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पाकिस्तानी क्रिकेट में तबलीग़ी जमात घुसा तो मैच जीतना परियों के भरोसे छोड़ दिया

Satya Vyas 100 (1)सत्य व्यास लल्लनटॉप के पुराने साथी हैं, हाल के सालों में हिंदी के उदीयमान लेखक के रूप में उभरे हैं. (बेस्टसेलर बिना कहे ही समझ लीजे!) सत्य व्यास ने ‘बनारस टॉकीज’ से नया पाठक वर्ग बनाना शुरू किया तो शहर बदल दिल्ली पहुंचे. पाठक वर्ग भी ‘दिल्ली दरबार’ पहुंचा. वहां से कुछ बरस पीछे बोकारो लौटे और ‘चौरासी’ से होते हुए ‘बाग़ी बलिया’ लिखी-पढ़ाई. क्रिकेट के किस्सों में डूबे रहते हैं और कहानियां यूं सुनाते हैं मानो आज सुबह की बात हो. इन्हीं सत्य व्यास ने पाकिस्तानी क्रिकेटर्स और ज़मात पर कुछ लिखा है. पढ़िए…


पाकिस्तानी क्रिकेट अपने प्रारंभ के दिनों से ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ता रहा है. देश चूंकि मजहबी आधार पर बना था इसलिए लाज़मी था कि खेलों पर भी इसका असर हो. हालांकि क्रिकेट अमीरों का खेल था इसलिए अब्दुल हफ़ीज़ कारदार, आसिफ़ इकबाल, माज़िद खान, इमरान खान, वसीम रजा जैसे अंग्रेज़ीदां लोगों ने इस खेल को धर्म से दूर रखा था. खेल खत्म होते ही पार्टियां यूं शुरू होती थी कि अंग्रेज़ खिलाड़ी भी बगले झांकने लगते थे.

वक्त बीता. 1999 विश्व कप की फाइनलिस्ट, पाकिस्तान की टीम 2003 विश्व कप में अपने पांच में से महज 2 मैच, वह भी नामीबिया और नीदरलैंड के खिलाफ जीत कर दौड़ से बाहर हो गई थी. कोढ़ मे खाज यह कि एक बार फिर वह भारत से नहीं जीत पाए.

# पहला जमाती

वापसी पर कुछ पुराने खिलाड़ियो पर गाज़ गिरनी तय थी. मौके की नज़ाकत समझते हुए वसीम अकरम ने फौरन और वकार यूनिस ने एक साल बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर दी. हालांकि टीम में यूनिस खान, इंजमाम, युसुफ योहन्ना, सकलैन मुश्ताक़, मुश्ताक़ अहमद सरीखे खिलाड़ी अब भी बाकी थे. इन्हें टीम में रहना भी था, इनकी उम्र रिटायरमेंट की नहीं हुई थी. यहीं से पाकिस्तानी क्रिकेट में जमात की दखल हुई. वह किस्सा तफसील मांगता है. कभी और लिखूंगा. फिलहाल एक मजेदार किस्सा याद आ रहा है.

सईद अनवर अपने निजी कारणों से जमात में पनाह पाने वाले पहले खेलते क्रिकेटर थे. सन दो हजार एक के बाद जितने साल सईद खेले वह खेल को, अपने और टीम के प्रदर्शन को आसमानी करिश्मा ही कहते रहे. इसके पीछे उनके तजुर्बात थे.

# यूनुस और शोएब

खै़र टीम में दो खिलाड़ी ऐसे भी थे जो अब भी क्रिकेट को इन सब से दूर रखना चाहते थे. पहले युनूस खान जो खुद बहुत अधिक धार्मिक व्यक्ति हैं लेकिन उनका मानना है कि धर्म प्रदर्शन की चीज नहीं है, इस लिए वह उसे मैदान तक नहीं लाते थे. दूसरे थे अंग्रेज़ीदां शोएब अख्तर जिनके बारे मे कुछ बताना शब्द खर्च करना ही है.

एक रोज सईद अनवर को टीम मीटिंग में बुलाया गया. सईद बेमन से आए और कुछ सुनने के पहले ही कहा कि

इन सब मीटिंग से क्या होगा. पाक मन से उसको याद करो. कायनात का मालिक अगर चाहेगा तो परियां उतार देगा. वही जीत की बुनियाद तामीर करेंगी.

कहकर सईद टीम मीटिंग से चले गए. बाद में पाकिस्तानी टीम वह मैच बुरी तरह हार गई. बाद में खाने की टेबल पर शोएब या युनूस ने चुहल करते हुए पूछ दिया,

‘सईद भाई! हार हो गई हमारी. वो परियां आईं नहीं मैच जिताने!

इतना कहते ही सईद अनवर ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया,

उसमें मैंने पाकीज़गी की भी बात की थी. तुम्हारा मन तो परियों में लगा था. जीत कहां से होती!


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