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जब संसद में छिड़ा ग्रेग चैपल का ज़िक्र और गांगुली ने कमबैक कर लिया!

”हाय, मेरा नाम है सौरव गांगुली, भूले तो नहीं. जो हुआ क्यों हुआ, कैसे हुए…ये सोचकर दुख होता था. गुस्सा भी आता था. पर अब नहीं, मैं टीम में वापस आने के लिए बहुत-बहुत मेहनत कर रहा हूं. क्या पता, मुझे हवा में टीशर्ट लहराने का एक और मौका मिल जाए. जो भी हो, टीम के बाहर या अंदर, मैं चुप बैठने वाला नहीं हूं. मैं हर मैच से पहले चिल्लाऊंगा. ऊह…आह…इंडिया… मैं यह बोलता रहूंगा. आप भी चिल्लाएंगे ना, मेरी टीम को अच्छा लगेगा. अपने दादा की बात सुनेंगे ना.”

साल 2006 में टीवी पर जब सौरव गांगुली पेप्सी के ऐड में ऐसा बोलते दिखे, तो सड़कों पर फैंस से लेकर संसद में सांसद तक, सभी भावुक हो गए. पूरा मामला ये था कि साल 2006 में टीम इंडिया के महाराज यानी गांगुली जिस कोच को लेकर आए, उसी ने उनकी टीम से छुट्टी करवा दी थी. इसके बाद दादा टीम में आने के लिए जी-जान से लग गए. क्या है वो कहानी, आपको बताते हैं.

जब दादा की ज़िदगी में सब उथल-पुथल हो गया

सौरव गांगुली को टीम से ये कहकर बाहर किया-

”आप टीम में फाड़ पैदा करने वाले खिलाड़ी हैं.”

इस तरह से टीम से बाहर होने के बाद दादा की ज़िंदगी में भूचाल आ गया. उनके घर के अंदर का माहौल खराब हो गया. उनकी पत्नी डोना भी पहले जैसी नहीं दिख रही थीं. घर में ज्योतिषियों का आना-जाना शुरू हो गया. सौरव के पिता ने भी उनसे कहा कि वेस्टइंडीज़ के खिलाफ सीरीज़ जीत के बाद उनके लिए टीम में रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए हैं. टीम इंडिया की हर जीत के बाद उन्हें ये लगने लगा था कि अब महाराज का टाइम पूरा हो गया है.

टीम से बाहर होने के बाद सौरव के पिता ने उनसे कहा था,

”महाराज, तुमने सबकुछ तो हासिल कर लिया है, क्यों नहीं तुम सम्मान के साथ अब अलविदा कह देते.”

लेकिन अपने पिता के साथ इस बातचीत में दादा ने एक बात कही,

”कोई भी हमेशा नहीं खेलता. माराडोना, सम्प्रास या गावस्कर. हर किसी को एक न एक दिन रुकना पड़ता है. मैं खुद इस बात को जानता हूं कि एक न एक दिन मुझे भी जाना होगा. लेकिन मैं इस चीज़ के साथ नहीं जीता चाहता कि जब मेरा मुश्किल वक्त आया, तो उससे निकलने के लिए मैंने मेहनत या कोशिश नहीं की.”

अपने पिता के साथ इस चर्चा के बाद सौरव अपने कमरे में आए और कमर कस ली. अब वो दादा वाले टैग को पीछे छोड़कर सौरव बनना चाहते थे. वो सौरव, जिसने 1996 में टीम में एंट्री की थी. सौरव ने कमरे में जाकर फैसला किया,

# कड़ी ट्रेनिंग करेंगे.
# रणजी ट्रॉफी के सारे मैचों में खेलेंगे.
# हार नहीं मानेंगे.

फिर से टीम में वापसी के लिए सौरव ने एक ट्रेनर रखा. हफ्ते में छह दिन मेहनत पर लग गए. उन्होंने अपनी ट्रेनिंग से नौ किलो वज़न घटा लिया.

लेकिन एक के बाद एक सीरीज़ में सौरव को बार-बार नज़रअंदाज़ किया जा रहा था. उनके लिए निराशा के अलावा कुछ नहीं था. इसी दौरान उनके पास वो ऐड आया, जिसने उनके लिए टीम इंडिया के रास्ते खोल दिए. यानी पेप्सी कम्पनी का ऐड.

”मैं सौरव गांगुली, मुझे भूले तो नहीं.”

टीम इंडिया का कप्तान, जिसे देश के करोड़ों लोग चाहते हैं. जिसे कोच के साथ तनातनी की वजह से टीम से निकाल फेंका गया. उनकी वापसी विज्ञापन में ही हो सकी. लेकिन इस अपील को करोड़ों लोगों ने देखा. इस बात को लेकर गर्मागर्म बेहसें हुईं कि सौरव गांगुली को टीम से बाहर निकालने का फैसला सही था या गलत. इस ऐड को करने के बाद सौरव गांगुली के लिए दबे हुए प्यार की बाढ़ आ गई. लोगों ने भर-भरकर सौरव को मैसेज और चिट्ठियां लिखीं. मानो ये सारी स्क्रिप्ट सौरव की वापसी के लिए भगवान ही लिख रहे थे. इधर देश में भावनाओं का जनसैलाब उमड़ा. उधर इंडियन टीम साउथ अफ्रीका में 1-4 से वनडे सीरीज़ हार गई.

साउथ अफ्रीका में भारत की हार पर कुछ राजनेताओं ने सवाल उठाए, तो ग्रेग चैपल ने ये कहकर उस सवाल को टाल दिया-

”राजनेताओं को बोलने और आलोचना करने के लिए ही पैसा दिया जाता है.”

इसके बाद भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन की संसद में भी चर्चा हुई. इसके कुछ समय बाद ही सौरव को टीम में वापसी का मौका मिल गया. जब टीम में सौरव की वापसी की खबर आई, तो सौरव ईडन गार्डन्स में थे. ये वो वक्त था, जब ऐसा लग रहा था कि भारतीय क्रिकेट नहीं, कोई मसाला फिल्म चल रही है. पत्रकारों की नज़र उस वक्त टीम इंडिया के कोच, कप्तान और सौरव गांगुली पर ही रहती थी.

सौरव प्रैक्टिस भी करते, तो कई पत्रकार ईडन गार्डन्स में ही बने रहते. लेकिन एक दिन अचानक कुछ पत्रकारों के चिल्लाने की आवाज़ आई.

”सौरव यू हेव बिन पिक्ड.”
सौरव तुम्हें चुन लिया गया है.

दादा ने ये खबर सुनकर चैन की सांस ली. लेकिन एक पत्रकार सौरव के टीम में आने से खुश नहीं था. वो इस दौरे पर दादा के चयन को एक बड़ी गलती बता रहा था. यहां तक की उसने दादा को भी फोन कर दिया. उन्होंने दादा को फोन करके कहा-

”साउथ अफ्रीकी गेंदबाज़ खतरनाक फॉर्म में हैं और दादा तुम्हारे यहां वापसी करना मतलब खुदकुशी करने जैसा है.”

लेकिन दादा इस बात को जानते थे कि फिर से टीम में जगह बनानी है, तो मुश्किल में भी खुद को साबित करना होगा.

साउथ अफ्रीका में मैच से पहले नेट्स में हुआ दादा का टेस्ट

2006-07 के दक्षिण अफ्रीका दौरे की टेस्ट सीरीज़ के लिए सौरव चुन लिए गए. चैपल के हाथ में अब भी टीम की डोर थी, जबकि द्रविड़ टीम के कप्तान.

भारतीय टीम दक्षिण अफ्रीका की पोचेस्ट्रम नाम की जगह पर थी. वहां पर एक प्रैक्टिस मैच खेला जाना था. उसके बाद टेस्ट सीरीज़ होनी थी. सौरव भी इसके लिए तैयार थे, हालांकि उनके लिए सबकुछ इतना आासान नहीं था.

सौरव अब पोचेस्ट्रम के लिए निकले. वनडे सीरीज़ में वहां कोई पत्रकार नहीं था. लेकिन जब सौरव की वापसी हुई, तो कई टीवी के पत्रकार तो उनके साथ ही फ्लाइट में दक्षिण अफ्रीका के लिए उड़े गए. क्योंकि इस सीरीज़ में किसी को भी इंडिया-साउथ अफ्रीका का मैच नहीं देखना था, बल्कि गांगुली vs चैपल का मैच देखना था.

जब सौरव एयरपोर्ट पर पहुंचे, तो वहां टीम मैनेजर और तीन युवा खिलाड़ी उन्हें रिसीव करने पहुंचे हुए थे. टीम का साफ संदेश था कि सौरव सीधे प्रैक्टिस के लिए पहुंच जाएं. सौरव एयरपोर्ट से निकले और सीधे मैदान पर पहुंच गए. लेकिन वो खिलाड़ी, जिसने बरसों टीम इंडिया की कप्तानी की, कई मौकों पर खिलाड़ियों को बनाया या बचाया, वो सभी उनसे मिलने में घबरा रहे थे. दरअसल ये डर ग्रेग चैपल का था. क्योंकि उस वक्त सौरव से दोस्ती का मतलब चैपल से दुश्मनी था.

बाकी खिलाड़ी तो नहीं आए, पर खुद कोच चैपल ने सौरव से हाथ मिलाया और वेलकम किया. लेकिन बस हाथ ही मिले थे. दिल तो मिलना मुश्किल था.

Ganguly Chappell
गांगुली-चैपल.

थोड़ी देर बाद ही कप्तान राहुल द्रविड़ भी दादा से मिले. अब दादा नेट प्रैक्टस के लिए तैयार होते हैं. कोच, कप्तान और टीम के बाकी खिलाड़ियों का ध्यान भी इसी तरफ था कि दादा कैसा खेलेंगे.

तेज़ गेंदबाज़ों का सामना करने के लिए दादा तैयार हुए. साथ वाले नेट्स में टीम के बाकी बल्लेबाज़ चेस्ट पैड और बॉल से बचने का सारा सामान लगाकर खेल रहे थे. लेकिन दादा चैपल और टीम को ये दिखाना चाहते थे कि वो अब भी निडर हैं और मुकाबले के लिए तैयार हैं. इसलिए उन्होंने चेस्ट पैड-वैड छोड़ा और नेट्स में प्रैक्टिस के लिए उतर गए.

दादा ने दौरे की शुरुआत में ही फैसला कर लिया था-

”मुझे चाहे गेंद लगे, मेरी हड्डी टूटे, चाहें मैं मर ही क्यों न जाऊं, लेकिन अब कदम पीछे नहीं खींचूंगा.”

नेट्स के 30 मिनट के सेशन में दादा ने ऐसी बल्लेबाज़ी की कि कोच चैपल ने पास आकर कहा-

”वेल बैटिड”

वो कोच, जिसने कभी सौरव को टीम से बाहर किया, वो ही उनकी तारीफ कर रहा था. ये यकीन करना आसान नहीं था.

साउथ अफ्रीका के खिलाफ प्रैक्टिस मैच

पोचेस्ट्रम में कोच के आगे तो दादा का टेस्ट हो गया था. लेकिन अब असली टेस्ट था विरोधी पेस अटैक के सामने. साउथ अफ्रीका की एक साइड टीम के साथ एक प्रैक्टिस मैच खेला जाना था. द्रविड़ आराम कर रहे थे, तो वीवीएस लक्ष्मण को टीम का कप्तान बनाया गया. टीम इंडिया की पहले बैटिंग आ गई. लेकिन मोर्ने मोर्कल की गेंदों के आगे भारतीय बल्लेबाज़ बुरी तरह से ढेर हो रहे थे. वसीम जाफर और वीरेंद्र सहवाग तो बिना खाता खोले ही लौट गए. वीवीएस लक्ष्मण और सचिन भी जल्दी से पवेलियन लौट गए. आलम ये था कि 69 के स्कोर तक आधी टीम पवेलियन लौट चुकी थी.

सौरव गांगुली ड्रेसिंग रूम में बैठकर टीम का ये हाल देखकर खुद से सिर्फ यही कह रहे थे-

”सौरव तुम्हें चोट लग सकती है, तुम्हारी हड्डी टूट सकती है, तुम मर जाओ, लेकिन कदम पीछे मत हटाना. क्योंकि तुम अपने विकेट के लिए नहीं, बल्कि अपने सम्मान के लिए खेल रहे हो.”

सौरव ने इस मौके का फायदा उठाने को ठान लिया. उन्होंने क्रीज़ पर ऐसा डेरा डाला कि पहले विकेट को समझा, फिर गेंदबाज़ों को और धीरे-धीरे रन जोड़ने शुरू कर दिए. उस विरोधी टीम में चार तेज़ गेंदबाज़ थे, जो टेस्ट टीम में जगह बनाने के लिए इंडियन बैटिंग का जमकर टेस्ट ले रहे थे.

Sourav Ganguly Bat
सौरव गांगुली.

जहां पूरी टीम कुछ नहीं कर पाई, दादा ने वहां चार घंटे बल्लेबाज़ी की और अपना अर्धशतक पूरा किया. दादा की बैटिंग देखकर अब टीम में भी जोश आने लगा और कुछ साथियों ने दबी आवाज़ में सही, लेकिन कहा-

”ये पुराना गांगुली है.”

उस मैच में सौरव ने 83 रन बनाए. उनके इस प्रदर्शन से ये साफ हो गया कि अब दादा प्लेइंग इलेवन में जरूर शामिल होंगे.

दादा की 15 मिनट की मोटिवेशनल स्पीच

वनडे की हार के बाद टीम एक नई सोच के साथ टेस्ट सीरीज़ खेलना चाहती थी. जोहान्सबर्ग में पहले टेस्ट से पहले शाम को टीम मीटिंग हुई. चैपल के सामने पूरी टीम बैठी. इस मीटिंग में द्रविड़, सचिन, कुंबले के अलावा दादा से भी बोलने को कहा गया. पहले कोच बोले, कप्तान बोले, कुछ और सीनियर खिलाड़ी बोले. फिर दादा का नंबर आया. दादा ने उठते ही कहा-

”इस टीम में आत्मविश्वास की कमी है. अगर हम वो हासिल कर लें, तो कुछ भी कर सकते हैं.”

दादा उस मीटिंग में 15 मिनट बोले, वो भी बिल्कुल कप्तान की तरह. चैपल के सामने गांगुली ने टीम को संदेश दिया. उन्होंने कहा,

”कम ऑन, हम साउथ अफ्रीका को उसके घर में हरा सकते हैं. हमने पहले भी कई टीमों को उनके घर में हराया है. इस बार भी हम ऐसा कर सकते हैं.”

इंडिया vs साउथ अफ्रीका, पहला टेस्ट, जोहानिसबर्ग

अब वो मैच खेला जाना था, जिसका प्रसारण टीवी पर होना था. भारतीय फैंस टकटकी लगाए बैठे थे, क्योंकि सौरव गांगुली टीम में वापसी करते हुए मैदान पर उतर रहे थे. बॉलर्स के लिए खतरनाक दिख रही पिच पर द्रविड़ ने अजीब फैसला कर लिया. टीम इंडिया की पहले बैटिंग. सौरव समेत टीम के कई खिलाड़ी हैरान थे. लेकिन अब जब ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डरना. ये कहावत सही होती दिख रही थी.

टीम इंडिया की बैटिंग टेस्ट के पहले दिन ही लड़खड़ा गई. वसीम जाफर 9, सहवाग, 4 बनाकर शुरुआत में ही लौट गए. इसके बाद द्रविड़ (34) और सचिन (42) ने कुछ संभाला, लेकिन वो भी ज़्यादा देर नहीं रुक सके. अब सौरव गांगुली मैदान पर उतर चुके थे.

उनके इरादे बिल्कुल साफ थे, उन्हें एक संदेश देना था.

उस वक्त मैदान पर मखाया एंटिनी, डेल स्टेन और आंद्रे नेल तेज़ गेंदों से आग उगल रहे थे. जबकि जैक कैलिस की लाइन मिस करना मतलब विकेट दे देना था. दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाज़ इतनी खतरनाक गेंदबाज़ी कर रहे थे कि हर दूसरे ओवर में एक न एक गेंद आकर सौरव शरीर पर लग रही थी.

लेकिन फिर भी वो क्रीज़ पर डटे रहे. डटे ही नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अर्धशतक भी जमाया. दादा की उस पारी से इंडिया ने 249 रन बोर्ड पर टांगे. सौरव उस पारी में 51 रन बनाकर नॉट-आउट लौटे.

इसके बाद साउथ अफ्रीकी टीम को ज़हीर और श्रीसंत ने बुरी तरह से ढेर कर दिया. साउथ अफ्रीका की टीम 84 रनों पर ढेर हो गई. दूसरी पारी में टीम इंडिया ने 236 रन बनाए. इसमें भी दादा ने ज़रूरी 25 रनों की पारी खेली. साउथ अफ्रीका के सामने 402 रनों का लक्ष्य था.

भारतीय टीम को जीत की खुशबू आने लगी थी. भारत का पलड़ा एकतरफा भारी था. तीसरे दिन का खेल खत्म होते-होते दक्षिण अफ्रीकी टीम मुश्किलों में घिर चुकी थी. उनके पास कोई सहारा था तो एश्वेल प्रिंस और मार्क बाउचर का, जो कि तीसरे दिन नॉट-आउट लौटे थे.

सौरव गांगुली की सबसे यादगार प्रेस कॉन्फ्रेंस

तीसरे दिन का खेल खत्म होने के बाद सौरव गांगुली को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए भेजा गया. ये पहला मौका था, जब सौरव गांगुली की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही थी. सौरव के कमबैक के बाद पहली बार मीडिया के सामने थे. बतौर कप्तान तो दादा ने बहुत से सवालों के जवाब दिए. लेकिन एक खिलाड़ी के तौर पर ये पहला मौका था, जब उन्हें जवाब देना था.

वो प्रेस कॉन्फ्रेंस बहुत खास थी. सौरव गांगुली की सबसे लोकप्रिय प्रेस कॉन्फ्रेंस. दादा उस दिन तय करके आए थे कि जैसी बल्लेबाज़ी की है, वैसे ही जवाब भी देंगे.

दादा से एक के बाद कमाल के सवाल पूछे गए.

पत्रकार का सवाल: कैसा लग रहा था, जब हर दूसरे ओवर में चोट लग रही थी?
दादा का जवाब: शरीर पर चोट खाना, आउट होने से बेहतर होता है.

पत्रकार का सवाल: टीम से बाहर होने पर क्या कहेंगे?
दादा का जवाब: सिर्फ क्रिकेट खेलना ही ज़िंदगी नहीं है.

सवाल: क्या अब भारत की जीत को पक्का मान लिया जाए?
जवाब: अगर हम ये टेस्ट मैच भी नहीं जीत सकते, तो हमें वापस ड्रेसिंग रूम में नहीं लौटना चाहिए.

जिस एटिट्यूड के साथ सौरव का ये बयान आय़ा था, उसे एक कप्तान के रूप में भी माना गया. दादा का ये बयान साउथ अफ्रीका के उस पूरे दौरे पर चर्चा का विषय बना रहा.

आखिर में भारत ने ये टेस्ट 123 रनों से जीत लिया और सौरव गांगुली ने फिर से टीम में अपनी जगह बना ली.


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