं एसबी चव्हाण पार्टी हाइकमान के ‘यस मैन’ हुआ करते थे. शरद पवार का लोगों से मेलजोल बढ़ाने में कोई सानी नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो उनका सोशल कैपिटल बेहद मजबूत माना जाता है. इतना मजबूत कि उसके दम पर उन्होंने सत्ता की धमक के सहारे चल रही अमित शाह की बहुचर्चित चाणक्यगिरी की हवा निकाल दी और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवा दिया. लेकिन इसके ठीक उलट एसबी चव्हाण कम बोलने वाले और रिजर्व रहने वाले नेता थे.

राजीव गांधी के साथ एस बी चव्हाण.
राजीव गांधी के साथ एसबी चव्हाण.

1986 में राजीव गांधी ने अपनी सरकार के गृह मंत्री एसबी चव्हाण को जब मुख्यमंत्री बनाकर बंबई जाने को कहा तो वे अनिच्छा के बावजूद वहां चले गए. इसी बरस राजीव शरद पवार को भी कांग्रेस में लेकर आ गए. पवार को कांग्रेस में लाने का मकसद था महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के बढ़ते प्रभाव को रोकना. लेकिन शरद भाऊ राजीव और चव्हाण की जी-हजूरी करने तो आए नहीं थे. लिहाजा उनकी मुख्यमंत्री एसबी चव्हाण से ठन गई.

एसबी चव्हाण चुपचाप काम करने वाले अनुशासनप्रिय आदमी थे. इस कारण विधायक और मंत्री अक्सर उनसे खफा रहते. वे समय से सचिवालय जाना, समय से आना, सचिवालय में गंदगी न हो इसके लिए सचिवालय परिसर में सुपारी, तंबाकू और पान-गुटखा पर बैन लगाना – इन सब पर ज्यादा फोकस करते थे. उनकी इसी आदत के कारण महाराष्ट्र में उन्हें ‘हेडमास्टर’ कहा जाने लगा था. वैसे एसबी चव्हाण ने सचिवालय परिसर में तो तंबाकू, सुपारी, गुटखा बैन कर दिया था, लेकिन ख़ुद दिनभर सुपारी चबाते रहते थे.

ताकतवर शुगर लाॅबी (जिससे शरद पवार की करीबी जगजाहिर है) से चव्हाण की अलग ठनी हुई थी. लिहाजा उनसे नाराज लोगों की तादाद बढ़ने लगी. ऐसे सब लोग अब शरद पवार के घर दस्तक देने लगे. एसबी चव्हाण की एक और कमजोरी थी. वे महाराष्ट्र में अपनी लाॅबी खड़ी नहीं कर पाए थे. इस कारण भी वे पार्टीजनों के बीच अलोकप्रिय हो रहे थे. ऐसे में राजीव गांधी ने एक रास्ता निकाला. जून 1988 में एसबी चव्हाण को वित्त मंत्री बनाकर दिल्ली लाया गया और उनकी जगह शरद पवार को मुख्यमंत्री बनाया गया.

एस बी चव्हाण बनाम शरद पवार- पार्ट 2

80 के दशक की चव्हाण और पवार की लड़ाई 90 के दशक में भी जारी रही. लेकिन तब तक कांग्रेस का हाईकमान बदल गया था. राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी और नरसिंह राव नए कांग्रेस सुप्रीमों और प्रधानमंत्री बन चुके थे. हालांकि हाईकमान तो ख़ुद शरद पवार भी बनना चाहते थे. लेकिन संयोग ऐसा बना कि दक्षिण के सांसदों की बड़ी संख्या, सोनिया गांधी का आशीर्वाद, अर्जुन सिंह का सहयोग और साथ-साथ महाराष्ट्र की पवार विरोधी लाॅबी (जिसमें एसबी चव्हाण और शिवराज पाटिल प्रमुख थे) को इकट्ठा कर नरसिंह राव ने बाजी पलट दी और 7 रेसकोर्स रोड तक जा पहुंचे.

नरसिंह राव ने भी पवार के साथ शह और मात का खेल जारी रखते हुए महाराष्ट्र के दोनों पवार विरोधियों (एसबी चव्हाण और शिवराज पाटिल) को बड़े ओहदे से नवाजा. एसबी चव्हाण को गृह मंत्रालय देकर नंबर 2 बनाया गया. वहीं शिवराज पाटिल को लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया. शरद पवार को रक्षा मंत्रालय से ही संतोष करना पड़ा. 2 साल बाद बंबई में सीरियल बम ब्लास्ट की वजह से हालात ऐसे बने कि नरसिंह राव के पास शरद पवार को दिल्ली से दूर करने का साॅलिड बहाना मिल गया. पवार मुख्यमंत्री बनाकर बंबई भेज दिए गए और इन सब निर्णयों में नरसिंह राव के बगलगीर बनकर खड़े थे एसबी चव्हाण. कहा जाता है कि उस दौर में नरसिंह राव एसबी चव्हाण का इस्तेमाल शरद पवार को चेक एंड बैलेंस करने के लिए किया करते थे.

शरद पवार के साथ एस बी चव्हाण (दाएं).
शरद पवार के साथ एसबी चव्हाण (दाएं).

उस दौर में एसबी चव्हाण और शरद पवार के बीच कैसे रिश्ते थे, इसे एक वाक़ये से समझा जा सकता है:

नरसिंह राव सरकार के आखिरी दिनों में हवाला कांड सामने आया. लगभग सभी पार्टियों के कई बड़े नेता इस कांड की चपेट में आ गए. भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी, जनता दल अध्यक्ष एसआर बोम्मई, केन्द्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया, विद्याचरण शुक्ल, दिल्ली के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना समेत कई नेताओं की सियासी बलि चढ़ गई थी. इस कांड की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया. उस वक्त पत्रकारों ने एसबी चव्हाण से पूछा,

“सर, जब इतने बड़े-बड़े नाम हवाला कांड में फंस गए तो क्या आपको आश्चर्य नहीं लगता कि शरद पवार कैसे बच गए? उनका नाम जैन डायरी में क्यों नहीं आया?”

इस पर एसबी चव्हाण ने बड़े व्यंग्यात्मक तरीके से हंसते हुए कहा,

“Don’t you know that hawala businesses run on the basis of trust?”

(क्या आपलोग नहीं जानते कि हवाला कारोबार भरोसे के आधार पर चलता है?)

दरअसल उनके कहने का आशय यह था कि शरद पवार भरोसे के काबिल नहीं हैं, जबकि इस तरह के कामों में भरोसा बहुत बड़ी चीज होती है.

अयोध्या विध्वंस की बदनामी

एसबी चव्हाण को नरसिंह राव ने उस दौर में गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी थी, जब अयोध्या विवाद अपने चरम पर था. यह संयोग भी कम दिलचस्प नहीं है कि फरवरी 1986 में जब अयोध्या के विवादित परिसर का ताला खोलकर लोगों को पूजा करने की इजाजत दी गई थी, तब भी चव्हाण ही देश के गृह मंत्री थे. प्रधानमंत्री नरसिंह राव के पूर्ववर्ती चंद्रशेखर ने इस मसले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश शुरू की थी और राव भी धीमे-धीमे इसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाह रहे थे. लेकिन तभी लोकसभा में विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या तक रथयात्रा और शिलापूजन का एलान कर दिया. 2 साल पहले ही आडवाणी ने ऐसी ही एक रथयात्रा कर अयोध्या पहुंचने की कोशिश की थी. लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के इशारे पर बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर आडवाणी की पूरी प्लानिंग चौपट कर दी थी.

लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ और आडवाणी कारसेवकों की भीड़ लेकर अयोध्या पहुंच गए. भाजपा की तरफ से सरकार को शांतिपूर्वक प्रतीकात्मक शिलापूजन का आश्वासन दिया जाता रहा. यहां तक कि राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में और सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने हलफनामे में भी उत्तर प्रदेश के तत्कासीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने शांतिपूर्वक शिलापूजन की बात कही थी. लेकिन 6 दिसंबर 1992 को हो गया इसके ठीक उल्टा. उस दिन कारसेवकों की उन्मादी भीड़ ने बाबरी मस्जिद का गुंबद ढहा दिया. तब प्रधानमंत्री नरसिंह राव और उनके गृह मंत्री एसबी चव्हाण की काफी आलोचना हुई थी. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान को धक्का पहुंचा था.

पी वी नरसिंह राव (बीच में) और विद्याचरण शुक्ल के साथ एस बी चव्हाण (दाएं).
पी वी नरसिंह राव (बीच में) और विद्याचरण शुक्ल के साथ एस बी चव्हाण (दाएं).

उस दौर को याद करते हुए इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार रहे जावेद एम अंसारी कहते हैं,

“जब कारसेवकों की भीड़ बाबरी ढांचे पर हमला कर रही थी, तब चंद्रशेखर और इंद्रजीत गुप्त समेत कई विपक्षी नेता प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को फोन कर रहे थे. लेकिन कोई भी फोन पर नहीं आ रहा था. मैं ख़ुद सोमनाथ चटर्जी के साथ बैठा था और वे लगातार एसबी चव्हाण को फोन किए जा रहे थे लेकिन चव्हाण साहब बात करने को तैयार नहीं थे. सरकार के लोग घटना पर जिस प्रकार से मुंह चुरा रहे थे उससे कई तरह की शंका लोगों के मन में पैदा होना स्वाभाविक ही है.”

इस घटना के बाद गृह मंत्रालय की भूमिका को लेकर काफी सवाल उठे. यहां तक कि गृह मंत्री एसबी चव्हाण की अपने विभाग के जूनियर मिनिस्टर राजेश पायलट से भी अनबन हो गई थी. लेकिन इस पूरे मामले में प्रधानमंत्री नरसिंह राव चव्हाण के लिए ढाल बनकर खड़े हो गए और कोई उन्हें कुर्सी से हिला नहीं पाया. इसके 16 साल बाद जब मुंबई में 26/11 का आतंकवादी हमला हुआ तो तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को इस्तीफा देना पड़ गया था. इसकी वजह हमले से ज्यादा उनका प्रेस ब्रीफिंग के लिए बार-बार सूट बदलकर मीडिया के सामने आना था. मीडिया ने जब इस बात को काफी ज्यादा उछाला तो उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शिवराज पाटिल से इस्तीफा मांगना पड़ा. लेकिन बाबरी विध्वंस के समय तमाम आलोचनाओं के बावजूद एसबी चव्हाण की कुर्सी सलामत रह गई थी. उनकी कुर्सी पर तब भी आंच नहीं आई जब 1995 में एक रशियन प्लेन AN26 ने बंगाल के पुरूलिया में AK-47 राइफलों का ज़खीरा उतार कर देश की आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे. आखिर निज़ामशाही के विरोध के जमाने की नरसिंह राव से दोस्ती कभी तो काम आनी थी.

इस पूरे मसले पर कांग्रेस के इतिहास पर पैनी नजर रखनेवाले रशीद किदवई कहते हैं,

“कांग्रेस में हमेशा से एक उदार दक्षिणपंथी गुट रहा है. पुराने जमाने में सरदार पटेल, रविशंकर शुक्ल, पीडी टंडन और केएम मुंशी जैसे लोग थे. बाद के दौर में एसबी चव्हाण जैसे लोग इस धारा का प्रतिनिधित्व करते थे. सीताराम केसरी बिना किसी का नाम लिए पार्टी के अंदर के ऐसे उदार दक्षिणपंथियों के लिए ‘कमल छाप कांग्रेसी’ शब्द का प्रयोग किया करते थे.”

डाॅ मनमोहन सिंह एस बी चव्हाण (दाएं) को अपना राजनीतिक गुरू कहते हैं.
डाॅ मनमोहन सिंह एस बी चव्हाण (दाएं) को अपना राजनीतिक गुरू कहते हैं.

समय के साथ नरसिंह राव का दौर बीता और सीताराम केसरी का जमाना आ गया. तब एसबी चव्हाण की अहमियत घटने लगी. केसरी ने संसद के दोनों सदनों में पार्टी के दोनों फ्लोर लीडरों (लोकसभा में नरसिंह राव और राज्यसभा में एसबी चव्हाण) को पद छोड़ने का आदेश दे दिया. लोकसभा में शरद पवार फ्लोर लीडर बनाए गए, जबकि राज्यसभा में चव्हाण की जगह ख़ुद चचा केसरी ने ले ली. इसके बाद 1998 आते-आते एक बार फिर कांग्रेस की कमान गांधी परिवार के हाथों में चली गई. लेकिन इसी दौर में सत्ता की कमान भाजपा के हाथ में चली गई थी.

उधर, कांग्रेस के दौर में हमेशा लालबत्ती का सुख भोगने वाले एसबी चव्हाण से लाल बत्ती दूर हो गई. संगठन के आदमी वे कभी रहे नहीं, इसलिए परिवार के प्रति वफादारी के बावजूद सोनिया गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति से आगे कोई जिम्मेदारी उन्हें नहीं सौंपी. और मई 2004 में जब तक कांग्रेस को सत्ता नसीब होती, उसके 3 महीने पहले ही 26 फरवरी को 83 बरस की उम्र में उनका निधन हो गया. उस समय कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री बने डॉ. मनमोहन सिंह, एसबी चव्हाण को अपना राजनीतिक गुरु कहकर संबोधित किया करते हैं. आजकल एसबी चव्हाण के बेटे अशोक चव्हाण कांग्रेस की तरफ से सक्रिय राजनीति में हैं. वे एक बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और फिलहाल महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार में मंत्री हैं.

एसबी चव्हाण को जानने वाले उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर याद करते हैं जो बेहद अनुशासित जीवन जीता था और बिना किसी बड़ी स्वीकार्यता या अपने इलाके नांदेड़ के बाहर बिना किसी ठोस जनाधार के सियासत में आगे बढ़ता गया. अपने सियासी करियर के दौरान एसबी चव्हाण देश के 2 सर्वोच्च पदों (राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री) को छोड़ कर लगभग तमाम बड़े पदों पर रहे.


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