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टेस्ट के पांचों दिन पार्क में सोकर, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच खेला ये भारतीय क्रिकेटर!

भारतीय क्रिकेट में सबसे बड़े विकेटकीपर का नाम लिया जाए, तो महेन्द्र सिंह धोनी के आगे कोई नहीं दिखता. लेकिन अगर शुरुआती दौर के विकेटकीपर्स का ज़िक्र आता है, तो फारूक इंजीनियर, सैय्यद किरमानी और किरन मोरे जैसे बहुत खिलाड़ी टीम इंडिया की शान रहे.

लेकिन फारूक से भी पहले एक ऐसा विकेटकीपर टीम इंडिया में आया, जिसने भारतीय क्रिकेट में अहम योगदान दिया. नाम है बुधी कुंदरन. सिर्फ 20 साल की उम्र में टीम इंडिया में एंट्री करने वाले बुधी का करियर एक फिल्मी कहानी जैसा रहा. वो साल 1960 से 1967 तक भारतीय टीम के लिए विकेट पीछे खड़े रहे. उन्होंने टीम इंडिया के लिए 18 टेस्ट खेले. इनमें उन्होंने 981 रन बनाए और 30 शिकार किए.

23 जून को उन्हीं बुधी कुंदरन की बरसी होती है. आइए आपको बताते हैं उनके शानदार करियर से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.

जब चुपचाप पिता के कपड़े पहनकर खेलने चले गए बुधी

बुधी कुंदरन एक गरीब परिवार से आते थे. उनके पिता को क्रिकेट का खेल बकवास लगता था और उस दौर के बहुत सारे परिवारों की तरह ही उनके पिता भी अपने बच्चों को क्रिकेट खेलने से रोकते थे. लेकिन बुधी के शानदार खेल की वजह से जब उन्हें स्कूल टीम में चुना गया, तो उनकी मां ने चुपचाप उनके पिता के कपड़ों को बुधी के साइज़ का करके मैच के लिए ड्रेस तैयार कर दी. इसके बाद जब बुधी ने इंटर स्कूल मैच में पहली बार ये सफेद कपड़े पहने, तो ताबड़तोड़ 219 रन ठोक दिए.

अगले दिन अखबार में उनकी तस्वीर छपी. उनकी पिता ने इसे देखा और उन्हें बुधी पर बहुत गर्व महसूस हुआ. इसके बाद बुधी के क्रिकेटिंग करियर में कभी कोई बाधा नहीं आई.

बिना डोमेस्टिक खेले ही मिल गई भारतीय टीम में जगह

बुधी ने शुरुआती क्रिकेट मुंबई में खेला, लेकिन उस वक्त नरेन्द्र तमहाने मुंबई रणजी टीम के विकेटकीपर बल्लेबाज़ होते थे, जो कि इंडिया के लिए खेल रहे थे. इस वजह से वो मुंबई टीम छोड़ रेलवे टीम के ट्रायल्स के लिए चले गए. उस वक्त लाला अमरनाथ रेलवे टीम के मेंटोर थे. साथ ही साथ लाला जी भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ता भी थे. उन्हें बुधी का खेल काफी पसंद आया. वो उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने रेलवेज़ की बजाए बुधी को सीधे भारतीय टीम में खेलने का ऑफर दे दिया.

लेकिन उस वक्त बुधी के पास न तो अपने गलव्स थे और न ही पैड. उस वक्त टीम इंडिया के विकेटकीपर नरेन्द्र तमहाने ने बड़ा दिल दिखाते हुए बुधी को अपना किट बैग दे दिया.

जब पार्क में सोकर खेला पहला टेस्ट

बुधी का डेब्यू ऑस्ट्रेलिया के साथ मुंबई के ब्रेबॉर्न क्रिकेट स्टेडियम में होना था. इंडियन क्रिकेट का ये वो दौर था, जब स्थानीय खिलाड़ियों को इंडियन टीम के साथ होटल में नहीं रोका जाता था. मैच से पहले वाली रात वो अपने घर पर ही थे. उनका घर बाज़ार गेट इलाके की एक चॉल में था. लेकिन भारतीय टीम के लिए पहला मौका कहिए या फिर सफोकेशन जो भी वजह हो, उन्हें मैच से पहले वाली रात नींद नहीं आ रही थी.

वो उठे और एक तकिया और चादर लेकर बॉम्बे के विक्टोरिया पार्क में जाकर सो गए. वहां पर पूरी रात मच्छरों ने उन्हें परेशान कर दिया. सुबह हुई और वो टीम इंडिया के लिए खेलने के लिए मैदान पर पहुंच गए. उन्होंने अपने पहले मैच ही लगभग 150 ओवरों तक विकेटकीपिंग की. लेकिन किसी को भी ये अंदाज़ नहीं था कि वो मैच के पांचों दिन पार्क में सो रहे थे.

जब उधार का सामान लेकर इंडिया के लिए खेले बुधी

करियर की दूसरी पारी में ही बुधी को कप्तान रामचन्द ने नंबर तीन पर प्रमोट कर दिया. लेकिन वो इआन मेकिफ की गेंद पर सिर्फ तीन रन पर ही हिट विकेट हो गए. इस मैच तक उनके पास अपना किट बैग और सामान भी नहीं था. वो नरेन तमहाने के गलव्स से कीपिंग कर रहे थे. जबकि जिस कैप को पहनकर वो मैच खेल रहे थे, वो उन्हें भर्दा हाई स्कूल के प्रिंसिपल बेहराम मुर्ज़बन ने दिया. यहां तक की जिस बैट और पैड से वो खेले, वो उन्हें अपने क्लब, फोर्ट विजय से मिला था.

मद्रास में खेले गए अगले मुकाबले में ही कप्तान रामचन्द ने इस बार उन्हें सीधे पारी शुरू करने भेज दिया. क्योंकि भारतीय क्रिकेट का ये वो वक्त था, जब कप्तान को ओपनिंग की परेशानी होती थी, तो वो सबसे पहले विकेटकीपर की तरफ ही देखते थे. इस मुकाबले में उन्होंने 12 शानदार चौकों के साथ 71 रनों की बेहतरीन पारी खेली और 111 के स्कोर पर तीसरे विकेट के रूप में आउट हुए. लेकिन बुधी के आउट होते ही पूरी भारतीय टीम एलेन डेविडसन और रिची बेनो के आगे सिर्फ 149 रनों पर ढेर हो गई.

इंग्लैंड के खिलाफ बनाया रिकॉर्ड 50 साल तक नहीं टूटा

कुंदरन ऐसे पहले भारतीय खिलाड़ी बने, जिन्होंने पहले टेस्ट मैच खेला और उसके रणजी ट्रॉफी मैच खेले. इसके साथ ही वो रणजी में पहला दोहरा शतक लगाने वाले बल्लेबाज़ भी बने. भारतीय क्रिकेट में कुंदरन पहले ऐसे बल्लेबाज़ थे, जिन्होंने क्रिकेट में आक्रामक विकेटकीपर का चलन शुरू किया.

साल 1963-64 में मद्रास में इंग्लैंड के पेस अटैक के सामने कुंदरसन ने 192 रनों की शानदार पारी खेली. लगभग 50 साल तक ये स्कोर किसी भी भारतीय विकेटकीपर का सबसे बड़ा स्कोर रहा. धोनी ने चेन्नई में 224 रन बनाकर इसे तोड़ा. इस पारी में बुधी ने 31 बाउंड्री लगाई. बाउंड्री का ये रिकॉर्ड भी 38 साल बाद वीवीएस लक्ष्मण ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तोड़ा.

बुधी इस सीरीज़ में लगातार शानदार खेले. दिल्ली टेस्ट में उन्होंने शतक जमाया. जबकि इसके बाद कानपुर में उन्होंने 55 रनों की पारी के साथ सीरीज़ का अंत किया. इस शानदार सीरीज़ के साथ वो क्रिकेट इतिहास के पहले ऐसे विकेटकीपर बने, जिन्होंने एक सीरीज़ में 500 रन बनाए.

टीम से बाहर होने के बाद हमेशा के लिए स्कॉटलैंड चले गए बुधी

इसके बाद फारुक इंजीनियर की टीम में एंट्री हुई और इस बात को लेकर होड़ मची की कौन टीम में बनेगा. जब तक दोनों एकसाथ खेले, तो उनके बीच ये होड़ होती थी कि कौन दर्शकों का ज़्यादा मनोरंजन कर पाएगा.

साल 1967 में टीम से छुट्टी के बाद बुधी की फिर कभी टीम में एंट्री नहीं हुई. टीम से छुट्टी के बाद उन्होंने टीम ऑफिशियल्स और बोर्ड पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों को ऐसा महसूस करवाया जाता है जैसे कि वो अधिकारियों की मेहरबानी से टीम में खेल रहे हैं.

उनके इस कमेंट की वजह से बोर्ड के साथ उनकी तकरार बनी रही.

इसके बाद वो ग्लास्गो शिफ्ट हो गए और साल 1970 में उन्होंने स्कॉटलैंड में स्कॉलिश लीग ड्रम्पेलियर के साथ कॉन्ट्रेक्ट किया. 80 के दशक में वो स्कॉटलैंड क्रिकेट टीम के लिए बेन्सन एंड हेजिस कप में भी खेले.

इसके बाद वो लगातार स्कॉटलैंड में ड्रम्पेलियर के लिए साल 1995 तक यानी 56 साल की उम्र तक क्रिकेट खेलते रहे, जो कि स्कॉटलैंड क्रिकेट के इतिहास में सबसे अधिक समय तक रहा. साल 2006 में लंग्स कैंसर की वजह से बुधी का ग्लासगो में ही देहांत हो गया.


जब 1983 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में कपिल देव के सामने कूदे भारतीय फैन्स कूदे और इंग्लैंड कंफ्यूज हो गई 

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