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सुरेखा सीकरी के वो यादगार सीन्स, जो उन्हें हिंदी सिनेमा का स्तंभ बनाते हैं

16 जुलाई, 2021. सिनेमा जगत ने अपनी एक नायिका खो दी. वो नायिका जिसके किरदार भले ही पहली नज़र में साधारण लगे लेकिन बुनियादी स्तर पर वे उतने ही खरे, सशक्त और मजबूत साबित होते थे. हम बात कर रहे हैं सुरेखा सीकरी की. वो सुरेखा सीकरी, जो किरदार के छोटे स्क्रीन टाइम से विचलित नहीं होती थीं. बल्कि वो सीमित स्क्रीन टाइम में भी संभावनाएं खोजती थीं. कि कैसे उस किरदार को प्रभावशाली बनाया जाए. इतना प्रभावशाली कि 02 घंटे की फिल्म खत्म होने के बाद भी 02 मिनट के लिए स्क्रीन पर आए उस किरदार को लोग याद रखें. सिनेमा हॉल से अपने घर तक के सफर में उस किरदार की कही बातों पर मनन करते रहें.

इसलिए वो कागज पर लिखे अपने किरदार को बारीकी से पढ़ती थीं. वो इच्छुक रहती थीं ये जानने को कि किरदार किस भाव से लिखा गया है. लिखते वक्त लिखने वाले की मनोदशा क्या थी. आर्ट सिनेमा हो या मेनस्ट्रीम एंटरटेनमेंट फिल्म, उन्होंने अपने किरदार के साथ मक्कारी नहीं की. बराबर एनर्जी के साथ डिलिवर किया. उनकी फिल्म ‘बधाई हो’ याद कर लीजिए. जहां उन्होंने दादी का किरदार निभाया. वो दादी जो ‘सेक्सी’ शब्द बोलने पर भी ठहाका लगवा दे. वो दादी जो अपनी बहू को ‘वैध साब की छोरी’ कह कह के ताने कसती. लेकिन समय आने पर बहू की हिमायत भी करती. जरा वो सीन याद कीजिए जब प्रियंबदा बनी नीना गुप्ता के ससुराल वाले उनके प्रेग्नेंट होने पर ताने मारते हैं. तब सुरेखा गरज पड़ती हैं. और उसके ससुराल वालों को एक-एक कर लाइन हाजिर करती हैं. उनका बेटा रोकने आता है. उसे भी झिड़ककर पीछे हटने को कहती हैं. गुस्सा ऐसा फूटता है कि उनका पूरा शरीर थर्राने लगता है. सांस की गति तेज़ी से ऊपर नीचे होने लगती है. किरदार की ऐसी बातें किसी कागज पर नहीं लिखी होती. इन बारीकियां को, भावों को एक्टर खुद जन्म देते हैं. ऐसे एक्टर जो अपने काम की गुणवत्ता में यकीन करते हों. सुरेखा सीकरी ऐसे एक्टर्स में से एक थीं.

आज की जेनरेशन सुरेखा सीकरी को ‘बधाई हो’ फेम के तौर पर पहचानती है. लेकिन जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ‘बधाई हो’ जैसे सब्जेक्ट पर फिल्में आम नहीं थी, उस वक्त भी सुरेखा सीकरी मजबूत किरदारों को परदे पर उतार रही थीं. आज उनके करियर की कुछ ऐसी ही यादगार परफॉरमेंसेज़ के बारे में जानेंगे.

Spotlight


#1. तमस

1947 का भारत-पाकिस्तान विभाजन. जिसने न जाने कितने परिवारों को असहनीय यादें दी. इंसानी वहशीपन के वो मंजर दिखाए जिनकी कल्पना कोई सपने में भी नहीं कर सकता था. विभाजन से उपजी वेदना को गोविंद निहलानी ने अपनी टेलिविज़न फिल्म का आधार बनाया. फिल्म थी ‘तमस’. एक-से-एक दिग्गज कलाकारों से सुसज्जित. ओम पुरी, दीपा साही, पंकज कपूर, अमरीश पुरी, केके रैना जैसे नाम. किसे छोड़ें और किसे गिने. फिल्म के एक्टिंग डिपार्टमेंट के हिस्से एक नैशनल अवॉर्ड भी आया. लेकिन उस पर ऊपर बताए किसी भी दिग्गज एक्टर का नाम नहीं लिखा था. बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का नैशनल अवॉर्ड मिला सुरेखा सीकरी को. उनके किरदार रज्जो के लिए. रज्जो एक पाकिस्तानी मुसलमान थी. जो अपने घर एक बूढ़े सिख दंपत्ति को पनाह देती है. घर के मर्दों का डर भी है. खासतौर पर बेटे का. जानती है कि उसे पता चलेगा तो बूढ़े दंपत्ति को जिंदा नहीं छोड़ेगा. लेकिन इतनी कठोर भी नहीं कि बूढ़े दंपत्ति को मार-काट के बीच झोंक दे. इसलिए अपने घर में छुपा लेती है. बेटे को पता चल जाता है. अपनी कुल्हाड़ी को सिख दंपत्ति के खून से रंगने के लिए दौड़ता है. आधी रात में उनकी कोठरी के दरवाज़े पर निर्मम प्रहार करता है.

Surekha In Tamas 3
बार-बार सिर पर दुपट्टे को संभालती रज्जो को कौन भूल सकता है.

अंदर सो रहे उसके मां-बाप जाग जाते हैं. परिस्थिति भांपकर मां फौरन दौड़ती है. बेटे के वहशीपन को लेकर जो डर था, वो हवा हो जाता है. जो काम शायद उसके पति को करना चाहिए था, उसकी जिम्मेदारी खुद लेती है. और आ खड़ी होती है बेटे और दरवाज़े के बीच. बेटा आंखों में खून भर चीखता है. रज्जो उसे कैसे भी दरवाज़े से दूर करने में जुट जाती है. इस दौरान बीच-बीच में नज़र घुमाकर पति की ओर भी देखती है. कि शायद उससे कोई मदद मिल जाए. पूरे सीन में बेटे के चिल्लाने की आवाज़ से शायद रज्जो के किरदार की ये महीन चीज़ें दब जाएं. यहां उस औरत ने सिर्फ अपने बेटे को नहीं रोका. बल्कि, सदियों से घर की महिलाओं में पुरुषों का सामना करने के नाम से बने डर का सामना किया.


#2. नसीम

‘नसीम’. 1992 के बाबरी कांड के इर्द-गिर्द बुनी गई फिल्म. जिसमें मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी ने अभिनय किया था. इसका एक सीन है. मोहल्ले में एक दहेज़-हत्या हो चुकी है, जिसे भारतीय विवाह संस्था में मान्यताप्राप्त रीज़न ‘स्टोव फटने से मृत्यु’ में खपाया जा रहा है. फिल्म के मुख्य किरदार के परिवार में बेचैनी है इस घटना को लेकर. घर के बड़े लड़के का दोस्त भी आया हुआ है. दुबला-पतला सा वो लड़का आवाज़ में बेतहाशा नफ़रत घोल के कहता है,

“पता नहीं ये हिंदू दुल्हनों के स्टोव ही ज़्यादा क्यों फटते हैं?”

तमतमाई हुई आवाज़ में सुरेखा सीकरी पलटकर जवाब देती है,

“हमारे लिए बुर्का और तलाक़ ही काफ़ी है ज़फर साहब!”

Hamare Liye Talaaq Aur Burqa
तपाक से ज़फर को चुप करा देती हैंं.

चंद पलों में अपनी बेचैनी को गुस्से में बदल लिया सुरेखा सीकरी ने. सीन के शुरुआत में सुरेखा का किरदार दुल्हन की मौत को लेकर बेचैन था. ज़फर की बात सुनकर इस बेचैनी ने गुस्से का रूप ले लिया. बेचैनी और गुस्से के बीच का ट्रांज़िशन इतना बारीक था कि नोटिस नहीं किया जा सकता. ये कमाल था सुरेखा सीकरी का.


#3. सरदारी बेगम

संगीत की महफ़िल सजी हुई है. एक औरत ठुमरी गा रही है. रसूखदार हेमराज माहौल का लुत्फ ले रहे हैं. तभी कमरे में एक लड़की घुस आती है. गायकी में खलल पड़ जाता है. गाने वाली औरत भारी आवाज़ में पूछती है. बेरुखी से,

“ऐ कौन हो तुम लड़की? ऐसे मुंह उठाए काहे घुस आई?”

Scene 3
श्याम बेनेगल के डायरेक्शन में बनी फिल्म.

लड़की कहती है कि वो गाना सीखना चाहती है. पल में गाने वाली औरत के भाव बदल जाते हैं. तना हुआ चेहरा ढीला पड़ जाता है. जिस पर एक मुस्कान देर सवेर अपना पता ढूंढ ही ले. चेहरे को हल्का सा झुकाती है. गाल को आधी बंद मुट्ठी का सहारा देकर लड़की से उसका नाम पूछती है. लेकिन उसके इस दूसरे सवाल में पहले वाला रौब नहीं होता. आवाज़ में वो जोर नहीं होता. ऐसे पूछती है जैसे घर की छोटी बेटी ने कोई नादानी कर दी हो. एक डायलॉग से दूसरे में इतना अंतर. वो भी बिना किसी एफर्ट के. ये था सुरेखा सीकरी का कमाल. फिल्म ‘सरदारी बेगम’ में उन्होंने गाने वाली औरत का रोल अदा किया था.


#4. परिणति

कहानी उस समय के राजस्थान की है जब मेघ दूध बरसाते थे. और रेगिस्तान में दूब उगती थी. लेकिन कुछ इंसानी भाव तब भी जस के तस थे. जैसे मोह, लालच और पश्चाताप. गांव का सेठ बेटा होने पर गांव में धर्मशाला और प्याऊ खुलवाता है. और संभालने की जिम्मेदारी देता है गणेश और कुरजा को. दोनों पति-पत्नी की जान बसती है अपने बेटे लक्ष्मण में. लेकिन बालपन में ही लक्ष्मण उनसे दूर हो जाता है. जब सेठ उसे अपने साथ शहर ले जाता है. कुरजा का दिल पसीजता है. लेकिन बेटे के बेहतर भविष्य के लिए उसे जाने देती है.

After Son's Murder 1
लालच, मोह और पश्चाताप की कहानी.

अब दोनों पति-पत्नी का एक ही लक्ष्य. इतना धन जुटा लें कि बेटे को वापस बुला सकें. बेटे को फिर से आंखों के सामने देखने का मोह जन्म देता है लालच को. कुरजा की बोली से लेकर उसकी आंखें तक से कुटिलता टपकने लगती है. दोनों अपनी धर्मशाला में ठहरने वाले मुसाफिरों की हत्या कर उनका धन हड़पना शुरु कर देते हैं. ऐसा करते-करते कई साल बीत जाते हैं. एक रात मुख पर सूरज सा तेज लिए एक लड़का उनके यहां ठहरने आता है. लालच से अंधे बूढ़े दंपति उसकी भी हत्या कर देते हैं. अगली सुबह पता चलता है कि जिसका खून बहाया वो उनका अपना था. दोनों सुन्न पड़ जाते हैं. चीख-चीत्कार नहीं फूटता. कुरजा को देखकर लगता है कि जैसे किसी ने उसके शरीर से प्राण खींच लिए हो. एक पुतला बचा है जिसमें अपनी कोई जान नहीं. पहले बेटे के लिए मोह, फिर लालच और अंत में पश्चाताप. तीनों भावों को समान दर्जे से सामने लाईं सुरेखा सीकरी, जिन्होंने फिल्म में कुरजा का किरदार निभाया.


#5. सलीम लंगड़े पे मत रो

अमीना. मुंबई के चौल में रहती है. अपने छोटे-से परिवार के साथ. लेकिन अमीना फिल्म की सेंट्रल कैरक्टर नहीं. ये कहानी थी उसके सलीम की. एक लोकल गुंडा. हफ्ता वसूली करता है. मवालीगिरी करता है. यही वजह है कि उसके अपने आदर्शवादी पिता से नहीं बनती. बाप और बेटे में बहस भी होती है. चूंकि हम फिल्म अमीना के चश्मे से नहीं देख रहे, इसलिए वो हमें अधिकतर सीन्स में पीछे दिखाई देती है. जैसे सलीम अपने पिता से झगड़ रहा है, दोनों बाप-बेटे फ्रेम में सबसे आगे हैं. और अमीना बैकग्राउंड में खड़ी दिखती है. घर के मर्द जब झगड़ने लगें तो बीच में औरतों का क्या काम, ठीक इसी विचारधारा का सूचक बन अमीना पीछे खड़ी रहती है. अमीना भले ही बैकग्राउंड में है. आगे खड़े बाप-बेटे में चिल्लम-चिली मची है. फिर भी आपका अटेंशन अमीना पर जाएगा. झगड़े के बीच उसकी कांपती उंगलियों पर जाएगा.

Baap Aur Bete Ka Jhagda 1
बैकग्राउंड में रहते हुए भी सुरेखा अपनी स्क्रीन प्रेजेंस महसूस करा देती हैं.

इसे कहते हैं मजबूत स्क्रीन प्रेज़ेंस का नमूना. जो अमीना के रोल में सुरेखा सीकरी ने दिया. सुरेखा ने फिल्म में पवन मल्होत्रा की मां का किरदार निभाया. पवन और सुरेखा की उम्र में ज्यादा बड़ा फर्क नहीं. फिर भी सुरेखा को देखते वक्त आपको ‘सारांश’ वाले अनुपम खेर याद नहीं आएंगे. ऐसा काम किया सुरेखा सीकरी ने फिल्म में.


#6. कबाड़ (स्टार बेस्टसेलर्स)

“देख जब चिलचिलाती धूप में प्यास लग रही हो, गला सूख रहा हो. ऐसे में कोई एक लोटा ठंडा पानी पिला दे, उसी ठंडे पानी की तरह है ताई.”

एक कबाड़ी ये कहता हुआ अपनी पत्नी के साथ चले जा रहा था. अपनी ताई के पास. पत्नी ताई से परिचित नहीं थी. और न ही दर्शक. लेकिन उसकी कही इस एक लाइन से सबके दिमाग में ताई की एक तस्वीर बन जाती है. ताई जो थोड़ी-सी अड़ियल हो. ज़िद्दी हो. बात-बात में मारने के लिए हाथ उठा दे और मारे नहीं. हाथ उठे भले ही लेकिन गुस्से में नहीं. बल्कि घर के किसी छोटे की बेवकूफी पर. उस सदस्य की अल्हड़पन में कही किसी बात पर. उस कबाड़ी की मुंहबोली ताई भी कुछ ऐसी ही है. बड़े-बूढ़ों की कही बातों में मानती है. इसलिए तो कभी भी कबाड़ी के मुंह पर दरवाज़ा बंद नहीं करती. शायद यही अपनत्व उस कबाड़ी को ताई के घर तक ले जाता है. वरना कबाड़ी दिन में कितने घर जाते हैं. ऐसे में कौन याद रह जाए भला.

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रघुवीर यादव और सुरेखा सीकरी.

साल 1999 से 2000 तक स्टार प्लस पर एक शो टेलीकास्ट हुआ. 36 एपिसोड्स का शो जहां अनुराग कश्यप, उषा दीक्षित, हंसल मेहता, तिग्मांशु धूलिया और इम्तियाज़ अली जैसे डायरेक्टर्स ने अलग-अलग कहानियां डायरेक्ट की. उन्हीं में से एक कहानी थी ‘कबाड़’. जिसे डायरेक्ट किया उषा दीक्षित ने. ‘कबाड़’ के कबाड़ी बने थे रघुवीर यादव. और उनकी ताई बनी थी सुरेखा सीकरी. सुरेखा ऐसी ताई बनीं, जो शायद सबके परिवार में नहीं हो. लेकिन उन्हें देखकर यही लगेगा कि काश हमारी भी ऐसी कोई ताई होती. जो बिना किसी झिझक इतना प्यार लुटाती.


#7. ज़ुबैदा

एक डाइनिंग टेबल. बीचों-बीच वाली कुर्सी पर एक आदमी बैठा है. खाने में व्यस्त. दाएं हाथ की ओर उसकी पत्नी बैठी है. माथे को एक हाथ से दबाए. एकटक टेबल पर अपनी नज़र गड़ाए हुए. उसके मन में जैसे कोई तूफान उबल रहा हो. नज़र इतनी पैनी है कि किसी का भी दिल छेद दे. औरत के ठीक सामने वाली कुर्सी पर एक बच्चा बैठा है. जिसे माहौल का तनाव भांपकर अंदर भेज दिया जाता है. पत्नी के गुस्से का कारण सामने आता है. वो अपनी बेटी को सुपुर्द-ए-खाक कर के आई थी. जहां पति ने आना जरुरी नहीं समझा. पूछने पर कहा कि लाश, कफन और कब्रिस्तान, ये सब मुझसे नहीं देखा जाता. पत्नी बिना पलकें झपकाए कहती है,

“मैं दिल पर पत्थर रख कर गई थी वहां और आप नहीं जा सके.”

पति बेरुखी से जवाब देता है कि नहीं जा सका. इतना कहना था कि पत्नी के सब्र का बांध टूट जाता है. हाथ में छुरी उठाकर धम से उसे टेबल पर दे मारती है. कुर्सी से उठकर अपना हाथ बढ़ाती है पति के गिरेबान पर. उसे झटका देकर किसी नींद से बाहर लाने की कोशिश करती है. कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई उसकी आवाज़ कहती है,

“हमारी इकलौती बच्ची अब नहीं रही. वो मर चुकी है. मर चुकी है. मर चुकी है. अब तो उसे माफ कर दो.”

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फिल्म खत्म होने के बाद भी ये सीन आपको याद रहेगा.

अपनी बात पूरी कर पाने से पहले ही फूट-फूटकर रोने लगती है. जब देखती है कि उसके आंसुओं का भी पति के कठोर दिल पर कोई असर नहीं हुआ, तो सुबककर अपनी कुर्सी पर बैठ जाती है.

ये सीन था श्याम बेनेगल की फिल्म ‘ज़ुबैदा’ से. अभी जिन पति-पत्नी की बात हुई, उनका रोल निभाया था अमरीश पुरी और सुरेखा सीकरी ने. फिल्म की लीड नायिका भले ही करिश्मा कपूर थीं. लेकिन सुरेखा सीकरी को उनके इस सीन के लिए भुलाया नहीं जा सकता. फिल्म खत्म होने के बाद भी ये सीन ज़हन में बना रहता है.


#8. मम्मो

सुरेखा सीकरी को अपना दूसरा नैशनल अवॉर्ड दिलाने वाली फिल्म. यहां उन्होंने सपोर्टिंग रोल निभाया. मम्मो की बहन का रोल. जो अपने नवासे के साथ रहती हैं. मम्मो पाकिस्तान से आई हैं, अपनी बहन के घर रहने. गर्म दूध को उबलते देखा है? नज़र हटी और उबल कर बाहर आ गया. लेकिन दूध के बारे में एक और बात कही जाती है. उसके उबाल के बारे में. कि जितना जल्दी ऊपर चढ़ेगा, ठीक उतना ही जल्दी नीचे दब जाएगा. मम्मो की बहन भी कुछ ऐसी ही हैं. झट से गुस्सा आएगा और उतनी ही जल्दी उतर भी जाएगा. फिल्म से ही एक मिसाल देते हैं. मम्मो की बहन को अपने नवासे की अलमारी से प्लेबॉय मैगज़ीन मिलती है. गुस्से में लाल नवासे की तरफ दौड़ती हैं. एक के बाद एक चपत लुटाने लगती हैं. ‘नाक कटा दी बेशर्म, नासपीटे’ जैसी बातें फूटती हैं मुख से. मम्मो के बीच-बचाव में आने पर वो उसे भी नहीं बख्शती. कहती हैं,

“ये मेरा खाए, ये मेरा पिए. और मेरी ही छाती पर मूंग दलती है. पाकिस्तान वाले ठीक कहते थे, ये डायन है. सबको खा जाएगी. मेरी ज़ुबैदा को खा गई.”

Mammo's Sister
फिल्म के एक दूसरे सीन में फरीदा जलाल और सुरेखा सीकरी.

ये सुनकर मम्मो का दिल बैठ जाता है. एक कोने में जाकर चुपचाप बैठ जाती है. मानो उसे उसकी जगह दिखा दी गई हो. बहन को भी आभास हो जाता है कि गुस्से में क्या-कुछ अनर्गल बोल गई. फूलती सांस को पकड़ते हुए कहती है,

“जाने क्या-क्या बोल गई. पता नहीं मुझे क्या हो गया मम्मो.”

मम्मो हंसकर टाल देती है. कि बात का बतंगड़ बनाना तो तुम्हारी पुरानी आदत है. साथ ही कहती है,

“बंबई की बारिश की तरह है तुम्हारा गुस्सा, अभी है, अभी नहीं है.”

आगे दोनों बहनें बचपन की गुड़िया पर की लड़ाई को याद करने लगती हैं.

सुरेख सीकरी की सिनेमा जगत को दी गई यादें अमिट हैं. उनके सशक्त किरदार हमेशा याद किए जाएंगे. ये थी हमारी ओर से उनको एक छोटी सी श्रद्धांजलि. आज के मैटिनी शो में हमनें सुरेखा सीकरी की फिल्मों के यादगार सीन्स पर बात की. विदा लेने से पहले उनके एक और सीन का जिक्र किए देते हैं. फिल्म थी ‘सरफरोश’. जहां सुरेखा जी ने सुल्तान की मां का किरदार निभाया. रोल छोटा था. लेकिन वहां भी उन्होंने अपनी छाप कैसे छोड़ी, ये आप फिल्म देखकर समझिए.


वीडियो: सुरेखा सीकरी के निधन पर मनोज बाजपेयी, अरविंद केजरीवाल, पूजा भट्ट समेत अन्य ने क्या कहा?

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