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वेब सीरीज़ रिव्यू: 'दी फैमिली मैन' ने कश्मीर की ऐसी-ऐसी सच्चाइयों को दिखाया है जो पहले न देखी होंगी

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# लाइट, कैमरा, एक्शन-

श्रीकांत तिवारी. मुंबई की किसी सोसाइटी के पार्क में बैठे हैं. नीचे नीले रंग का योगा-मैट बिछा है. आंखे बंद हैं. बगल में रखा मोबाइल बज रहा है. कॉल इम्पोर्टेन्ट है, शायद ऑफिस से है. श्रीकांत कॉल को इग्नोर करते हैं और फिर अपने योग में लग जाते हैं. घर आते हैं. सुची से मुख्तसर सी बात करते हैं.

सुची, सुचित्रा अय्यर तिवारी. उनकी वाइफ. कॉलेज में साइकोलॉजी पढ़ाती हैं. दोनों के बीच पहले बिजली का बिल भरने और फिर इस बात को लेकर बहस होती है कि बच्चों को स्कूल कौन छोड़ेगा? चूंकि सुचित्रा की आज कॉलेज में जॉइंट क्लास है, और श्रीकांत बच्चों को कम ही स्कूल छोड़कर आते हैं तो तय होता है आज वो ही जाएंगे.

अथर्व और धृति- श्रीकांत तिवारी के दो बच्चे, जो पिता की सुनते तो हैं, लेकिन दूसरे कान से निकालने के लिए. सोसाइटी के पार्क से लेकर बच्चों को स्कूल छोड़ के आने तक श्रीकांत का फोन कई बार बजता है. लेकिन वो उसे या तो काट देता है या इग्नोर कर देते हैं. यूं ये इस्टेबलिश होता है कि श्रीकांत तिवारी एक फैमिली मैन हैं.

इधर श्रीकांत अनुलोम-विलोम में लगे हैं, उधर उनकी ज़िंदगी का अनुलोम विलोम हुआ पड़ा है.
इधर श्रीकांत अनुलोम-विलोम में लगे हैं, उधर उनकी ज़िंदगी का अनुलोम विलोम हुआ पड़ा है.

दरअसल ये पहले कुछ सीन और इस वेब सीरीज़ का नाम ‘दी फैमिली मैन’ आगे आने वाली स्टोरी का काउंटर नैरेटिव है. यानी श्रीकांत तिवारी ठीक उससे उलट हैं, कि जैसा उन्हें अभी तक प्रोजेक्ट किया गया. लेकिन दस एपिसोड की इस सीरीज़ के 10वें मिनट में ही क्लियर हो जाता है.

# कहानी-

श्रीकांत तिवारी दरअसल एक सीक्रेट एजेंट हैं. अपने ट्रेड के विशेषज्ञ. एक ‘वर्ल्ड क्लास स्पाई’. जैसा सीरीज़ के प्रोमो में भी उन्हें प्रोजेक्ट किया गया है. गुप्त रूप से टास्क नाम की एक काल्पनिक सरकारी संस्था में काम करते हैं. टास्क (Threat Analysis and Surveillance Cell), एनआईए की एक शाखा है जिसका काम है देश में होने वाले हमलों का पहले ही पता लगाकर उन्हें रोकना. और अबकी देश में जो खतरा आने वाला है उसका नाम है- ज़ुल्फिकार. दुश्मनों का एक ऐसा मिशन जिससे 26/11 (मुंबई टेरर अटैक) से भी कहीं बड़ी तबाही फैलने वाली है. ये क्या है और इसे कैसे रोका जाए इसमें ही टास्क की टीम, ‘फैमिली मैन’ की स्क्रिप्ट और इसके साढ़े सात घंटे के लगभग का रन टाइम खर्च होता है.

अगर आपने ‘ट्रू लाइज़’ देखी है तो उस मूवी में आर्नोल्ड श्वाज़नेगर के किरदार की तरह ही ‘फैमिली मैन’ के श्रीकांत तिवारी भी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ की दिक्कतों में साम्य नहीं बना पा रहे हैं और दोनों ही जगह उनसे चीज़ें छूटती जा रही हैं.  यूं श्रीकांत ओवर स्ट्रेस्ड हो चुके हैं. उन्हें डॉक्टर ने सिगरेट शराब पीने से मना कर रखा है. इसलिए वो केवल तभी सिगरेट शराब पीते हैं जब वो स्ट्रेस में हों. यानी ऑलमोस्ट हमेशा.

कश्मीर, बलूचिस्तान, सीमा पार का आंतकवाद और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर जैसे कई सब प्लॉट्स सीरीज़ को रोचक बनाए रखते हैं.
कश्मीर, बलूचिस्तान, सीमा पार का आंतकवाद और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर जैसे कई सब प्लॉट्स सीरीज़ को रोचक बनाए रखते हैं.

इन दो मेन प्लॉट्स के अलावा बीफ, लिंचिंग, हेट स्पीच, आईएसआई, बलूचिस्तान, सीरिया, कश्मीर, स्लीपर सेल, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर जैसे कई और सब प्लॉट्स हैं जो न्यूज़पेपर्स की हेडलाइंस से इंस्पायर्ड हैं. और वेब सीरीज़ खुद इस बात को हर एपिसोड के अंत में बताती है कि सीरीज़ ‘न्यूज़पेपर की हेडलाइंस से इंस्पायर्ड’ है.

इस सब से गुजरते हुए अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम हो रही ये वेब सीरीज़ एक ऐसे मोड़ पर खत्म होती है कि दूसरे सीज़न के पर्याप्त जगह बना सके.

# एक्टिंग-

श्रीकांत तिवारी बने हैं- मनोज वाजपेयी. इस सीरीज़ में उनकी एक्टिंग की सबसे बड़ी खासियत ये लगी कि जब सीरीज़ बताना चाहती है कि वो स्ट्रेस्ड हैं तो वो स्ट्रेस्ड लगते भी हैं. जब इक्का-दुक्का जगह डायलॉग्स एब्यूसिव होते हैं तो भी उनकी सहज एक्टिंग के चलते आपको वो सब लाउड नहीं लगते. जैसे एक सीन जहां वो अपनी बच्ची के प्रिंसिपल से बात कर रहे हैं और मोबाइल में ऑफिस से बहुत अर्जेंट और इंपोर्टेंट काम के बारे में कॉल और मैसेजेस आ रहे हैं. न केवल इस वक्त उनकी दुविधा देखने लायक है बल्कि उनके मुंह से अचानक निकली गाली, अचानक निकली हुई ही लगती है. फोर्स्ड नहीं. यूं उनकी इसी एक्टिंग के चलते कई ‘ऑकवर्ड्स’, ‘ऑव्यस’ बन जाते हैं. और इसी के चलते स्क्रिप्ट पढ़ते हुए कई औसत से लगने वाले सीन भी स्क्रीन पर दमदार लगने लगते हैं. उनका ये किरदार अपने एक ‘स्पेसिफिक टेंपलेट’ के चलते उनके द्वारा अपने शुरुआती दिनों में निभाए गए ‘प्रताप सिंह’ (शूल) के किरदार की याद दिलाता है.

सुचित्रा का किरदार निभाने वालीं प्रियमणि ने साउथ की हर भाषा की मूवी में काम किया है और वहां वो काफी पॉपुलर हैं. अगर आपने इनकी ‘परुथीवीरन’ (परूथी गांव का वीर). ‘चारुलता’ और ‘अतु ओरु कनाक्कालम्’ (वो सपनों के दिन थे) जैसी फ़िल्में देखी होंगी तो आप इनकी एक्टिंग से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे होंगे. जहां परूथीवीरण के लिए इन्हें एक्टिंग का नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिला था वहीं ‘चारुलता’ में इन्होंने एक ऐसी जुड़वा लड़की का किरदार निभा कर दर्शकों और समीक्षकों की वाहवाही लूटी थी जो सर से जुड़ी हुई हैं. फैमिली मैन में भी उन्होंने अपना बेस्ट देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है. इंटिमेट सीन न करने के अपने आग्रह के बावज़ूद जिस तरह से उन्होंने अपने किरदार को बोल्ड बनाया है वो एक्टिंग के छात्रों के लिए एक लेसन हो सकता है. एक सीन में जब वो अपने कलीग के साथ एक ही रूम में रहते हुए व्हाट्सएप पर चैट कर रही होती हैं तो भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर दर्शकों के शरीर में भी एक झुरझुरी सी होती है. ये एहसास किसी भी इंटिमेट सीन को देखकर होने वाले एहसास से इक्कीस है.

ढेरों करैक्टर्स से सजी वेब सीरीज़ को साध लेना इतना आसान भी नहीं होता. (लेफ्ट टॉप से क्लॉक वाइज़- शारिब हाशमी, किशोर, प्रियमणि, महक ठाकुर
ढेरों करैक्टर्स से सजी वेब सीरीज़ को साध लेना इतना आसान भी नहीं होता. (लेफ्ट टॉप से क्लॉक वाइज़- शारिब हाशमी, किशोर, प्रियमणि, महक ठाकुर)

श्रीकांत तिवारी के साइड किक तलपड़े का किरदार निभाने वाले शारिब हाशमी का नाम भी एक नेशनल अवार्ड से जुड़ा हुआ है, जो उनकी 2012 में आई फिल्म ‘फिल्मिस्तान’ को मिला था. ‘फैमिली मैन’ में भी जहां कई सीन में वो कॉमिक रिलीफ लाते हैं तो कई जगह स्क्रिप्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा लगते हैं. एक सीन में जहां श्रीकांत और पाशा अपने पछतावे से माहौल बोझिल बना रहे होते हैं ठीक तभी तलपड़े कॉमिक रिलीफ बनकर आते हैं. ऐसा नहीं है कि तब आप ठहाके लगा के हंसते हों, लेकिन फिर भी कुछ भार कम हुआ सा ज़रूर लगता है.

कहानी के एक बहुत ज़रूरी किरदार मूसा रहमान को नीरज माधव ने निभाया है. अपने करियर की शुरुआत एक डांसर/कोरियोग्राफर के तौर पर करने वाले नीरज ने बाद में साउथ की कई फिल्मों में बतौर एक्टर काम किया है. इस सीरीज़ में उनका ये किरदार डिसेप्टिव और स्टोरी के सबसे बड़े सस्पेंस की रीढ़ है. कुछ-कुछ ‘फना’ मूवी में आमिर खान के किरदार की तरह है. ऐसे किरदारों का सबसे बड़ा टास्क हुआ करता है अपने हाव-भावों और बातों से दर्शकों को तब तक धोखे में रखना जब तक लेखक नहीं चाहता कि राज़ खुले. और इसे निभाने में नीरज माधव को डिस्टिंक्शन मार्क्स मिलते हैं. वो अपनी मासूमियत और शातिरपन दोनों ही से इतना कन्विंस कर लेते हैं कि दर्शक अन्यथा सोच ही नहीं पाते.

गुल पनाग, सलोनी के अपने छोटे से रोल में स्मार्ट, सिंसियर, पॉजिटिव और सीरियस लगती हैं. सलोनी का किरदार भी श्रीकांत तिवारी की तरह ही एक सीक्रेट एजेंट का है, जो कश्मीर में पोस्टेड हैं. सलोनी श्रीकांत की सीनियर हैं और सीरीज़ के अंतिम कुछ एपिसोड्स में ही दिखाई देंती हैं, जब श्रीकांत का तबादला मुंबई से कश्मीर होता है. गुल पनाग ने चालीस की उम्र में भी एथलीट सरीखी बॉडी मेंटेन की है, जो उनके करैक्टर के लिए मुफीद लगती है. और इसलिए ही वो स्क्रीन में अपने जॉब को लेकर इतनी प्रोफेशनल दिखती हैं जितनी श्रीकांत तिवारी नहीं लगते. ये अलग बात है कि श्रीकांत तिवारी के करैक्टर की यही मांग रही होगी. सेक्रेड गेम्स के पहले कुछ एपिसोड के सैफ़ अली खान की तरह.

कुछ किरदार ऐसे भी हैं, जो सिर्फ कुछ समय के लिए आते हैं, लेकिन बहुत कुछ कर गुज़रते हैं.
कुछ किरदार ऐसे भी हैं, जो सिर्फ कुछ समय के लिए आते हैं, लेकिन बहुत कुछ कर गुज़रते हैं.

श्रीकांत और सलोनी दोनों एक ही डिपार्टमेंट में, लगभग एक ही रैंक में हैं. लेकिन जहां गुल पनाग का ऑरा पॉजिटिव है वहीं श्रीकांत तिवारी जगह-जगह लूज़र की तरह पोट्रेट होते हैं. वो खुद भी अपने को लूज़र कहते हुए पाए जाते हैं.

मेन विलेन साजिद को शहाब अली ने प्ले किया है. उनका रिज्यूम बाकी मेन कैरेक्टर्स की तरह इतना लंबा चौड़ा नहीं है. इससे पहले उन्होंने केदारनाथ में देखा गया था. ‘फैमिली मैन’ में उनका चेहरा इतना सपाट लगता है कि आप उसमें कोई एक्सप्रेशन मुश्किल से ही देख पाते हो. वैसे उनके किरदार को देखकर ये कहना ग़लत न होगा कि ऐसा उन्होंने जानबूझकर किया हो, या उनसे करवाया गया हो. कुछ बड़े एक्शन सिक्वेंसेज़ में भी वो एवरेज ही लगते हैं. फिर चाहे वो नीरज माधव के साथ कार के भीतर का फाईट सीन हो या ट्रक को कश्मीर से दिल्ली पहुंचाने वाला सीन.

पिछले कुछ टाइम में जितनी भी वेब सीरीज़ आई हैं, उनमें बच्चों को या तो दिखाया ही नहीं गया या दिखाया भी गया तो एक फिलर की तरह, लेकिन इसमें वे सबसे रियलिस्टिक और कॉन्टेंपररी लगते हैं. अथर्व का किरदार निभाने वाले बच्चे वेदांत सिन्हा ने तो खैर अच्छा काम किया ही है लेकिन धृति का किरदार निभाने वालीं लड़की महक ठाकुर विशेष रूप से प्रभावित करती हैं. एक्टिंग में इतनी मैच्योरिटी है कि आप ज़ल्द ही इनको अन्य प्रोजेक्ट्स में भी काम करते हुए देखने वाले हैं.

कुछ और करेक्टर्स (लेफ्ट टॉप से क्लॉक वाइज़- शहाब अली, वेदांत, दलीप ताहिल, नीरज माधव)
कुछ और करेक्टर्स (लेफ्ट टॉप से क्लॉक वाइज़- शहाब अली, वेदांत, दलीप ताहिल, नीरज माधव)

लास्ट बट नॉट लीस्ट, ‘फ़ोर्स वन’ के लीडर इमरान पाशा का किरदान निभाने वाले किशोर कुमार जी. का किरदार भी दमदार है. और उतनी ही दमदार है उनका अभिनय. ‘फ़ोर्स वन’ भी ‘टास्क’ की तरह ही एनआईए (National Investigation Agency) का एक काल्पनिक एक्सटेंशन है और इसका काम ज़्यादा जोखिम भर है.

पाशा को देखकर जब कलीग कहते हैं कि ‘ये अगर साड़ी भी पहन ले तब भी अंडर कवर एजेंट ही लगेगा’ तो दर्शक ठहाके लगाकर हंसते हैं. क्यूंकि वाकई में पाशा का किरदार निभाने वाले किशोर ‘दी फैमिली मैन’ में ऐसे ही दिखते हैं. खासतौर पर अपने मुंडाए हुए सर और चेहरे पर हमेशा पसरी रहने वाली गंभीरता के चलते. किशोर भी साउथ का जाना माना नाम है. कन्नड़, मलयालम, तमिल, तेलुगु… ऐसी कोई प्रमुख साउथ इंडियन भाषा नहीं जिसके प्रोजेक्ट उन्होंने न किए हों. साथ में उन्होंने ‘हाई प्रिस्टेस’ नाम की एक कन्नड़ वेब सीरीज़ में भी काम किया है. ये सीरीज़ ज़ी 5 पर स्ट्रीम हो रही है.

इन सबके अलावा साढ़े सात घंटे लंबी सीरीज़ में अगर ढेर सारे प्लॉट्स और सब-प्लॉट्स हैं तो ज़ाहिर है उतने ही किरदार भी रहे होंगे. और हर एक के बारे में लिखना संभव नहीं. हां मगर ये ज़रूर है कि ओवरऑल सबने ही बेहतर एक्टिंग की है. हां मगर कई जगहों पर सीन को निपटा लेने की एक ज़ल्दबाज़ी किरदारों की एक्टिंग में भी दिखती है.

# कास्टिंग-

सीरीज़ के डायरेक्टर राज, डीके और कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की विशेष तौर पर तारीफ़ करनी होगी कि इन लोगों ने कास्टिंग फाइनल करते वक्त एक्टर्स की मदर टंग, उनकी उम्र, उनके डील-डौल और रियल लाइफ में उनके बैकग्राउंड का भी पूरा ख्याल रखा है. साउथ के एक्टर्स अगर साउथ इंडियन बने हैं तो चंडीगढ़ की गुल पनाग नॉर्थ की.

# डायरेक्शन-

निर्देशक राज और डीके ने एक साथ मिलकर कई फ़िल्में बनाई हैं. जिनमें से ज़्यादातर क्राफ्ट, कहन और नयेपन के लिहाज़ से ‘शोर इन दी सिटी’ या ‘गो गोवा गोन’ सरीखीं औसत थीं.  ‘स्त्री’ ने बेशक तारीफ़ और पैसा दोनों कमाया लेकिन इसकी इन्होंने सिर्फ स्क्रिप्ट लिखी थी.

निर्देशक राज और डीके ने एक साथ मिलकर कई फ़िल्में बनाई हैं
निर्देशक राज और डीके ने एक साथ मिलकर कई फ़िल्में बनाई हैं.

तो क्या इनका पिछला काम ऐंवे ही रहा है? उत्तर ये है कि अगर आप इनकी निर्देशित की हुई पिछली फ़िल्में देखें तो आप गौर करेंगे कि इनकी औसत सी दिखने वाली फिल्मों में भी कई टुकड़े बहुत अच्छे बन पड़ते हैं. इनकी दिक्कत रही है उन सब अच्छी चीज़ों को जोड़कर उससे एक मुकम्मल प्रोडक्ट बनाना. दोनों ‘दी फैमिली मैन’ में इस चीज़ को काफी हद तक साध पाते हैं. खासतौर पर तब जबकि वेब सीरीज़, जिसमें कहानियों की कई स्ट्रीम्स एक साथ चलती हैं, को एकसाथ बांधे रखना और उससे दर्शकों को बांधे रखना एक ढाई घंटे की फिल्म से कहीं ज़्यादा मुश्किल है.

# क्या अच्छा है-

# इस सीरीज़ की स्क्रिप्ट और डायरेक्शन की सबसे अच्छी बात ये लगी कि ‘आतंकवादी हमले’,’कश्मीर’,’पाकिस्तान’ जैसे सब्जेक्ट्स पर बेस्ड होते हुए भी सीरीज़ में राष्ट्रवाद को लेकर जबरन गाल नहीं बजाए गए हैं. चेस्ट थम्पिंग जैसी चीज़ें नदारद हैं. साथ में सिक्के का दूसरा पहलू भी काफी ईमानदारी से दिखाया गया है. फिर चाहे वो कश्मीर में आम लोगों की ज़िंदगी हो, जो दो पाटों के बीच में फंस गई है या गौ हत्या और मुस्लिम युवकों के आतंकवाद की ओर झुकने के प्रमुख कारण जैसे संवेदनशील मुद्दे हों. एक कॉमर्शीयल कंटेंट में इतनी ईमानदारी विरले ही देखने को मिलती है. केवल आतंकवाद को लेकर ही नहीं ‘फेमिनिज्म’ जैसे एक और ज्वलंत मुद्दे पर भी ये सीरीज़ बड़ा ही शांत सा लेकिन कन्विंसिंग स्टैंड लेती है. सुचित्रा को नौकरी छोड़नी होती है, वो छोड़ देती है. भले ही उसका कारण अरविंद यानी शरद केलकर से प्रभावित रहना रहा हो या अपनी ज़िंदगी की एकरसता को खत्म करने का आग्रह. ये महिला अपने पुरुष काउंटपार्ट्स पर डेपेंडेंट नहीं है.

# दूसरा पॉइंट है इसकी रिसर्च. खासतौर पर लोकेशंस और वहां के रहन-सहन को देखकर कभी-कभी आपको लगता है कि ये मूवी नहीं रियल फुटेजेज़ का एक कोलाज है. कश्मीर की बंद दुकानें और उनके ऊपर लिखे हुए अतिवादी नारे आपने पिछली बार किसी मूवी या सीरियल में नहीं न्यूज़ में देखे होंगे. फिर एक जगह कश्मीर का इंटीरियर इलाका (गांव) दिखाया गया है, ये शादी का सीन है. कश्मीर का इससे रियल सीन मेरी स्मृति में तो कोई नहीं है. ठीक जैसा ‘कहानी’ फिल्म का कोलकाता या ‘ये है मुंबई मेरी जान’ की मुंबई. सीरीज़ में लोकेशंस भी एक दो नहीं ढेरों हैं. समुद्र के बीच किसी नौका से शुरू हुई लोकेशंस की ये यात्रा मुंबई, केरल, कश्मीर, बलूचिस्तान, लाहौर जैसी जगहों से होते हुए दिल्ली में आकर रुकती है.

लोकेशंस और वहां के रहन सहन पर काफी रिसर्च की गई लगता है. (बड़ी वाली तस्वीर कश्मीर में हो रही शादी की है और लेफ्ट की तस्वीरें क्रमशः केरल का समुद्र तट, मुंबई और कश्मीर के एक मकान की)
लोकेशंस और वहां के रहन सहन पर काफी रिसर्च की गई लगता है. (बड़ी वाली तस्वीर कश्मीर में हो रही शादी की है और लेफ्ट की तस्वीरें क्रमशः केरल का समुद्र तट, मुंबई और कश्मीर के एक मकान की.)

# कुछ सीन हैं जिसमें सस्पेंस और टेंशन को भी बहुत अच्छे से प्रोजेक्ट किया गया है. जैसे एक सीन है काला घोड़ा बम ब्लास्ट वाला. ये कैसे फनी से अत्यंत गंभीर हो जाता है, इसका क्रेडिट शार्प डायरेक्शन को जाता है. इसकी तुलना रामगोपाल वर्मा की मूवी ‘सत्या’ के उस सीन से की जा सकती है जहां चुटकुले के दौर के बीच अचानक गोलाबारी होना शुरू हो जाती है.

हॉस्पिटल में आंतकवादियों और एनआईए के बीच हुई मुठभेड़ भी काफी रोचक और कलात्मक लगती है. अगर आपने सीरीज़ के कैरेक्टर्स में इंवेस्ट किया है तो ये सिक्वेंस भी आपको ढेर सारे शॉक देकर जाता है. इसे आप जीओटी के ‘रेड वेडिंग’ का छोटा रिचार्ज वर्ज़न कह सकते हैं.

# क्या उतना बेहतर नहीं हो पाया?

ऐसा नहीं है कि सीरीज़ में सब कुछ बढ़िया ही बढ़िया है. कुछेक चीज़ें हैं जो खटकती भी हैं. जैसे मनोज बाजपेयी का ऑफिस, जो बनावटी लगता है. बलूचिस्तान में जाकर वापस आ जाना कन्विंस नहीं करता. ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ वाले पॉइंट को ज़हन में रखने के बावज़ूद.

मंत्री की पार्टी में बीफ लेकर जाने वाला सीन ‘सब्जेक्ट’ के लिहाज़ से अच्छा है लेकिन इसका ट्रीटमेंट और इसका सस्पेंस काल्पनिक लगता है. अब अगर इस सीन के सामने आप सेक्रेड गेम्स के उस सीन को रखें, जहां एक क्रिकेट खेलते बच्चे की लिंचिंग हो जाती है और सरताज (सैफ़ अली का किरदार) देखता रह जाता है. तो जहां उस सीन को देखकर आपको माहौल की गंभीरत का अंदाज़ा सहज लग जाता है, वहीं यहां वो बात नहीं आ पाती. यूं ये सीन बस एक फिल्मी सीक्वेंस बनकर रह जाता है. जहां ‘फैमिली मैन’ में आप सीरीज़ के हीरो (मनोज वाजपेई के किरदार) के लिए रूट कर रहे होते हैं, मारे गए लड़कों के लिए नहीं. वहीं सेक्रेड गेम्स वाले सीन में आप गुस्से और दुख से भर जाते हैं. हीरो (सैफ के लिए कैरेक्टर) के लिए नहीं उस लड़के के लिए. इस जैसे कई और सीन हैं जहां पर इमोशंस दिखते हैं लेकिन आपको हिलाते नहीं.

सीरीज़ के कुछ पोस्टर्स
सीरीज़ के कुछ पोस्टर्स

वैसे तो सीरीज़ में बहुत कम गाली-गलौच है (अगर हाल ही में आई बाकी कई सीरीज़ से तुलना करें तो) लेकिन बच्चे के मुंह से निकली एक गाली जो सीरीज़ के पहले एपिसोड में ही सुनने को मिल जाती है, खटकती है. होने को सीरीज़ बनाने वालों का इसपर एक्सक्यूज़ भी आया था कि वो गाली नहीं बल्कि उससे मिलता जुलता कोई शब्द है. लेकिन मेरा मानना है कि दोनों बातों से कोई खास अंतर नहीं आना.

# सीरीज़ की ओवरऑल फील क्या है-

ये कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है, जिसके बारे में ये कहा जाए कि ‘द फैमिली मैन’ नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा. लेकिन इसके बारे में ये भी नहीं कहा जा सकता है ‘द फैमिली मैन’ बेहद बुरी और स्किप करने लायक है. इसे आपने देख लिया, तो वो आपके लिए भी एक एक्सपीरियंस है. कई मायनों में तो बाकी फिल्ममेकर्स या सीरीज़ मेकर्स के लिए सीख भी है. वीकेंड में एक साथ साढ़े सात घंटे या पूरे वीक शाम को एक-एक घंटा लगाकर आप दी फैमिली मैन का पहला सीज़न निपटा सकते हैं.


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