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कैसे भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर लेफ्ट UPA सरकार का संकट बना था और अमर सिंह संकटमोचक?

इतिहास में 2 मार्च ऐसी तारीख के रूप में दर्ज है, जिसे भारत और अमेरिका के बीच हुए सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक के लिए जाना जाता है. बात 15 साल पहले की है. साल था 2006. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश भारत आए हुए थे. वे एक बड़ी डील करने के लिए यहां का दौरा कर रहे थे. तब देश में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी, जो इस डील की वजह से बड़े संकट में पड़ने वाली थी. इस संकट का कारण बनने वाले थे लाल झंडा वाले प्रकाश करात, जिनके नेतृत्व वाली CPM और लेफ्ट फ्रंट के समर्थन की बुनियाद पर मनमोहन सिंह की सरकार टिकी हुई थी. बताया जाता है कि 1996 में प्रकाश करात की जिद ने ही ज्योति बसु के रूप में देश को पहला कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री मिलने से वंचित कर दिया था. तब करात ने सरदार हरकिशन सिंह सुरजीत की पहल को आगे नहीं बढ़ने दिया था और अब वे एक और सरदार मनमोहन सिंह के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे थे. लेकिन इस बार उनके सामने खड़े हो गए थे (दिवंगत) अमर सिंह. जो पॉलिटिकल किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं, उसके लिए मनमोहन सिंह और कांग्रेस शायद आज भी अमर सिंह को याद करते होंगे.

क्या हुआ था?

तारीख थी 2 मार्च 2006. जॉर्ज बुश दिल्ली में थे. राष्ट्रपति भवन में उनकी जबर्दस्त ख़ातिरदारी की जा रही थी. वैसे रायसीना आने वाले हर विदेशी अतिथि का स्वागत जबर्दस्त ही होता है. लेकिन बुश की खातिरदारी की खास वजहें थीं. उनके पूर्ववर्ती बिल क्लिंटन ने 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद से ही भारत के परमाणु कार्यक्रमों पर एकतरफा प्रतिबंध लगा रखा था. लेकिन जार्ज बुश ने बिल क्लिंटन के जमाने के नियम-कायदों को साइड कर दिया था. उन्होंने भारत को उसके शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम सप्लाई करने और उसके संवर्धन पर अपनी सहमति दे दी थी. इसी सहमति को आम बोलचाल की भाषा में ‘भारत-अमेरिका परमाणु करार’ कहते हैं. इस करार के बाद मनमोहन सरकार ने दावा किया था कि इससे भारत के एटाॅमिक एनर्जी स्टेशनों को पर्याप्त मात्रा में यूरेनियम सप्लाई सुनिश्चित होगी. साथ ही दक्षिण भारत के तटीय इलाकों में मौजूद थोरियम का संवर्धन कर उसे यूरेनियम के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की तकनीक भी अमेरिका से हासिल हो सकेगी.

अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई बातचीत में न्युक्लीअर डील पर सहमति बनी थी. (फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage)
अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश और भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई बातचीत में न्युक्लीअर डील पर सहमति बनी थी. (फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage)

लेकिन प्रकाश करात इस करार के खिलाफ खड़े हो गए. उन्हें साल भर पहले ही हरकिशन सिंह सुरजीत की जगह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) का महासचिव बनाया गया था. करात को यह जिम्मेदारी उस दौर में मिली थी, जब वाम मोर्चा भारत के संसदीय इतिहास में सबसे ज्यादा सीटें (64) लेकर दिल्ली पहुंचा था. अकेले CPM को 44 सीटें मिली थीं. लेफ्ट की इसी ताकत का परिणाम था कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA-1 सरकार की तकरीबन हर नीति पर वाम मोर्चे की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. सरकारी नौकरियों के लिए बोरा भर-भर कर वेकेंसीज निकालना, सरकारी कर्मचारियों के लिए छठा वेतन आयोग, मजदूरों के लिए रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) आदि कई कार्यक्रमों को देखकर यही लगता था कि UPA सरकार कम्युनिस्ट पार्टी का मैनिफेस्टो लागू कर रही है. इन सब के अलावा सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एक नेशनल एडवाइजरी कमिटी (NAC) भी बनाई गई थी. वाम विचारधारा के लोग इस कमेटी में भरे पड़े थे. उस दौर की सियासत पर नजर रखने वाले लोग अक्सर इस NAC को ‘सुपर कैबिनेट‘ कहा करते थे. साथ ही लोकसभा अध्यक्ष का पद भी CPM नेता सोमनाथ चटर्जी के जिम्मे था.

तो ये जलवा था उस सरकार में लेफ्ट पार्टियों का. लेकिन इस जलवे के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी व्यक्तिगत रुचि से परमाणु करार का मामला आगे बढ़ा दिया. लेफ्ट पार्टियों ने इसका खुलकर विरोध किया. उन्होंने मनमोहन सिंह के इस कदम को लेफ्ट की नीतियों के खिलाफ माना. लेफ्ट की नजर में यह करार साम्राज्यवाद के विस्तार की अमेरिकी नीति का एक हिस्सा था. साथ ही चेर्नोबिल की परमाणु दुर्घटना जैसे तर्क भी दिए जाने लगे.

चुनाव के चलते मामला कुछ दिन टला

2 मार्च 2006 को हुए परमाणु करार पर लेफ्ट UPA सरकार के खिलाफ खड़ा था. लेकिन तब पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव होने वाले थे. ऐसे में विरोध के बावजूद लेफ्ट पार्टियों ने समर्थन वापसी की हद तक जाने से परहेज किया और चुनाव प्रचार में व्यस्त हो गए. चुनाव के नतीजों ने लेफ्ट फ्रंट में नया कॉन्फिडेंस भर दिया. केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF को हरा कर लेफ्ट की सत्ता में वापसी हो गई थी. वहीं, बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में इतनी बड़ी जीत मिली, जितनी कभी ज्योति बसु भी नहीं दिला सके थे. तब लेफ्ट ने बंगाल की 80 फीसदी सीटों पर कब्जा कर लिया था.

प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, ए बी वर्धन और डी राजा (बाएं से दाएं) फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage
प्रकाश करात, सीताराम येचुरी, ए बी वर्धन और डी राजा (बाएं से दाएं) फ़ोटो क्रेडिट : gettyimage

सरकार से लेफ्ट की तनातनी बढ़ी

विधानसभा चुनावों में मिली सफलता के बाद लेफ्ट के नेताओं की सरकार से तनातनी बढ़ने लगी. वे सरकार पर दबाव बनाने लगे कि वह परमाणु करार से पीछे हटे. लेकिन इस दफा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अड़ने लगे. उन्होंने परमाणु करार के मुद्दे को अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया और पीछे हटने से इन्कार कर दिया. नतीजतन अगले 2 साल तक लेफ्ट और कांग्रेस के बीच जबानी धींगामुश्ती चलती रही. लेफ्ट की ओर से हर दूसरे दिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के नेता एबी वर्धन सरकार को धमकी देते रहते और सरकार डांवाडोल दिखती रहती. उस दौर में कहा जाने लगा था कि ‘एबी वर्धन की जुबान खुलती है तो सरकार और सेंसेक्स – दोनों थर्राने लगते हैं.’

इसी दरम्यान जब वर्धन से पत्रकारों ने पूछ डाला कि ‘सरकार कब तक सुरक्षित है’ तो उन्होंने जवाब दिया था,

“शाम 5 बजे तक तो सुरक्षित है लेकिन आगे का मैं नहीं जानता.”

वर्धन के इस एक बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस और लेफ्ट के संबंध किस स्तर पर पहुंच गए थे. लेफ्ट अपने रुख पर अड़ा रहा तो मनमोहन सिंह भी अपना रुख और कड़ा करते चले गए. कहा जाता है कि तब कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मामले में बीच-बचाव की कोशिशें की थीं. लेकिन पीएम मनमोहन सिंह इस मसले पर अपने रुख से झुकने को कतई तैयार नहीं थे. कांग्रेस की एक बैठक में मनमोहन सिंह इतने खफा हो गए थे कि परमाणु करार के मुद्दे पर पार्टी के झुकने की स्थिति में अपने इस्तीफे तक की धमकी दे दी थी.

नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस को मनमोहन सिंह के सामने झुकना पड़ गया था. बाद में 8 जुलाई 2008 को लेफ्ट पार्टियों ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. लेकिन कई लोगों का मानना है कि CPM के कई नेता इस हद तक जाने को तैयार नहीं थे. खुद सीताराम येचुरी समर्थन वापसी वाले प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद नहीं थे. लेकिन यह प्रकाश करात की जिद थी, जिसने CPM समेत समूचे वाम मोर्चे को समर्थन वापसी के लिए मजबूर कर दिया था.

सोमनाथ चटर्जी की बगावत

लेफ्ट के सरकार से अलग होने के फैसले से नाराज होने वालों में तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी थे. लेकिन चूंकि वे स्पीकर के पद पर थे, इसलिए ख़ुद को पार्टी की गतिविधियों से पूरी तरह अलग कर लिया था. और अब यह स्पीकर का पद उनके गले की फांस बनने वाला था. एक तरफ उनकी पार्टी CPM का फरमान था कि ‘सोमनाथ दादा’ अध्यक्ष पद छोड़ें और एक सांसद की हैसियत से विश्वास मत पर सरकार के खिलाफ वोट करें. दूसरी तरफ, सोमनाथ चटर्जी इसके ठीक उलट तर्क दे रहे थे. उनका कहना था कि ‘मुझे इस 14वीं लोकसभा ने अपना गार्जियन चुना है और जबतक इस सदन का भरोसा मुझे हासिल है, मैं अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता. मैं इस सदन में अंपायर हूं और मुझे खिलाड़ी बनने के लिए मजबूर न किया जाए.’

इसी अंपायर बनाम खिलाड़ी की जंग में सोमनाथ चटर्जी और प्रकाश करात उलझ गए. नतीजतन सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया गया. पार्टी के दायित्व और संविधान के दायित्व के बीच की दुविधा में सोमनाथ दादा ने संवैधानिक जिम्मेदारियों को अहमियत दी और उनका यह स्टैंड उनके पाॅलिटिकल करियर के खात्मे का कारण बन गया.

प्रकाश करात (दाएं) के अड़ियल रूख के कारण सोमनाथ चटर्जी (बाएं) को भी CPM से बाहर होना पड़ा था.
प्रकाश करात (दाएं) के अड़ियल रूख के कारण सोमनाथ चटर्जी (बाएं) को भी CPM से बाहर होना पड़ा था.

समर्थन वापसी के बाद क्या हुआ?

प्रकाश करात और कुछ अन्य कम्युनिस्ट नेताओं ने सरकार से समर्थन वापस लेने के अपने फैसले से राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अवगत करा दिया. लेकिन तब भी प्रतिभा पाटिल ने मनमोहन सिंह सरकार से अपना बहुमत साबित करने को नहीं कहा. जबकि परंपरा यही रही है कि जब कोई भी सरकार का समर्थन कर रही पार्टी अपना सपोर्ट वापस लेती है तो राष्ट्रपति द्वारा सरकार को हफ्ता दस दिन के भीतर सदन का विश्वास हासिल करने का निर्देश दिया जाता है. इस परंपरा को तब भी फाॅलो किया गया था, जब भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस लिया था या चचा केसरी ने देवेगौड़ा सरकार की लगाम खींची थी या फिर जयललिता ने जब वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लिया था.

बहरहाल, पूर्व राष्ट्रपति ने परंपरा का पालन भले ना किया लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ख़ुद से सदन में विश्वास प्रस्ताव रखने का फैसला कर लिया. इससे यूपीए के लोगों के माथे पर बल पड़ने लगे. उस वक्त लोकसभा में कांग्रेस के अपने 150 सांसदों थे. सरकार को राजद, लोजपा, द्रमुक और एनसीपी एवं कुछेक निर्दलीयों के कुल 80 सांसदों का सपोर्ट ही दिख रहा था. यानी किसी सूरत में सरकार का आंकड़ा 230 से आगे नहीं बढ़ रहा था. लाजमी था कि सरकार को संसद की किसी अन्य बड़ी ताकत के सहारे की जरूरत थी.

मुलायम कैसे माने?

उन दिनों समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 39 सदस्य हुआ करते थे. इसलिए समाजवादी पार्टी का सपोर्ट सरकार के लिए अहम था. बिना सपा के विश्वास मत हासिल करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी. इसलिए लेफ्ट की समर्थन वापसी से कुछ हफ्तों पहले से ही मुलायम सिंह और अमर सिंह पर डोरे डाले जाने लगे थे. लेकिन तब सपा यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (UNPA) के नाम से एक नया मोर्चा बना चुकी थी. मुलायम सिंह UNPA के चेयरमैन थे. राज्यों में हारे हुए कई लोग मसलन चंद्रबाबू नायडू, प्रफुल्ल कुमार महंत, फारूक़ अब्दुल्ला और ओम प्रकाश चौटाला इस मोर्चे में शामिल थे.

इस मोर्चे में शामिल सभी दल (सपा को छोड़ कर) अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस से लड़ रहे थे. लिहाजा उनके कांग्रेस के साथ जाने का कोई सवाल नहीं था. लेकिन समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से अपनी नजदीकी के संकेत देने शुरू कर दिए थे. अमर सिंह कहने लगे कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के सामने आकर परमाणु करार के फायदे समझाएं. इसके बाद उस समय के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने मुलायम सिंह और अमर सिंह से मुलाकात की और उन्हें परमाणु करार से होने वाले फायदों से अवगत कराया.

इसके बाद UNPA के नेता अमर सिंह के 27, लोदी इस्टेट वाले बंगले पर बैठे. इस बैठक में मुलायम सिंह ने कहा,

 “हमलोगों को कलाम साहब (पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम) से मिलकर उनकी राय जाननी चाहिए कि यह परमाणु करार देशहित में है या नहीं. वे वैज्ञानिक हैं इसलिए बेहतर बता सकते हैं.” 

मुलायम की इस बात ने बहुत कुछ कह दिया था. उनके इस रुख से काफी हद तक स्पष्ट हो गया था कि UNPA का कोई भविष्य नहीं है. आखिर एपीजे अब्दुल कलाम परमाणु करार का क्यों विरोध करते!

UNPA की बैठक के बाद मुलायम सिंह और अमर सिंह ने एपीजे अब्दुल कलाम से मुलाकात की. इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार को समर्थन देने का एलान कर दिया गया. वैसे कहने वाले ये भी कहते हैं कि इस समर्थन के बदले में सरकार और अमर सिंह के बीच कई मामलों पर सौदेबाजी हुई थी. लेकिन इस बारे में कभी कुछ खुलकर सामने नहीं आ पाया कि क्या सौदेबाजी हुई थी.

यूपीए सरकार को समर्थन देने से पहले मुलायम सिंह और अमर सिंह ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से परमाणु करार के नफा-नुकसान पर चर्चा की थी.
यूपीए सरकार को समर्थन देने से पहले मुलायम सिंह और अमर सिंह ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से परमाणु करार के नफा-नुकसान पर चर्चा की थी.

इस मामले पर मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने अपनी किताब ‘The Accidental Prime Minister’ में लिखा है,

“तमाम गहमागहमी के बाद शनिवार 21 जून का दिन काफी शांत था. मैं अपने घर पर लंच करके आराम कर रहा था कि तभी मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह के एक दोस्त लाइन पर थे. उन्होंने कहा, ‘‘मि. बारू, आपके लिए एक संदेश है. मेरे मित्र अमर सिंह कोलोराडो में अस्पताल में हैं. वे चाहते हैं कि आप प्रधानमंत्री को बता दें कि अमेरिका के डॉक्टर बहुत अच्छे हैं और उनका पूरा ख्याल रख रहे हैं. वे वहां बहुत खुश हैं और कहते हैं कि अमेरिकी लोग बहुत गर्मजोशी भरे और दोस्ताना लोग हैं. हमें उनके साथ अच्छा रिश्ता रखना चाहिए.’’ उसी दिन दोपहर बाद मैं डॉ. सिंह से मिला और उन्हें उस संदेश के बारे में बताया, जो अमर सिंह की ओर से एक स्पष्ट राजनैतिक संदेश था. उन्होंने इस संदेश के जरिए परमाणु करार पर समाजवादी पार्टी के समर्थन का इशारा किया था…कई महीने बाद अमर सिंह ने परमाणु सौदे का श्रेय लेने की कोशिश की.”

कैश फाॅर वोट मामला

22 जुलाई को लोकसभा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु करार के पक्ष में अपने तर्क दिए. उन्होंने गुरु गोविंद सिंह को याद किया और अपने भाषण के अंत में एक लाइन का प्रस्ताव रख दिया,

“यह सदन सरकार में विश्वास प्रकट करता है.”

इसके बाद विश्वास प्रस्ताव पर बहस शुरू हो गई. कांग्रेस के लोग लेफ्ट के सांसदों से पूछने लगे, ‘क्या आपलोग सदन में सांप्रदायिक भाजपा के साथ मिलकर वोट करेंगे?’ इस पर लेफ्ट के लोग दलील देते, ‘ट्रेन में मेरी बगल की सीट पर कौन बैठेगा, यह हम तय नहीं कर सकते.’

सदन में सत्ता पक्ष, विपक्ष और नए विपक्ष यानी लेफ्ट के सांसदों ने खूब बहस की. रेल मंत्री लालू यादव ने अपने अंदाज में लेफ्ट पार्टियों की खिंचाई की थी. इसी बहस में लालू ने मुकेश के गाए फिल्मी गाने को दोहराते हुए कहा था,

“तुम मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं

तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी”

लालू ने जैसे ही अपना भाषण समाप्त किया, भाजपा के तीन सांसद अशोक अर्गल, फग्गन सिंह और महावीर भगोरा अध्यक्ष के आसन के पास पहुंच गए. उसके बाद जो हुआ उससे पूरा देश अवाक रह गया. ये तीनों अध्यक्ष के सामने नोटों की गड्डियां लहराने लगे. उनका आरोप था कि सपा नेता अमर सिंह ने भाजपा सांसदों को वोटिंग से गैरहाजिर रहने के लिए 9-9 करोड़ रुपये प्रति सांसद देने का लालच दिया था. बकौल अशोक अर्गल,

“हमने तत्काल इस मामले पर अपने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अवगत कराया और उसके बाद पार्टी ने तय किया कि इस प्रकार की निहायत ही घटिया हरकत को सदन के सामने बेनकाब किया जाए.”

इसके बाद संसद में हंगामा मच गया. अब तक तो सिर्फ सांसदों की कथित खरीद-फरोख्त का मामला गाहे-बगाहे सुना गया था, लेकिन यहां तो सांसदों को खरीदने के लिए कथित तौर पर भेजे गए नोटों की गड्डियां ही सदन में लहरा दी गई थीं.

लोकसभा में नोट की गड्डियां लहराते भाजपा सांसद.
लोकसभा में नोट की गड्डियां लहराते भाजपा सांसद.

हंगामे के बीच स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए शांति कायम करने का अनुरोध किया क्योंकि उसी शाम विश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग होनी थी. बाद में इस पूरे मामले की जांच हुई और जांच प्रक्रिया के दरम्यान लाल कृष्ण आडवाणी के सहयोगी सुधीन्द्र कुलकर्णी, एक कथित बिचौलिये सुहैल हिंदुस्तानी और यहां तक कि अमर सिंह को भी जेल जाना पड़ा था. वे उस कांग्रेस की सरकार बचाने के लिए चक्कर में जेल गए थे, जिसके अध्यक्ष के आवास पर 4 साल पहले उनकी काफी बेइज्जती हुई थी.

“अटल जी वोट किया क्या”

तमाम बहस होने के बाद 23 जुलाई की शाम लोकसभा स्पीकर के आदेश से वोटिंग शुरू हुई. इस वोटिंग में एक अजीब नजारा देखा गया. विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने स्पीकर से अनुरोध किया, “पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अस्वस्थ हैं और सदन में आने में असमर्थ हैं. लेकिन वे संसद भवन पहुंच चुके हैं. लिहाजा पार्किंग में खड़ी उनकी गाड़ी से ही उनका वोट करवा लिया जाए.”

स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने आडवाणी की मांग मान ली. अटल बिहारी वाजपेयी के पार्किंग से ही वोट डालने का इंतजाम कर दिया गया. यह अपनी तरह का पहला मामला था, जब सदन में आए बिना किसी सांसद को वोट डालने की इजाजत दी गई थी.

वोटिंग के बाद जब नतीजे घोषित करने की बारी आई तब सबसे पहले सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा के महासचिव से अपनी बंगाली टोन वाली हिंदी में पूछा,

“अटल जी वोट किया क्या?” 

उसके बाद महासचिव ने हां में सर हिलाया और तब सोमनाथ चटर्जी ने घोषणा की.

“Ayes have it. In favour of ayes : 275 while in favour of NOs : 256.”

(विश्वास प्रस्ताव सदन ने मंजूर कर लिया. प्रस्ताव के पक्ष में 275 और विपक्ष में 256 वोट पड़े)

अंततः मनमोहन सिंह की सरकार बच गई थी. समाजवादी पार्टी उनकी सरकार के लिए संकटमोचक साबित हुई थी. प्रकाश करात के UPA सरकार से अलग होने के फैसले के बाद भारत में लेफ्ट पार्टियों का जो डाउनफॉल शुरू हुआ वह आज तक बदस्तूर जारी है. हालत आज यहां तक पहुंच गई है कि बंगाल में लेफ्ट पार्टियों को अपना वजूद बचाने के लिए उसी कांग्रेस से हाथ मिलाना पड़ रहा है, जिसकी सरकार को कभी उन्होंने डिरेल करने की कोशिश की थी.


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