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क़िस्सा बंगाल से निकले 'बेस्ट' लेफ्ट हैंडर का, जिसने हमें सौरव गांगुली दिया

तारीख थी 5 अक्टूबर, 1969. न्यूज़ीलैंड की टीम इंडिया टूर पर थी. तीन टेस्ट मैचों की सीरीज का दूसरा मैच नागपुर में खेल जा रहा था. न्यूज़ीलैंड ने पहली पारी में 319 रन बनाए थे. जवाब में भारतीय टीम 150 रन पर छह विकेट खो चुकी थी. ऐसे वक्त में क्रीज़ पर आया 23 साल का लेफ्ट हैंड बल्लेबाज. नाम अंबर रॉय.

स्कोर में 11 रन ही जुड़े कि अशोक मांकड़ भी आउट हो गए. अब क्रीज़ पर अंबर के साथ थे फारुख इंजिनियर. डायल हैडली की अगुवाई वाली न्यूज़ीलैंड पेस बैटरी ने सोचा कि अब तो इंडिया गई. सिर्फ उन्होंने ही नहीं, सबने यही सोचा. लेकिन अपनी धुन में रहने वाले अंबर के दिमाग में कुछ और ही था.

# लोड नहीं लेना

अंबर ने अपने डेब्यू को शानदार करने का मन बना लिया था. कहते हैं कि अंबर ने अपने जीवन में कभी किसी चीज का लोड लिया ही नहीं. मैच होता तो बैटिंग के वक्त अंबर पैड बांधकर सो जाते. उनकी बारी आने पर साथी प्लेयर उन्हें जगाते. अंबर मैदान में जाते, कभी ज़ीरो तो कभी सैकड़ा लगाकर वापस आते. सिगरेट जलाते और एकदम निर्लिप्त भाव से बैठ जाते.

लेकिन अंबर ने उस दिन लोड लिया था. हैडली, बॉब कनिस, हीडली हॉवर्थ, विक पोलार्ड और ब्रायन युले जैसे दिग्गज पूरा जोर लगाते रहे लेकिन अंबर को हिला नहीं पाए. उस दिन आलम ये था कि अपनी धमाकेदार बैटिंग के लिए फेमस फारुख इंजिनियर भी उनसे पीछे चल रहे थे.

अंत में अंबर 48 रन बनाकर आखिरी विकेट के रूप में आउट हुए. इस पारी में 10 चौके शामिल थे. अगला दिन वैसा ही रहा जैसा भारत में होता है, लोगों ने अंबर को अगला स्टार बता दिया. यह देख उनके चाचा पंकज रॉय मुस्कुराए. इंडियन टीम के ओपनर रह चुके पंकज को लगा कि भतीजा उनकी विरासत संभाल लेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अंबर अपनी अगली तीन इनिंग्स में 2, 0 और 4 रन ही बना पाए. यह सीरीज खत्म हुई.

टीम इंडिया की अगली सीरीज ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ थी. सेलेक्टर्स ने पहले दो टेस्ट के लिए अंबर को नहीं चुना. लेकिन सेलेक्टर विजय मर्चेंट को अब भी अंबर पर भरोसा था. उन्होंने दिल्ली में हुए सीरीज के तीसरे टेस्ट के लिए अंबर को वापस बुलाया. इस स्टे में अंबर को सिर्फ एक पारी में बैटिंग मिली जिसमें वह अपना खाता नहीं खोल पाए.

लापरवाही अब करियर पर भारी पड़ती दिख रही थी, लेकिन अंबर अब भी वैसे ही थे. मस्तमौला, लोड ना लेने वाले. अगला टेस्ट ईडन गार्डन में हुआ. अंबर के अपने घर में. लेकिन वे वहां भी नाकाम रहे. इस टेस्ट में अंबर ने 18 और 19 रनों की पारियां खेलीं. यही टेस्ट उनके करियर का अंतिम टेस्ट साबित हुआ.

# फर्स्ट क्लास का हीरो

हालांकि फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनका जलवा जारी रहा. सिर्फ 15 साल की उम्र में फर्स्ट क्लास डेब्यू करने वाले अंबर अब बंगाल के कप्तान थे. डोमेस्टिक क्रिकेट में वापसी के साथ ही अंबर ने असम के खिलाफ 173 रन पीट दिए. दो मैच बाद ही उन्होंने बिहार के खिलाफ 133 रन मारे. अंबर डोमेस्टिक क्रिकेट में लगातार रन बनाते रहे लेकिन नेशनल टीम में उन्हें जगह नहीं मिली.

1972-73 में इंग्लैंड की टीम इंडिया टूर पर आई. डेरेक अंडरवुड, टोनी ग्रेग, बॉब कॉटम और जैक बिर्केनशॉ के सामने अंबर ने ईस्ट ज़ोन के लिए 70 रन की नॉटआउट पारी खेली. जबकि उनकी पूरी टीम 148 पर ऑलआउट हो गई थी. इतना ही नहीं इसके बाद उन्होंने मोइन-उद-दौला गोल्ड कप के फाइनल में करसन घावरी, प्रसन्ना, सलीम दुर्रानी और पद्माकर शिवाल्कर जैसे दिग्गजों के खिलाफ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के लिए 124 और 37 का स्कोर भी बनाया.

इसके बाद 1974-75 के रणजी ट्रॉफी क्वॉर्टरफाइनल में अंबर ने कर्नाटक के खिलाफ 154 रन की नॉटआउट पारी भी खेली. कर्नाटक की उस टीम में प्रसन्ना और भगवत चंद्रशेखर दोनों खेल रहे थे.

अंबर ने अपने फर्स्ट क्लास करियर के 132 मैचों में 43.15 की ऐवरेज के साथ 7,163 रन बनाए. इसमें 18 सेंचुरी थीं. सिर्फ रणजी ट्रॉफी की बात करें तो यहां अंबर के नाम 49.57 की ऐवरेज से 11 शतकों के साथ 3,817 रन हैं.

# गज़ब का टैलेंट

डोमेस्टिक क्रिकेट में मैदान के बाहर भी अंबर का जलवा था. कहते हैं कि उस दौर में अंबर के हर स्ट्रोक पर पूरा ईडन गार्डन अपने पंजों पर खड़ा हो जाता था. लेकिन अंबर को इन सब चीजों से कभी फर्क नहीं पड़ा. उनका अंदाज ही अलग था. इस बारे में उनके चचेरे भाई प्रणब रॉय ने एक बार विज्डन से कहा था,

‘अंबर दादा दूसरी दुनिया से थे. वह एक हीरो थे, स्टार. वह भाग्यशाली रहने में ही खुश रहने वाले इंसान थे. उन्होंने कभी भी किसी भी चीज की जिम्मेदारी नहीं ली. उन्होंने कभी तनाव नहीं लिया. वह ऐसे ही थे. जब उन्हें पता चला कि उनके हार्ट में गंभीर समस्या है और वह बहुत ज्यादा दिन नहीं जी पाएंगे, उन्हें फर्क ही नहीं पड़ा. उन्होंने बस यही कहा कि वह फिर से सिगरेट पी सकते हैं, और उन्होंने वही किया.

उनके पास गज़ब का टैलेंट था. लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं थी. उन्होंने कभी भी कड़ी मेहनत नहीं की, वह बमुश्किल ही कभी प्रैक्टिस पर जाते थे. वह प्रैक्टिस सेशन पर जाकर भी वैसे ही लौट आए थे, बिना बल्ला उठाए. इसके बाद भी वह भारत के लिए खेले. उन्होंने कभी समझा ही नहीं कि उन्हें क्या तोहफा मिला है. अगर उन्होंने कड़ी मेहनत की होती तो शायद चीजें अलग होतीं. वह भारत के लिए 40-50 टेस्ट खेल सकते थे.’

रिटायरमेंट के बाद अंबर बंगाल के सेलेक्टर बने. अंबर 15 साल तक बंगाल के सेलेक्टर रहे. कहा जाता है कि सबसे पहले उन्होंने ही सौरव गांगुली का टैलेंट पहचाना था. 1984 से 1986 तक वह इंडियन टीम के सेलेक्टर भी थे. 5 जून, 1945 को पैदा हुए अंबर का 19 सितंबर, 1997 को सिर्फ 52 की उम्र में निधन हो गया. विज्डन के मुताबिक उनकी मौत मलेरिया से हुई थी लेकिन कई लोगों का मानना है कि उन्हें हार्ट-अटैक आया था.

ट्रिविया

# अंबर बहुत आलसी थे. आलस के चलते वह अक्सर नेट सेशन नहीं करते थे.

# अंबर से पहले उनके चाचा पंकज इंडिया के लिए खेल चुके थे. पंकज के बेटे प्रणब ने भी भारत के लिए दो टेस्ट मैच खेले हैं. इसके अलावा उनके दो और चाचा, निमइ और गोबिंदो भी फर्स्ट क्लास क्रिकेटर थे.

# अंबर का परिवार बेहद अमीर था. कहा जाता है कि उनका परिवार बैंकों को लोन देता था.

# अंबर ने अपने फर्स्ट क्लास डेब्यू के चार साल बाद अपनी पहली फर्स्ट क्लास सेंचुरी मारी थी. विज्डन ने अंबर को बंगाल से निकला बेस्ट लेफ्ट हैंड बैट्समैन करार दिया था


ऑस्ट्रेलियाई चयनकर्ताओं से पहले ही सौरव गांगुली ने स्टीव स्मिथ को कप्तान बना दिया था

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